एक दिन चीनी सन्यासी फ़ज़ंग (फ-त्सांग ) महारानी वू ( ६२४-७०५ सी ई) के राज दरबार में अवतामसक सूत्र  पर  प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने समझाया कि एक ब्रह्मांड जिसमें चेतना के अनेक आयामों  के साथ, अस्तित्व के अनेक लोक हैं वे मात्र अंतरसंयोजित ही नहीं बल्कि वे परस्पर समाविष्ट भी हैं।महारानी ने कहा मैं इसे समझी पर इसे ग्रहण नहीं कर  पायी।मैं अंतरसंयोजन को समझ गयी किंतु  दो चीज़ें एक दूसरे को कैसे समाविष्ट  कर  सकती  हैं?

यह अच्छी तरह ज्ञात है कि अंतरसंयोजन का सिद्धांत न केवल  मौलिक है , यह मात्र अंतर्दृष्टि के बारे में है जिसका प्रयोग फ़ज़ंग उनके चारों ओर की हर चीज़ के लिए किया करते थे।वे एक सुवक़्ता थे और महारानी वू ने उनको अनेक सूत्रों के अनुवाद का कार्य दिया था।उनकी बहुमुखी प्रतिभा और बुद्धिमत्ता और राजनैतिक ज्ञान से  प्रभावित होने के साथ ही साथ महारानी उनको बहुत पसंद भी करती थी।

उन्होंने अंतर्संयोजनात्मकता  कैसे कार्य करती है यह समझाने का प्रयास किया लेकिन महारानी तब भी अप्रभावित रहीं।उन्होंने कहा क्या आप इसे प्रदर्शित कर सकते हैं? फ़ज़ंग ने उत्तर दिया मुझे कुछ  संसाधन और एक सप्ताह का समय चाहिए होगा।

सात दिनों के पश्चात शाम के समय उन्होंने महारानी को एक बड़े से सभागृह में बुलाया जहाँ असंख्य दर्पण लगे हुए थे । संध्या  की कोमल किरणें बड़े – बड़े परदों से छन- छन कर अनेक दर्पणों पर गिरकर इसे एक अलौकिक दृश्य बना  रही थीं । सभागृह के मध्य में एक बड़ा सा झूमर था जिसके भीतर एक मोमबत्ती रखी थी,जिसे अभी जलाया नहीं गया था।।महारानी ने कहा यहाँ पर होना बड़ा ही शांतिप्रद और स्वप्निल  है।

फ़ज़न ने कहा “ महारानी की अनुमति से जब पूरी तरह  सूर्यास्त हो जाए तो  मैं मोमबत्ती जलाना चाहता हूँ।”

संध्या रात्रि में बदल गयी, सभागृह में अंधेरा हो गया, वहाँ पर प्रकाश  का एकमात्र स्रोत बाहर खड़े रक्षक थे जो मशालें  और भाले लेकर खड़े थे। फ़ज़ंग मोमबत्ती  जलाने वाले  थे , उन्होंने  दरवाज़े बंद करने के लिए कहा।

तत्पश्चात उन्होंने  महारानी को दर्पणों के पास ले जाते हुए कहा “देखिए महारानी ! एक मोमबत्ती के प्रकाश से सारा सभागृह जगमगाने लगा। एक मोमबत्ती की लौ का प्रकाश सारे दर्पणों से टकराते हुए  बहुगणित हो गया।आप प्रत्येक दर्पण में एक लौ  को देखेंगी। लौ का स्रोत मात्र एक ही है लेकिन यहाँ हर दर्पण इसे दिखा रहा है।एक को हटा लो सब चली जाएँगी।”

महारानी ने कहा “ मैं समझ गयी।’ ज्योतियों के प्रतिबिम्ब के बहुगणित होने से टिमटिमाता प्रकाश उनकी आँखों, आभूषणों और उनके वस्त्रों पर किए स्वर्ण के काम पर देखा जा सकता था ।” लेकिन यह कैसे इस बात को प्रदर्शित करता है कि चीज़ें परस्पर एक दूसरे में अंतर निहित हैं।

फ़ज़न ने कहा ‘ कृपया मेरे साथ आइए और किसी भी एक दर्पण को ध्यान से देखिए।”

वह एक दर्पण के सामने खड़ी  हुई और  बोली इसमें क्या है ?”

“ न केवल प्रत्येक दर्पण में मूल मोमबत्ती का प्रतिबिम्ब है बल्कि प्रत्येक दर्पण में सारे अन्य  दर्पणों की विभिन्न ज्योतियाँ हैं। यही अंतरसंयोजन का सिद्धांत है।

इसलिए यह हमारे और हमारे चारों ओर प्रत्येक के साथ है । हम कार्मिक रूप से एक दूसरे पर निर्भर और अंतरसंयुक्त हैं। हम हमारे भीतर ब्रह्मांड की अनकही और असीम महिमा और सामूहिक चेतना के अनंत प्रभावों  को  अपने भीतर लेकर चलते हैं।आप जो करते हैं, कहते हैं और सोचते हैं वह अन्यों पर प्रभाव  डालता है और अन्य का आप पर प्रभाव पड़ता है। यह कर्मों का सृजन करता है।। यही मेरा सामूहिक चेतना  से तात्पर्य है। सदा परिवर्तन शील और रूपांतरित होने वाली। बुद्ध ने इसे अनित्य और अनात्मा कहा ;

