मुझे स्मरण है कि मैने  बचपन में दो पुस्तकें पढ़ी थीं और उनको पढ़ने में बहुत आनंद आया था, वे थीं हितोपदेश और पंचतंत्र जो कि ऐसोप  की दंत कथाओं का भारतीय संस्करण है जो कि लगभग  २००० वर्ष पहले लिखी गयी थीं। मैं  आपके साथ एक विशेष कहानी साझा करना चाहता था कि मुझे  इसी प्रकार की एक कहानी पढ़ने में आयी  जो कि उदयलाल पई ने लिखी है “ आप एक शेर को नहीं खाते इसका यह अर्थ नहीं है कि शेर आपको नहीं खाएगा।”मैं इसका थोड़ा अंश  थोड़ा उद्धृत कर रहा हूँ।( हूँ— थोड़ा अधिक, वास्तव में पूरी)

एक समय की बात है एक गाँव में एक लड़का नदी के किनारे अकेला टहल रहा था। उसी समय उसको  सहायता के लिए करुण पुकार सुनाई दी ।

एक मगरमच्छ चिल्ला रहा था। “ कृपया मेरी सहायता करो, मुझे बचाओ, कोई  मुझे मुक्त कर दो।”  जैसे मनुष्य कामनाओं में फँसे हैं , अपनी पूँछ हिलाते हुए वह जानवर उसी प्रकार जाल में बुरी तरह फँसा हुआ था।

वह लड़का  बेचारे मगरमच्छ की सहायता करना चाहता था किंतु उलझन में था।उसने कहा  यदि मैं तुम्हारी सहायता करूँ तो जिस क्षण  तुम मुक्त होगे मुझे खा जाओगे।”

मगरमच्छ आँसू बहा कर बोला “ मैं उसे कैसे खा सकता हूँ जिसने मेरी जान बचाई हो?” मेरे दयालु रक्षक। मैं वादा करता हूँ कि तुमको मैं स्पर्श भी नहीं करूँगा और हमेशा तुम्हारा आभारी रहूँगा।”

लड़के को दया आ गयी  और वह जाल काटने लगा, मगरमच्छ का सिर जाल से बाहर  ही  आया  था कि, जैसी संभावना  थी, उसने तुरंत बच्चे का पैर अपने जबड़ों में जकड़ लिया। और बोला “ मैं कई  दिनों से भूखा हूँ—।”

लड़का  चीख़ा कितनी ग़लत बात है।” नालायक  मगरमच्छ तुमने मेरी भलाई का यह प्रतिफल दिया।”

मैं क्या करूँ यह संसार ऐसा ही है! यह जीवन ऐसा ही है।”

लड़का  रोने लगा यह अन्याय है।

अन्याय से तुम्हारा क्या अर्थ है?किसी से भी पूछो और वे तुमको बताएँगे कि यह विश्व इसी प्रकार काम करता है। यदि वे मुझे ग़लत बताएँगे तो मैं तुमको छोड़ दूँगा।”

बच्चे ने पास के एक झाड़ पर एक चिड़िया को देखा और उससे पूछा “ क्या तुम सोचती हो कि मगरमच्छ जो कर रहा वह  सही है? क्या यही  संसार का तरीक़ा है- अन्याय से पूर्ण ?”

चिड़िया पूरी घटना को देख रही थी। इसलिए उसने जल्दी से उत्तर दिया कि मगरमच्छ सही है । अच्छाई का प्रतिफल   हमेशा दया के रूप  में नहीं मिलता । उसने बताया कि वह अपने साथी के साथ अपने बच्चों के लिए घोंसला बना रही  थी लेकिन वह सब बेकार हो गया क्योंकि साँप आए और अंडों को निगल गए। उसने लड़के को आगाह किया कि इसमें  कोई संदेह नहीं कि  यह संसार एक  न्यायपूर्ण जगह नहीं है। यह  कहते हुए चिड़िया अपनी बात समाप्त की ।

तुमने सुना बच्चे !अपनी पकड़ उसके पैर पर और मज़बूत करते  हुए मगरमच्छ ने कहा । अब मैं  तुमको खा जाऊँगा ।

