आश्रम में मेरा समय अधिकांशतः अति व्यस्त रहता है। किसी भी निर्धारित दिन, मैं बहुत से लोगों से एक-एक कर के भेंट करता हूँ। उस दिन भी अन्य दिनों की ही भांति, सुबह से दोपहर के बीच चालीस से अधिक मुलाकातों का क्रम था। मेरे पास समय का अत्याधिक अभाव था, अतः हम प्रत्येक व्यक्ति को केवल पाँच मिनट का समय दे पा रहे थे।

ऐसी ही एक भेंट में, एक सज्जन मेरे सम्मुख आए और बोले, “स्वामी, वे लोग आपके विषय में झूठी अफवाहें फैला रहे हैं।”
“ठीक है, कोई बात नहीं,” मैंने कहा, “मुझे कोई आपत्ति नहीं।”
मैं केवल उनकी समस्या पर केन्द्रित रहना चाहता था, न कि यह सुनने में समय व्यर्थ गँवाने के कि दूसरे मेरे विषय में क्या कह रहे हैं।
“नहीं स्वामी,” उन्होंने पुनः आग्रहपूर्ण ढंग से कहा, “वे बुरी बातें कह रहे हैं।”
“वे आकाश पर थूक रहे हैं। उन्हें ऐसा करने दें।”
मैंने सोचा कि इतना कहने से यह अध्याय यहीं बंद हो जाएगा, ताकि हम किसी सारगर्भित व सार्थक तथ्य की ओर ध्यान दे पाएँ। किन्तु यह सज्जन कृतसंकल्प थे।

“वे तो यह भी कह रहे हैं…..”
“कृपया रुकें।” मैंने अपना हाथ उठा कर उन्हें मौन होने का इशारा किया। “मैं नहीं सुनना चाहता। मैं अफवाहों पर अपनी समीक्षा नहीं देता।”

उन्हें इस बात से परेशानी हुई कि मैंने उन्हें उनका वाक्य पूरा नहीं करने दिया।
“हमारे पास समय का अभाव है”, मैंने आगे कहा, “यदि आपके पास पूछने के लिए कोई प्रश्न नहीं तो शायद आप एक गीत गा सकते हैं।”

अगले दो मिनट वे चुप रहे और फिर कुछ घबराहट के भाव लिए कक्ष से जाने को उठ खड़े हुए। मुझे उनके लिए बुरा लगा व स्वयं के लिए भी कि हमने पूरे पाँच मिनट गंवा दिये। कभी कभी शायद जिंदगी भी कुछ इसी प्रकार कार्य करती है, मैंने सोचा। हम इसके साथ अफवाहें साझा करना चाहते हैं, हम कोई तथ्य उजागर करना चाहते हैं, किन्तु जिंदगी सुनने से मना कर देती है क्योंकि वह उसे अप्रासंगिक मानती है। हम विचारमग्न व असंतुष्ट से बैठे रह जाते हैं और हमें एहसास भी नहीं होता कि हमारा समय समाप्त हो गया।

यदि आप अपने मन का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें तो आप पाएंगे कि अधिकांश समय आपके विचारों में अन्यान्य लोग विचर रहे होते हैं। एक अनियंत्रित-अदम्य मन आपको अन्य लोगों के विषय में सोचने को बाध्य कर देता है। किसी प्रकार की करुणावश अथवा उनकी देखभाल के भाव से नहीं, अपितु विवशता एवं आसक्तिवश हो कर। इससे भी अधिक दुःखद यह है कि मन प्रायः नकारात्मक सोच ही रखता है। यह आवश्यक नहीं कि वह बुरी सोच हो, किन्तु नकारात्मक अवश्य। वह इन विचारों में निमग्न रहता है कि अन्य लोग आपको एक विशेष परिपेक्ष्य से ही क्यों देखते हैं, या क्यों नहीं वे आपकी अच्छाई को भी देख पाते, अथवा तो क्यों वे आपकी पीठ पीछे आपकी निंदा करते हैं, इत्यादि।

