कुछ व्यक्ति दूसरों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील क्यों हैं? जबकी कई लोग ऐसे भी हैं जो दूसरों की चिंता भी नहीं करते। एक व्यक्ति में ऐसा क्या है जिस कारण वह और अधिक संवेदनशील होता है? भारत में एक प्रसिद्ध और सुंदर भक्ति गीत है। वास्तव में, यह महात्मा गांधी का पसंदीदा गीत था। मैं इस गीत की पहली दो पंक्तियाँ उद्धृत करता हूँ –

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे ।
पर दुःखे उपकार करे तो ये, मन अभिमान न आणे रे ॥
उस व्यक्ति को वैष्णव या भगवान का सच्चा भक्त कहते हैं जो दूसरे व्यक्ति के दर्द को समझता है, वह जो दूसरों की सहायता करता है, परंतु कभी स्वयं अहंकार नहीं करता।

पीड़ा के विषय में एक विचित्र बात है। विभिन्न लोगों पर इस का भिन्न प्रकार से प्रभाव होता है। उनमें से कुछ व्यक्ति जो पीड़ित हैं, वे इसे संसार को वापस दुःख देने का निर्णय करते हैं। “मुझे यह सहजता से प्राप्त नहीं हुआ, इसलिए कोई भी इसे सहजता से प्राप्त नहीं करेगा,” वे ऐसा मानते हैं। जबकि, कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जो बिल्कुल विपरीत करते हैं। वे कहते हैं, “किसी और को ऐसा कष्ट नहीं भुगतना चाहिए जैसे मुझे हुआ।” किसी भी श्रेणी में लोगों की कोई कमी नहीं है। हमारे संसार में दोनों उदाहरण हैं कुछ भले और कुछ जो इतने अच्छे नहीं हैं। प्रश्न यह है कि – कुछ व्यक्ति दूसरों की तुलना में अधिक संवेदनशील क्यों हैं? सबसे पहले मुझे आपके साथ एक कहानी साझा करने दें।

एक गुरु ने एक राजा के पुत्र को बारह वर्ष तक शिक्षा प्रदान की और उसे एक उत्तम नवयुवक के रूप में परिवर्तित किया – शिष्ट एवं कुलीन। जब उसने राजकुमार को राजा को सौंपा, तो वह उसकी प्रशंसा करते नहीं थका। उन्होंने भविष्यवाणी की कि मेधावी राजकुमार एक दिन एक महान सम्राट होगा। कुछ वर्ष बीत गए और राजकुमार ने राज्य के प्रशासन कार्यों में अधिक नियंत्रण लेना आरंभ कर दिया। आयुर्वृद्धि होने के कारण राजा ने निर्णय किया कि उसके लिए अपने पुत्र को राज्य दे कर सेवा निवृत्त होना सर्वोत्तम होगा।
स्वभावतः उसके गुरु को राज्यभिषेक के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया गया।

“हे गुरुदेव,” राजा ने समारोह में कहा, “कृपया अपने छात्र को आशीर्वाद दें ताकि वह सदा के लिए अपनी प्रजा के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध राजा हो।”
गुरु मुस्कुराए और धीरे से राजकुमार के पास गये। परंतु आशीष देने के बजाय, उन्होंने अपनी छड़ी के साथ उसकी पिटाई करनी शुरू कर दी।
राजा, राजकुमार, दरबारी व अन्य सभी लोग स्तंभित और भयभीत हो गए। परंतु जब तक गुरु ने पिटाई बंद नहीं की, तब तक कोई फुसफुसाया भी नहीं।
“मुझे दंडित करने का आपको अधिकार है, गुरुदेव,” राजकुमार ने कहा। “परंतु, कृपया मुझे अपना अपराध बताएं।”
“हाँ ऋषिवर,” राजा ने पूछा, “आपने उसे दंडित क्यों किया? किस भूल के लिए?”
“कोई अपराध नहीं था,” गुरु ने कहा। “यह अंतिम सबक था। कल एक राजा होने के नाते, कभी-कभी, उसे लोगों को दंडित करना होगा। परंतु अब दर्द का अनुभव होने पर वह सही संयम का प्रयोग करेगा। वह दंडित व्यक्ति की भावनाओं को और बेहतर ढंग से समझेगा।”

मुझे इस कहानी का संदेश पसंद है। अन्य व्यक्ति के दर्द को वास्तव में समझने हेतु, उससे सहानुभूति करने के लिए, हमें पता होना चाहिए कि दर्द में कैसा प्रतीत होता है। अद्भुत बात यह है कि दुःख पीड़ित लोगों को एक दूसरे के और निकट ला सकता है। यह शीघ्रता से पाखंड के सतही परतों को तोड़ता है, कृत्रिमता को पिघलाता है। दुःख में, आप दूसरे व्यक्ति के साथ हैं या आप नहीं हैं। जब वे दर्द में होते हैं, या तो आप उन की सहायता कर रहे हैं या आप उन की सहायता नहीं कर रहे हैं।

रायः मैं उन लोगों से मिलता हूँ जो करुणा का अनुभव करना चाहते हैं, जो सहानुभूति अनुभव करना चाहते हैं। परंतु वे असमर्थ हैं, वे मुझे बताते हैं। जब वे किसी के साथ मिलजुल कर नहीं रह पाते हैं, तो वे दूसरे व्यक्ति के प्रति केवल क्रोध का अनुभव करते हैं। दूसरे व्यक्ति के दर्द, विपत्ति या दुःख उनके हृदय को नहीं पिघलाता है। यह उन्हें स्थानांतरित नहीं करता है। वे अपने कार्यों और व्यवहार के साथ आगे बढ़ते हैं जैसे कि कुछ भी नहीं हुआ, जैसे कि उन्हें चिंता नहीं है। मैं आपकी बात समझ सकता हूँ। किंतु कोई बात नहीं इसके विषय में बुरा लगने का कोई लाभ नहीं।

