एक गाँव में एक पति-पत्नी अपने 13 वर्ष के पुत्र के साथ रहते थे। तीनों साधारण परिवार की भांति ही रहते थे; पति-पत्नी काम पर जाते, धन कमाते व परिवार की आवश्यकताओं का ध्यान रखते। उनके पास एक गधा भी था जो उनकी आजीविका कमाने में सहयोगी था। और हाँ, मैं उस परिवार के मुखिया की बात नहीं कर रहा; यह तो वास्तव में चार टांगों वाला पशु ही था! एक बार उनके पुत्र ने अपने लिए साईकल लेने की ठान ली और अपने माता पिता पर साईकल खरीदने का दबाव बनाने लगा।

किन्तु उसके माता पिता के पास पर्याप्त धन नहीं था। तथापि, उन्होंने अपने पुत्र की जिद्द के आगे घुटने टेक दिये और अपने गधे को बेच कर प्राप्त धन से उसके लिए साईकल लेने का निर्णय लिया। पुत्र अत्याधिक प्रसन्न हो गया, किन्तु अपनी छोटी उम्र के कारण, अपने माता पिता के प्रति उसमें कृतज्ञता का कोई भाव नहीं आया, चूंकि 13 की उम्र में यही लगता है कि माता पिता का यह कर्तव्य है कि संतान की इच्छाओं की पूर्ति करें। ऐसे ही 30 वर्ष की आयु होने पर ऐसा महसूस होता है मानो सम्पूर्ण विश्व पर आपको प्रसन्न रखने का दायित्व है; व 50 के होने पर लगने लगता है कि हमारा संसार के प्रति कोई कर्तव्य शेष नहीं। 70 आते आते मनुष्य अपनी इच्छाओं व मानसिक तनाव के ताने बाने की उलझन से इतना थक चुका होता है कि अब उसे दुनिया के हिसाब किताब में कोई रूचि नहीं रहती। तो, अब वे गधे को पशु-बाजार ले जा कर बेचने का निर्णय करते हैं; इस भौतिक संसार की कार्य-प्रणाली का अनुसरण करते हुए, जहां अधिकांशतः हर व्यक्ति इसी प्रकार के वित्तीय क्रय-विक्रय में व्यस्त है।

वह पशु-बाजार वहाँ से दो गाँव आगे, लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर था। उन्होंने कुछ खाने पीने की सामाग्री साथ ली व गधे को लेकर पैदल यात्रा आरंभ की। वे अभी कुछ ही किलोमीटर चले थे कि उनका सामना आगे से आते चार युवाओं के समूह से हुआ। उनमें से एक युवा ने उस परिवार को अपने गधे के साथ आते देख व्यंग्य किया, “देखो इन मूर्खों को, इनके पास एक गधा है, फिर भी तीनों पैदल चले जा रहे हैं। इनमें से एक आराम से गधे के ऊपर बैठ सकता है।”

वे उस परिवार का परिहास करते हुए आगे निकल गए।उस परिवार ने यह सब सुना और उन्हें वास्तव में अपनी मूर्खता का आभास हुआ।अपनी जग-हँसाई रोकने के लिए पति-पत्नी ने कुछ विचार किया और उन्होंने अपने पुत्र को गधे के ऊपर बैठा दिया क्योंकि वह सबसे छोटा था व जल्दी थक सकता था। अब सब ठीक ठाक लग रहा था। उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी।

जब वे अगले गाँव में पहुंचे तो वहाँ स्त्रियों का एक झुंड जो नदी की ओर जा रहा था, ने उन्हें देखा। स्त्रियों ने आपस में बातचीत आरंभ कर दी जिसकी आवाज उस परिवार तक भली भांति पहुँच रही थी। उनमें से एक बोली, “क्या कलयुग आ गया है। इस जवान लड़के को देखो! स्वयं तो गधे पर बैठा है और उसके माता पिता पैदल चल रह हैं। इससे अधिक बुरा और क्या हो सकता है? यदि मेरा पुत्र इसके जैसा होता तो मैं उसे जीवित ही धरती में दफन कर देती।”

“मुझे तो इस बेचारी औरत पर दया आ रही है। शायद उसका पुत्र अपने पिता के नक्शे-कदम पर चल रहा है। वरना उसे यह विचार और कहाँ से आता?,” दूसरी स्त्री बोली।

पति-पत्नी ने एक दूसरे की ओर ऐसे देखा जैसे मानो वे चुपचाप आँखों से वार्तालाप कर रहे हों। गधा तो आराम से आगे बढ़ता रहा, उसे उस परिवार की व्यथा का अनुमान कैसे होता; हाँ, पुत्र अवश्य बात समझ गया। वह गधे से नीचे उतरा व अपनी माता को उस पर बैठा दिया। यह व्यवस्था उन्हें अधिक सुचारू लगी।

