जीवन की वर्णमाला

हाल ही में मेरे पिताजी ने मुझसे कहा, “जीवन ने मुझे यह सिखाया है स्वामीजी कि हर मनुष्य को अकेले ही अपनी जीवन यात्रा से होकर जाना पड़ता है।”

वे थोड़े अशांत व उद्विग्न थे, क्योंकि कुछ दिन पूर्व वे एक छलपूर्ण फोन कॉल का शिकार हो गए थे। फोन पर एक व्यक्ति ने उन्हें बताया कि उनका बैंक कार्ड अवरुद्ध हो गया है। कई चरणों के माध्यम से कॉलर उनसे सही विवरण निकालने में सफल हो गया और उनके बैंक खाते की जानकारी प्राप्त कर ली। और दो मिनट से कम समय में विभिन्न वेबसाइटों पर मेरे पिताजी की पूरी एक महीने की पेंशन की राशि खर्च कर दी। बैंक ने निष्कर्ष निकाला कि यह मेरे पिताजी की असावधानी थी क्योंकि उन्होंने कॉलर के साथ लेनदेन का पासवर्ड साझा कर दिया था और प्रत्यक्ष रूप से पुलिस भी कुछ नहीं कर सकी क्योंकि कॉल भारत के किसी अन्य राज्य से आई थी।

इस स्थिति को पूर्ण रूप से देखा जाए तो यह हानि अधिक नहीं है। जब आप चार दशकों से अधिक समय से धन अर्जित कर रहे हों और यदि एक महीने की पेंशन खो भी जाए तो यह बहुत बड़ी समस्या नहीं है। परंतु जब क्षति का प्रश्न उठता है तो कदाचित नुकसान के परिमाण से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम कैसा अनुभव करते हैं। एक अप्रत्याशित अवांछनीय घटना भी एक बुद्धिमान व्यक्ति को हिला के रख सकती है। इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए उन्हें दो सप्ताह से अधिक समय लगा कि उन्हें धोखा दिया गया। दूसरी ओर मेरी माताजी, सर्दी की हवा की भांति ठंडी व शांत थीं और इस मौद्रिक हानि पर भी न झपकीं। एक ही छत के नीचे दो व्यक्तियों पर एक ही नुकसान का अलग-अलग प्रभाव होता है। हम कितने सुंदर एवं दिलचस्प संसार में रहते हैं।

पिताजी ने अपने कष्टमय बचपन को याद करते हुए कहा, “मैंने देखा है कि जब आप कष्ट में होते हैं तब आपके साथ कोई भी नहीं होता। केवल आपका साहस और भगवान की कृपा एक व्यक्ति को पार करने में मदद करती है। कोई और मदद नहीं कर सकता।”

मुझे पता था कि वे ऐसा क्यों कह रहे थे क्योंकि बहुत से लोग अपने आप को पूरी प्रकार से अकेला महसूस करते हैं जब वे निराश होते हैं। ऐसे में हालांकि वे आमतौर पर अकेले नहीं होते हैं परंतु सभी लोगों की मदद के साथ भी अकेलापन इस प्रकार से उन तक पहुँचता है जैसे कि दरारों के माध्यम से पानी का रिसाव होता है। दरारें जो हमारी चेतना में होती हैं, हमारे विषय में हमारी समझ में और जीवन के हमारे दृष्टिकोण में होती हैं। यही कारण है कि बुद्ध का विश्वास था कि समयाक दृष्टि (जीवन का सही दृष्टिकोण) आत्म-अनुभूति के सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है। कृष्ण भी बार-बार अर्जुन को हर वस्तु की अस्थायी प्रकृति के विषय में स्मरण कराते हैं और बताते हैं कि उसे जीवन के द्वंद्व का साहस के साथ मार्गनिर्देशन करना होगा।(मात्र-स्पार्श्स्तु कौंतैय शितोषना-सुखा-दुखा-दाह … भगवद गीता २.१४)। वे कहते हैं कि केवल वस्तुएं ही नहीं, यहाँ तक कि जिन व्यक्तियों से आप प्रेम या घृणा करते हैं, वे भी एक दिन आपके जीवन में नहीं होंगे या आप उनके जीवन में नहीं होंगे। (अव्यक्तदीनी भूतानी व्यक्त-मध्यानि भारता … भगवद गीता २.२८)। तब आप क्यों चिंतित होते हैं।

जीवन में हानि होना (या फिर मृत्यु होना) अनिवार्य है। प्रश्न केवल यह है कि किस समय हानि होगी।

जो भी हमें प्रिय है या जो हमारे हृदय के निकट है, उसे किसी न किसी दिन हम अवश्य खो देंगे। यह तो निश्चित है।

