आदर का आधार

ब्रहमदत्त, काशी के राजदरबार में विगत चालीस वर्षों से अपनी सेवायें प्रदान करते आ रहे थे व उस राज्य के सर्वाधिक विश्वासपात्र मंत्री थे। वहाँ के राजा न केवल प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य में उनका परामर्श लेते, अपितु उन्हें इतना स्नेह देते कि ब्रहमदत्त प्रायः रात्रिभोज राजपरिवार के साथ ही लिया करते। उन्हें महाराज के निजी कक्ष में प्रवेश की पूर्ण अनुमति थी। अन्य सभासद उनकी ईमानदारी के लिए उन्हें अत्यधिक सम्मान प्रदान करते एवं काशी की प्रजा उनकी बुद्धिमत्ता को देखते हुए उन्हें अति आदरणीय मानती।

एक बार राजकोष के सुरक्षाकर्मी ने ब्रहमदत को कुछ स्वर्ण मुद्राएँ बिना बही खाते में दर्ज किए ही अपनी जेब में रखते हुए देखा। उसने अपने मुख्य सुरक्षा अधिकारी को यह जानकारी दी, जिसने यह कहते हुए बात को निरस्त कर दिया कि आदरणीय मंत्री अवश्य ही किसी जल्दी में होंगे, अथवा तो हो सकता है सुरक्षा कर्मी को कोई गलतफहमी हुई हो। कुछ दिन बीतने के उपरांत वही घटना पुनः घटित हुई। ब्रहमदत्त ने कुछ और स्वर्ण मुद्राएँ चुराईं, किन्तु पुनः शिकायत निरस्त कर दी गई। जब सुरक्षाकर्मी ने तीसरी बार वैसी ही घटना का उल्लेख किया तो दो नये सुरक्षाकर्मी वहाँ नियुक्त कर दिये गए। उन नये कर्मियों ने भी इस बात की पुष्टि की कि ब्रहमदत्त नियमित रूप से मुट्ठी भर मुद्राएँ राजकोष से निकाल रहे हें।

इस बात का वर्णन महाराज के सम्मुख किया गया, किन्तु राजा ने यह कह कर उन्हें डांट दिया कि वे ब्रहमदत्त जैसे गुणी व आदरणीय व्यक्ति पर संशय किस आधार पर कर रहे हैं। इस धिक्कार के बावजूद सुरक्षाकर्मियों द्वारा अपना कार्य तत्परतापूर्वक करने में कोई कमी नहीं आई, और, अंततः, एक दिन उन्होंने मौका पा कर ब्रहमदत्त को उस समय रंगे हाथों पकड़ लिया जब वह स्वर्णमुद्राओं से भरा एक छोटा सा थैला बिना बही खाते में दर्ज किए बाहर निकल रहे थे।

“तुम लोगों की मुझे हाथ लगाने की हिम्मत भी कैसी हुई?”, ब्रहमदत चिल्ला उठे। “क्या तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ?”
“आप जो भी हों, किन्तु इस समय आप एक चोर हैं”, मुख्य सुरक्षा अधिकारी ने कहा। “आप हमारे साथ सहयोग करें, अन्यथा आप को पछताना पड़ेगा।”

ब्रहमदत्त ने उस परिस्थिति से बाहर निकलने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु सुरक्षाकर्मियों ने अत्यंत निष्ठापूर्वक अपना कर्तव्य निभाते हुए उन्हें एक साधारण अपराधी की भांति गिरफ्तार कर राजा के सम्मुख पेश कर दिया।

“तुम्हें अपनी आत्मरक्षा में क्या कहना है?” सम्पूर्ण वृतांत सुनने के पश्चात राजा ने ब्रहमदत्त से पूछा।
“कुछ भी नहीं, महाराज।”
“इस धोखेबाज को कारावास में डाल दिया जाये”, राजा ने आदेश दिया। “मैं एक सप्ताह के भीतर इसके दंड की घोषणा करूंगा।”
राजा इस बात से अत्यंत दु:खी थे कि जिस व्यक्ति पर उन्होंने जीवनपर्यंत विश्वास किया, वह एक भ्रष्ट अधिकारी निकला। राजा ने ब्रहमदत्त के कोट पर लगे राजकीय सम्मान चिन्ह को उतार लिया व सभा स्थगित कर दी। यह समाचार जंगल की आग की भांति सम्पूर्ण राज्य में फ़ैल गया और लोग ब्रहमदत्त को चोर, बदमाश और अन्यान्य नामों से संबोधित करने लगे।

