कुछ सप्ताह पूर्व कैनडा में एक मृदुभाषी और बुद्धिमान नवयुवक मेरे पास आया और उसने मुझसे एक प्रश्न पूछा जो अधिकांश लोगों के लिए महत्वपूर्ण प्रासंगिकता का प्रश्न है। वह अपने पियानो गायन प्रस्तुति के लिये जा रहा था और उसकी माँ ने बताया था कि उसे अन्य छात्रों के लिये तालियाँ बजानी चाहिये एवं उन्हें शुभकामनाएं देनी चाहिये।

“स्वामीजी मैं सदैव यही करता हूँ।” उसने मुझसे कहा, “परंतु कोई भी मेरे लिये ताली नहीं बजाता। माँ शुभकामनाएं देने को कहती हैं। मैं सदा ऐसा ही करता हूँ, परंतु कोई भी मुझे शुभकामनाएं नहीं देता। इससे क्या लाभ? उन्हें मेरी कोई परवाह नहीं है फिर मुझे उनकी सराहना क्यों करनी चाहिए?”

वह बहुत परेशान था और मुझे उसकी आँखों में कुछ आँसू उमड़ते दिखाई दिए।

“हमारे संसार में,” मैंने उससे कहा, “तुम सदैव उन लोगों से मिलोगे जो तुम्हारी परवाह नहीं करेंगे। तुम उन लोगों से मिलोगे जो प्रतिदेय नहीं करेंगे, जो तुम उनके लिये करते हो उसको महत्व नहीं देंगे। परंतु ऐसे लोग बहुसंख्य नहीं हैं क्योंकि अधिकांश लोग अच्छे होते हैं। फिर भी, कुछ ऐसे लोग होंगे जो अपनी दुनिया में इतने तल्लीन होंगे कि तुम्हारी दयालुता देख भी नहीं पाएंगे। स्वीकार करना दूर, आभार प्रकट करना भी पूरी तरह भूल जाएंगे। और, क्या तुम जानते हो कि तुम्हें ऐसे लोगों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए?”

“मुझे सुदृढ़ होना चाहिए?”

“हम्म … ठीक है।”

मैं उसे सुदृढ़ होने के लिए नहीं कह रहा था। मैं उसे मात्र यही कहना चाहता था कि उसे स्वयं को उनके कारण बदलना नहीं चाहिये। परंतु मैंने अपना मन बदल लिया और सुदृढ़ होने की बात आगे बढ़ाते हुए उससे पूछा, “वह शक्ति कहाँ से आएगी?”

निरुत्तर होने पर उसने अपना सर हिलाया।

“तुम्हारी शक्ति तुम्हारे व्यवहार से आएगी। और सभी परिस्थितियों में वैसा ही व्यवहार करो जो तुम्हें शोभा देता है। यदि तुम उन्हें शुभकामना देना या उनके लिये ताली बजाना बंद कर देते हो तो तुम बिल्कुल उनके जैसे हो जाओगे। जबकि यदि तुम अपनी अच्छाई का त्याग न करो तो तुम उनसे ऊपर उठ जाओगे। इस प्रकार तुम अद्वितीय हो जाते हो, अधिक शक्तिशाली और बेहतर।”

उसकी आँखें चमक उठीं और मैंने उसे सलाह दी कि उसे मात्र दूसरों को प्रसन्न करने के लिये ताली बजाना या कुछ भी नहीं करना चाहिए। मैं उसे निर्बल बनने के लिए नहीं कह रहा था। अच्छे व्यवहार का अर्थ यह नहीं है कि आप लोगों की स्वीकृति के लिए ही कार्य करें (भले ही, कुछ व्यक्ति आपसे यही अपेक्षा करेंगे)। इसका अर्थ है, कि आप उनसे बेहतर जानते हैं और आपके आचरण से इस बात का पता चलता है।

एक उद्धरण जो प्रायः गांधीजी की विशेषता प्रस्तुत करने के लिये कहा जाता है, “एक आँख के बदले दूसरी आँख लेने से पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी।”

जब संसार आपको हर प्रकार से चुनौती देता है, तब अपने साहस के आधार पर खड़ा रहना और अपने सिद्धांतों पर अटल रहना सरल नहीं है। परंतु यह पूर्णतया संभव है। हममें अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने की अंतर्जात अभिलाषा होती है। हमारा अहंकार हमें दूसरे व्यक्ति को यह दिखाने के लिए प्रेरित करता है कि हम उससे बेहतर जानते हैं, कि हम उससे बेहतर हैं। भले ही ऐसा करने की प्रक्रिया में बहुत से व्यक्ति ठीक विपरीत कर बैठते हैं। निपुणता से वाद विवाद करना या ऊँचे स्वर में बोलना, आध्यात्मिक श्रेष्ठता का कोई प्रमाण नहीं है।

