डेफ़ोडिल फूल का सिद्धांत

प्रत्येक भाषा में कुछ ऐसे अनूठे शब्द होते हैं, जिनका अनुवाद करना संभव नहीं है। जापानी भाषा में ऐसा ही एक शब्द है “वब सबी”। यह मात्र एक शब्द नहीं, वरन एक दर्शन है। यह जीवन जीने का एक मार्ग है। सीधे सीधे कहा जाए तो इसका अर्थ है जीवन की अपूर्णताओं के बीच सुंदरता को खोजना तथा उन्नति व आयु के प्राकृतिक काल चक्र के साथ गरिमापूर्ण विधि से आगे बढ़ते जाना।

किंतु ऐसा जीवन जिसमें आप गरिमामय ही नहीं वरन् साथ ही साथ सुखी, कृतज्ञ व शांत भी हैं, ऐसे जीवन के लिए आपको क्या मूल्य चुकाना होगा?

मेरे विचार से इसके लिए आपको अपने जीवन तथा नित्य दिनचर्या में एक विशेष गुण को इस प्रकार समाविष्ट करना होगा कि यह आपका स्वभाव ही बन जाए। यहाँ मेरा अर्थ दया, क्षमा, कृतज्ञता आदि गुणों या अन्य किसी कठिन कार्य से नहीं है जिनके विषय में मैं बहुधा चर्चा करता रहता हूँ। मैं यहाँ जिस विषय पर कहने जा रहा हूँ वह आपके स्वयं के, आपके जीवन और आपके संसार के विषय में है। इसके पहले कि मैं आपसे उस गुण को साजा करूँ पहले मैं आपको एक सुंदर कहानी सुनाना चाहता हूँ। १९९८ में घटी इस कहानी को मैंने जरोल्डीन एडवर्डस की “सेलीब्रेषन” पुस्तक में पढ़ा था। मैं इस कहानी को यहाँ अक्षरशः उद्धृत कर रहा हूँ –

मेरी बेटी केरोलीन ने कई बार मुझे फ़ोन करके कहा “माँ डेफ़ोडिल फूल का मौसम समाप्त हो जाए उसके पहले आपको डेफ़ोडिल के बगीचे को देखने अवश्य आना चाहिए।”

हालाँकि मुझे जाने की इच्छा तो थी, परंतु लगुना से एरोहेड पहुँचने में दो घंटे लगते थे। जब केरोलीन ने तीसरी बार फ़ोन किया तो मैंने थोडी अनिच्छा पूर्वक कहा, “ठीक है, मैं मंगलवार को आऊँगी।”

संयोगवश मंगलवार को बहुत अधिक ठंड थी और वर्षा भी हो रही थी। परंतु क्योंकि मैंने उससे वादा किया था इसलिए मैं गाडी चलाकर केरोलीन के घर गयी। घर पहुँच कर पहले मैं उसके बच्चों से स्नेहपूर्वक मिली और उन्हें गले से लगाया। फिर मैंने अपनी बेटी से कहा, “देखो केरोलीन डेफ़ोडिल फूल को तो तुम भूल जाओ। घना कोहरा होने के कारण रास्ता भी ठीक से दिखायी नहीं दे रहा है। वैसे भी मेरे लिए इस संसार में तुम्हारे और तुम्हारे दोनों बच्चों के अतिरिक्त देखने योग्य कुछ नहीं है। इसलिए तुम्हारे घर से आज बाहर जाना ठीक नहीं है।”
मेरी बेटी धीरे से मुस्कुरा कर बोली “माँ हम तो सदैव ऐसे ही मौसम में बाहर जाते हैं।”
मैंने कहा, “वह तो ठीक है केरोलीन। किंतु जब तक मौसम साफ नहीं हो जाता मैं बाहर कहीं नहीं जा रही और फिर उसके पश्चात मैं अपने घर वापस लौट जाऊँगी।”

