यह एक आशीर्वाद है यदि आप इसका उपयोग कर सकें और इससे उत्साहित एवं प्रेरित हो सकें। यदि नहीं, तब यह निरंतर अशांति व रिक्तता का मूल कारण बन जाता है। यह आपको अनुभव कराता है कि सब कुछ गलत है और आप एक व्यक्ति के रूप में पूर्ण नहीं हैं। आपको ऐसा प्रतीत होता है कि आपको कुछ करने की आवश्यकता है या किसी को ढूंढने की आवश्यकता है, जिससे आप जो शून्यता का अनुभव कर रहे हैं, उससे उभरें। कदाचित आपको एक नया या भिन्न रिश्ता बनाना चाहिए। कदाचित आपको अपना काम बदलना होगा या किसी नये देश में जाना होगा, या फिर हो सकता है कि आप केवल निराश हैं। एक गहरे कुंड में गिरना या दीवार को घूरते रहना और आप कहाँ जा रहे हैं या आपको कहाँ जाना चाहिए यह ना जानना, यह सब इस वस्तु को नियंत्रण में न रखने से उत्पन्न होता है। यह वस्तु क्या है? अकेलापन।

अकेलापन वह अवस्था है जब आप अपने जीवन में हर प्रकार से दिशाहीन अनुभव करते हैं, जब आपको सब कुछ व्यर्थ प्रतीत होता है (भले ही थोड़ी देर के लिए ही)। यह उल्लेखनीय है कि बढ़ती संख्या में अनेक व्यक्ति गंभीर अकेलापन की भावना से पीड़ित और परेशान हो रहे हैं।

मैंने मैट हैग द्वारा लिखित पुस्तक नोट्स आन ए नर्वस प्लेनट में एक दिलचस्प प्रसंग पढ़ा –

क्या आपने कभी अपने बच्चों की निरंतर मनोरंजन की अपेक्षा के विषय में माता-पिता को परेशान होते सुना है?

आप यह जानते ही होंगे।

“बचपन में मैं कार में पीछे बैठ कर खिड़की से बाहर १७ घंटे तक बादलों और घास को देख कर भी पूर्ण रूप से प्रसन्न रह सकता था। अब हमारी छोटी मिशा कार में पांच सेकंड भी बिना व्यंगचित्र देखकर या गेम ऐप खेलकर या यूनिकॉर्न के रूप में स्वयं की फोटो लिए बिना नहीं रह सकती है।”

कुछ इसी प्रकार की समस्या।

कदाचित, इसके पीछे एक स्पष्ट सत्य है। हमारे पास जितने अधिक प्रोत्साहन के साधन हैं, उतनी ही सरलता से हम ऊब जाते हैं।

और यह एक और विरोधाभास है।

वैसे देखा जाए तो आज के युग में अकेला न होना अति सरल होना चाहिए। सदैव ही कोई ऐसा व्यक्ति होता है जिससे हम ऑनलाइन बात कर सकते हैं। यदि हम प्रियजनों से दूर हैं तब हम उन्हें इंटरनेट पर स्काइप कर सकते हैं। परंतु फिर भी हम अकेलापन का अनुभव करते हैं। जब मुझे उदासी का अनुभव होता है, तब मैं अपने आप को भाग्यशाली मानता हूँ कि मेरे चारों ओर बहुत से ऐसे लोग हैं जो मुझसे प्रेम करते हैं। परंतु मैंने कभी स्वयं को इस प्रकार अकेला अनुभव नहीं किया था।

मेरे विचार में अमेरिकी लेखक एडिथ व्हार्टन अकेलेपन पर विचार प्रकट करने वाली सबसे बुद्धिमान महिला थीं। उनका मानना था कि अकेलेपन का उपचार सर्वदा संगति नहीं है, बल्कि आपको स्वयं की संगति में प्रसन्न रहने की विधि ढूंढनी चाहिए। अनौपचारिक नहीं होना चाहिए, परंतु अपनी स्वयं की असंगत उपस्थिति से भय नहीं होना चाहिए।

उनके अनुसार दुःख का उपचार यह है कि “अपने मन के भीतरी घर को इतने समृद्ध रूप से सजाना चाहिए कि आप वहाँ संतुष्ट हो सकें। जो किसी भी व्यक्ति का स्वागत करे और आमोद से उन का सत्कार करे, किंतु जब कोई अनिवार्य रूप से अकेला हो जाए तब भी वह प्रसन्न रह सके।”

