सबसे बड़ा भय

“हर बार जब मैं गोल अखाड़े में जाता हूँ, मुझे भय लगता है। परंतु यह अपने आप पर निर्भर करता है कि इस भय का आप कैसे सामना करते हैं। आपको केवल यह करना है कि अपने पैरों को जमाकर रखें, अपने मुखपत्र को दाँतों पर कसें और कहें, ‘चलो शुरु हो जाओ!’।” ये प्रसिद्ध मुक्केबाज़ माइक टायसन के शब्द हैं। यदि इसके बारे में सोचें, तो यही सार है – “चलो शुरु हो जाओ!”। क्रिया ही भय का सबसे प्रबल विषहर है।

यदि आप अपने आस-पास देखें, तो आप पाएंगे कि अधिकतर लोग अपना पूरा जीवन भय में बिताते हैं। कई लोग हानि, अस्वीकृति या असफलता के भय से ग्रस्त हैं। कुछ लोग वृद्धावस्था के भय से पीड़ित हैं, परंतु मैं इस विषय पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ। अवलोकन करने पर मैंने देखा है कि एक भय है जो सहज रूप से इन सभी को निष्प्रभ कर देता है। और, नहीं, मुझे नहीं लगता है कि मृत्यु का भय सबसे बड़ा भय है। हाँ, मृत्यु का भय सबसे अनिवार्य भय अवश्य हो सकता है। परंतु हम अपने जीवन में निरंतर मृत्यु के विषय में चिंतित नहीं रहते हैं। आज नहीं तो कल, प्रत्येक व्यक्ति इसे स्वीकार कर लेता है।

वास्तव में, मैंने एक डॉक्टर द्वारा साक्षात्कार पढ़ा जो एक मरणासन्न रोगियों के अस्पताल में नियुक्त था। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह थी कि चालीस साल के अपने कार्यकाल में उन्होंने कभी भी मरणासन्न रोगी की आंखों में भय या संघर्ष नहीं देखा था। वे स्वीकृति में रहते थे और उनके चेहरे पर सोते हुए बच्चे के समान शांति और चमक थी, विशेष रूप से उनके अंतिम क्षणों में।

जिस मौलिक भय की ओर मेरा संकेत है वह स्वाभाविक नहीं है और अंतर्जात भी नहीं है। हम इसके साथ पैदा नहीं होते हैं। हम इसे निरंतर, विलक्षण रूप से, धीरे-धीरे सीखते हैं। यह इतना प्रबल हो जाता है कि कुछ समय के पश्चात यह हमारी प्रकृति का एक हिस्सा बन जाता है। यदि जीवन एक भाषा है और हर प्रकार का भय एक अक्षर है, तो मैं जो वर्णित कर रहा हूँ वह भय वर्णमाला के समान होगा – जिसमें अन्य सभी भय हैं।

यह प्रसन्नता का भय है। हाँ, यह हमारा प्राथमिक भय है।

जिस क्षण से आप जन्म लेते हैं, आपका तुलनात्मक मूल्यांकन आरंभ हो जाता है। शिक्षक, माता-पिता, प्रचारक, रिश्तेदार, मित्र, समाज – कभी-कभी नेक इरादों के साथ – आपको आपकी त्रुटियों का निरंतर स्मरण कराते हैं। हम अपनी स्वयं की प्रगति के निमित्त, स्वयं का विश्लेषण नहीं करते हैं बल्कि दूसरों की क्षमताओं के निमित्त करते हैं।

वह मुझसे बेहतर नाचता है, वह अधिक बुद्धिमान है, वह अधिक शक्तिशाली है, वह अधिक सुंदर है, वह अधिक धनवान है आदि। यह तुलना कदाचित कम प्रेरणादायक और अधिकतर समालोचनात्मक होती है। आपको प्रतीत होता है कि आप किसी सीढ़ी के सबसे नीचे सोपान पर हैं। हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जहाँ प्रयास को नहीं प्रत्युत उपलब्धि को पुरस्कृत किया जाता है।

यदि आप द्वितीय स्थान पर हैं और बहुत छोटी मात्रा से प्रथम स्थान नहीं अर्जित कर पाते हैं, तो यह पर्याप्त नहीं माना जाता। संभवत: आपको व्यक्तिगत प्रदर्शन के लिए बधाई नहीं मिलेगी, इसके बजाय आपको दिलासा दिया जाएगा कि कम से कम आपको द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ। इस तुलना से आपको लगता है कि आप अभी यथेष्ट नहीं हैं। आपका प्रयास पर्याप्त नहीं था और इसका हमारे अस्तित्व पर एक भयावह प्रभाव पड़ता है।

समय के साथ, यह भावना – मैं यथेष्ट नहीं हूँ – दो विरोधी शक्तियों, भय और आत्म-निष्ठा, का एक अनंत युद्धक्षेत्र सजा देती है। एक ओर हम स्वयं को स्वयं-पुष्टि के माध्यम से सांत्वना देने का प्रयास करते हैं कि मैं इतना बुरा नहीं हो सकता, कम से कम मुझे द्वितीय स्थान मिला है, मुझे कुछ खुशी भी मिलनी चाहिए। यह हमें भावुक बनाता है और हमें तनावग्रस्त बनाता है। हम रचनात्मक आलोचना के प्रति भी प्रतिकूल हो जाते हैं और स्वयं को बचाने के लिए रक्षा की दीवार बनाते हैं। इस प्रकार हम कई अच्छी बातों को भी ठुकरा देते हैं।