केरोलीन ने कहा “माँ क्या आप मुझे गैरेज तक छोड़ सकती हैं जहाँ से मुझे अपनी गाडी लेकर आनी है।”
“अच्छा ठीक है। पर कितनी दूर है तुम्हारा गैरेज?”
“बस कुछ ही दूर। और आप चिंता न करें, गाडी मैं चलाऊँगी। मुझे इस मौसम में चलाने की आदत है।”
हम सब गाडी में बैठे और चल दिए। कुछ समय बाद मैंने पूछा, “हम कहाँ जा रहे हैं? यह तुम्हारे गैरेज का रास्ता नहीं हैं।”
केरोलिन यह सुनकर मुस्कुराई और बोली, “हम थोड़ा लंबे रास्ते से जा रहे हैं। यह डेफ़ोडिल फूल के बगीचे से होते हुए जाता है।” मैंने थोड़ा कठोरतापूवर्क कहा “वापस मुड़ो केरोलिन।”
केरोलिन बोली “माँ मेरा विश्वास करो। यदि आप उस बगीचे को अभी देखने नहीं गयीं तो बहुत पछतायेंगी।”

लगभग २० मिनट बाद हम एक संकरे पथरीले रास्ते पर मुड़ गये। मुझे एक छोटा सा चर्च दिखायी दिया। चर्च के दूसरी ओर एक हाथ से लिखा साइन बोर्ड था “डेफ़ोडिल का बगीचा”। केरोलिन ने गाडी रोक दी। हम सब गाडी से उतरकर बाहर आ गये। हमने दोनों बच्चों के हाथ पकड़ लिए। मैं केरोलिन के पीछे-पीछे रास्ते पर चलने लगी। रास्ते के किनारे मैंने सामने की ओर देखा। सामने देखते ही मेरे पाँव रुक गये।

मेरे सामने सर्वाधिक सुंदर दृश्य था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पूरी पहाड़ी पर सोना बिखेर दिया हो। यहाँ डेफ़ोडिल के पौधों को बड़े ही सुंदर ढंग से उगाया गया था। ऐसा लग रहा था जैसे बहुत बड़ा सा रिबन हो। गहरे नारंगी, श्वेत, नींबू, पीले, गुलाबी, केसरी तथा मक्खनी पीले रंग के फूलों को घुमावदार पैटर्न में लगाया गया था। हर रंग के फूल को इस प्रकार समूह में लगाया गया था, जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे डेफ़ोडिल के फूलों की नदी घुमावदार रास्ते से बहती हुई जा रही हो। ये फूल पाँच एकड़ में लगाये गये थे।

मैंने केरोलिन से पूछा, “यह बगीचा किसने लगाया है?”
उसने कहा, “केवल एक स्त्री ने यह सब किया। वह यहाँ सामने ही रहती है।”

उसने एक सुव्यवस्थित फ़ार्म हाउस की ओर संकेत किया। यह फ़ार्म हाउस छोटा था किंतु अपनी संपूर्ण भव्यता के साथ खड़ा था। हम पैदल उस फ़ार्म हाउस तक गये।

घर के आँगन में हमें एक पोस्टर दिखायी दिया।

उस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था। “आप जो प्रश्न पूछना चाहते हैं, उनके उत्तर इस प्रकार हैं-

पहला उत्तर सरल था – “५०,००० बल्ब (कंद)”
दूसरा उत्तर – “एक बार में एक बल्ब रोपा गया। वह भी एक स्त्री द्वारा, जिसके दो हाथ, दो पैर और बहुत छोटी सी बुद्धी है।”
तीसरा उत्तर – “इसे १९५८ में आरंभ किया गया था।”

तो यह था डेफ़ोडिल फूल का सिद्धांत।
यह मेरे लिए जीवन बदल देने वाला अनुभव था।

मैंने उस स्त्री के विषय में सोचा जिससे मैं आज तक कभी मिली भी नहीं थी। उस स्त्री ने पहाड़ की चोटी को सुंदर फूलों से ढाँकने के स्वप्न को साकार करने हेतु अपने कार्य का आरंभ आज से चालीस वर्ष पूर्व मात्र एक बल्ब (कंद) लगाने से किया था। दिन प्रतिदिन एक एक बल्ब लगाते लगाते उसने अपनी दुनिया तथा इस विश्व को सदैव के लिए बदल दिया था। उसने ऐसी वस्तु का सृजन किया जो अद्भुत सौंदर्यपूर्ण व प्रेरणाप्रद थी।

