दयालुता का विपरीत

आपके अनुसार दयालुता का विपरीत क्या है? क्या यह दूसरे व्यक्ति को हानि पहुँचाना है? मेरे विचार से ऐसा नहीं है। आप पूछेंगे फिर यह क्या है?

दो वर्ष पूर्व मैं सुवि के साथ उनकी गाड़ी में एक व्यस्त बाजार से होकर यात्रा कर रहा था। मैं सुवि को लगभग दो दशकों से भी अधिक समय से जानता हूँ। मेरे प्रति उनका प्रेम एवं उनकी निष्ठा अभी भी मुझे विस्मित कर देती है। जून का महीना था और कड़ाके की सर्दी थी। हमारी गाड़ी में हीटर अपनी अधिकतम गति पर चल रहा था और बाहर लोग अपनी जेबों में हाथ घुसाए, दाँत किटकिटाते अपनी साँसों से कोहरे की वाष्प निकलते चले जा रहे थे। यह केवल हास्य के लिए। यदि आप उत्तर भारत या चेन्नई से परिचित हैं तब मुझे यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं कि जून का मौसम कैसा होता है।

सूर्य ऐसे आग उगल रहा था जैसे एक विशालकाय ड्रेगन सम्पूर्ण गृह को जलाकर भस्म कर देगा। हम सभी अपनी कार में सुखी थे (इसके लिए मैं कैरियर महोदय को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने लगभग १०० वर्ष पूर्व आधुनिक एयर कन्डीशनिंग का आविष्कार किया था)। लोग पसीने से तरबतर ही नहीं थे परंतु जला देने वाली गर्मी में झुलस भी रहे थे। कहीं भी एक पेड़, फूल पत्ती, यहाँ तक कि घास कि एक तिनका भी दिखाई नहीं दे रहा था। हमारे चारों ओर कोंक्रीट की दुकानें, अत्यधिक थके हुए पैदल यात्री, अस्त-व्यस्त यातायात, अवैध ठेले और बेतुकी पार्किंग में खड़ी गाडियाँ थीं। हम सड़क के किनारे रुके (कदाचित उन नियम-विरुद्ध खड़ी गाड़ियों में एक और बढ़ाते हुए) और सुवि मेरे लिए गले कि खराश मिटाने वाली गोली लेने के लिए निकटतम फार्मेसी में गए जबकि मैं गाड़ी में ही बैठा था।

संयोग से मैंने बायीं ओर दृष्टि डाली, मात्र चार या पाँच फीट आगे, एक वृद्ध महिला पैदल पथ पर बैठे अखरोट बेच रही थी। वह अपने सामान से भरी एक छोटी सी डलिया की चौकसी कर रही थी। मुझे एक उदासी की लहर का अनुभव हुआ। उसकी क्या कहानी हो सकती है? मैंने सोचा उसके बच्चे कहाँ हैं? क्या वे उसे दो समय का भोजन नहीं दे सकते? क्या हमारे देश ने उसके लिए कुछ भी नहीं किया? क्या वह कुछ बेच भी पाती है? इस मौसम में अखरोट? उसे ये कहाँ से मिले होंगे? क्या बकवास है! मेरी उदासी कुंठा में बदलने लगी, यहाँ तक कि जीवन ने जिस उदारता से मुझे आनंद उठाने की सुविधाएं प्रदान की हैं उनके लिए मैं स्वयं को दोषी अनुभव करने लगा।

मैं अपने विचारों में उलझा ही हुआ था कि एक व्यक्ति ने अपना स्कूटर रोका। उसने अपना इंजन बंद किया और संतुलन बनाने के लिए पैर नीचे टिकाए। मैंने उनकी बातें सुनने के लिए खिड़की नीचे की।

“क्या ये अच्छी गुणवत्ता के अखरोट हैं?” वह आगे की ओर झुका और कड़क स्वर में बोला।
“जी, महोदय”
“कितने के दिये?”
“२५० ग्राम के १०० रुपये” उसने थोड़े अखरोट अपनी हथेली पर रखकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा जिससे वह व्यक्ति उनकी गुणवत्ता स्वयं देख ले।
“तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट तो नहीं हो गयी है?” उस व्यक्ति ने कहा। “मैं इससे बेहतर गुणवत्ता वाले अखरोट इससे बेहतर दाम पर दुकान से खरीद सकता हूँ।”
“ये कश्मीरी अखरोट हैं, महोदय” महिला ने लगभग विनती करते हुए कहा।
“मैं पहले चखना चाहूँगा।”

उसने अपने हाथ पीछे खीच लिया। मुझे वास्तव में पता था कि वह क्या सोच रही होगी। यदि प्रत्येक सम्भावी ग्राहक ने उसके अखरोट चखे और किसी ने भी न खरीदे या मात्र कुछ ही ने खरीदे तब उसे घाटा होगा। वह उसे मात्र चखने के लिए एक अखरोट देने को उत्सुक न थी। कुछ पल बीत गए।

“आप खरीदेंगे न?” उसने धीमे स्वर में कहा।
“और तेरी आरती करने के लिए रुका हूँ?”