मैं उनसे पूर्ण रूप से सहमत हूँ। जिस प्रकार अपनी इच्छाओं को पूरा करने से अधिक इच्छाओं का जन्म होता है, संगति द्वारा अकेलापन को दूर करने का प्रयास वास्तव में लंबे समय तक काम नहीं करता। मैं इस बात को नहीं नकार रहा कि मानव संपर्क, सहयोग, समुदाय आदि हमारे कल्याण के लिए आवश्यक हैं। परंतु वे बिना किसी व्यक्तिगत असुविधा के आपके जीवन का केंद्र नहीं बन सकते हैं। सामाजिककरण आदि आपके अकेलेपन की भावनाओं को कम करने में आप की मदद कर सकते हैं, या क्षणिक रूप से आपको इसे भूलाने में सहायक हो सकते हैं। परंतु अंत में, आप वास्तव में इतने अकेले हैं कि वे आपके अकेलापन को दूर नहीं कर पाएंगे। अधिकांश स्वयं-सहायक पुस्तकों का कहना है कि जीवन में एक गहन अभिलाषा की अनुपस्थिति आपको अकेला बनाती है। उनका यह मत है कि यदि आप अकेलापन अनुभव कर रहे हैं, संभवत: आपके पास जीवन जीने या अपने जीवन में कुछ कार्य करने का कोई व्यावहारिक कारण नहीं है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो सुबह आपके अलार्म बंद होने से पहले उठने के लिए आपको उत्तेजित करता है। इसलिए, सामान्य ज्ञान कहता है कि अपने जीवन को किसी वस्तु या किसी व्यक्ति के साथ भरें।

एक योगिक परिप्रेक्ष्य से ये सब भी अस्थायी उपाय हैं। मैं किसी वस्तु या किसी व्यक्ति के विषय में भावुक हो सकता हूँ, इसका अभिप्राय यह नहीं है कि मैं अकेलेपन का अनुभव नहीं करूंगा। अनेक सफल कलाकार व संगीतकार हैं जो हर समय अपनी कला में डूबे रहते थे किंतु फिर भी वे अवसाद के शिकार हो जाते हैं। योग कहता है कि अकेलापन स्वयं को खोजने का एक सुंदर अवसर है। न केवल यह जानने के लिए कि आप क्या कर सकते हैं, परंतु आपने जो भी किया है उस पर चिंतन करने के लिए। जब आप अकेलेपन में मन को जागरूक बना के रखते हैं तब आप शांति के एक विशाल जलाशय को पाएंगे। यदि अकेलेपन की कोई व्याख्या है तो वह है आत्मा का आह्वान।

गहन अकेलेपन में गहन जागरूकता निर्वाण से कम नहीं है। सामान्य अकेलेपन में आप केवल अपने विचारों एवं भावनाओं में बहते जाते हैं जो निरंकुश होने पर प्रायः नकारात्मक होते हैं। अकेलेपन के एक और प्राचीन रूप में, जिसे मैं योगिक अकेलेपन या मन के एकांत के रूप में संदर्भित करता हूँ, आप प्रत्येक बीते क्षण के हर छोटे विचार के विषय में गंभीर जागरूकता बनाए रखते हैं। आपको यह अनुभव होना आरंभ हो जाता है कि आप वास्तव में अजन्मा, अनंत, अमिश्रित हैं, कि आप अपने शरीर से भी परे हैं और सदा बकबक करने वाले मन से भी परे हैं।

इसी प्रकार के शांत क्षणों में जीवन का ज्ञान आपको प्राप्त होता है। जो भी व्यक्ति जिनसे आप प्रेम करते हैं या घृणा करते हैं, चाहते हैं या तिरस्कार करते हैं, अभिलाषित हैं या आप उनसे दूर रहते हैं, वे सभी व्यक्ति, तथा स्वयं आप भी, केवल एक छोटी अवधि के लिए ही इस धरती पर हैं। अव्यक्तदीनी भूतानी व्याप्त-माध्याय भारत अव्यक्त-निधननी ईवा तपरा का परदेवाना। कृष्ण कहते हैं, “हे अर्जुन तुम किसके लिए दुखी हो? ये व्यक्ति अतीत में विद्यमान नहीं थे, वे भविष्य में भी नहीं रहेंगे। केवल थोड़े समय के लिए जब तक कि आप यहाँ हैं, वे आपके जीवन में हैं। तब यह आसक्ति क्यों?” (श्रीमद भगवद गीता, २.२८।)।