“निस्संदेह,” मैंने उनसे कहा, “कोई भी हमारी पीड़ा का हिस्सा नहीं ले सकता है। मैं आपसे सहमत हूँ। यह एक निजी विषय है। जिस प्रकार आपके हार्दिक भोजन करने से किसी और व्यक्ति की भूख शांत नहीं होगी या फिर आपके भोजन से वंचित रहने से किसी और को भूख नहीं लगेगी।”
उन्होंने सहमति प्रकट करी और चिंतामुक्त हुए क्योंकि मैंने, जिसे वे अपने गुरु के रूप में भी देखते हैं, उनके विचार को विधिमान्य किया।

मैंने फिर उनसे कहा, “किंतु वे आपकी क्षति को और आपके दर्द को साझा कर सकते हैं। आप उनके लिए अच्छे भोजन की पूर्ति नहीं कर सकते हैं परंतु आप अपने भोजन को उनके साथ साझा अवश्य कर सकते हैं। उसके बाद चाहे वे पूर्णता या अपूर्णता का अनुभव करें, यह उनका विचार है। और यही पीड़ा है। पीड़ा वह नहीं है जो हमारे साथ हो रहा है, परंतु हम किस प्रकार से उसे देखते हैं कि हमारे साथ क्या हो रहा है। यह वास्तविक स्थिति नहीं है बल्कि हमारी व्याख्या है जो तब हमारी भावनाओं को नियंत्रित करती है। व्याख्या को बदलें और भावनाएं अपने आप बदल जाएंगी।”

आप अपनी भावनाओं को केवल इस सोच से नहीं बदल सकते कि आप उनमें बदलाव चाहते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितनी निराशाजनक अवस्था में हैं या आप की इच्छा शक्ति कितनी प्रबल है। आपको यह जानने की आवश्यकता है कि आप में इन भावनाओं को क्या उजागर कर रहा है। स्रोत पर जाएं। इस का कारण एक घटना या घटनाओं का एक संग्रह, कुछ लोग या कोई अन्य कारण भी हो सकता है। फिर स्वयं से पूछें कि क्या आप अलग अनुभव करना चाहते हैं। यदि ऐसा है तब इस धारणा से आरंभ करें कि परिस्थिति या कोई और व्यक्ति बदलने वाला नहीं है। वे वहीं हैं जहाँ वे सदैव रहते हैं, वे वही हैं जहाँ उन्हें होना चाहिए। एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित करें, अपने आप को सकारात्मक रूप से विचलित करें, उज्ज्वल पक्ष को देखें, अपने और दूसरों के प्रति प्रेम-कृपा का अभ्यास करें, और धीरे-धीरे, आपका परिप्रेक्ष्य बदलने लगेगा। जब ऐसा होगा तब बाकी सब कुछ इसके साथ बदल जाएगा।

एक बार बुद्ध को सुसीलोमा नामक एक राक्षस का सामना करना पड़ा जिसके नाम का अनुवाद है, सुई रूपी बाल। वह एक प्रारूप उग्र व्यक्ति था जिसके बाल सुइयों के समान थे। वह यह जानना चाहता था कि बुद्ध वास्तव में प्रबुद्ध हैं या नहीं। वह बुद्ध के बगल में जाकर बैठ गया और उन्हें आहत करने के उद्देश्य से उन पर झुकने लगा। परंतु बुद्ध उससे दूर हो गए।
उस राक्षस ने कहा, “आह! आपको दर्द पसंद नहीं है। आप वास्तव में प्रबुद्ध नहीं हैं। एक प्रबुद्ध व्यक्ति अपनी समानता बनाए रखेगा चाहे कुछ भी हो जाए। उस पर कोई प्रभाव नहीं होता। उसकी कोई पसंद या नापसंद नहीं होती है।” बुद्ध ने कहा – “यह कैसी मूर्खता है। ऐसी वस्तुओं से मेरे शरीर को क्षति पहुँच सकती है। यह मुझे चोट पहुंचा सकता है और अस्वस्थ बना सकता है।” (एस.एन. १०:५३)

यह मात्र सामान्य ज्ञान है। हम सांप पर पैर नहीं रखते हैं, हम आग के निकट नहीं जाते हैं, और सुइयों से भी दूर रहते हैं। आप स्वयं को ऐसी वस्तुओं से दूर कर लेते हैं। यह सामान्य ज्ञान है, आसक्ति नहीं। यह अपने शरीर की ओर दयालुता है – उसे स्वस्थ रखते हुए, उसे सुरक्षित रखें।
(अजहन ब्रह्म द्वारा लिखित “जागरूकता का आचरण”)