“क्या सब ठीक है?”, अर्धरात्रि के समय राजा को अपने कक्ष में इधर उधर घूमते देख रानी ने पूछा। “आप कुछ चिंतित लग रहे हैं।”
“मैं स्पष्ट रूप से समझ नहीं पा रहा कि कैसे ब्रहमदत्त जैसा भद्र व्यक्ति इतने निम्न स्तर तक जा कर मुझे धोखा दे सकता है?” यह कहते हुए राजा ने रानी को सम्पूर्ण वृतांत सुनाया।
“उसने प्रत्युत्तर में कुछ भी नहीं कहा?, सचमुच?”
“हाँ, एक शब्द भी नहीं।”
“अच्छी बात है”, रानी ने विचार करते हुए कहा, “उसके इस कृत्य में अवश्य ही कोई गोपनीय तथ्य विद्यमान है। आपको ब्रहमदत्त के साथ एकांत में बात करनी चाहिये। क्या आपको नहीं लग रहा कि उसके जैसे व्यक्ति को इतनी अल्प राशि चोरी करने की भला क्या आवश्यकता हो सकती है?”

दंड सुनाने से पूर्व राजा ने ब्रहमदत्त से एकांत में भेंट की और कहा, “तुम्हारे जैसा प्रतिष्ठित एवं बुद्धिमान व्यक्ति भला ऐसा कृत्य कैसे कर सकता है? तुम मेरे पिताजी की सेवा में भी थे और अपनी बाल्यावस्था में मैं तुम्हारी गोद में खेला करता था। धन अथवा ऋण के लिए तुमने मुझसे कहा होता।”

“महाराज, राजकोष से एक भी पैसे का हेर फेर नहीं हुआ है। मैंने प्रतिदिन थोड़ी थोड़ी रकम कोष से निकालने से पूर्व स्वयं ही समग्र राशि वहाँ जमा कर दी थी। आप इसकी गणना करा सकते हैं। यह तो मात्र एक प्रयोग था।”
“हे वृद्धवर, यह समय पहेलियाँ बुझाने का नहीं है”, राजा ने अपना धैर्य खोते हुए कहा, “स्पष्ट बात करो।”
ब्रहमदत्त ने कहना आरंभ किया – “कुछ समय से मैं इस सोच में पड़ा था कि आप मेरे किस गुण के लिए मुझे पसंद करते हैं? क्या वह मेरी बुद्धिमत्ता है, मेरा इतने दीर्घ काल से आपकी सेवा में अनुरत होना है, मेरी निष्पक्ष राय, मेरी प्रतिष्ठा, अथवा तो ऐसा कुछ और? मैं जानना चाहता था कि सभासद एवं समस्त काशी राज्य मुझे किस गुण के लिए आदर-सत्कार प्रदान करता है।”
“संभवतः इन सभी गुणों के लिए।”
“जी अवश्य, किन्तु…”, ब्रहमदत्त बोलते रहे, “इनमें से एक भी मेरी रक्षा नहीं कर पाया। मेरे द्वारा एक छोटा सा दुराचार और मुझे तत्काल एक धोखेबाज, झूठा और न जाने किस किस नाम से बुलाया जाने लगा। मैं इस परिणाम पर पहुंचा हूँ कि वह मेरा आचरण ही था जिसने मुझे इतना सम्मानीय स्थान प्रदान कराया। जैसे ही मेरे आचरण पर प्रश्न चिन्ह लगा तो अन्य सब कुछ महत्वहीन हो गया।”

इस कथा से मुझे जीवनपर्यंत स्मरण रहने वाला ज्ञान मिला। हमारी शिक्षा, पालान-पोषण एवं चरित्र, इन सब का प्रथम परिचय हमारा आचरण ही होता है। समाज में हमसे कहीं अधिक गुणवान, अधिक योग्य व अधिक जानकार व्यक्ति विद्यमान हैं। ऐसे भी जो हमसे अधिक सौंदर्यवान, धनवान एवं सफल हैं। तथापि, एक बृहद स्तर पर देखा जाये तो इन में से कुछ भी महत्व नहीं रखता। दूसरों के लिए इस तथ्य का न के बराबर अथवा तो बिलकुल भी महत्व नहीं कि आप कितनी लंबी अवधि तक उनकी सेवा में रहे, अथवा आपका इरादा कितना नेक है, अथवा तो आप कितने बुद्धिमान हैं। अंततः जो एक बात महत्व रखती है वह यह कि आपका आचरण कितना उत्कृष्ट है।

