संसार

एक दिन मैंने “द हिडेन लैम्पस” में “एना प्रजना डॅगलस” के शब्दों में पटाचारा की कथा पढ़ी। प्रस्तुत है (आंशिक अनुवाद के पश्चात) –

कुछ २५०० वर्ष पहले भारतवर्ष के एक धनी परिवार में पटाचारा का जन्म हुआ पर अंततः वह अपने सामानवाही नौकर से विवाह करने के लिये घर से भाग गयी। जब वह अपने दूसरे पुत्र को जन्म देने वाली थी, तभी उसके साथ एक त्रासदी हो गई। एक ही दिन में उसने अपना सम्पूर्ण परिवार खो दिया। कहा जाता है कि उसके पति को विषैले सर्प ने डस लिया। उसी दिन उसके नवजात पुत्र को एक बाज़ उड़ा ले गया। कुछ ही पलों में अचानक उसका घर ढह गया, जिसमें उसके भाई, माता और पिता की मृत्यु हो गयी जबकि उसका ज्येष्ठ पुत्र नदी में डूब गया।

दुख से पागल होकर पटाचारा ने अपने कपड़े फाड़ डाले और एक उन्मत्त व्यक्ति की भांति भटकने लगी। बिखरे केश, अस्त-व्यस्त व नग्न शरीर लेकर वह लम्बे समय तक इधर-उधर भटकती रही जब तक कि वह घुमावदार रास्तों से होती हुई जेतावन नहीं पहुँच गयी, जहाँ बुद्ध शिक्षा दे रहे थे। उसकी घृणित, अशोभनीय अवस्था को देखकर कुछ वरिष्ठ भिक्षुक उसे बुद्ध की दृष्टि के सामने से हटाने के लिये उठे। बुद्ध ने अपना हाथ उठाया और संकेत करते हुए उन्हें रोका।

पटाचारा उनके पैरों पर गिर पड़ी। उसके आँसू तो बहुत पहले सूख चुके थे। उसके बालों में गांठ पड़ गये थे, शरीर मैला था और उससे दुर्गंध आ रही थी। अपने रूप से अनभिज्ञ, वह कभी हिचकी भर कर रोती और कभी चिल्लाती।
“हे कुलीन महिला,” बुद्ध कोमलता से बोले – “सचेत हो”।

उनके दयापूर्ण शब्दों से पटाचारा को स्थिरता का अहसास हुआ। उसे तत्क्षण ज्ञात हुआ कि वह नग्न थी। एक व्यक्ति ने उसे अपना लबादा दिया और पटाचारा ने अपने शरीर को ढ़क लिया। उसने अपनी त्रासदी का वर्णन किया तथा बुद्ध से सहायता की भीख माँगी।

“मैं तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता,” बुद्ध ने कहा “कोई भी नहीं कर सकता। अनगिनत जन्मों से तुम अपने प्रियजनों के लिये रोती आ रही हो। तुम्हारे अश्रु से चारों महासागर भर सकते हैं। किंतु कोई भी व्यक्ति कष्टों से पूर्ण रूप से बच नहीं सकता। इस बात को जानते हुए ही एक बुद्धिमान व्यक्ति जागृति के पथ पर चलता है।”

बुद्ध की उपस्थिति और उनके शब्दों से पटाचारा का अंतः करण एक गहन शांति से भर गया। फिर बुद्ध ने धम्मपद (२८८-२८९) के सूत्र कहे –

“यहाँ शरण देने हेतु कोई पुत्र नहीं है। जिसे मृत्यु ने पकड़ लिया हो उसके लिये कोई पिता, कोई परिवार नहीं हैं। संबंधियों में भी कोई शरण संभव नहीं है। इस बात से जागरूक होकर, बुद्धिमान व्यक्ति, जो कि सद्गुणों से नियंत्रित है, उन्हें उस पथ को बनाना चाहिये जो निर्वाण को जाता है।”

उसे विधिवत संघ में सम्मिलित कर लिया गया और बुद्ध ने उसे अस्थायित्व पर ध्यान करने को कहा।

“पटाचारा,” उन्होंने कहा “एक दिन मनुष्य को तो मरना ही है। एक क्षण के लिये ही अस्थायित्व के सत्य को देखना इस बात से बेहतर है कि इसे बिना जाने सौ वर्षों तक जिया जाए।”

अस्थायित्व अस्तित्व का तत्व है। यह संसार जीवित है, क्योंकि यह निरंतर बदल रहा है। हमारे संघर्षों का जड़ है स्थायित्व की खोज – किसी प्रकार निरर्थक रूप से यह सुनिश्चित करना कि हमारे जीवन में जो भी हमें प्रिय हो, वे वैसे के वैसे रहें। जबकि सामंजस्य व उद्विकास दूसरी ही प्रणाली से फलते-फूलते हैं। वह है – स्वतंत्रता का नियम।

आप जिसको भी पकड़ कर रखना चाहते हैं, उसे समाप्त कर देते हैं। किसी भी वस्तु को जीवित रहने के लिये एक स्तर की स्वतंत्रता चाहिये। कल्पना करें यदि आकाश बादलों को पकड़ के रखता, उन्हें कहीं जाने न देता। तो कहीं वर्षा नहीं होती और अंततः समुद्र भी सूख जाते और साथ ही हमारी पृथ्वी भी समाप्त हो जाती। प्रकृति अस्थायित्व के सिद्धांत पर ही जीवित है। नित बदलती सृष्टि के साथ निश्चिंत रहना ही जागृति है। यह सरल नहीं है किंतु निश्चित रूप से संभव है।