अनिच्छा से और थोड़ा धीरे-धीरे उसने एक अखरोट फोड़ा और उसे आधा भाग दिया। उसने उसे दूसरा भाग भी देने को कहा। व्यक्ति ने अखरोट खाया, छिलका सड़क पर फेंका और कहा कि अखरोट की गुणवत्ता के विषय में वह सशंकित है। उसने महिला को बातों ही बातों में दूसरा अखरोट देने के लिए राजी कर लिया जो, उसने दे भी दिया। उसकी वाणी में जो रोब था उसके कारण उसने वृद्ध महिला को बड़ी सरलता से नियंत्रित कर लिया, जो जानती थी कि १० घंटे के अंतराल में मात्र कुछ ही ग्राहक यहाँ रुकेंगे। वह अपने रात का भोजन जुटाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दे सकती थी।

“ठीक है” व्यक्ति ने कहा “मुझे २० रुपये के दे दो।”

महिला अति प्रसन्न हुई। उसने तुरंत अपना तराजू उठाया, पुराने अखबार से बना एक छोटा कागज का थैला निकाला और उसे अखरोट से भरा। “अविश्वसनीय” मैंने सोचा। उसे अधिक से अधिक ५-७ रुपयों का लाभ हुआ होगा और इस पर भी वह प्रसन्नता से मुस्कुरा रही थी।

“तुम लोग बहुत चतुर हो।” उस व्यक्ति ने कहा “तुम दिखाते कुछ हो और बेचते कुछ और।”
“महोदय मैं वैसी नहीं हूँ, मेरे पास मात्र यह छोटा सा ढेर है जो आपके सामने है।”
“मुझे उस थैले में से एक चखना है, यह जानने के लिए कि तुमने कोई चाल तो नहीं चली।”

महिला ने थैले से एक अखरोट निकाला, खोला और उसे दोनों भाग दे दिए। तीसरी बार, उसने खाया और छिलके सड़क पर फेंक दिया।

“ये अच्छे नहीं हैं” उसने कहा और अपने स्कूटर का इंजन चालू किया।
वह महिला एक क्षण के लिए सदमे से बुत-वत हो गयी। “आप मुझे दो रुपए कम दे सकते हैं” उसने विक्षिप्तता के साथ थैला नीचे रखते हुए कुछ अखरोट पुनः एक बार आगे करते हुए कहा। व्यक्ति पहले ही जा चुका था। “आप १० रुपए के ही ले लीजिए” उसने पीछे से चिल्लाकर याचना की “पाँच रुपए?” ग्राहक अब दूर जा चुका था। खिन्न हो कर उसने अपना तराजू एक ओर रखा, थैले को खाली कर अखरोटों को छोटे से ढेर में डाला, कागज के थैले को मोड़ा और उसे उस चटाई के नीचे सरका दिया जिस पर वह बैठी थी।

मैं थोड़ा विक्षुब्ध व अशांत हो गया। मैं उस व्यक्ति पर क्रोधित नहीं था क्योंकि ऐसा करने में कोई समझदारी न थी। मेरा क्रोध उसे किसी भी प्रकार से एक श्रेष्ठतर व्यक्ति नहीं बना सकता था। प्रकृति उसे किसी अन्य विधि से पाठ पढ़ाएगी। ऐसा सदैव होता है। एक मिनट पश्चात सुवि वापस आ गए। उन्हें थोड़ा अधिक समय लग गया क्योंकि उन्हें कुछ विशेष प्रकार की गोलियां, जो मुझे चाहिए थीं, लेने के लिए दूसरी फार्मेसी पर जाना पड़ा।

“क्या आपके पास कुछ रुपए हैं?”
“जी स्वामी जी” उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा। “आपको कितने रुपयों की आवश्यकता है?”
“आपके पास जितने हैं, सभी की” मैंने कहा।

हम अखरोट वाली महिला के पास थोड़ी देर रुके जिससे वह बाकी के दिन के लिए अपने घर जा सके। हमने अपनी खिड़की ऊपर की और शांतिपूर्वक गाड़ी द्वारा अपने गंतव्य तक पहुँच गए। उस घटनाक्रम ने मुझे गहराई से सोचने पर विवश कर दिया। उस स्कूटर वाले अधेड़ आयु व्यक्ति के कर्मों का भुगतान कौन करेगा? उस शठता व आवेदनशीलता के प्रदर्शन के बदले उसे क्या मूल्य चुकाना पड़ेगा? निश्चित ही कुछ मूल्य तो अवश्य देना होगा।