इन  शब्दों  उनकी शिक्षाओं का सार निहित है । वह है यह संसार अनित्य( अस्थायी) और अनात्मा ( जो किसी भी अंतर्निहित आत्मा से रहित हो) है ।हमारा हमारे मतों   के प्रति मोह और कुछ नहीं अविद्या है,  एक प्रसुप्त  मन का ,एक निष्क्रिय चेतना का चिन्ह है।

लोगों के स्वयं के जीने के तरीक़े के प्रति मोह के कारण आज हिंसा, असहनशीलता और बेचैनी के स्तर को  देखिए। उस विषय में  किसी भी चीज़ के प्रति मोह जो कि स्वाभाविक है , अज्ञानता की शाखाएँ हैं। क्योंकि मोह का स्वभाव है स्थायित्व की खोज। मेरी सुंदरता, मेरी सम्पत्ति, मेरा परिवार और यौवन  कुछ  भी क्षीण नहीं होना चाहिए।जिन चीज़ों को हम पकड़ कर रखना चाहते हैं यदि हमें उन पर पकड़ ढीली करना पड़ती है तो मोह हमें बुरी तरह आहत करता है।

बुरी बात यह है कि ऐसा मोह आसक्ति को जन्म देता है, और आसक्तिपूर्ण व्यवहार के साथ हम आत्मसम्मोहन का  विकास कर लेते हैं, हम आत्मरसिक  यहाँ तक कि हम स्वयं में आसक्त भी हो जाते हैं ।हम स्वयं के प्रेम करने लगते हैं, उस प्रकार से नहीं जो हमारा उत्साह और सुख  को बढ़ाए बल्कि इस प्रकार से कि हम निरंतर हर चीज़ में सुयोग्य अनुभव करने के लिए बाह्य स्वीकृति खोजते हैं।

यदि कहानी यहीं ख़त्म हो जाती तो यह उतना बुरा न होता।परेशानी यह है कि जो मोह अज्ञान की ओर ले जाता है वह सारी  भावनाओं का नाश करने वाली  तृष्णा का सृजन करता है। संस्कृत का  शब्द तृष्णा एक अविश्वसनीय रूप से गहन शब्द है, क्योंकि इसका अर्थ लोभ से कहीं अधिक है। संस्कृत शब्द तृष्णा  का अर्थ है ऐसी कामना जो अतृप्य हो,  जो अंतर्निहित रूप से अस्थायी हो उसमें स्थायित्व के लिए निरर्थक  खोज तृष्णा कहलाती है।

यह सब  बहुत सरल  है : लोभ के साथ हम आसक्त रहते हैं और फलस्वरूप  वास्तविक ज्वाला अज्ञान के कम्बल के नीचे आवृत रहती है और अज्ञानता से हम निरंतर  जो हम कर सकते हैं, उससे चिपके रहते हैं।और परिणामस्वरूप हमारे कष्ट अंत हीन हैं।

एक पति ने गुसलखाने में से अपनी पत्नी को आवाज़ दी “ हनी क्या तुम मुझे तोलिया दोगी?

पत्नी रसोई में से चिल्लाई “ तौलिया !” मैं तुम्हारे लिए ये नाश्ता तैयार करूँ या तुमको तौलिया दूँ?

वह वहाँ फ़व्वारे के नीचे भीगा हुआ खड़ा था।जो कि अब बंद हो गया था।
पहली बात  तुम हमेशा तौलिया भूल जाते हो,  फिर उसे गीला ही  बिस्तर पर ही छोड़ दिया करते हो ! मुझे तुम्हारे गंदे कपड़े भी उठाना पड़ते हैं ।पत्नी गुसलखाने तक आयी और आगे कहती रही । गुसलखाने को  साफ़ करना तो दूर की बात है, तुम तो अपना शेविंग जेल तक  खुला छोड़ दिया करते हो   और अपना रेज़र भी लापरवाही से ऊपर की ओर धार रख कर छोड़ दिया करते हो  और उसके बाद तुम पूरे घर में गीले ऐसे घूमते रहते हो  जैसे कोई बैल तालाब में से निकल कर घूम रहा हो । एक दिन अनु (काम वाली बाई) गीले फ़र्श पर फिसलकर गिर गयी और तीन दिन तक काम पर नहीं आयी।मुझे स्वयं ही सारा काम करना पड़ा। हे  भगवान यह आदमी ऐसा क्यों है?

पति ने सोचा कि मेरी ग़लती क्या है उससे तौलिए की माँग करना या शादी में उसका हाथ माँगना?

