दयालुता का महत्त्व

विजयनगर के सम्राट कृष्णदेवराय के मंत्री अपने राजा की जय जयकार कर रहे थे। राजा प्रसन्नता और गर्व से प्रफुल्लित था। आखिरकार, यह उसका सक्षम शासन था कि कारागृह लगभग रिक्त थे, उसके राजकोष और अन्न भंडार भरे हुए थे और नागरिकों ने अपने करों का भुगतान कर दिया था।

राजा ने कहा “चूंकि मैं अनुरागशील, न्यायी और ईमानदार व्यक्ति हूँ, इस लिए यह स्वाभाविक है कि मेरी प्रजा भी मेरे जैसी है।”

दरबारियों ने पूरे हृदय से सहमति व्यक्त की और अपने राजा का गुणगान किया। राजा के विशेष सलाहकार, तेनाली राम चुप रहे।

राजा ने तेनाली राम के चेहरे पर निराशा देखते हुए पूछा “क्यों, तेनाली राम, आप मेरे गुणों के विषय में सुनकर प्रसन्न नहीं हैं?”
“आपकी भलाई को कौन नकार सकता है, महाराज! किंतु इस विषय पर मेरे विचार कुछ भिन्न हैं।”
“वह कैसे?”
“निश्चित रूप से, आपका धर्माचरण प्रजा के लिए महत्त्व रखता है और उन्हें प्रेरित करता है, परंतु यह कारण नहीं है कि वे समय पर अपने करों का भुगतान करते हैं या किसी भी प्रकार के दुराचार से दूर रहते हैं।”
“फिर क्या कारण है?”
“वह इसलिए क्योंकि आप के राज्य में उचित नियम व शासन प्रबंध हैं। उनके बिना स्थिति कुछ भिन्न होती।”
“मैं इस बात से असहमत हूँ,” राजा ने कहा। “लोग अच्छे हैं क्योंकि वे स्वाभाविक रूप से अच्छे हैं।”

“निसंदेह, महाराज। परंतु यह भी सत्य है कि लोगों की इच्छाएं व आवश्यकताएं हैं जिनके कारण वे बार-बार भटक जाते हैं। इतना अधिक कि कभी-कभी उच्चतम व्यक्ति भी राज्य के हित को अपने हित से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं मान पाते। यदि हमारा शासन इतना उत्तम नहीं होता, तो यही प्रजा कपट व्यवहार करती।”

मंत्री और राजा तेनाली राम से असहमत थे। उन्होंने तेनाली को इसे सिद्ध करने के लिए कहा और तेनाली ने वह चुनौती सहर्ष स्वीकार कर ली।

अगले ही दिन, आगामी उत्सव के लिए लोगों को उनके एक दिन के दूध उत्पादन से बीस प्रतिशत के अनिवार्य योगदान देने की घोषणा की गई। शहर के बीच में एक गाड़ी पर एक बड़ा बर्तन रखा गया और एक दिन निर्धारित किया गया, जब सभी लोग आएंगे, मंच पर चढ़ेंगे और उस बर्तन में दूध डालेंगे। उन्हें बताया गया कि यह प्रणाली विश्वास पर आधारित है और उनके राजा को अपनी प्रजा की अच्छाई व निष्ठा पर पूरा विश्वास है। सूरज ढलने के पश्चात, गाड़ी को बैल गाड़ियों से खींच कर शाही रसोई में ले जाया जाएगा।

सभी ने इकट्ठा होकर अपना योगदान देने का संकल्प लिया। लोगों ने अपने राजा की प्रशंसा करते हुए आपस में बात की, कुछ ने यह भी कहा कि वे खुशी-खुशी अपने मवेशियों से पूरे दिन का दूध उत्पादन देंगे। पूरा शहर उत्साहित था और हर व्यक्ति ने एक-दूसरे को सूचित किया।

एक गरीब आदमी की पत्नी ने नियत दिन पर उससे पूछा, “आप यह बर्तन कहाँ ले जा रहे हैं?”
“तुम जानती हो कहाँ! आज के दूध उत्पादन का २०% दान करने के लिए।”
“आपको लगता है कि आपका एक बर्तन दूध पर कोई ध्यान देने वाला है? हमारे बच्चों को कौन खिलाएगा?”
“परंतु, मुझे जाना चाहिए,” आदमी ने कहा। “हमारे सभी पड़ोसी जा रहे हैं।”
“जाइये,” उसने कहा, “अवश्य जाइये, परंतु मुझे आप को सही मात्रा में दूध देने दें।” इसके साथ, उसने अपने पती से बर्तन लिया, लगभग उसे खाली कर दिया और फिर पानी से भर दिया। “बस अपने हाथ को उस बड़े बर्तन में रखें और इसे डाल दें। कोई ध्यान नहीं देगा।”

