भावनात्मक उपचार – मानसिक छाप मिटाना

अपने वचनानुसार मैं आपके समक्ष मानसिक छापों को मिटाने का अभ्यास वर्णित कर रहा हूँ। भावनाएं प्रतिबिंबों एवं शब्दों के रूप में संग्रहीत होती हैं। शारीरिक परिताड़ना के कष्ट से गुजरने वाले व्यक्तियों के शारीरिक घाव भले ही समय के साथ भर जाएँ, किन्तु, यह मन द्वारा हर घटना व हर विचार को प्रतिबिंब व शब्द रूप में संग्रहीत करके रखने और उसे पुनः स्मरण कर पाने की रहस्यमयी क्षमता ही है जो महानतम दुःख व संताप का हेतु है। अपने शांत क्षणों में जब आप कष्टमयी घटनाओं का स्मरण करते हैं, तब आप स्वाभाविक ही उदासी अनुभव करते हैं। आप जितना अधिक उन्हें विस्मरित करने का प्रयत्न करते हैं, उतनी अधिक बोझिलता बढ़ती जाती है; जितनी अधिक तेजी से आप उनसे दूर भागना चाहते हैं, उतनी अधिक तीव्रता से वे लौट आते हैं। उस क्षण, सबसे उत्तम कार्यविधि भी प्रायः कम ही काम आती है। एक प्राकृतिक/सहज चिकित्सा होती है व एक सचेतन चिकित्सा पद्धति। प्राकृतिक चिकित्सा बहुत लंबी अवधि ले सकती है, और कभी कभी हो ही नहीं पाती। भावनात्मक चिकित्सा का अभ्यास, मानसिक प्रतिबिंबों व शब्दों को मिटाने का स्वयं का प्रयास होता है, व सचेतन चिकित्सा के अंतर्गत आता है। आपका प्रयास जितना प्रबल होगा, परिणाम उतना ही उन्नत व तीव्र गति से आएगा।

निराशा, क्रोध, चिंता, बोझिलता, विशाद इत्यादि से ग्रस्त अनुभव करना एक भावनात्मक रूप से घायल व्यक्ति के लक्षण मात्र हैं। जैसा कि मैंने पहले भी एक बार कहा था कि इसका अर्थ है कि आप अभी भी अपने अन्तःकरण में कहीं किसी ठेस से क्षतिग्रस्त हैं, दर्द अभी भी बाकी है। हो सकता है आपने उसे मात्र अस्वीकार किया हुआ हो। एक सीमा के बाद, यह दृष्टिकोण आपके लिए और सहायक नहीं होने वाला। मात्र लक्षणों से लड़ने का कोई लाभ नहीं। स्वयं को पूर्ण रूप से स्वस्थ करने हेतु मूल कारण तक पहुँचना होगा। अन्य शुभचिंतक, जिनकी सहायता के आप इच्छुक हैं, और जो वास्तव में अच्छे व सच्चे चिकित्सक हैं, वे आपको उसके मूल तक तो पहुंचा सकते हैं, किन्तु, अंततः, आपका पूर्ण उपचार अन्तःकरण में ही होगा; वह आपके स्वयं के प्रयास से ही संभव है। यह कुछ इस प्रकार है कि अन्य व्यक्ति आपको कोई नौकरी/कार्य दिलवा तो सकता है, किन्तु आपकी कार्य क्षमता के बल पर ही आप वेतन के अधिकारी होंगे। अधिक विलंब न करते हुए, अब मैं आपके साथ भावनात्मक चिकित्सा के दो अति उत्तम उपाय साझा कर रहा हूँ।

योगिक पद्धति

यह उपाय कुछ कठिन, किन्तु स्थायी है। यह न केवल वर्तमान की घटना, अपितु उससे कहीं आगे तक का उपचार करने में सक्षम है। हर योगिक प्रक्रिया की सफलता उस व्यक्ति विशेष के स्थिर मुद्रा में बैठने, केन्द्रित होने व घटनाओं को मानसिक रूप से स्पष्ट (मानसदर्शन) देख पाने की क्षमता पर निर्भर करती है। एक मुद्रा में स्थिर बैठने से प्राथमिक ऊर्जाएँ स्थिर होती हैं, केन्द्रित होना पाँच उच्च स्तरीय ऊर्जाओं को स्थिरता प्रदान करता है, व आपके मन को तैयार करता है और मानसिक रूप से घटना को स्पष्ट देखने से मुख्य चिकित्सा होती है। अपने ध्यान के एक सत्र में आप मानसदर्शन की प्रक्रिया को जितना अधिक समय तक कर पाते हैं, उपचार उतनी तीव्रता से हो पाता है। मानसदर्शन एक शल्यक्रिया की भांति है, रोगी (मन) को पूर्णत: स्थिर मुद्रा में रहना होता है, जबकि शल्यचिकित्सक (आप स्वयं) प्रक्रिया (मानसदर्शन) करता है। उसका क्रम निम्न प्रकार से है –