शायद उसकी ग़लती उसका ग़ैरज़िम्मेदाराना व्यवहार हो सकता है। या शायद पत्नी अधिक धैर्यवान हो सकती थी या वे दोनों ही  चिंता नहीं करते।किसी भी प्रकार से उन दोनों में धीरे धीरे प्रेम का विकास हो जाता है और एक दिन उनको आश्चर्य होता है कि कहाँ यह सब ग़लत था।

देखभाल करना दूसरों के बारे में नहीं है और वही आपके ऊपर भी लागू होता  है। सम्बंध का एक भाव अंतरसंयोजन को ईंधन देता है

क्या आप लम्बी प्रतीक्षा के बाद  कभी अपने प्रिय व्यक्तियों के साथ छुट्टी मनाने के लिए सुंदर पहाडों  पर स्थित किसी पर्यटन स्थल पर गए हैं ? एक छोटी सी ग़लतफ़हमी, जैसे कि किसी वाद- विवाद  या कि काम से या और कोई विचलित समाचार मिलने से आप आप थोड़े व्यथित हो गए हों। क्या आपको याद है कि आपको उसके बाद कैसा लगा था ? पहाड़ों की सुंदरता या बर्फ़ कि सफ़ेदी, गाती हुई सुंदर चिड़ियाँ ,बहती हुई नदी सभी अपना सौंदर्य तत्क्षण  खो देती   हैं। अंदर या बाहर के किसी भी प्रकार के आनंद से वंचित हो आप उस सुंदरता को नहीं देख सकते।हर चीज़ अभी भी वहाँ है लेकिन अब वैसी अनुभव नहीं होती।

अज्ञानता हमारी चेतना के साथ यही करती है।सब वहीं है बस आप इसे देख नहीं सकते।

अंतरसंयोजन के सिद्धांत से लाभ लेने के लिए, हम अपनी चेतना  के दर्पण को तृष्णा और स्वार्थ , आत्म केंद्रीकरण आवृत्त नहीं कर सकते ।

वे आँखों पर पट्टी बाँधने की भाँति कार्य करते हैं और हमें अपने भीतर की अग्नि देखने से रोकते हैं। सुंदर हाल, सूर्यास्त, संध्या, झूमर में उस मोमबत्ती को देखने से हमारी दृष्टि को बाधित करते हैं।यह सब दर्पण के स्वच्छ होने पर और आपकी दृष्टि के स्पष्ट होने पर निर्भर है।

कुछ लोगों के  संघर्ष कभी समाप्त क्यों नहीं होते , उसका एक कारण यह भी  है, वे अपने जीवन में अधिकांश समय किनारे पर ही रहते हैं।

मोह  ऐसा हमारे लिए  करता है । वे हमारे सिर में आवाज़  और हलचल  का सृजन करता है।मैं जानता हूँ कि आपमें से कुछ सोचेंगे ; जैसा कि मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि फिर हमें लगाव नहीं होना चाहिए क्या?

यह मेरा विशेषाधिकार  नहीं है कि मैं आपको बताऊँ कि आप अपने जीवन में क्या करें या क्या नहीं या आपके पास क्या हो और क्या नहीं। मैं इस शिक्षा में विश्वास नहीं करता।मैं जो कह रहा हूँ,वह यह है कि, जिससे मैं जुड़ा होता हूँ  अंततः वही मेरे दुःख का कारण होता है।  हाँ लगाव प्रेरित भी करता है। हमें सुख देता है, यहाँ तक कि यह एक प्रकार से हमें दृढ़ भी करता है, लेकिन यह हमें सत्य और हमारे चारों ओर की सुंदरता से बेसुध भी बनाता है।

अंतरसंयोजन का नियम हर एक के लिए है, लेकिन यह आपके लिए काम करे इसके लिए व्यक्ति को यह अवश्य जानना होगा कि पहिए को गतिमान कैसे रखा जाए। किसी के पास  बैंक एकाउंट में १० अरब डौलर हो सकते हैं। लेकिन यदि उसे इन्हें कैसे निकालना है या इस पैसे को किस प्रकार प्रयोग करना है ज्ञात नहीं है तो वह इसे ख़र्च या निवेश नहीं कर सकेगा । 

आप पूछेंगे कि पहिए को गतिमान कैसे रखा जाए ? दयालु बनें। किसी के जीवन में अंतर लाएँ। कभी भी जब आप आहत हों, स्वयं से पूँछें क्या मैं इसलिए आहत हूँ क्योंकि मैं अपने दृष्टिकोण के पीछे नहीं देख पा रहा हूँ, शायद मेरा दर्पण ढाँका हुआ है?और मैं उस ज्योति को नहीं देख रहा हूँ जो मेरे सारे संसार को प्रकाशित कर रही है?

तब आपकी अंतर की आवाज़ आपको अधिकार में ले लेगी और ब्रह्मांड के साथ सम्बंध को पुनर्प्रज्वलित करते हुए  शांतता और प्रेम के तट  की ओर आपका निर्देशन करेगी।

एक करुणामय हाव भाव के समान कोई चीज़ नहीं जोड़ती। और कोई भी चीज़ हमेशा के लिए संबद्ध  नहीं होती। ब्रह्मांड का उद्देश्य इसे चलाना नहीं है   ।

शांति।

स्वामी