लड़के ने देखा एक गधा नदी के किनारे घास चर रहा था।उसने मगरमच्छ से कहा रुको! और गधे से भी उसने वही प्रश्न पूँछा।गधे ने कहा कि दुर्भाग्य से मगरमच्छ सही है । मैं  गधा हूँ हर कोई मुझे मूर्ख समझता है लेकिन फिर भी मैं यह जानता हूँ कि संसार में न्याय के सिवा सब  है।हमेशा अच्छे लोगों के साथ बुरा होता  है। जब मैं जवान था तो मेरा मालिक मेरे ऊपर गीले कपड़े ढोकर ले जाया करता था और मुझसे अधिकतम काम लिया करता था।मैने वर्षों तक उसकी सेवा ईमानदारी के साथ की।अब मैं बूढ़ा और कमज़ोर हो गया हूँ ,तो  उसने यह कहते हुए मुझे छोड़ दिया है कि वह मुझे खिला नहीं सकता। इसलिए हाँ मगरमच्छ सही है। यहाँ अन्याय और असमानता है।
मगरमच्छ ने बच्चे से कहा  अब बहुत हो गया “ मेरे मुख में पानी आ रहा है, और अब मैं इसे मुख में नहीं रख सकता। यदि चाहो तो तुम अपनी प्रार्थना कर सकते हो।”

बच्चे ने कहा थोड़ा रुको “ बस एक अंतिम बार प्रयास कर लेने दो, मुझे उस ख़रगोश से पूछने दो। कहा जाता है  कि तीसरी बार अंतिम होती है।”

चूँकि तुमने मेरी जान बचाई है इसलिए मैं तुमको यह अंतिम मौक़ा देता हूँ।

ख़रगोश से  वही प्रश्न  पूँछने पर   उसने चिड़िया और गधे से बिलकुल भिन्न उत्तर दिया। ख़रगोश ने कहा”यह बिलकुल मूर्खता है। यह ऐसा बिलकुल नहीं है।” संसार एक न्याय से पूर्ण जगह है।”

मगरमच्छ लड़के  के पैर को अपने मुख में पकड़े हुए  बुदबुदाते हुए  बोला। तुम क्या बोल रहे हो मूर्ख ख़रगोश !” वास्तव में यह संसार एक अन्याय से पूर्ण स्थान है।मेरी ओर देखो,मेरी कोई ग़लती नहीं थी फिर भी मैं जाल में फँसा हुआ था ।”

ख़रगोश बोला “तुम ऐसे बोल रहे हो जैसे कोई आदमी पान मुख में रखे हुए बोलता है। मुझे तुम्हारी बुदबुदाहट का अर्थ समझ में नहीं आ रहा।साफ़ साफ़ और ज़ोर से बोलो।”

मगरमच्छ ने कहा “ जानता हूँ कि तुम ऐसा करके क्या करना चाह रहे हो! मैं साफ़ बोलने के लिए मुँह खोलूँगा और लड़का बच जाएगा।”

ख़रगोश ने कहा तुम क्या बेवक़ूफ़ हो?क्या तुम भूल गए कि तुम्हारी पूँछ कितनी शक्तिशाली है, एक झटका पड़ेगा और वह मर जाएगा। तुम यहाँ सबसे अधिक शक्तिशाली हो।”

मगरमच्छ अपनी झूठी प्रशंसा सुनकर झाँसे में आ  गया और अपना तर्क देने के लिए उसने मुँह खोला।

ख़रगोश चिल्लाया ‘ लड़के भागो भागो।खड़े मत रहो ‘ और लड़का पंजों के बल भाग खड़ा हुआ।

मगरमच्छ क्रोध से पागल हो गया “ तुमने मेरे साथ धोखा  किया! तुमने मेरा भोजन छीन लिया। यह न्याय नहीं है।’

ख़रगोश पेड़ से गिरी एक चेरी को  मुँह में चबाते हुए  बोला “ देखो कौन यह बात  बोल रहा है?”