अधिकतर समय आपकी भावनाएं आपके नियंत्रण में नहीं होती हैं। परंतु मुझे यह आशा है कि आपके कार्य आपके नियंत्रण में हैं। कभी-कभी आप उदासीनता अथवा स्वार्थ या निरुत्सुकता का अनुभव करते हैं। कभी-कभी आप वास्तव में कुछ भी अनुभव नहीं करते हैं जब आप अन्य व्यक्ति को दर्द में देखते हैं। ठीक है। यह मनुष्य का स्वभाव है (अथवा इसे अमानवीय भी कहा जा सकता है), यह अच्छा नहीं है। परंतु यह आपको एक बुरा व्यक्ति नहीं बनाता है। आप अपनी भावनाओं को नहीं चुन सकते हैं। परंतु, आप अपने व्यवहार का चयन कर सकते हैं। आप एक विशेष प्रकार का व्यवहार कर सकते हैं – दयालु विधि से, एक अधिक सावधानीपूर्वक विधि से कार्य कर सकते हैं। यदि आप ऐसा करते हैं, तो शीघ्र ही सहानुभूति की नदी चारों ऋतुओं में आपके हृदय में कलरव करेगी।

किसी को सिर दर्द हो रहा है और वे दर्द में रो रहे हैं। आप उनकी पीड़ा को नहीं समझते। कोई समस्या नहीं। यह हो सकता है कि आप ऐसे हों। परंतु, उठें और उन्हें दवा प्रदान करें। यह करुणा है। बिना प्रतिक्रिया किए उन्हें सुनें। यह सहानुभूति है। जब आप दोनों का अभ्यास करते हैं, तो आप न केवल उनके दर्द को समझना शुरू करेंगे, आपको वास्तव में वह अनुभव होगा। जब आप दूसरों के दर्द का अनुभव करना आरंभ करते हैं तब आपके स्वयं के अस्तित्व में एक गहन रूपांतरण होगा। यह करुणा व सहानुभूति के विषय में कदाचित सबसे सम्मोहक बात है – यह वास्तव में आपकी मदद करता है, आध्यात्मिक व भावनात्मक रूप से विकसित होने में। जब आप निस्वार्थ काम करते हैं तो आपको लाभ होता है।

मैंने एक बार कहीं पढ़ा था – दूसरे व्यक्ति के दर्द को समझने के लिए, न केवल आप उसके जूतों में कदम रखें, परंतु उन्हें पहन कर एक मील दौड़ें। यदि उस दौड़ के अंत में, आप उसके दर्द को समझ नहीं पाए, तो क्या हुआ। कम से कम आप उस व्यक्ति से एक मील दूर हैं और आपके पास उसके जूते भी हैं!

यह केवल हंसी के लिए था। क्योंकि दया और सहानुभूति के अतिरिक्त अन्य एकमात्र ही दिव्य भावना है – हास्य। सभी अच्छी भावनाओं के समान, यह दाता और प्राप्तकर्ता दोनों के लिए अलंकृत है। यहाँ तक कि भौतिक रूप से भी। तभी जेरि साइनफ़ील्ड सबसे धनी अभिनेता कैसे हो सकता है? कल्पना करें कि क्या हास्य अभिनय इतना समृद्ध हो सकता है, तो हास्य का अनुभव कैसा होगा? भौतिक या आध्यात्मिक रूप से। जब आप दयालु नहीं हो सकते हैं, जब आप सहानुभूति नहीं दे सकते हैं, जब आप दूसरों के दर्द को समझ नहीं पाते हैं, तो कम से कम उत्तेजित न हों। यही मेरे कहने का तात्पर्य है।

थोड़ा तनाव कम करें और अपनी इच्छाओं, पसंदों और मांगों से परे देखें। संसार बहुत भिन्न प्रतीत होगा। भावशून्य या दूषित नहीं प्रतीत होगा। मुझे एक सुंदर सूफी कविता याद आ रही है –

खुदा हमको ऐसी खुदाई ना दे, के अपने सिवा कुछ दिखाई ना दे।
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए, जहाँ से दूसरे की आवाज़ सुनाई ना दे। 
इसका अर्थ है कि - भगवान मुझे ऐसा आशीर्वाद नहीं दें कि मैं (अपने आप से आसक्त होकर) मेरे अतिरिक्त किसी को न देख पाऊं। मुझे ऐसा स्वर्ग नहीं चाहिए, जहाँ से मैं दूसरों की पुकार नहीं सुन पाऊं।

जब दूसरों के दर्द की बात आती है, तो इसे समझने का प्रयास करें। कम के कम प्रयास तो करें। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते, तो उस पर चिंतन करें, उसके विषय में सोचें। यदि यह बहुत कठिन है तो कम से कम आपका व्यवहार ऐसा हो कि आप दूसरों को चोट न दें। वह विधि काम करेगी। सर्वोपरि, याद रखें, हमें किसी अन्य व्यक्ति को पीड़ा देने का कोई अधिकार नहीं है। किसी को भी नहीं, कुछ भी नहीं।

शांति।
स्वामी