सावधानीपूर्वक पालन पोषण करने के चार पहलू

वैदिक ग्रन्थों में एक पद बहुधा प्रयोग में लाया जाता है – उसे “ब्रहमचारी” शब्द दिया गया है। इसे बारंबार एवं अपने संकुचित रूप में अविवाहित जीवन के रूप में प्रतिपादित किया जाता है। किन्तु इसके वास्तविक अर्थ का संयम/परिवर्जन से अतिन्यून संबंध है। ब्रहमचारी का अर्थ है वह जिसका आचरण ब्रह्म के समान हो। इस परिपेक्ष्य में, बौद्ध ग्रंथ ऐसे मनुष्य को “ब्रहम विहारी” कहते हैं – ऐसा व्यक्ति जिसका व्यवहार उत्कृष्ट एवं दिव्य हो। ऐसे व्यक्तित्व के चार पहलू होते हैं। आप इन चार को व्यवहार में लाएँ और कोई भी संबंध दिव्य बन जाएगा। जब प्रेम व बच्चों के पालन-पोषण की बात आती है, तो मेरे विचार में, इसका पाँचवाँ पहलू भी होता है।

गत सप्ताह से आगे बढ़ते हुए, जब मैंने प्रथम पहलू – करुणा पर बात की थी, चलिये अब मैं शेष चार पर प्रकाश डालता हूँ, सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू से आरंभ करते हुए। जैसा कि हमारा अभ्यास सा बन गया है, चलिये पहले मैं आपके साथ एक लघु कथा साझा करता हूँ।

एक अनुबंधित-वेतनभोगी (कांट्रैक्ट वर्कर) को अपने काम में दोहरी पारी तक कार्य करना पड़ा। वह अति खिन्न व थका मांदा घर पहुंचता है (आप यह एहसास जानते होंगे)।
“पापा,” उसके ६ वर्षीय पुत्र ने कहा, “आप एक घंटे में कितना कमाते हैं ?”
“बेटा, अभी नहीं” वह बोला, “और, तुम्हें समझना चाहिए कि यह एक अशिष्ट प्रश्न है।”
“लेकिन मैं तो केवल जानना चाहता हूँ।”
“क्या मुसीबत है!” वह व्यक्ति चिल्लाया। “आपके थके हारे पापा घर पहुंचे हैं और आप प्रेम भरी एक जप्फ़ी के स्थान पर यह बेकार का प्रश्न पूछ रहे हैं।”
“लेकिन मैं अभी की अभी कुछ खरीदना चाहता हूँ,” लड़के ने ज़ोर देकर कहा।
“अरे नालायक!” पिता आपे से बाहर हो गए, “भाग जाओ यहाँ से!”
“परंतु……”
“और कोई बहस नहीं। अपने कमरे में जाओ।”

वह लड़का सिर झुकाये वहाँ खड़ा रहा। उसकी आँखेँ भर आईं और एक आँसू नीचे ढुलक गया।

“मैंने कहा अपने कमरे में जाओ!”
“अभी”
बच्चा चुपचाप अपने कमरे में चला गया और किवाड़ बंद कर लिया।

रात्रि में भोजन करने के पश्चात जब पिता कुछ शांत हुए तो वह बच्चे के कमरे में गए।

“बेटा, मुझे खेद है,” वह बोले, “मैं बहुत अधिक थका हुआ था और मैं नहीं जानता कि उस समय मुझे क्या हो गया था। आप अब बताओ कि क्या खरीदना चाहते हो?”
“पहले मुझे यह बताएं के आप कितना कमा लेते हैं?” बच्चे ने भीरुपने से कहा
“२० डॉलर प्रति घंटा” पिता बोले।

बच्चे ने अपने तकिये के नीचे से कुछ पैसे निकाले – कुछ मुड़े-तुड़े एक-एक डॉलर, कुछ निकेल्स और डाइम्स – जो वह पिछले कई सप्ताह से एकत्र कर रहा था।

“पापा, ये १० डॉलर हैं।” उन पैसों को पिता के हाथ में रखते हुए उसने कहा, “क्या आप मेरे साथ ३० मिनट के लिए खेलेंगे?”

