नेक बनना

वैसे सोचा जाए तो यह एक दार्शनिक प्रश्न है, परंतु इस प्रकार के अधिकांश प्रश्नों का हमारे जीवन पर अवश्य प्रभाव होता है। अधिक लाभदायक क्या है- एक निरंतर भौतिक अनुसरण या आंतरिक शांति का पथ? जबकि वे पारस्परिक रूप से अनन्य नहीं हैं फिर भी हमें किसी एक को प्राथमिकता देने की आवश्यकता होती है। मेरा तात्पर्य है, क्या हमें सफल होने पर ध्यान देना चाहिए, भले ही इसका अर्थ निर्दयी होना और अपने रिश्तों का त्याग करना हो (आशा है कि हमारे नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों का बलिदान न हो)? या, क्या हमें न्यूनतर भौतिक वस्तुओं को स्वीकार कर, अपने परिवार, अभिलाषा और आंतरिक जीवन वृत्ति को अधिक प्राथमिकता देनी चाहिए?

इटली से आप्रवासी माता-पिता से जनमें हुए एक अमेरिकी पादरी टोनी कैम्पोलो ने अपनी पुस्तक में अपने माता-पिता की कठिनाइयों और उन्हें किसी अन्य पादरी (जिसे टोनी बाद में सबसे अप्रत्याशित रूप से मिले) से प्राप्त सहायता का संक्षेप में विवरण दिया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने लेट मी टेल यू अ स्टोरी नामक पुस्तक में एक दिलचस्प उपाख्यान साझा किया है।

संसार भर में माताओं पर किए गए एक अध्ययन में एक प्रश्न पूछा गया, “बड़े होने पर आप अपने बच्चों के लिए क्या चाहती हैं?” जापान में माताओं ने निरंतर उत्तर दिया, “हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सफल हों।”

परिणाम यह है कि जापान के लोगों ने संसार के इतिहास में सबसे अधिक सफलता संचालित बच्चों की एक पीढ़ी उत्थित की है। वे किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में अधिक परिश्रम तथा और लंबे समय तक काम करते हैं। उनसे किसी भी गतिविधि में उत्कृष्टता प्राप्त करने की अपेक्षा की जा सकती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान जिस प्रकार से पुनः स्थापित हुआ, वह अधिकतर उस सफलता पर केंद्रित मानसिकता के कारण था जो बच्चों को उनके माता-पिता ने सिखाया था।

जब अमरीकी माताओं से वही प्रश्न पूछा गया, तब आप कल्पना कर सकते हैं कि उत्तर क्या था – “हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे खुश रहें!”

खुश?!?!?! आपको समझना होगा, मेरा पालन पोषण एक परम्परावादी इटालियन परिवार में हुआ है। मुझे नहीं लगता कि मेरे पिता वास्तव में कभी चिंतित थे कि मैं खुश हूँ या नहीं। ओह, हो सकता है कि उनके लिए यह चिंता का विषय था, और वे निःसंदेह मुझे सफल देखना चाहते थे।

परंतु यदि आपने मेरे पिता और विशेष रूप से मेरी माता से पूछा होता, “आप क्या चाहते हैं, कि आप का पुत्र बड़े होने पर क्या बने?” दोनों का उत्तर होता, “हम चाहते हैं कि वह अच्छा व्यक्ति बने!”

इस कहानी को पढ़ना मेरे लिए एक कठिन सुपरिचित विचार था (जैसा कि यह आपके लिए भी हो सकता है।) मुझे स्मरण है कि बाल्यावस्था में मेरी माताजी की यही प्रार्थना होती थी। जब भी वे हमें आशीर्वाद के लिए किसी संत के पास लेकर जातीं वे सदा कहतीं, “कृपया इन्हें आशीर्वाद दें ताकि वे नेक व्यक्ति बन सकें।” उन्होंने हमें बताया कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात है – नेक होना। बाकी सब किसी न किसी प्रकार से स्वयं हो जाता है, ऐसा उनका विचार था। बाल्यावस्था में मैंने कहीं पढ़ा था, “महत्वपूर्ण होना अच्छा है परंतु अच्छा होना अधिक महत्वपूर्ण है।”

मैं इसका खण्डन नहीं करता कि आपको कभी-कभी रक्षा और बचाव करना पड़ता है। आप तब भी भलाई छोड़े बिना इसे कर सकते हैं। यह सोचना कि अच्छा होना और विनम्र होना एक समान है, यह गलत धारणा है। (कुछ वर्ष पहले, मैंने प्लेटो द्वारा यूथिफ्रो के आधार पर क्या अच्छा है, इस प्रश्न पर लिखा था। आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं)। मेरे अनुसार भलाई के तीन मुख्य गुण हैं।