लड़का गाँव को दौड़कर गया और सब गाँव वालों को बुला के लाया जो अपने साथ भाले और तलवार लेके आए और उन्होंने मगरमच्छ को मार डाला। उसके पालतू कुत्ते ने ख़रगोश को नीचे गिरा दिया। लड़के ने अपने कुत्ते को पकड़ने का प्रयास करते हुए कहा रुको इस ख़रगोश ने मेरी जान बचाई है उसका शिकार मत करो । परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुत्ता अपने दाँत ख़रगोश की नरम गर्दन में गड़ा  चुका था। अब वह फ़र की निर्जीव गेंद से अधिक कुछ न था।

लड़के ने दुखी होकर कहा आख़िकार शायद  मगरमच्छ सही था,संसार का तरीक़ा अन्याय पूर्ण है।यही जीवन है।

हज़ारों लोगों से बात करने के बाद और निकट से कष्टों को देखने के बाद मुझे यह अनुभव हुआ कि यह अज्ञानता है  कि कष्ट से निकलने का कोई मार्ग है।। यहाँ मैं दर्द( जो है) और दुःख  ( जो हम सोचते हैं कि यह है) में अंतर नहीं कर रहा हूँ। बुद्ध ने दावा किया कि दुःख अस्तित्वमान हैं और इनसे निकलने का मार्ग है। शायद हो। वेद भी कहते हैं कि यदि मैं समता की अवस्था को बनाए रख सकूँ, यदि मैं संसार के अस्थाई यहाँ तक कि अविश्वसनीय  स्वभाव को हमेशा याद रख सकूँ, तो  मैं उतना दुःख  नहीं पाउँगा ।

अच्छे लोग हर समय दुःख उठाते हैं।आप कितने अच्छे  या आध्यात्मिक हैं और आपको कितने दुःख  जीवन में सहन करने होंगे, इसके बीच कोई सीधा- सीधा सम्बन्ध नहीं है ।   यदि यह आपको  आनुवांशिक रूप से प्राप्त हुआ  है तो अच्छा और महान होना आपको शारीरिक और मानसिक रोग से बचा नहीं सकता। उदाहरण के लिए अच्छा  या महान होने का यह अर्थ नहीं है कि हमें एक ट्रक या शराब पिए हुए चालक द्वारा टक्कर नहीं लग सकती।

अच्छा होना  आपके निवेश  के मूल्य या आपके प्रिय जनों के जीवन पर निर्भर नहीं है।  अन्य शब्दों में अच्छाई को किसी भी उस चीज़ से जिसे  हम अच्छा नहीं समझते न छुटकारा और न ही क्षतिपूर्ति चाहिए ।

तब प्रश्न उत्पन्न  होता है कि यदि ऐसा है तो  फिर अच्छा  क्यों बना जाए।यदि मेरी अच्छाई मेरे दुखों को कम करने में कुछ भी नहीं करती तो ( प्रत्यक्ष रूप से तो बिलकुल नहीं ) फिर इस अच्छाई और करुणा  के  बारे में चिंता क्यों की जाए? उत्तर उतना ही  सीधा और सरल है जितना कि यह प्रश्न स्वयं है।और वह यह है कि  अच्छा होना हमारी अंतर्निहित प्रकृति है।हमारी रचना इस प्रकार की हुई है कि  जब हम अच्छाई का अभ्यास करते हैं तो ख़ुशी का अनुभव करते हैं  । अतः  अच्छा होना  हमारा स्वाभाविक धर्म है।  हमें यह जीवन  मौसम की तरह नियमित रूप से जो चुनौतियाँ और कठिनाइयाँ देता है उनका सामना करने के लिए अच्छाई और इसकी बहन करुणा शक्ति प्रदान करती है।

हम प्रार्थना करते हैं, हम ध्यान करते हैं, हम करुणाभाव  से काम करते हैं, हम अच्छा करते हैं इसलिए क्योंकि हमें ऐसा करना चाहिए : यही अच्छाई है। यह हमारा एक अभिन्न अंग है। जब हमारे पास मार्ग हो तो हम हमारा  अधिकार  सिद्ध कर सकते हैं अंततोगत्वा , लेकिन  जब हम मार्ग बनाते हैं तो  हम आनंद और ख़ुशी का अनुभव करते हैं।हमें अच्छाई को नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि यह हमारे भीतर शक्ति और लचीलेपन को प्रविष्ट कराती है।