प्रायः हम अपने अनुभवों के कारण, अनुकूलन या फिर अपनी स्वाभाविक आदतों से अज्ञानतावश, हम यही करते हैं। हम सांप पर पैर रख देते हैं, अपने आपको आग में झोक देते हैं, और अपने आप पर सुइयाँ चुभा लेते हैं। आसक्ति के सांप, इच्छाओं की आग और ईर्ष्या और लोभ की सुइयाँ। वे हमें काटते हैं, जलाते हैं और चोट पहुँचाते हैं। हम इसे कष्ट कहते हैं और यह समझ लेते हैं कि यही जीवन जीने की विधि है। हम अपनी पीड़ा को दु:ख समझने लगते हैं। हमारा पीड़ा पर कोई नियंत्रण नहीं है परंतु दु:ख लगभग पूर्णतः हमारे हाथों में है। हम वस्तुओं को अपने निरीक्षण में ले सकते हैं या ज्वार में बह सकते हैं। यह विकल्प हमें याद रखना चाहिए और यह हमारे हाथों में है। हर समय।

एक व्यक्ति पिज़्ज़रिया गया और डाइट कोक के साथ एक बड़ा होल वीट पिज़्ज़ा मंगाया।
दुकान के मालिक ने पूछा, “क्या आप इसे छह टुकड़ों में विभाजित करना चाहेंगे या दस में?”
“दस?”, व्यक्ति ने चौंक कर कहा। “मैं वजन कम करने का प्रयास कर रहा हूँ। इसे छह टुकड़ों में काट दो!”

जीवन के साथ भी कुछ ऐसा ही है। यदि आप इसे अपने लिए चाहते हैं तो आप इसे छह हिस्सों में विभाजित करें या फिर दस में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसा कि मैंने माइंड फुल टू माइंडफुल में लिखा था “अंततः कुछ भी अनिवार्य नहीं रह जाता।” जितनी शीघ्रता से हम इसका अनुभव करेंगे, संघर्ष या चुनौतियां हमें परेशान करना बंद कर देंगी।

पीड़ा अपरिहार्य है परंतु दु:ख वैकल्पिक है। हानि होना अपरिहार्य है, परंतु संताप नहीं। मृत्यु निश्चित है। और जीवन, ठीक है, जीवन निश्चित नहीं है। इसकी अनिश्चितता, अप्रत्याशितता, यहाँ तक कि तर्कहीनता ही इसे सार्थक बनाती है, एक आशीर्वाद के प्रकार। आप जीवन के विशेषताओं को भयावह, उबाऊ एवं धूर्त मान सकते हैं या फिर साहसी, सुंदर व आकर्षक रूप में देख सकते हैं। यह आपकी पसंद पर निरभर करता है। यही जीवन की वर्णमाला है।

स्क्रैबल के खेल में, आपके रैक पर कौन से अक्षर आते हैं वह आपके हाथों में नहीं है। परंतु आप उनसे कौन से शब्द बनाते हैं और आप उन्हें कहाँ रखते हैं, वह कौशल और ज्ञान का विषय है। आप शब्दावली में जितने कम अज्ञानी हैं, उतनी ही अधिक संभावना है कि आपको अधिक अंक मिलेंगे। जितनी शीघ्रता से आप अपनी रैक खाली करते हैं, उतनी अधिक संभावना हो जाएगी कि आप और अधिक विकल्प प्राप्त करें। यदि आप वर्तमान में उपस्थित अक्षरों को नहीं छोड़ेंगे और यह मान लेंगे कि आप कितने दुर्भाग्यपूर्ण हैं, तो आप अंक प्राप्त करने का मौका खो देंगे। जीवन भी इससे अलग नहीं है।

जीवन की वर्णमाला वही है। आप अपने लिए उपलब्ध अक्षरों के साथ कौन से शब्द बनाते हैं वही यह निर्धारित करता है कि आप जीवन के हर एक पहलू में कैसा महसूस करते हैं। निःसंदेह, हर एक पहलू।

अपने हृदय को दयालुता से भरें, अपने समय को महान कार्यों से और अपनी बुद्धि को अच्छे विचारों से भरें। इस प्रकार दु:ख आपके जीवन से ऐसे लुप्त हो जाएगा जैसे संतुष्ट हृदय से उदासी लुप्त हो जाती है। आप अपनी आत्मा और स्वयं की वास्तविकता को जानेंगे। सुई आपकी आत्मा को छेद नहीं सकती और न ही आग इसे जला सकती है। पानी इसे सड़ा नहीं सकता और गर्मी इसे सूखा नहीं सकती है। (अच्छेद्यो अयम अदह्ह्यो यम अक्लेद्यो शोष्य एव च … भगवद गीता २.२४)। और आप पूछेंगे हैं उन सांपों का क्या, आसक्ति के सांप? उन्हें एक योगी उसकी गर्दन के चारों ओर लपेटता है और फिर भी उसे क्षति नहीं पहुंचती।

यह स्थायी शांति का मार्ग है। इस पर मेरे साथ चलें।

शांति।
स्वामी