१. मुद्रा – अपने मेरुदंड को एकदम सीधा रखें व पूर्णत: स्थिर हो कर बैठ जाएँ। टांगों को मोड़ कर बैठना सर्वोत्तम मुद्रा है, तथापि, इस अभ्यास के लिए कोई अन्य आरामदायक मुद्रा भी उतनी ही उत्तम है।
२. नेत्र बंद कर लें।
३. श्वास – कुछ मिनट तक गहरे श्वास लें, मात्र साधारण गहरे श्वास। परिणाम स्वरूप, चेतन मन की तुलनात्मक वृत्तियाँ कुछ हद तक धीमी हो जाएंगी।
४. पूर्वकाल में जिस व्यक्ति अथवा घटना से आपको अतिशय कष्ट, ठेस व दु:ख पहुंचा हो, उसका स्मरण करें। आपका मन उससे जुड़ी सभी भावनाओं व विचारों को स्वतः कड़ीबद्ध रूप में याद करने लगेगा। उस एक व्यक्ति अथवा घटना पर ही केन्द्रित रहने का प्रयास करें।
५. मानस-दर्शन – अपने हृदय चक्र में से कोमल विशुद्ध श्वेत प्रकाश को, करुणा एवं क्षमा के रूप में, निकलते हुए कल्पना करें। अनाहत चक्र, जिसे हृदय चक्र भी कहा जाता है, वह स्थान है जो आपके हृदय के समीप, मनश्च-स्नायु तंत्रिका के रूप में वक्ष स्थल के मध्य में, दोनों स्तनाग्र के बीच, आपके कंठ एवं नाभि के अनुलंब बिन्दु पर स्थित होता है। यदि आपको लगता है कि आपने कभी कोई गलत कार्य किया था जिसके लिए आप अपराध बोध से ग्रस्त हैं, तो स्वयं को क्षमा करने का मानस दर्शन करें। यदि आपको लगता हो कि आपको जो कुछ भी सहना पड़ा, उसमें आप गलत हैं, तो भी स्वयं को क्षमा करें।

जैसे जैसे आप इस अभ्यास को करते चलेंगे, आप भावनाओं के एक विशालकाय भंडार से गुजरेंगे। अपने ध्यान को पुनः उस श्वेत निर्मल प्रकाश पर केन्द्रित करें। स्वयं में उस निर्मल प्रकाश को समाहित होते हुए मानसिक रूप से देखें। स्वयं के साथ वार्तालाप करने में झिझकें नहीं। तथापि, आपका केन्द्रबिन्दु चिंतन व स्मरण पर न हो कर, मानसिक छापों को मिटाने व समाप्त करने पर होना चाहिए। यह सही अथवा गलत का विषय नहीं है, यह तो अपने स्वयं के भले के लिए स्वयं को क्षमा करना है। प्रतिबिंबों से भरे सम्पूर्ण पटल को साफ कर दें। उसे अपने मनभाते दृश्य द्वारा पुनः चित्रित करें। स्वयं के पूर्ण आनंद में होने की कल्पना करें; अपने को मुस्कुराते हुए, प्रसन्न मुद्रा में, पूर्ण स्वस्थ रूप में, व अपने सपनों को जीवंत होते हुए देखें।
६. पुनः कुछ गहरे श्वास लें व धीरे धीरे अपने नेत्र खोलें।
७. यदि आपकी ईश्वर में श्रद्धा है तो अपनी मनभावन प्रार्थना का उच्चारण करें, अथवा तो आपके जीवन में प्राप्त सभी सुख-सुविधाओं के लिए बस कृतज्ञता प्रकट करें।