इससे भी अधिक आश्चर्यजनक  यह है कि अच्छे लोग अच्छा करना इसलिए बंद नहीं करते क्योंकि प्रतिफल  नहीं मिल रहा है। अच्छे लोग अच्छे ही  रहते हैं।वे समझते हैं कि यह कोई चुनाव नहीं है। कुछ महान मानवों के बारे में सोचें। क्योंकि अच्छाई  प्रतिदान नहीं दे रही है, इसलिए क्या  वे हिंसा की ओर। या दुष्कर्म की ओर मुड़ जाते हैं,

हमारी  चुनौतियाँ  हमारी परीक्षा लेती हैं लेकिन हमारी प्रवृत्ति हमें आकार देती  है। हमारी कठिनाइयाँ हमें तोड़ती नहीं, बनाती हैं।वे उसे बाहर निकालती हैं जो पहले से ही हमारे भीतर है। इसलिए अच्छे लोगों का सामना जब बाधाओं के साथ होता है तो वे और अच्छे बनते हैं , दुखी  नहीं।

मुल्ला। जब वह ७ वर्ष  का था उसे उसके पड़ोसी ने २ दीनार देकर प्रलोभन दिया और कहा क्या तुम कोने की दुकान से २ समोसे ख़रीदकर लाकर  दे सकते हो, इसमें से  एक  तुम खा सकते हो और दूसरा मेरे लिए ले आना।

१० मिनिट बाद मुल्ला वापस आया और बोला यह शेष बची १ दीनार है। दुकानदार के पास एक ही  समोसा था इसलिए मैने मेरा ले लिया। शुक्रिया ।

एक अच्छा व्यक्ति अन्य किसी व्यक्ति की भाँति ही कष्ट पाता है। क्योंकि यदि   कोई गणितज्ञ  या एक कलाकार है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह बीमार नहीं हो सकता। बल्कि यह तुलना निरर्थक है। इसी प्रकार यदि कोई आध्यात्मिक रूप से विकसित है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह प्रकृति के नियमों से परे है। या उदयलाल पई के शब्दों में : चूँकि आप एक शेर को नहीं खाते, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि शेर आपको नहीं खाएगा।

क्या इसका यह अर्थ है कि हमें बुरा होना चाहिए? मैं आपको बताता हूँ कि यह आपके हाथों में नहीं है। साथ ही साथ यह कैसे सहायता करेगा? आख़िकार अच्छाई का विपरीत आपकी दुःख से  रक्षा नहीं करेगा।तो आप पूँछेंगे कि फिर  यह कौन करेगा ? आपका उद्देश्य,आपकी प्रवृत्ति ,आपकी धारणा और आपकी जीवन से अपेक्षाएँ यह करेंगी। जब वे पंक्ति बद्ध होंगी तो वहाँ चुनौतियाँ, अवरोध होंगे ,दर्द होगा लेकिन कोई दुःख  नहीं होगा।आप दुखी हो सकते हैं किंतु रोएँगे नहीं, आप कमज़ोर पड़ेंगे  लेकिन टूटेंगे  नहीं । जब और सब कुछ  असफल हो जाता है तो यह आपकी अंतर्निहित अच्छाई है जो कि जीवन के जहाज़ को दलदल वाले समुद्र में मार्गदर्शन करने में सहायता करती है। चाहे तहस नहस करने वाले झंझावात हों महात्मा गांधी, नेलसन मंडेला,मार्टिन लूथर किंग और उनसे पहले और बाद में अनेक लोगों ने इस आधार भूत सिद्धांत का प्रयोग  किया है ।

इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कोई लड़का, मगरमच्छ,गधा या ख़रगोश है, जीवन में कोई निश्चितता नहीं है। और शायद यह अनिश्चितता ही  है जो हमारे जीवन को सनसनीख़ेज़ बनाती है।

अच्छाई प्रार्थना है, यह ध्यान है। वास्तव में अच्छाई भगवान है। भले बनें।

शांति

स्वामी