कुछ किलोमीटर और आगे बढ़ जाने पर उनका सामना कुछ वृद्ध स्त्रियों के झुंड से हुआ, जो पेड़ की छाँव में व्यर्थ की बातों में लगी हुई थीं। उनके चेहरे की झाइयाँ व झुर्रियां जिंदगी को जीने की थकान दर्शा रही थीं। जैसे ही उन्होंने उस परिवार को पास से जाते हुए देखा वे ऊंचे स्वर में एक साथ बोलीं, “ये आजकल की औरतों को देखो! बेचारा पति व छोटा बालक तो पैदल जा रहे हैं और ये गधे पर बैठी है।”

“यही तो मुसीबत है, ये काम काज करना ही नहीं चाहतीं। अपने को महारानी समझती हैं।” दूसरी वृदधा बोली।

पत्नी को अति ग्लानि अनुभव हुई। उसने अपने पति से कहा कि वह उसी समय गधे से उतरना चाहती है।

उन्होंने विचार विमर्श किया व निर्णय लिया कि उत्तम तो यह होगा कि घर का मुखिया ही गधे पर सवार हो। यह उन्हें कुछ ठीक सा तो नहीं लग रहा था, किन्तु, फिर भी, दुनिया के दृष्टिकोण से यही ठीक था। लोगों को अक्सर यह तनाव हो जाता है कि वे उचित कार्य कर रहे हैं अथवा नहीं, या अन्य लोग क्या सोचते होंगे, इत्यादि …। तथापि वह व्यक्ति गधे पर चढ़ गया और उन्होंने यात्रा चालू रखी। जैसे ही उन्होंने गाँव का रास्ता पार किया, उनके स्वागत में एक अजनबी लोगों का झुंड प्रस्तुत था।

उस झुंड में से एक वृद्ध ने पति को समझाते हुए कहा “देखो, यह अच्छा नहीं कि तुम्हारी पत्नी व पुत्र तो इस तपती धूप में पैदल चलें और तुम गधे पर बैठ कर जाओ। ऐसा मत करो। आखिर तुम्हारी पत्नी ही तो तुम्हारा सदा पूरा ख्याल रखती है और, सोचो, यदि इस बालक को इतनी तेज गर्मी में चलने से कुछ हो गया तो इसका दायित्व किस पर आएगा?”

पति ने उस वृद्ध कि सलाह को ध्यान से सुना। अब तीनों ही गधे पर बैठ गए। उन्हें लगा कि स्थिति का यही सही हल है। किन्तु, हर किसी की बातें सुनकर भला कभी सही हल निकल सकता है! जैसे जैसे वे मार्ग पर आगे बढ़ते गए, उन्हें पशु-बाजार जाने वाले अन्य व्यापारी भी दिखाई देने लगे। उनमें से एक क्रुद्ध स्वर में चिल्लाया, “इस आलसी व क्रूर परिवार को देखो! कितने निर्दयी हैं! ये तो इस गधे को मार ही डालेंगे। मुझे तो ऐसे लोगों से घृणा है। यह गधा मेहनत करके इनकी धन कमाने में मदद करता है और ये इसकी सेवा के स्थान पर, इसके साथ इतना क्रूर व्यवहार कर रहे हैं।”

यहाँ यह बताना कठिन था कि कौन किसकी सवारी कर रह था!

गधे को हर हाल में अपने मालिक कि आज्ञा का ही अनुसरण करना होता है; किन्तु यहाँ तो उसके मालिक इस दुनिया के हाथों गधे बने हुए थे।

कहानी यहीं समाप्त होती है, किन्तु इसका ध्येय नहीं।

अपने हृदय का अनुसरण करें। यह आवश्यक नहीं कि हर तथ्य का सदा कुछ अर्थ हो ही। केवल उन्हीं कि बात को सुनें जिन लोगों को आप जानते हैं व उन पर भरोसा करते हैं। हर किसी को प्रसन्न करने की व्यर्थ दौड़ में आप न तो कहीं पहुँच पाएंगे और न ही स्वयं कुछ बन पाएंगे। गधे की दुनिया के हमराही कदापि न बनें, आपका अपना पृथक मार्ग हो सकता है। आप अपने गधे की सवारी करना चाहते हैं, उससे काम लेना चाहते हैं या उसे बेचना चाहते हैं – स्वयं निर्धारित करें। वह आपका अपना गधा है, आपका अपना संसार है।

शांति।
स्वामी