एक सत्र कम से कम पंद्रह मिनट का होना चाहिए। कृपया इस अभ्यास में एकसमान रूप, दिन प्रातिदिन अटल रहें, मात्र प्रथम सत्र में परिणाम की अपेक्षा न रखें। जब आप यह अभ्यास कई बार, अनुमानतः तीस बार, कर लेंगे, तब आप एक चमत्कार अनुभव करेंगे – कुछ समय पश्चात, आप पाएंगे कि उस व्यक्ति अथवा घटना को स्मरण करने पर अब आप को क्रोध अथवा झुंझलाहट का अनुभव नहीं होगा। इसके विपरीत, अब ऐसी स्मृति आने पर आप विश्रांति अनुभव करेंगे। मायने आपने अपनी भावनाओं को सफलतापूर्वक रूपांतरित कर दिया है, उन्हें बदल दिया है। यह एक सुंदर भाव है, एक सशक्त करने वाला भाव। अधिकांश योगिक प्रक्रियाएं औसतन २८ दिन के नित्य अभ्यास के उपरांत ही परिणाम दर्शाती हैं। साधारणतः छह माह के अभ्यास के उपरांत ही एक साधक अपने अभ्यास में पारंगत हो पाता है। जब आप एक बार मानस दर्शन का गहन अभ्यास करने में सक्षम हो गए तो आप हर वह परिणाम पा सकते हैं, जहां तक आप कल्पना कर पाएँ। आगे के उपचार के सत्र और अधिक परिणाम लाते हैं, वह भी अधिक तीव्रता से।

बौद्धिक पद्धति

सोचें जब एक शिशु को कोई नया खिलौना मिलता है। वह उसकी ओर अत्यंत आकर्षित होता है। जितना अधिक वह उस नए खिलौने के साथ खेलता है, उतनी ही तीव्रता से उसका आकर्षण कम होता जाता है। वह उस खिलौने से उकता जाता है। पहले तो वह उसके साथ ही सोता था, बातें करता था, खेलता था, किन्तु अब वह खिलौना मृत है। उसे देखने पर भी शिशु में कोई भाव उत्पन्न नहीं होते। इसी प्रकार, स्वाभाविक रूप से ही, हालांकि यह एक विडम्बना है, जब जब आप अपशब्द, अस्वीकृति, असफलता, धोखा, झूठ, व दर्द इत्यादि का अनुभव करते हैं, आपके मन को एक नया खिलौना मिल जाता है। जितना अधिक आप इससे दूर रहने का प्रयास करते हैं, आकर्षण उतना ही प्रबल होता जाता है। ऐसी भावनाओं से ऊपर उठने का यहाँ एक सरल उपाय है। इस अभ्यास को प्रभावी रूप से करने हेतु आपको एक दर्पण अथवा श्रुतलेखन यंत्र (डिक्टाफोन) कि आवश्यकता होगी। क्रम बद्ध पद्धति –
१. दर्पण में स्वयं को देखना प्रारम्भ करें, अथवा डिक्टाफोन चालू करें।
२. अपने अतीत के उस दर्दनाक अथवा नकारात्मक प्रसंग का स्मरण करें।
३. उसे शब्दों में बोलना आरंभ करें, दर्पण से वार्तालाप करते हुए, अथवा डिक्टाफोन में रेकॉर्ड करते हुए।
४. उस प्रसंग से जुड़े हर छोटे से छोटे तथ्य का स्मरण करें। उदाहरण के लिए, मान लें कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसे आप दिल से चाहते थे, उसने आपसे संबंध विच्छेद कर दिया हो। वह सूचना, उसके मिलने का समय, स्वरूप, ढंग, आचरण, और उससे जुड़ा सब कुछ पूर्ण रूप से अप्रत्याशित था। वर्षों बीत गए, किन्तु फिर भी आप उससे उबर नहीं पाये। इस अभ्यास के एक अंश रूप में ही, उस प्रसंग का पुनः स्मरण करें। कृपया यह कार्य निर्भीक होकर करें। उस समय आप जिस कमरे में थे उसकी दीवारों का रंग याद करें; वह समाचार मिलने से पूर्व आपने भोजन में क्या खाया था; आपने उस समय कौन से वस्त्र पहने हुए थे; आपके मन में उस समय क्या विचार चल रहे थे; दूसरा व्यक्ति देखने में कैसा था; उस कमरे की सजावट कैसी थी; आसपास क्या क्या था। सब कुछ स्मरण करें और उसे शब्दों में उच्चरित करें।
५. आपको दर्द व कष्ट का अनुभव होगा। आपको भावों का प्रवाहपूर्ण वेग भी अनुभव हो सकता है। कृपया सशक्त व दृढ़ बनें। इसे कई सत्रों में, कई बार दोहराएँ। इस खिलौने के साथ खेलें। अनुमानतः, १५ से २० बार ऐसा करने पर, इसका प्रभाव लुप्त हो जाएगा, सदा के लिए।
६. बाद में आप अपनी ही रेकॉर्ड की हुई आवाज पुनः सुन सकते हैं। जैसे जैसे आप यह करेंगे, आप और अधिक विस्तार से उस प्रसंग का स्मरण कर पाएंगे। एक समय के उपरांत, जैसे जैसे आप ऐसे सत्र दोहराएंगे, वैसे वैसे वह प्रसंग, वह व्यक्ति, आपके जीवन का वह दौर, कुछ भी आपके लिए मायने नहीं रखेगा।