उसके डेफ़ोडिल बगीचे के सिद्धांत ने प्रसन्नता का महत्त्वपूर्ण सिद्धांत सिखाया। इसने हमें हमारे लक्ष्य और कामनाओं की ओर एक एक कदम बढ़ाना सिखाया (चाहे यह कदम छोटे ही क्यों न हों)। साथ ही यह भी सिखाया कि हम जो काम करें उससे प्रेम करें और समय के छोटे छोटे अंशों का सदुपयोग करें। जब हम समय के छोटे छोटे हिस्सों को नित्य छोटे छोटे प्रयासों के साथ गुणित करते हैं, तो हम पायेंगे कि हम अद्भुत कार्यों का संपादन कर लेते हैं। हम इस प्रकार संसार को भी बदल सकते हैं।

यहाँ मै धैर्य व दृढ़ता की बात कर रहा हूँ। दृढ़ता मात्र नहीं धैर्य भी आवश्यक है। दृढ़ता के द्वारा हम एक एक कदम बढ़ाकर नियमित चलते हैं और जब यही कदम धैर्य के साथ संयुक्त हो जाता है तो काम को हम अत्यंत गरिमापूर्ण ढंग से करते हैं। जब हम धैर्यवान होते हैं, तो हम शांति से बिना क्रुद्ध हुए कठिन से कठिन काम कर पाते हैं। यदि आप जो चाहते हैं, आपको वह नहीं मिलता, धैर्य रखें। आपका बेटा, बेटी या पत्नी आपकी बात नहीं सुन रहे, चिंता न करें, फिर प्रयत्न करें और धैर्यवान बनें (या इसके विपरीत सामान्य स्थिति ऐसी हो सकती है कि आप उनकी बात नहीं सुन रहे तो घबराएं नहीं और उनसे धैर्य रखने को कहें!)। आप किसी विशेष विचारधारा को ग्रहण नहीं कर पा रहे अथवा किसी कठिन प्रश्न का हल नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं तो बात को सहज भाव से स्वीकार करें, धैर्य रखें। अन्य व्यक्ति अपना व्यवहार नहीं बदल रहा, उसे थोड़ा समय दें, धैर्य रखें। अक्सर अब अन्य सब उपाय असफल हो जाते हैं तो धैर्य काम करता है। मैं जानता हूँ, यह कहना सरल है परंतु करना बहुत कठिन है, किंतु प्रयत्न से सब किया जा सकता है।

जब मैं हिमालय में नित्य २२ घंटे ध्यान किया करता था और यह साधना महीनों तक इसी प्रकार चलती रहती थी तो कई बार यह मुझे अत्यंत थका देती थी। मैंने इससे पहले जो भी काम किए थे यह काम उन सबसे अधिक कठिन और थका देने वाला था। हालाँकि लक्ष्य प्राप्ति के प्रति मैं दृढ़ था, फिर भी दर्द व थकान भी कई बार हो जाती थी। वहाँ पर स्थिर बैठे रहना मात्र चुनौती नहीं थी। बल्कि इसे निरंतर करते रहना और एक ही जगह अपने ध्यान को स्थिर करना उससे भी बड़ी चुनौती थी। परंतु इस दिनचर्या पर टिके रहने के लिए मैं स्वयं से मात्र एक ही बात कहा करता था।

“स्वामी यदि तुम चाहो तो उठ सकते हो किंतु फिर तुम करोगे क्या? यदि तुम धैर्यपूर्वक बैठे रहोगे और ध्यान करोगे तो निश्चित ही अधिक प्रसन्न रहोगे। क्योंकि तुम इसी के लिए यहाँ पर हो। समय तो वैसे भी बीतता ही जाएगा।”

यह विधि मेरे लिए सदैव सफल रही है और मैंने प्रतिदिन निश्चित समय पर बैठने और नियत घंटो तक ध्यान करने के संकल्प को कभी नहीं तोड़ा। दृढ़ता प्रतिबद्धता है, और धैर्य आपकी प्रवृत्ति। और यह मुझे धैर्य के विषय पर कुछ अधिक महत्वपूर्ण कहने के लिए प्रेरित करती है। धैर्य एक ही स्थान पर बैठे रहना और दुःखी हुए बिना स्थिति में परिवर्तन की प्रतीक्षा करना मात्र नहीं है। यह निष्क्रिय धैर्य हो सकता है। सक्रिय धैर्य है कि शांत मन से निरंतर प्रयत्न करते रहें। आप चलते रहें और मन को भटकने न दें।