इस पिता की पहले की क्रुद्ध प्रतिक्रिया भले अब अनुचित लगे, किन्तु यही है क्रोध की वास्तविक संरचना – अनुचित/अविवेकशील। जब आप शांत हो चुके हों, तब पीछे मुड़कर देखने पर आप पाते हैं कि वह सब आवश्यकता से अधिक व अनुचित था, किन्तु उस भाव से गुजरते समय वह सब उचित लग रहा था। तथापि, मैंने यह कथा क्रोध को विशिष्टता से बताने हेतु नहीं, बल्कि एक पूर्णतः भिन्न कारण से कही, और यही मुझे पालन-पोषण के पहले पहलू की ओर अग्रसर करता है।

समय

सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आपके पास पालन पोषण के लिए समय है? भोग-विलास के साधन, सर्वोत्तम शिक्षा, साजो सामान – ये सब समय की भरपाई नहीं कर सकते। अच्छे पालन पोषण के लिए आवश्यक है कि आप अपने बच्चों को समय दें। मैं जानता हूँ कि आप पर कार्यालय का अत्याधिक बोझ है और आप थके मांदे घर लौटते हैं, और आपके पास एक शब्द तक बोलने की ऊर्जा शेष नहीं होती, किन्तु, “अच्छा अभिभावक” बनने के लिए आपको “अच्छा समय” देना ही होगा।

इसके लिए हो सकता है आपको अपना टी॰वी॰ देखना कम करना पड़े, अथवा कोई अन्य गतिविधि कम कर अपने बच्चे/बच्चों के साथ अधिक समय व्यतीत करना हो। अथवा तो आपको अपने व्यावसायिक लक्ष्य कुछ नीचे लाने पड़ें और अपने परिवार को वरीयता देनी पड़े। एक परिवार को अपनी प्रसन्नता हेतु लाखों डॉलर के आलीशान भवन की आवश्यकता नहीं होती। आपको इतना बड़ा लोन लेने अथवा वह बड़ी सी कार लेने की बिलकुल आवश्यकता नहीं। लाखों लोग आई-फोन के बिना भी बहुत आराम से बातचीत करते हैं। आपको यह सूत्र समझ में आया!

यह बात केवल पालन-पोषण पर ही नहीं वरन हर क्षेत्र में लागू होती है। आप जिस किसी भी विषय-वस्तु की चाह रखते हों, आपको उसे समय देना ही होगा। क्रोध से भरे विचारों को समय दें और क्रोध बढ़ जाएगा। अपना समय प्रेम से युक्त विचारों को दें और प्रेम बढ़ने लगेगा, इत्यादि। कुछ भी सीखना चाहते हैं तो उसे समय दीजिये।

मैत्री

साधारणतः, मैत्री का तात्पर्य प्रेम भरी विनम्रता होता है। इसका शाब्दिक अर्थ है मित्रता। मित्र से आता हुआ अथवा मित्र द्वारा दिया गया भाव, और तो और, मित्र से जुड़ा कुछ भी, मैत्री है। मित्रों के साथ हम अपना हर भाव साझा कर सकते हैं, बिना किसी आलोचनात्मक टिप्पणी के। यदि आपके बच्चे घर आकर अपने दुख-दर्द बिना किसी प्रतिहिंसा अथवा दंड के भय के आपके साथ साझा कर सकते हैं, तो मित्रता रूपी वृक्ष अपनी जड़ें गहराई तक फैला पाएगा।

और, यह बात न केवल माता-पिता व बच्चों के, वरन हर प्रकार के संबंध के लिए सत्य है। मित्रता ही वह ईंधन है। मैत्री का अभाव, जहां दो लोग परस्पर बातें साझा करने के स्थान पर उन्हें एक दूसरे से छुपाने पर अधिक केन्द्रित होते हैं, तनाव एवं बेचैनी के भावों को स्थायी रूप देने लगता है। जैसा कि मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि मित्र बनने का यह अर्थ कदापि नहीं कि आप हर बार हाँ ही कहें। इससे भिन्न, इसका तात्पर्य है सकारात्मक रूप से न कह पाना। इसका अर्थ है संबंध में मिठास बनाए रखते हुए किसी बात पर असहमति जताना। एक निष्कपट संबंध में यह उतना कठिन नहीं जितना कि यह लग रहा हो।

मुदिता

मुदिता एक सरल शब्द है जिसका सीधा अर्थ है : प्रसन्नता। यदि आपके पास करुणा है और आप पालन-पोषण में समय भी लगा रहे हैं, एवं वहाँ मैत्री भी कुछ अंश में विद्यमान है, किन्तु यदि आपके संबंध में प्रसन्नता नहीं है तो बहुत जल्दी यह आपके लिए बहुत कठिन हो जाएगा। जीत के जशन की खुशी, एक परिवार के होने की खुशी, जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों को हंस कर झेल लेने की खुशी; असफलताओं से बाहर आने की ज़िंदादिली; क्षमा करने एवं क्षमा मांगने का साहस। एक तरह का खुलापन व ईमानदारी आपको आसपास के लोगों के साथ सहजता से रहने योग्य बनाते हैं।