१. उदात्त आशय

भलाई की जड़ पर यह है कि मैं जो कुछ करने जा रहा हूँ उसके पीछे मेरा आशय किसी को चोट पहुंचाना, हानि पहुंचाना या कष्ट पहुंचाना नहीं है। मेरे हृदय में किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष भाव या घृणा नहीं है। उदात्त आशय आपकी चेतना की सफाई के रूप में कार्य करता है। किंतु यह केवल पहला कदम है और अपने आप में अधूरा है, क्योंकि वास्तविक भलाई किसी की मदद करना है। किसी के हित के लिए ने केवल विचार करना बल्कि कार्यशील भी होना। चुनौती तब आती है जब आप कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं परंतु आपके प्रियजन आप का समर्थन नहीं करते हैं। क्या आपका आशय तब भी महान है यदि आपके कार्य कुछ लोगों की मदद कर रहे हैं परंतु अन्य व्यक्तियों को चोट भी पहुंचा रहे हैं? नेक होने के पीछे यही वास्तविक कठिनाई है। इस के लिए एक विकल्प बनाने की आवश्यकता है। ऐसे में केवल याद रखें कि महान इरादों के पीछे प्राथमिक उद्देश्य किसी व्यक्ति की आवश्यकता होने पर मदद करना है। जब हम किसी भी द्वेष या घृणा के बिना प्रेम से कुछ करते हैं, आत्म शुद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए या दूसरे व्यक्ति की मदद करने के उद्देश्य से, तब हमारा आशय उस विषय में महान होता है।

२. परोपकारिता

हम जो कुछ भी अपने जीवन में करते हैं वह हमारे सुख और सुविधा के प्रति होता है। तेज कारें, बड़े घर, नवीनतम गैजेट, अधिक निवेश इत्यादि। जब हम अपने स्वार्थी हितों का चुनाव नहीं करते हुए निःस्वार्थता की एक निश्चित स्तर के साथ निर्णय लेते हैं तथा दूसरों को अपने से पहले रखते हैं, तब हम अच्छाई की ओर बढ़ते हैं। एक सुंदर सूफी कहावत है, जिसका अनुवाद कुछ इस प्रकार है –

कलयान तराना कोई बहादुरी नहीं, लैइके डुबडे नो तारेन ते तान जाना।
भल्या नाल करदा हर कोई भला यारा, भला बुरे नाल करिण ते तान जाना।
(यह कोई बड़ी बात नहीं है कि आप अकेले तैर सकते हैं, मुझे दिखाएं कि क्या आप किसी डूबने वाले व्यक्ति को बचा सकते हैं। हर कोई अच्छे व्यक्ति के साथ अच्छा होता है, मुझे दिखाएं कि क्या आप बुरे व्यक्ति के लिए अच्छा कर सकते हैं।)

परोपकार की यह भावना मुझे अगले महत्वपूर्ण विषय पर ले जाती है क्योंकि निःस्वार्थ होने से मेरा यह अर्थ नहीं कि आप उन लोगों की सहायता करें जो मदद नहीं चाहते हैं। परोपकार से, मेरा तात्पर्य यह है कि किसी के साथ हमारा पहला कदम होना चाहिए उनकी मदद करना ना कि उन्हें आंकना। हमें उन्हें सहानुभूति देनी चाहिए, सलाह नहीं। समर्थन देना चाहिए बजाय इसके कि उनकी आलोचना करें। हमें कम से कम अपना हाथ बढ़ाना चाहिए। यदि वे सहायता लेने से मना करते हैं, तो वह अलग बात है।

३. विवेक

अच्छा होने का अर्थ यह नहीं कि आप उग्र व रोबदार हों। समझदारी वह होती है जब आप सावधानी पूर्वक अपने निर्णय लेते हैं तथा स्थिति की वास्तविकता को समझ कर व्यावहारिक रूप से ऐसा करते हैं। विवेक के बिना, भलाई अज्ञानता की ओर बढ़ने लगती है। आपने सुना होगा, “कभी हार न मानना।” किंतु यह सदा सत्य नहीं होता। उदाहरण के लिए, आप किसी की मदद नहीं कर सकते यदि वे आपकी मदद नहीं स्वीकार करना चाहते हैं। नेक होने हेतु यह भी जानना आवश्यक है कि आप कब अपने प्रयास त्यागें और अपनी ऊर्जा किसी और वस्तु पर निर्देशित करें जहाँ इसका कोई प्रभाव हो। ज्ञान के बिना भलाई प्रायः अप्रीतिकर और कदाचित उपयोगी भी नहीं होती है।

दो युवा लड़के, जॉनी और रोनी क्रिसमस में अपने दादा दादी के घर रहने गए। रात को सोने से पूर्व वे अपनी प्रार्थना करने के लिए अपने बिस्तर के बगल में घुटने टेक कर बैठ गए। छोटे भाई जॉनी ने ऊँचे स्वर में प्रार्थना करना आरंभ किया –
“मुझे एक नई साइकिल चाहिए …”। और फिर उसने और ज़ोर से कहा, “नई साइकिल! भगवान, कृपया मुझे क्रिसमस पर एक नई साइकिल दें!”
रोनी ने देखा कि जॉनी और अधिक उत्साह से प्रार्थना कर रहा था, लगभग चिल्लाते हुए, मानो वह प्रार्थना नहीं कर रहा हो बल्कि पड़ोस को जगाने का प्रयास कर रहा हो। “मुझे एक नया एक्सबॉक्स चाहिए … एक्सबॉक्स, भगवान यह एक गेमिंग कंसोल है! क्रिसमस पर मुझे एक नया एक्सबॉक्स दें!!”
“जॉनी तुम्हें क्या हो गया है?” रोनी ने उसे हिलाकर पूछा। “तुम चिल्ला क्यों रहे हो? भगवान बहरे नहीं हैं।”
“किंतु दादी तो बहरी हैं!” छोटे बच्चे ने धीमे स्वर में उत्तर दिया और ज़ोर से प्रार्थना करने लौट गया।