जितनी अधिक विस्तृत जानकारी आप स्मरण कर पाएँ, करें; यह अतिशय महत्वपूर्ण है। उसका कारण यह है – आपको “बो” की याद है? यदि आप विस्तृत बातें पुनः स्मरण नहीं कर पाते तो आप उसके चिह्न मिटा नहीं पाएंगे। यदि आप उन्हें मिटा नहीं पाएंगे तो जब जब भी आप उस रंग की दीवारें देखेंगे; उसी प्रकार के भाव किसी अन्य व्यक्ति के मुख पर देखेंगे; और जो भोजन आपने उस दिन खाया था यदि उसे देखेंगे; तो यह सब चुपचाप आपके अन्तःकरण में नकारात्मक अथवा निराशा के भावों को जगा देगा। अतः, मैं बार बार इस तथ्य के महत्व को बता रहा हूँ कि कृपया जितना अधिक विस्तृत रूप से हो सके, उतना विस्तार से स्मरण करें। जैसे कि कहा जाये कि पांचवें सत्र में स्मरण में लाई गई जानकारी, प्रथम सत्र कि तुलना में कहीं अधिक विस्तृत होगी। अतः, इस अभ्यास को तब तक पुनः करते रहें जब तक आप इससे पूर्ण रूप से उभर नहीं जाते। वह भयावह-भूत विस्तृत जानकारी में ही छुपा बैठा है!

आप यह अभ्यास एक मित्र के साथ मिल कर भी कर सकते हैं, यदि वह बिना पक्षपात के आपको सुनने का इच्छुक हो। आप दोनों बारी बारी से यह अभ्यास कर सकते हैं। आप दूसरे व्यक्ति को दर्द से छुटकारा पाने में सहायक हो सकते हैं और वह आपको। यही कारण है कि दूसरे के साथ दु:ख साझा करना, किसी निष्पक्ष व्यक्ति से बात करने से हर कोई हल्का महसूस करता है। आप जितनी बार भी बातों द्वारा उसे बाहर निकालते हैं, वह उस भावना का प्रभाव कम करता जाता है, और, यही कारण है कि लोग अपने मित्रों के साथ अपने दु:ख साझा करते हैं। यह मन की, दर्द का सामना करने की अपनी स्वाभाविक क्रियाप्रणाली है। जब आप उसके बारे में बात करते हैं तो मन के छाप हल्के होते जाते हैं।

अधिक जानकारी हेतु मेरा कुछ समय पूर्व लिखा यह लेख पढ़ें – “कर्म का प्रभाव एवं मानसिक छाप ”।

कोई भी मानसिक छाप न रहने का अभिप्राय है कि अब कोई दर्द भी नहीं। दर्द न होने का अर्थ है अब आप स्वस्थ हैं, आपका उपचार पूर्ण हुआ। मन का पूर्णत: स्वस्थ होना मानो ऐसा है कि आप परम आनंद व विशुद्ध शांति की वास्तविक स्थिति में पुनः स्थापित हो गए; हर्ष एवं प्रसन्नता की स्थिति; करुणा एवं सहिष्णुता की स्थिति।

स्वयं को स्वस्थ करें; यह आपका स्वयं के प्रति कर्तव्य है। स्वयं का उपचार करें; आप इसके अधिकारी हैं। अपने स्व के भाव में रहें, आप अनमोल हैं।

शांति।
स्वामी