शब्द कभी यह सिद्ध नहीं कर सकते कि आप आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत हैं। आप कुछ भी कह लें वह पर्याप्त नहीं है। कहना आसान है। केवल हमारा आचरण ही यह दर्शाता है कि हम कहाँ खड़े हैं। जब हमारे शब्द हमारे व्यवहार से अंकुरित होते हैं तभी उनका प्रभाव सामने वाले व्यक्ति पर पड़ता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि आप कोई प्रभावशाली व्यक्ति हैं तो लोग आपके भाषण का सम्मान करेंगे, चाहे वे आपसे सहमत न हों, फिर भी आपके प्रति आदर प्रदर्शित करेंगे। परंतु उनके हृदय में स्वयं के प्रति सम्मान पाने के लिये आपको ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करना होगा जो उन्हें प्रेरित करे, उन्हें भीतर से पिघला दे। हम अपने हृदय में किसी के लिये जो सम्मान रखते हैं वही वास्तविक सम्मान है। और कोई भी दूसरे प्रकार का सम्मान मात्र दिखावा है।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे आपकी जय-जयकार नहीं करते। उनके लिए तालियाँ बजाकर आप अपना श्रेष्ठ व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। हो सकता है आप उन्हें आपकी विचारशैली अपनाने के लिये प्रेरित करें। परिणाम स्वरूप अधिक व्यक्ति प्रसन्न होंगे। ऐसा करने से यह संसार बेहतर बनेगा।

मेरा विश्वास करें, उदार और उत्कृष्ट आचरण कठिन नहीं है। आपको स्वयं से मात्र एक प्रश्न करना है कि मेरा ध्येय क्या है? आपको स्वतः ही पता चल जायेगा कि आपको किस प्रकार का आचरण शोभा देता है। प्रायः उत्तेजना में आप स्वयं से यह प्रश्न पूँछना भूल जाएं। आपको बाद में यह बोध होगा कि आप अलग प्रकार से व्यवहार कर सकते थे और आपको वैसा करना चाहिये था। इससे कैसे अभिभूत किया जाए? बहुत सरल है। स्वयं से यह प्रश्न प्रतिदिन करें, सुबह और शाम, कि मेरा ध्येय क्या है? इस प्रकार आपको सही समय पर याद आ जाएगा कि आपको कैसा आचरण करना है।

मैंने अल टॅपर की पुस्तक “एक पादरी, एक पुजारी और एक रब्बी” में एक चुटकुला पढ़ा था।

एक पादरी, एक पुजारी, और एक रब्बी ताश खेल रहे थे जब पुलिस ने खेल पर छापा मारा।

पादरी की ओर इशारा करते हुए, प्रमुख पुलिस अधिकारी ने कहा, “आदरणीय ऑल्सवर्थ क्या आप जुआ खेल रहे थे?”

अपनी आंखों को स्वर्ग की ओर करते हुए पादरी ने मन में कहा, “हे ईश्वर, अब मैं जो करने जा रहा हूँ उसके लिये मुझे क्षमा करना।” तब पादरी ने पुलिस अधिकारी से कहा, “नहीं, मैं जुआ नहीं खेल रहा था।”

उस अधिकारी ने पुजारी से पूछा, “पुजारी मर्फी, क्या आप जुआ खेल रहे थे?”

पुनः स्वर्ग से याचना करके, पुजारी ने उत्तर दिया, “नहीं, मैं जुआ नहीं खेल रहा था।”

रब्बी की ओर मुड़कर अधिकारी ने पुनः पूछा, “रब्बी गोल्डस्टीन, क्या आप जुआ खेल रहे थे?”

अपने कंधे उचकाते हुए रब्बी ने उत्तर दिया, “किसके साथ?”

यदि आप वापस बहस नहीं करते हैं तो दूसरे व्यक्ति आपके साथ बहस कैसे कर सकता हैं? वे अपने खेल किसके साथ खेलेंगे, यदि आप उन खेलों का हिस्सा नहीं बनते हैं? आकाश पर कोई कैसे थूक सकता है?

जब आपको कठिन लोगों और जटिल परिस्थितियों का सामना करना पड़े तो उसके विषय में मेरा दृष्टिकोण सरल है। प्रस्तुत है- चाहे कुछ भी हो अपनी अच्छाई का त्याग न करें। आपको समय पर दृढ़ होना पड़ सकता है, चुनौतीपूर्ण और नकारात्मक भी होना पड़ सकता है, यह ठीक है। फिर भी इसका यह अर्थ नहीं कि आप अपनी अच्छाई का त्याग कर दें। क्यों? विशाल परिप्रेक्ष्य में देखें तो अपनी अच्छाई का त्याग कर किसी को भी सम्मान, प्रेम या प्रभुत्व नहीं प्राप्त हुआ है।

मै इसमें कुछ और जोड़ूंगा कि अच्छाई कोई विशेषता या जन्मजात गुण नहीं है। यह कोई भावना नहीं है। यह एक प्रकार का व्यवहार है। एक चुनाव है, एक आदत है।

अच्छे बनें, दयालु बनें। यह हर प्रकार से योग्य है। हाँ, सर्वदा।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - Of What Good is Goodness?