कल्पना करें आप अपने खेत को जोतने और देखभाल करने से थक गये हैं, किंतु फिर भी आप स्वयं को बीज बोने हेतु विवश करते हैं। इसके बाद अंकुर फूटने की राह देखना मात्र धैर्य नहीं है। प्रतिदिन जब आप उन्हें पानी दें उस समय सकारात्मक और आशा से पूर्ण बने रहना भी धैर्य है। धैर्य वह समझ है, कि मुझसे यथासंभव जो बन सकेगा वह प्रयत्न करूँगा, किंतु फल तभी मिलता है जब नियति अनुसार उसका समय आता है। धैर्य के विषय में सर्वाधिक कठिनाई यह है कि हम इसके लिए कोई अवधि निर्धारित नहीं कर सकते। हमारे बोये हुए सारे बीज अंकुरित नहीं होंगे और इससे हमें विचलित नहीं होना चाहिए। हम पुनः उसी सावधानी और आशा के साथ बीज बोयें वह धैर्य है।

एक निपुण गुरू जिनके बहुत से अनुयायी थे उनके पास एक जिज्ञासु आया।

जिज्ञासु ने पूछा “क्या आप मुझे दीक्षा देंगे? मैं आपसे ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ।”
गुरू ने कहा “मेरा शिष्य बनने के लिए तुम्हारे भीतर बहुत अधिक धैर्य होना चाहिए। तुम्हें प्रतीक्षा करनी होगी।”
जिज्ञासु ने कहा – “मैं हर वस्तु के लिए सज हूँ। परंतु मुझे कितने समय तक प्रतीक्षा करनी होगी?”
गुरू ने कहा -“क्षमा करना मैं तुम्हें दीक्षा नहीं दे सकता। तुम जा सकते हो।”

जिस क्षण हमें इस बात की चिंता होती है कि हमें कितनी देर धैर्य रखना होगा बस उसी समय अधैर्य हमारे भीतर प्रविष्ट होता है। धैर्य में यही मुख्य बात है, कि हमें यह नहीं ज्ञात होता कि किसी काम को पूर्ण करने में कितना समय लगेगा। मैंने कहीं पढ़ा था कि मेरी कामनायें सबसे पहले पूरी हो जायें इसी कामना का नाम अधैर्य है। संभवत: कभी कभी आपकी आवश्यकताएं पूरी भी हो जायें। अक्सर तो नहीं और निश्चित रूप से सदैव तो ऐसा नहीं होता। प्रकृति, विश्व, अन्य व्यक्ति तथा आपके प्रिय जनों के पास अन्य काम भी करने को रहते हैं। दूसरे लोगों की भी अपनी आवश्यकताएं हैं जो वे पूरी करना चाहते हैं। इसलिए धैर्य रखें। अधैर्य से हताशा आती है, जिससे क्रोध आता है और क्रोध अपने मित्र अहंकार के बिना कभी नहीं आता। इन सबका हमारी चेतना में प्रवेश हमें अंधा बना देता है और हम हमारी सोचने समझने की बुद्धि को खो बैठते हैं। जैसा कि भगवान कृष्ण ने गीता के दूसरे अध्याय के तिरसठवें श्लोक में कहा है “बुद्धिनाशात्प्रणश्यति” – जिसकी बुद्धि का नाश हो गया हो उसकी मुक्ति की संभावना अधिक नहीं है।

हो सकता है हमारी योजनायें सफल ना हों। कोई बात नहीं। हम नयी बना लेंगे। हो सकता है जीवन में जैसा हम चाहते थे उस प्रकार सफल न हो पाये हों। कोई बात नहीं। हम प्रयास करते रहेंगे। जो हमारे नियंत्रण में नहीं है ऐसी वस्तुओं के प्रति सुखद प्रतिक्रिया ही धैर्य है। चाहे हमारे समक्ष कितना ही कठिन लक्ष्य हो, अपना सिर ऊँचा करके, गरिमापूर्वक, आशा व दृढ़ निश्चय के साथ एक समय पर एक कदम आगे बढ़ायें।

धैर्यपूर्वक एक बार में एक बल्ब लगायें और शीघ्र ही ५०,००० डेफ़ोडिल फूलों का बगीचा सज हो जायेगा। तब तक धैर्य पूर्वक प्रयास करते रहें। यही एक विधि है जिससे हम जीवन की अपूर्णताओं, दुःखों व चुनौतियों में प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं। यही वह विधि है जिसके द्वारा यात्रा का आनंद, प्राप्ति के आनंद से भी बढ़कर होगा। “वब सबी” इसी का नाम है।

शांति।
स्वामी