प्रतिवर्ष औसतन  लगभग १०००० ईमेल, और ३००० से अधिक टिप्पणियाँ और पत्र मुझे प्रत्यक्ष  विभिन्न इवेंट के समय  भेजे जाते हैं ( सन २०१४ की तुलना में आने वाले ईमेल की तुलना में तीन गुना अधिक )। इसमें समूह और व्यक्तिगत मुलाक़ातों , और स्वामिनार में अनेक प्रश्नों के मेरे द्वारा दिए गए  उत्तरों की संख्या सम्मिलित नहीं है।  साथ ही मेरा काम ब्लैक लोटस, ब्लौग्स, आश्रम, लेखन,सम्पादन, प्रकाशकों, यात्रा,इवेंट आदि का भी है। अन्य शब्दों में कहा जाए तो मेरे समय का बड़ा भाग लोगों के साथ बातचीत में जाता है। फिर भी इन ईमेलों और विषयों की बाढ़  के बीच  , जाने कैसे उसके संदेश ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया।

उसने चार वर्ष पूर्व मेरी एडमिन टीम को प्रथम बार लिखा था। और मैं उससे तत्काल मिलने के लिए सहमत  हो गया था।वह आश्रम आने की स्थिति में नहीं थी, इस कारण उससे देखने के लिए जहाँ मैं ठहरा हुआ था वहाँ मिलने की व्यवस्था की गयी ।

एक दुर्बल  किंतु  सुंदर आत्मा वंदना, वंदना शर्मा जो मात्र ४० वर्ष की आयु थी ।  जब मैं उससे तीन वर्ष पूर्व मिला उस समय उसकी आँखों में थोड़ा भय और आशा थी। वह सन २०१५ से कैन्सर से लड़  रही थी। यह काफ़ी विकसित हो चुका था और अंतिम अवस्था में था  । वह पुनः स्वस्थ होना और जीना  चाहती थी। उसने अपनी बात मुझसे  बिना किसी संशय के कही। वंदना अपने छोटे बच्चों के लिए बहुत अधिक चिंतित थी। ओपरेशनों, दवाइयों, कीमो और रेडिएशन के रूप में कभी न समाप्त होने वाले ईलाजों ने उसके स्वास्थ्य पर बहुत भयानक प्रभाव डाला था।कभी कभी उसके पास चलने की भी शक्ति शेष नहीं रहती थी और वे उसे व्हील चेयर पर मेरे पास लेकर आया करते थे। वह हमेशा  मुस्कुराती और घबराई रहती थी।

वह मेरे पास बहुत विश्वास के साथ आयी थी, लेकिन मैं उसे उस चीज़ का वादा किस प्रकार कर सकता था जो मेरे हाथों में नहीं थी ?क्या मैं कर सकता था? नहीं।

फिर भी मैं उसके परिवार और उसके साथ सदा प्रेम करने वाले पति के  साथ वंदना को देखता रहा। जब भी मुझे उसे देखने का समय मिलता मैं उसके लिए ५ मिनिट अलग रखता और मैं उससे ५ एक बार  अवश्य मिला होऊँगा । शीघ्र ही वह समझ गयी थी कि मैं उसकी इच्छा पूरी करने में असमर्थ हूँ।

मैं जानता था कि मैं इस ग्रह पर उसके निवास के समय को थोड़ा और बढ़ाने में किसी प्रकार की सहायता नहीं कर सकता। उसे माँ प्रकृति ने निष्कासन का सूचना पत्र दे दिया था। शायद इसको कहने का सही  तरीक़ा यह है कि उसका स्थानांतरण होने वाला था।उसका यहाँ पर जो समय था उतनी उसने सेवा कर दी थी और मैं उसके लिए इस समयावधि में वृद्धि नहीं कर सकता था।

उसके बाद गुरुपूर्णिमा ( १६ जुलाई २०१९), पर उसके पति मुझसे मिले। किसी भी अन्य समय की भाँति उनके पास मेरे लिए हाथ से बनाए लड्डू थे। दो डिब्बे थे। एक छोटा मैने रखा और दूसरे को मैने आशीर्वाद देकर उनको वापस कर दिया। पहली मुलाक़ात से ही यह परम्परा थी। हम दोनों ही जानते थे कि मैं वास्तव में मिठाई नहीं खाता लेकिन इसका कोई अर्थ न था।

उन्होंने मुझे एक लिफ़ाफ़ा दिया और कहा “ वंदना यह पत्र आपको देना चाहती थी।मुझे यह उसके जाने के बाद मालूम हुआ ।”

मैने जब तक इवेंट समाप्त नहीं हो गया तब तक प्रतीक्षा की क्योंकि मैं इसे शांति में पढ़ना चाहता था। यह मेरी मेज़ पर तीन दिन तक रखा रहा।मुझे स्मरण कराते हुए कि इसे  वह समय और ध्यान देने की आवश्यकता है, जिसके यह योग्य है ।

मैं उसके पति की सहमति और स्वीकृति से इसे आपके साथ अक्षरशः साझा कर रहा हूँ।मैने सारे अनुच्छेद , विराम चिन्ह और वाक्य विन्यास वैसे के वैसे ही रखे हैं , जैसे वंदना ने (१७-५-१९७४ – ०६-५-२०१९) लिखे थे।

स्वामी जी,

शत शत प्रणाम।

यदि आप इसे पढ़ रहे हैं तो हम दोनों ही जानते हैं कि इसका क्या अर्थ है।

कोई समस्या  नहीं है!