दूसरी ओर प्रसन्नता का भय हमें अनुभव कराता है कि मैं संभवत: उस सफलता को प्राप्त नहीं कर पा रहा हूँ जिसकी मैंने महत्त्वाकांक्षा की थी। मैं इतने प्रेम, देखभाल तथा ऐसे सुखों और खुशी के योग्य नहीं हो सकता। जब अच्छी वस्तुएं होती हैं, तो हमें लगता है कि यह भाग्य है, या अनायास सफलता, कि हम इस सौजन्य के योग्य नहीं हो सकते। यह प्रसन्नता का भय है। और यह अधिकतर लोगों को अपने सपने का पीछा करने से रोकता है। अपने पूर्ण सामर्थ्य से संभावना को वास्तविक बनाने में बाधा डालता है। क्योंकि इतने लंबे समय तक अपनी महत्त्वाकांक्षा का दमन करने के पश्चात, वे यह मानना आरंभ करने लगते हैं कि वे प्रसन्नता के पदाभिलाषी नहीं हैं।

यह आपके साथ घटित न होने दें। असहमति का होना सामान्य है और कभी-कभी वितर्क भी आवश्यक हो सकता है। परंतु यदि आप को अपमानित व पदच्युत किया जाए तो यह ठीक नहीं है। यदि आप खुशी के भय से ऊपर उठना चाहते हैं ताकि आप अपने जीवन को सम्पूर्ण जी सकें तब आप किसी को भी स्वयं का अनादर करने की अनुमति न दें। और यदि वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाएं। अपने आप को दूर रखने का कोई मार्ग खोजें।

प्रसन्नता का भय अपने आप में विश्वास नहीं करने से आता है। यह स्वयं का आदर न करने से आता है। यदि आप दूसरों को अनादर करने का मौका देते हैं, तब यह जान लें कि वे आपके साथ ऐसा ही व्यवहार करेंगे। चारों ओर सफल और खुश लोगों को देखें और आप एक आम लक्षण पाएंगे – वे अपना सम्मान करते हैं। वे खुश होने से भयभीत नहीं हैं और यदि आप स्वयं से प्रेम करना सीखते हैं तो आप भी नहीं होंगे। बहुत कम लोग खुशी का आनंद लेते हैं। अधिकतर इसके खोने से भयभीत हैं और उस भय में वे लगभग सदैव इसे खो देते हैं।

एक पुजारी लंबे सप्ताहांत के ठीक पहले एक सेवित गैस स्टेशन पर कतार में प्रतीक्षा कर रहा था। परिचारक अपनी पूरा प्रयास कर रहे थे परंतु वहाँ बहुत सारी गाड़ियाँ थीं। अंत में, पुजारी की बारी आ गई।

“आदरणीय पुजारी,” परिचर ने कहा, “मैं विलम्ब के लिए क्षमा चाहता हूँ। ऐसा प्रतीत होता है कि हर कोई लंबी यात्रा की तैयारी के लिए अंतिम क्षण तक प्रतीक्षा कर रहा है।”
पुजारी ने कहा, “मैं यह पूर्ण रूप से समझ सकता हूँ। मेरे व्यवसाय में भी यही होता है!”

आप किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं? जीवन आगे बढ़ेगा, समय का चलना जारी रहेगा। यदि आप अब अपने ‘सुख का भय’ नहीं त्याग देते हैं तब आप बाद में इसे त्यागने का साहस कभी नहीं कर सकते हैं। गांधीजी ने एक बार कहा था, “भय आपका शत्रु है। हमें ऐसा प्रतीत होता है कि द्वेष शत्रु है; परंतु यह भय है।” यदि आप शत्रु को स्वयं के ऊपर चलने दें, तो वे ऐसा ही करेंगे। भय अवमानना और द्वेष की भावना को पैदा करता है। इससे भी दुष्टतर, भय आपको या तो मनोग्रस्ति रूप से आत्म-सचेत या फिर अप्रिय रूप से आत्म-आलोचनात्मक बनाता है। दोनों प्रकार से यह आपको अपर्याप्त अनुभव कराता है।

आप जीवन द्वारा प्रदान की गई खुशी के हर औंस के योग्य हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि वास्तविकता में आप सांस ले रहे हैं और जीवित है, यह तथ्य है कि प्रकृति आपको चाहती है। ब्रह्मांड आपको चाहता है। हर कोई गलती करता है। हर कोई कभी न कभी काम को बिगाड़ता है और विपत्ति के शिकंजे में फंसता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप एक आपदा हैं। किसी को भी यह सामर्थ्य न दें कि वह आपके मन में अपेक्षाकृत होने का भय उत्पन्न करें। “जो पाप रहित है वे ही पहले पत्थर फेंकें।” अपनी विशाल क्षमता और खुशी से डरें नहीं; इसका अध्यर्थन करें।

अपने मुखपत्र को दाँतों पर कसें और कहें, “चलो शुरु हो जाओ!”।

शांति।
स्वामी