निःसन्देह, हमें प्राप्त सम्मान इन तथ्यों पर निर्भर करता है कि हम क्या व कितनी जानकारी रखते हैं और हमारे पास कितनी सम्पदा है, किन्तु ऐसा सम्मान इस धारणा पर आधारित होता है कि हमारी उपलब्धियों के पीछे उत्तम आचरण आधार स्वरूप होता है। किसी बदमाश को कोई भी उस प्रकार आदर नहीं देता (भय से भले ही किन्तु अंतर मन से नहीं) जिस प्रकार एक संत को दिया जाता है। यदि आप राम, बुद्ध, महावीर, जीसस या मोहम्मद के जीवन का निरीक्षण करें तो आप पाएंगे कि ऐसा नहीं है कि उन्होंने दुनिया को वह सत्य प्रदान किए जो उनसे पूर्व के ऋषि-मुनि अथवा पैगंबर देने में विफल रहे। जो कुछ भी उन्होंने बताया वह सम्पूर्ण विश्व पहले से ही जानता था। यह तो उनका उत्तम आचरण था जिसने उन्हें मानव जीवन के इतिहास में अमर पद प्राप्त कराया।

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ (भगवद गीता ३.२१)

एक श्रेष्ठ पुरुष (अथवा स्त्री) का जिस प्रकार का भी आचरण होता है, साधारण मनुष्य प्रायः उसी का अनुकरण करते हैं। महापुरुषों द्वारा स्थापित अपने अनुकरणीय आचरण का मानदंड सम्पूर्ण विश्व द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।

मेरे विचार में, आचरण के तीन पहलू हैं। प्रथम, हम स्वयं किस प्रकार का आचार-विचार अपनाते हैं व, तदोपरांत अन्य लोगों से व्यवहार करते हैं। द्वितीय, हमारे शब्दों एवं दिये गए वचनों की तुलना में हमारे कृत्य कितने सत्य हैं। और, तृतीय यह कि हर प्रकार की परिस्थिति में हम किस प्रकार का प्रदर्शन करते हैं। भले ही कठिनाइयों का सामना करते समय, प्रलोभनों से लड़ते हुए, अथवा तो धन दौलत भरा जीवन जीते हुए, कहीं न कहीं वह हमारा आचरण ही है जो दर्शाता है कि हम अपने अंतर में किसे या क्या सँजोये हुए हैं।

जिस प्रकार से एक श्रेष्ठ संचालक हमारे अन्तःकरण को पिघला देने वाले, हृदयस्पर्शी संगीत प्रदान करने वाले कलाकारों के समूह का निर्देशन अति सहजतापूर्वक कर पाता है; उसी प्रकार हमारा मन हमारे विचारों, शब्दों व कृत्यों को समिष्ट करता है। जब ये तीनों परस्पर समरस होते हैं तो जीवन रूपी वाद्य-वृंद सुरमय संगीत द्वारा जीवंत हो उठता है। किन्तु जब हर कोई एक भिन्न तान व भिन्न राग अलापता है, मन के निर्देशों से असावधान, दूसरों की तान के प्रति उदासीन, तो ऐसी स्थिति में जो निकल कर आता है वह कर्ण-कटु शोर के सिवा कुछ नहीं होता।

“यदि मैं एक गुलाम होता तो मेरा मूल्य क्या होता?” राजा ने मुल्ला नसरुद्दीन से पूछा।
“महाराज! इस प्रकार से सोचना तो असंभव है।”
“तदपि, मेरे कहने से एक अनुमान तो लगाओ। कोई एक राशि बोलो।”
“आपके द्वारा पहने राजसी परिधान को मिला कर अथवा उसके बिना?” मुल्ला ने कहा।
“मैंने जो पहना है उसे मिला कर।”
“लगभग ९०० दिनार, महाराज।”
“यह तो बेतुका अनुमान है मुल्ला!”, राजा चिल्लाया। “इतनी राशि के तो मात्र मेरे वस्त्र ही हैं।”
“महराजाधिराज!”, मुल्ला बोला, “मैंने वह मूल्य इसमें जोड़ कर ही बोला है।”

मृदुभाषी शब्दों, नेक आचरण एवं सत्य से परिपूर्ण कृत्यों के बिना हमारा मूल्य हमारे द्वारा अर्जित धन-सम्पदा से अधिक नहीं। मानवता से दिव्यता तक की यात्रा अच्छे आचरण से प्रशस्त होती है। भले ही लोग हमें इस बात से जानते हों कि हम उनके लिए क्या क्या करते हैं; शायद वे हमारा आदर हमारी धन-सम्पदा के आधार पर करते हों, तथापि अंततोगत्वा, वे हमें इस बात के लिए प्रेम करेंगे कि हम उन्हें महसूस कैसा करवाते हैं। और, यह तथ्य कि हम उन्हें किस प्रकार का महसूस करवाते हैं, यह पूर्णतय हमारे आचरण पर निर्भर होता है। यह इतना ही सरल है।

शांति।
स्वामी