उसी शहर में एक धनी व्यक्ति अपनी पत्नी को दूध का बड़ा बर्तन भरने के लिए डांट रहा था।
“यदि मैं भी इस प्रकार दान करना आरंभ कर दूँ, तब शीघ्र ही हम सड़क पर होंगे!” उसने अपनी पत्नी से बर्तन लिया और उसे एक और बर्तन दिया जिसमें ९०% पानी और १०% दूध था। “यह केवल सफेद रंग का हो वह पर्याप्त है। जब पूरा शहर दे रहा हो, तब दूध या पानी के एक मात्र बर्तन से कुछ बदल नहीं जाएगा।”

सैंकड़ों लोगों की लम्बी कतार बन गई और दोपहर भी नहीं हुई थी कि वह विशाल बर्तन भर गया। एक अन्य बर्तन रखा गया और जब तक सूरज डूबा तब तक एक, दो या तीन नहीं, बल्कि चार बर्तन भर गए और शाही रसोई में ले जाये गए।

राजा ने भरे हुए बर्तनों की ओर संकेत करते हुए कहा, “तेनाली राम! यह देखो मेरी प्रजा कितनी दानशील व दयालु है!”
“निःसंदेह महाराज। यदि आप की अनुमति हो, तो क्या हम दूध को उबाल कर मलाई निकालना आरंभ करें वरना इस गर्मी में यह नष्ट हो जाएगा?”

शीघ्र ही जब उन्होंने दूध को कढ़ाई में स्थानांतरित करना आरंभ किया, वह सामान्य से बहुत पतला लग रहा था, जैसे कि वह दूध नहीं बल्कि छाछ हो। जब उबले हुए दूध से मलाई निकालने का समय आया, तो परिणाम अपेक्षित उत्पादन का पांच प्रतिशत भी नहीं था।

शाही रसोइया ने राजा को सूचित किया, “महाराज क्षमा करें किंतु दुखद समाचार यह है कि यह दूध दूध नहीं पानी था। इसमें से ९५% केवल पानी था।”

कृष्णदेवराय बहुत परेशान थे और उनके दरबारी चुप थे।

“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी प्रजा इतनी कपटी हो सकती है। क्या मैं इतना बुरा राजा हूँ कि मैं उन्हें नेक बनने के लिए प्रेरित नहीं कर सका?”
तेनाली राम ने कहा “महाराज न तो आप और न ही हमारी प्रजा कपटी है। सुगम मार्ग अपनाना मानव स्वभाव है। हर किसी को लगा कि उनका थोड़ा सा दूध महत्वपूर्ण नहीं था क्योंकि पूरा शहर दे रहा था। और किसी भी जांच के अभाव में, उनमें से अधिकतर ने केवल दिखावे के लिए कुछ डालने की औपचारिकता की, भले ही वह लगभग पानी ही हो।”

कुछ यही दया के साथ भी है; हम सोच सकते हैं कि कैसे एक छोटा सा कार्य संसार को बदल देगा, परंतु ऐसा हो सकता है। हर कर्म का महत्व है। हर बूंद मायने रखती है। हर विचार का महत्व है।

यह पोस्ट उन कुछ उपयोगकर्ताओं के प्रश्नों से प्रेरित थी जिन्होंने स्वामीनार (ब्लैक लोटस ऐप का उपयोग करते हुए) में पूछा था कि क्या दयालुता के छोटे कार्य का वास्तव में कर्ता या संसार पर कोई प्रभाव होता है।

हम सोचते हैं कि संसार को बदलने के लिए, हमें बड़े स्तर पर कुछ भव्य कार्य करने की आवश्यकता है। इतना विशाल और इतना भव्य कि यह निश्चित रूप से एक व्यक्ति या लोगों के एक छोटे समूह से परे है। परंतु, सच्चाई यह है कि यदि सभी यही सोचेंगे कि कोई और ऐसा करेगा तो कुछ नहीं होगा। या फिर यदि ऐसा सोचें कि एक छोटे से कार्य से क्या फर्क पड़ेगा। किंतु फर्क पड़ता है। ऐसा सदा हुआ है। चाहे टीला हो या रेत का पहाड़, वे दोनो ही रेत के छोटे दानों से बने होते हैं। यदि हमने एक बार में एक दाना निकाल लिया, तब एक समय ऐसा आयेगा जब कुछ भी नहीं बचेगा।