इसमें कोई संदेह नहीं कि एक आस्तिक के लिए श्रद्धा तथा एक उच्च ऊर्जा सब कुछ प्रदान करती है। यदि आप वास्तव में इस विषय में सोचें, तब यह पाएंगे कि सदैव एक माध्यम होता है जो आम तौर पर एक और व्यक्ति होता है। और इस संसार में अन्य मनुष्यों के साथ जुड़ने का उनके साथ स्नेह का संबंध बनाने का एक मार्ग है और वह है अच्छा होना। जितना अधिक आप अच्छे व नेक होंगे उतने ही अधिक मनुष्यों के जीवन को प्रभावित करेंगे। और आप जितने अधिक मनुष्यों के जीवन को प्रभावित करेंगे (या फिर कुछ ही व्यक्तियों के जीवन को यदि आप और अधिक मात्रा में प्रभावित करते हैं), आपकी चेतना में सुंदर स्मृतियों की संख्या उतनी अधिक होगी। जब भी आप अकेले या उदास होते हैं, तब ये सकारात्मक व समवेदनापूर्ण स्मृतियाँ आपके बचाव के लिए आ जाएंगी। यदि आप ध्यान दें, तब आप पाएंगे कि जब आप अपनी स्मृतियों के संसार में खो जाते हैं तब आप अकेलेपन का अनुभव करते हैं। मैत्री, दयालुता, करुणा के क्षण आनंदमय स्मृतियाँ बनाते हैं। तर्क, दुःख, क्रोध व दुर्व्यवहार आदि के क्षण दुखद स्मृतियों के निर्माण के खंड हैं। पहला आपको भीतर से स्नेही और दूसरा आप को कड़वा बना देता है। जिसने भलाई की अंतर्निहित प्रकृति को समझ लिया है और अंतर्लीन कर लिया है वह कभी अकेलेपन का अनुभव नहीं करेगा।

एक शिष्या ने अपनी गुरु से पूछा, “मैं तीव्र अकेलापन की इस भावना को कैसे दूर करूं?”
गुरु ने उत्तर दिया, “कभी भी यह न सोचें कि जीवन में कुछ सही नहीं हो रहा है। जीवन में सब कुछ वैसा ही है जैसा होना चाहिए। जब आप इसे स्वीकार करते हैं, तब आपके जीवन में आशा की किरण आ जाती है।”

आशा को एक मौका दें। जब आप अच्छे होते हैं, तब आप न केवल दूसरों के साथ प्रबल बंधन बनाते हैं बल्कि आप अपने साथ भी गहरा संबंध बनाते हैं। और ऐसा करने पर आप सर्वश्रेष्ठ संबंध में प्रवेश करते हैं। क्या आपको पता है कि वह सर्वश्रेष्ठ संबंध क्या है? सबसे संतुष्टिदायक संबंध है शांति के साथ संबंध। जो, मैं बता सकता हूँ, आजीवन भलाई में लीन रहने के बिना संभव नहीं है।

किसी भी वस्तु की तुलना में अच्छा होना ही जीवन में अंतत: अधिक लाभदायक है। यह अत्यंत लाभकारी होता है तथा वास्तविक रूप में भलाई ही आशा का बीज है। आप जिस भी प्रकार से भलाई का कोई काम करते हैं, वह कभी भी अनदेखा नहीं रहता। किसी भी रूप में माँ प्रकृति आपको कई गुना वापस देगी। यह सदा होता है।

जब हम इस ग्रह पर हैं, तब हमारे पास अपने, अपने प्रियजनों, समाज और संसार के लिए भलाई का प्रचार करने का उत्तरदायित्व है। आप में जो महानता का बीज है, वह दैव्य प्रकाश जिसे आप अनुभव करना चाहते हैं, वह आपके भीतर भलाई की आग के प्रवाह से आरंभ होता है। जब यह प्रचण्ड होता है, तब यह सभी नकारात्मकता और स्व-रुचि को नष्ट कर देता है।

अगली बार वर्षा होने के तुरंत बाद आकाश को ध्यान से देखें। बादलों से रिक्त सुंदर नीला आकाश, शांत व असामान्य नवीनता से धुला हुआ दिखाई देता है। एक नेक हृदय भी ऐसा ही होता है; अपने आप या दूसरों के प्रति पराजय के विचार या नकारात्मक भावनाओं का कोई चिह्न नहीं होना। और अपने ही वैभव में शांतचित्त रहना।

अच्छे बनें, नम्र रहें।

शांति।
स्वामी