जो भी हमें अपने जीवन में मिलता है वह अपनी व्यक्तिगत यात्रा पर होता है। अपने मार्ग पर जाते हुए हम केवल उनके पथ को पार करते हैं। इसलिए, अकेलेपन का उपचार किसी ऐसे व्यक्ति या किसी वस्तु को ढूंढने से नहीं होता जो आपको संलग्न, प्रसन्न या व्यस्त रखता हो। यह जागरूकता का केंद्र ढूंढने से होता है। इस से आप यह अनुभव करने लगते हैं कि स्थायी प्रसन्नता का स्वाद लेने हेतु हमें भीतर की ओर झांकना चाहिए और अकेलेपन की सुंदरता को गले लगाना चाहिए।

योगिक ग्रंथों का मानना है कि इस प्रकार का अकेलापन आप को पूर्ण रूप से मुक्त कर देता है। ग्रंथों ने इस अवस्था को कैवल्य नाम दिया है – आप स्वयं की संगति में पूर्ण रूप से शांत व अंतर्लीन हो जाते हैं। हमारे अनुबंधनों, इच्छाओं व कार्यों के कारण, बुद्धि और आत्मा के बीच एक विभाजन हो जाता है। आत्म-अनुसंधान, चिंतन व सतर्कता के द्वारा यह विभाजन कम होने लगता है और आप और अंतर्लीन होने लगते हैं। सत्त्व-पुरुषायोह शुद्धिसाम कैवल्यम इति। इस प्रकार, जब बुद्धि की शुद्धता आत्मा की शुद्धता के समान हो जाती है, तब व्यक्ति मुक्ति की अंतिम स्थिति तक पहुँच जाता है। (पतंजलि के योग सूत्र, ३.५५)।

एक सुंदर लड़की एक कैफे में कॉफी पी रही थी। मुल्ला नसरूद्दीन ने उससे संपर्क किया।
“क्या तुम अकेली हो?” उसने उससे शर्माते हुए पूछा।
“मैं लंबे समय से अकेली हूँ,” लड़की ने उत्तर दिया।
“तब, क्या मैं यह कुर्सी ले सकता हूँ?”

यदि आप अपने जीवन में किसी की खोज इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आप अकेले हैं, तब आप निराश होंगे। आप उनके हृदय में कुर्सी की खोज कर रहे हैं और कदाचित उन्हें केवल आपकी कुर्सी चाहिए। यह सत्य है कि एक और व्यक्ति की उपस्थिति में आप व्यस्त हो जाएंगे क्योंकि अधिकांश सांसारिक संबंध ऐसे ही होते हैं परंतु व्यस्त होने का अर्थ यह नहीं कि आप पूर्णता या आनंद का अनुभव करेंगे। दो अकेले व्यक्ति एक आनंदकारी जनसमूह नहीं कहलाते।

जब आप अपने जीवन को सरल बनाते हैं और उसे व्यवस्थित करते हैं, जब आप अपनी बुद्धि व आत्मा की भलाई के लिए समय देते हैं, जब आप सभी जीव जंतुओं के प्रति प्रेम और दयालुता की भावना से रहते हैं, तब आप अपनी बुद्धि और आत्मा के बीच के अंतर को दूर कर देते हैं। अपनी प्रतिबंधित और समाज से प्रभावित बुद्धि को पीछे छोड़ते हुए आप यह अनुभव करते हैं कि आप जो भी चाहते हैं और जिससे भी पीडित हैं आप उन सब से कहीं अधिक विशाल हैं और उनसे परे हैं। आप ब्रह्मांड में केवल चमकता सितारा नहीं अपितु स्वयं ब्रह्मांड हैं। फिर आपको अकेलेपन का अनुभव कौन करा सकता है या अकेलेपन के अनुभव से बाहर कौन ला सकता है? कोई भी नहीं। यदि कोई है, तब केवल एक व्यक्ति आपको सदा के लिए आपके अकेलेपन से बाहर खींचने का सामर्थ्य रखता है। और वह व्यक्ति आप स्वयं हैं। आप के भीतर विराजमान वह संपूर्ण, सुंदर व अविनाशी व्यक्ति जो असीम महिमा एवं भव्यता से भरा है और जो सामान्य अकेलेपन से सदैव बहुत दूर है।

आपके पास जो एकमात्र सच्चा और शाश्वत संबंध है वह है आप के स्वयं के साथ का संबंध। इसको जियें। इसे प्रेम करें। इसका आदर करें। यह इसके योग्य है।

शांति।
स्वामी