हमारे सामान्य कार्यों में, हमारे दिनचर्या में ऐसे सद्गुणों को अपनाने तथा अनुभव करने से भलाई व दया का पोषण होता है। धीरे-धीरे, वे हमारी चेतना में समा जाते हैं और हमारे स्वभाव का अंश बन जाते हैं। इतना ही नहीं ये गुण संक्रामक हैं। जब लोगों का एक समूह सभी के हित और कल्याण के लिए जीना आरंभ कर देता है, तब उनके आसपास के अन्य लोग भी इस प्रकार की विधियाँ अपनाने लगते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी अन्य परिवर्तन के समान यह भी एक धीमी और लंबी प्रक्रिया है परंतु यह काम अवश्य करता है। अपने चारों ओर देखें कि कैसे राष्ट्र, संस्कृतियाँ और धर्म विकसित हुए हैं। कैसे इनमें से कुछ दूसरों की तुलना में अधिक प्रगतिशील रहे हैं।

एक व्यक्ति अखबार पढ़ने में मग्न था। कुछ देर पश्चात उसने अपनी पत्नी से कहा, “कृपया मुझे एक कप चाय बना कर देना।”
“चाय!” पत्नी ने कहा। “क्या तुम आज काम पर नहीं जाओगे?”
“ओह क्षमा करना … मुझे लगा कि मैं कार्यालय में ही हूँ।”

दया दान नहीं है। यदि तुलना करनी हो तो दया ईमानदारी के समान है। एक कुटिल व्यक्ति को दयालु या करुणामय होना कठिन लगता है। यह अंतत: बहुत सरल है। यदि आप अपने कार्यों के प्रति निष्ठावान हैं, तब आप अपने हर कार्य को संपूर्ण चेष्टा व लगन से करेंगे। आप को यह अहसास होगा कि किसी भी वस्तु में, चाहे वह भावना हो या शिल्प हो, यदि आप निपुणता प्राप्त करना चाहते हैं, तो लक्ष्य प्राप्ति हेतु निरंतर एवं उत्तम प्रयास की आवश्यकता होगी जो छोटे-छोटे अनेक कदमों से बनते हैं।

हर दयालु कृत्य आपके आध्यात्मिक बैंक खाते में जमा होता है और एक एक ऐसे कृत्य का महत्त्व है। यदि सभी ने पर्याप्त करुणा पैदा की, तो दयालुता की उपज अपने आप बढ़ जाएगी।

हर छोटी तितली, हर मधुमक्खी, हर पक्षी का सादे विशाल खेतों को घने जंगलों में बदलने में योगदान होता है। सबसे अधिक मात्रा में पराग और बीज वे ले जाते हैं और इधर-उधर गिराते हैं। उनमें से हर एक बीज महत्व रखता है।

ऐसा क्यों? प्रकृति के भव्य व निरंतर खेल में सब कुछ और हर कोई महत्व रखता है। आप भी और आपके कार्य भी।

आइए हमारे संसार को अच्छाई और दया से भरें। बहुत सारे व्यक्तियों को आपके सहायता की आवश्यकता है। बस चारों ओर देखें और आप समझ जाएंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ।

एक अलग विषय पर मैं यह बताना चाहूँगा कि कई लोगों ने एक साथ मिल कर बड़े ही स्नेह से द बुक ऑफ फेथ नामक पुस्तक लिखी है। यह पुस्तक मेरे साथ उनके अनुभव के विषय में है। नवजोत गौतम और अन्य योगदानकर्ताओं द्वारा लिखित, और, हमेशा की तरह, साध्वी वृंदा ओम द्वारा संपादित और संकलित, इस पुस्तक में कई कहानियाँ हैं, जिन्हें फिर से याद करते हुए मुझे भी आनंद आया। इस लेख पर दिखाया गया चित्र द बुक ऑफ फेथ से लिया गया है। पेपरबैक कुछ दिनों में उपलब्ध होगा तथा किंडल संस्करण अभी उपलब्ध है। यदि आप इस पुस्तक को पढ़ना चाहते हैं तो यहाँ प्रासंगिक लिंक दिए गए हैं।

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शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - Kindness Matters