यदि आपकी अपने बच्चों के साथ बातचीत अधिकांश समय उन्हें भाषण देने के रूप में ही होती है तो आप भले ही कितना भी सकारात्मक व मधुरभाषी दिख रहे हों, मित्र के रूप में भी, तथापि आप के संबंधों में से प्रसन्नता अति शीघ्र लुप्त हो जाएगी। वे आपको अनदेखा करना प्रारम्भ कर देंगे। अधिकांश अभिभावकों में अपने बच्चों को हर समय परामर्श देते रहने की प्रवृति होती है। माना कि यह सब उनकी भलाई को ध्यान में रखते हुए होता है, किन्तु क्या आप एक ऐसे “मैत्रीपूर्ण” बॉस के साथ प्रसन्न रह सकते हैं जो सदा आपको समझाता रहे कि और अच्छा कैसे बना जा सकता है? कभी कभी, कोई सुझाव न देना ही सर्वोत्तम सुझाव होता है।

किसी संबंध में प्रसन्न रहने का गुप्त रहस्य यह है – स्वयं को अत्याधिक गंभीरता से न लें।

उपेक्षा

बहुत से विचारक जैसे थिच नहाट हन्हा, उपेक्षा को समबुद्धि अथवा स्वाधीनता के रूप में परिभाषित करते हैं। संभवतः एक संबंध की वास्तविक परीक्षा यह है कि वह कितनी छूट प्रदान करता है, एवं ऐसे विशेषाधिकार का उपयोग किस प्रकार किया जाता हैं। हालांकि उपेक्षा का एक अर्थ है – धैर्य। और, धैर्य ऐसा गुण है जो माता-पिता प्रचुर मात्र में रखते हैं और खोते भी हैं – असमंजस की बात यह कि कभी कभी एक ही समय में।

“क्या तुम जानते हो अब्राहम लिंकन जब तुम्हारी उम्र के थे, तो उन्होंने स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ाई की?” यह वह वाक्य था जो एक पिता अपने १४ वर्षीय पुत्र को अवश्य कहते, जब भी वे उसे डांट लगाते, और ऐसा प्रायः नित्य होता। उन्हें लगता कि यह बात उनके पुत्र का मनोबल बढ़ाएगी। महीनों तक वह बालक एक ही तर्क बार बार सुनता रहा।

एक दिन वह और न सह सका और पलटवार में बोला, “पिताजी, क्या आप जानते हैं कि अब्राहम लिंकन जब आपकी उम्र के थे तो वे अमेरिका के राष्ट्रपति थे!”

धैर्यवान बनें। इस तथ्य को समझें कि जब “आप” १५ या २० वर्ष के थे तो आप भी उसी तरह की चुनौतियों से गुजर रहे थे जैसी आज उनके सम्मुख प्रस्तुत हैं। आप को भी कभी थोड़ा सुस्ती भरा दिन बिताना प्रिय था, शायद देर से उठना भी, और तला-भुना बाजार का खाना खाना इत्यादि भी। संभवतः ऐसे अवसर भी आए हों जब आपने असत्य का सहारा लिया हो, कक्षा से अनुपस्थित हो कर सैर-सपाटे का आनंद लिया हो। यह सब बड़ा होने के अंतर्गत ही आता है।

माता-पिता की भूमिका में, और प्रेम में पड़ने पर भी, आप का उद्देश्य सदा अच्छा ही होता है, किन्तु आप उन्हें हर बात की शिक्षा नहीं दे सकते। और आपको प्रयत्न भी नहीं करना चाहिए। चूंकि बहुत से ऐसे पाठ होते हैं जो केवल जिंदगी ही पढ़ा सकती है। और, जिंदगी कभी भी एक पाठ अकेले नहीं देती। वह ऐसा समय के साथ करती है। हम जो सबसे उत्तम विकल्प हो बस वही कर सकते हैं, और शेष समय पर छोड़ देना चाहिए। जीवन रूपी पुष्प समय के साथ खिलता है। उसमें जल्दबाज़ी मायने उसको नष्ट करना है।

कृपया धैर्य धरें। कोमलचित्त बने रहें। सौहार्द बनाए रखें। सब कुछ सामान्य रूप से लें।

शांति।
स्वामी