 उस समय जब मैं अपने जीवन की  सबसे कठिन और अंतिम अवस्था से गुज़र रही थी , जब मुझे एक गुरु की आवश्यकता थी तब  आपको मेरे जीवन में लाने के लिए मैं भगवान की बहुत आभारी हूँ। मैं एक शांत और शांति से पूर्ण हृदय और मन के साथ जा रही हूँ।

मैं दुखी हूँ परंतु डरी हुई नहीं हूँ। भावनात्मक लगावों के कारण दुखी हूँ किंतु क्या आनेवाला है उससे डरी हुई नहीं हूँ। यह विकास मात्र आपके ही कारण है।

मैं नहीं जानती कि मैं बदली हूँ या नहीं लेकिन अब मैं भिन्न प्रकार से सोचती और अनुभव करती हूँ।मैं बहुत अधिक कष्ट में हूँ किंतु मैं अपनी परिस्थितियों  से नाराज़ नहीं हूँ। मुझे यह ज्ञात हो गया है कि मैं ही अपने सारे दुखों की निर्माता हूँ। जो भी मेरे पास है वह जीवन में जिस भी व्यक्ति से मैं कभी भी मिली हूँ उसके प्रति प्रेम है। वे  सब मैं ही हूँ।

एक समय था जब मेरे पास ऊर्जा और जीवन था किंतु इसके साथ क्या करूँ इसका कोई विचार न था  और जब मेरे पास थोड़ा ज्ञान आया है तो कोई ऊर्जा और जीवन शेष नहीं रहा।मैं चाहती हूँ कि मुझे इसे सही भाव से अच्छे काम में प्रयोग करने एक अवसर मिले । मुझे एकमात्र इसी का दुःख  है।

मैं हमेशा मेरे बच्चों और विशेष रूप से मेरे पति  के लिए जो मेरे हमसफ़र  हैं और उनका संसार मेरे चोरों ओर ही  घूमता है, उनके लिए बहुत चिंतित रहती थी। लेकिन अब मुझे किसी प्रकार की  चिंता नहीं है क्योंकि मैं जानती हूँ कि आप उनकी देखभाल करेंगे।

मुझे अक्सर आश्चर्य होता है कि यदि भगवान को मुझे बस अभी तक ही जीवन देना था  तो क्यों नहीं उन्होंने  एक सेकेंड में एक झटके से या दुर्घटना से जीवन ले लिया, वे मुझे   ४ साल से भी अधिक समय ये यन्त्रणा क्यों दे रहे हैं? लेकिन अब मैं समझ गयी हूँ कि मेरी विलीन होने के पूर्व और अधिक विकसित होने के लिए मेरी आत्मा का  पूर्ण काया पलट किया जा रहा  है।

यह मात्र छोटा सा मूल्य है, जो मैने चुकाया  है।
मेरी एक छोटी से प्रार्थना है।

इसके बाद  मेरे समस्त जीवनों में  चाहे मैं कोई सा भी जीवन का स्वरूप या पात्र बनूँ, बस किसी न किसी प्रकार से बस मुझे आपके आस पास ही रखिए।मुझे नहीं मालूम आपकी कृपा के लिए मेरी आत्मा कितना भटकी है लेकिन अब जब मैने आपको पा ही लिया है तो मैं बस आपकी कृपा में की रहना चाहती हूँ। मैं जानती हूँ कि मेरे सभी सम्बंध और प्रीति  प्रत्येक जीवन में बदलती रहेगी । लेकिन यह सम्बंध मै चाहती हूँ कि शाश्वत रहे ।मुझसे वादा कीजिए कि आप मुझे प्रत्येक जीवन में सदैव आपके आस पास ही रखेंगे।
इस निश्चित  विश्वास के साथ कि हम बहुत जल्द मिलेंगे मैं आपको शुभ विदा कहती हूँ।

आप मेरे गुरु,मेरे प्रेम, मेरे ईश्वर हैं।
आपके  प्रेम (बिना किसी शर्त के) और सहारे के लिए धन्यवाद। मैं शायद आपको पहचान न पाऊँ लेकिन मुझे निश्चय है कि आप मुझे खोज लेंगे।

जय श्री हरि

वंदना।

मैने कहा, तथास्तु।

यह पत्र वह संदेश है जो आज मेरे पास आपके लिए है। कृपया जान लें कि एक दिन यह समाप्त होने वाला है। अपने जीवन को इस प्रकार जिएँ कि आप इसे प्यार करते हैं और इसकी देखभाल करते हैं। क्षुद्र विचार, भावनाएँ, द्वेष, क्रोध,नकारात्मकता इस सबके लिए  हमारे पास सच में समय नहीं है।और यदि आप सोचते हैं कि आप कर सकते हैं तो पुनः विचार कीजिए।

समझौता करें या आगे बढ़ जाएँ।

और हाँ वंदना ओम् स्वामी तुम्हें खोज लेगा। जिस प्रकार  जो मेरे आस पास हैं उनको मैं वचन देता हूँ कि स्वामी तुमको खोज लेगा। यह मेरा काम  है, मेरा धर्म है, इनमें से मैं किसी को भी अनुमत रूप से नहीं लेता।

शांति।

स्वामी।