मैंने जो लिखा है उस पर मुझे कोई अधिक व्याख्यान देने की आवश्यकता नहीं है। यह कहानी स्वयं में एक संदेश है फिर भी इस लेखन के प्रारंभ में मैंने एक प्रश्न उठाया था। दयालुता का विपरीत क्या है? क्या यह दूसरों के प्रति क्रूर होना है? नहीं, मित्रों यह और भी गहन बात है।

दयालुता की अनुपस्थिति ही दयालुता का विपरीत है।

जिस प्रकार प्रकाश की अनुपस्थिति से अंधकार की उपस्थिति बनती है। जब हम अपने हृदय में दयालुता का अनुभव नहीं करते तब हम निर्दयी हो जाते हैं। निर्दयी होना मात्र निर्दयी व्यवहार करना नहीं है, यह दयालुता का प्रदर्शन न करना भी है। जब हम दयालु व्यवहार करने में समर्थ हैं तब भी हम ऐसा व्यवहार करने से मना करते हैं। और दयालु व्यवहार क्या है? जब हम दूसरे व्यक्ति के हित को आगे रखते हुए उचित प्रकार से कार्य करते हैं तब हम दयालु हैं। जब हम ऐसा एक स्तर की संवेदनशीलता के साथ दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए करते हैं तब हम दयालु हैं। जब हम अपने हृदय एवं मन को संभावनाओं के प्रति खोलते हैं तब हम दयालु हैं। आप दृढ़ हो सकते हैं। आप ना कह सकते हैं। आप किसी को विकल्प रहित कर सकते हैं फिर भी आप दयालु रह सकते हैं। सत्य तो यह है कि दयालुता के बिना हम न तो करुणामय हो सकते है न ही संवेदनशील। क्षमाशील एवं विनम्र होना तो दूर की बात रही।

त्योहारों के अवसर पर हुए भरपूर लाभ को देखकर एक यात्रा एजेंट अति आनंदित था। उसी समय उसने एक छोटी सी वृद्ध महिला और एक वृद्ध पुरुष को दुकान की खिड़की पर विभिन्न गंतव्यों के विज्ञापनों को अभिलाषा के साथ निहारते देखा। उदारता से उसने उन्हें अपनी दुकान में बुलाया और कहा “मैं जानता हूँ कदाचित आपकी पेंशन पर आप कहीं एक छुट्टी बिताने कि आशा नहीं कर सकते हैं। परंतु मैं आपको अपने खर्चे पर हवाई के एक शानदार सैरगाह पर भेज रहा हूँ।”

उन्होंने यात्रा एजेंट का आग्रह अस्वीकार करने का प्रयास किया किंतु एजेंट ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह वास्तव में उन्हें यह प्रस्ताव देना चाहता है और यह कोई फसाने वाली बात नहीं है। अतः जैसे कि बच्चे खा-पीकर नया खिलौना पाकर प्रसन्न हो जाते हैं वृद्ध महिला और पूरुष ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और चले गए। एक महीने बाद वृद्ध महिला दुकान पर पुनः गयी।

“आप की यात्रा कैसी रही? मुझे सारी बातें बताएं।” एजेंट ने उत्साहित होकर पूछा।
“उड़ान आराम दायक थी और वहाँ कमरा उत्कृष्ट था।” उसने कहा। “मैं आपको धन्यवाद करने आई हूँ। परंतु एक बात ने मुझे उलझन में डाल दिया। वह वृद्ध व्यक्ति कौन था जिसके साथ एक ही कमरे में रहने के लिए आपने मुझे बाध्य किया?”

दयालुता का यह अर्थ नहीं कि यह जाने बिना कि दूसरे व्यक्ति की वास्तव में क्या आवश्यकताएं हैं आप कुछ करने लगें। दूसरे शब्दों में जो कुछ आपकी समझ से दूसरों के लिए हितकारी है, उनके लिए हो सकता है किसी काम का न हो। दयालुता दूसरों के प्रति संवेदनशील व उदार होना है। क्योंकि निष्कपटता व संवेदनशीलता आपके हृदय में स्वतः ही दयालुता का भाव जाग्रत कर देती है। एक बार उस भाव का अनुभव कर लेंगे तब आप स्वभाविक रूप से न केवल दयालु बनेंगे वरन दयालुता से सोचेंगे और अनुभव भी करेंगे।

स्वयं के प्रति एवं दूसरों के प्रति दयालु बनें, सभी वस्तुओं एवं सभी व्यक्तियों के प्रति दयालु रहें।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - The Opposite of Kindness