यदि कोई आपके जीवन में नहीं रहना चाहता, उसे जाने दें। किसी साथी, व्यक्ति, मालिक या किसी वस्तु को पकड़ कर रखने में कोई बुद्धिमता नहीं है। अंततः हर किसी को और हर वस्तु को नष्ट होना है। हम जो कुछ भी चाहते हैं उससे विछोह का कोई ‘यदि’ नहीं है, है तो केवल ‘कब’। यह अनिवार्य है। मात्र कुछ समय की ही बात है। हमारी बालावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था सभी अवस्थाएं बीत जाती हैं। जो कल आपको अत्यंत प्रेम करते थे हो सकता है कल आपसे घृणा करें। आप कल जिसे अत्यंत प्रेम करते थे, आज हो सकता है उसकी याद आपको दुख ही देती है। यही संसार है- आवर्ती रूप से क्षण-भंगुर।

जिस क्षण आपको यह स्पष्ट होता है कि कुछ भी शाश्वत नहीं है और आप इसे सहज स्वीकार कर लेते हैं, तो ज्ञानोदय होने ही वाला है। इसके पश्चात सदैव पूर्ण शांति एवं सामंजस्य की अवस्था आती है।

सुबह नाश्ते के समय एक युवती ने अपने पति से कहा “‘प्रिये, कल रात मैंने सपने में देखा कि तुम मुझे मोतियों का एक हार दे रहे थे। तुम्हे क्या लगता है इसका क्या अर्थ होगा।”

मुस्कुराते हुए आदमी ने अपनी पत्नी को चूमते हुए कहा, “तुम्हे आज रात पता चल जाएगा।”

उस रात वह जब घर आया तो उसके पास सुंदर लिपटा हुआ एक पैकेट था। चंचलता से हँसते हुए उसने अपनी पत्नी को वह पैकेट दिया। उसकी पत्नी प्रसन्नता से उछल पड़ी और अपने उपहार को खोलने लगी। उसने फीते और पैकेट को खोला।

इसमें एक पुस्तक थी जिसका नाम था, “स्वप्नों के अर्थ”!

हम सपने देखते हैं कि जीवन हमें मोतियों का हार दे रहा है, जबकि वह वास्तविकता में हमें सपनों का अर्थ दे रहा होता है। यह असंगति ही प्रमुख कारण है इस बात का कि क्यों कुछ व्यक्ति सदैव भावनात्मक उतार चढ़ाव का शिकार होते रहते हैं। वे स्थायित्व चाहते हैं, कोई गारंटी। जबकि ऐसा कुछ है ही नहीं। सत्य तो यह कि अबाध रूप से हर वस्तु नश्वर है, एक क्षणिक अवस्था।

समय पे फल होत है, समय पे झरि जात
सदा रहे नहिं एक सा, का रहीम पछतात

जब समय आता है तो पेड़ फलों से लद जाता है और फिर समय के साथ इसके फल और पत्तियाँ झड़ जाते हैं। रहीम कहते हैं कि क्यों पछताते हो, समय तो चला ही जाता है।

यह अस्थायित्व के सत्य को अपने हृदय में आत्मसात करने की सबसे प्रभावशाली स्वप्रतिज्ञा है। जब भी आप दुखी या विचलित हों, जब भी आपको लगे कि सब समाप्त हो गया है, तो अपने हृदय पर हाथ रखकर स्वयं से कहें कि यह समय चला जाएगा। कि दुख भी जीवन का अंश है। यह भी एक ऋतु समान है। अपने हाथ के कोमल स्पर्श से अपने हृदय पर दस्तक दें और कहें कि परीक्षा लेने वाली यह घड़ी सदैव नहीं रहेगी।

जब भी आप सातवें आसमान पर हों और सोच रहे हों कि आपका जीवन बहुत उत्तम है, अपने हृदय पर पुनः दस्तक दें और स्वयं को याद दिलाएं कि यह समय भी सदैव नहीं रहेगा। यह भी उन्हीं बदलते ऋतुओं में से एक है। इससे आपके मन की शांति पर अनोखा परंतु सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आप और अधिक केंद्रित और स्थिर हो जाते हैं।

समय की पूर्णता में, वर्तमान समय को अगले वर्तमान समय के लिये स्थान बनाना ही पड़ता है। वर्तमान को भविष्य के लिये झुकना ही पड़ता है। हर क्षण के उभरने और बीतने का कभी समाप्त न होने वाला खेल ही हमारे जीवन की अनिश्चितता को सुंदरता देता है। यह किसी दबाव या नियंत्रण से परे है। अधिक से अधिक आप इसे जी सकते हैं। प्रेम कर सकते हैं। और आनंदित हो सकते हैं। कृतज्ञता से। यह शांति का मार्ग है। और मैं कहना चाहूँगा कि शांति ही एकमात्र खज़ाना है। अन्य सब तो अल्पकालिक प्राप्ति है।

शांति।
स्वामी