इस सबसे निपटने हेतु मेरे पास एक सीधा-साधा तत्वविचार है। वह है – प्रथमतः, राय हर किसी का व्यक्तिगत विषय है। यह अपने घर की दीवार पर कोई चित्र लगाने जैसा है। आप अपनी रुचि के अनुरूप जो चाहें लगा सकते हैं। इसी प्रकार, उनका मन उनका अपना निवास है और उनकी राय वह चित्र हैं जो उन्होंने वहाँ लगाने के लिए चुने हैं। यह उनके हाथ में है कि वे अपने घर की दीवार पर कौन से चित्र सजाएँ और इस सबसे मैं स्वयं को प्रभावित नहीं कर सकता, चूंकि वह उनका घर है। दूसरे यह कि मेरे बारे में वे आपसे क्या कहते हैं यह जानकारी आपके लिए है न कि मेरे लिए। मेरा यह कहना है कि यदि वह मेरे लिए है तो उन्हें आकर प्रत्यक्ष रूप से मुझे बताने दें।

मैं अपनी प्रतिक्रिया केवल उस कथन पर देता हूँ जो मुझसे प्रत्यक्ष कहा गया हो, व उत्तर पाने की इच्छा से कहा जाये। यह मेरे जीवन का सिद्धान्त है कि मैं केवल प्रश्नों के उत्तर देता हूँ और वक्तव्य अथवा दृष्टिकोण संबंधी वाक्यों के नहीं। अधिकांश अफवाहें झूठा कथन मात्र होती हैं। अन्य समय मैं किसी भी टिप्पणी पर ध्यान न देना व उसका उत्तर न देना पसंद करता हूँ। नित्य प्रति, नियमित रूप से सैकड़ों लोगों से व्यवहार करते हुए अपने मन की शांति जस की तस बनाए रखने का यह मेरा मूल मंत्र है। और यही मेरे आज के लेख का मर्म भी है – क्या, कैसे एवं किसे प्रतिक्रिया दी जाये – इसका चयन करना।

मैंने एक बार एक रुचिकर उद्धरण पढ़ा था, जिसका श्रेय कई लोगों को जाता है। वह है, “उत्कृष्ट मन, श्रेष्ठ विचारों पर बातचीत करते हैं; औसत मन, विभिन्न घटनाओं पर बातचीत करते हैं; सामान्य मन, अन्य लोगों से संबन्धित बातचीत करते हैं।” अधिकांश रूप से लोग अंतिम श्रेणी में आते हैं; वे केवल दूसरों के बारे में बातचीत करते हैं। उनके पास अपने जीवन अथवा भविष्य संबंधी कोई प्रश्न नहीं, उनके पास मनन हेतु कोई श्रेष्ठ विचार नहीं, न ही विनिमय हेतु कोई पूर्ण ज्ञान; अपितु वे मात्र इस बात से संबंध रखते हैं कि अन्य लोगों के पास उनके या दूसरों के बारे में बोलने को क्या है।

तथापि, वे लोग जो अपने ही मार्ग पर चलते हैं, जो स्वयं की सफलता हेतु तैयारी में जुटे रहते हैं, उनके पास इस बात की चिंता के लिए समय नहीं होता कि दूसरे उनके विषय में क्या राय रखते हैं। केवल एक खाली दिमाग अथवा तो अनुत्पादक दिमाग ही अफवाहों से उद्विग्न होता है (झूठी अथवा अन्य किसी भी प्रकार की)। यदि आप को मेरी बात का भरोसा है तो यह जान लें – भले ही आप कितने भी महान हों, आप हर किसी को सदा प्रसन्न नहीं रख सकते। जब कभी भी कोई आपसे ऐसी बात साझा करने को प्रस्तुत हो जो उन्होंने किसी और से आपके बारे में सुनी हो, तो बस उन्हें वह सब कहने से पूर्व ही रोक दें।

यदि आप उन्हें रोक नहीं पाते, तो स्वयं को स्मरण करवाएँ कि यह ‘बुलेटिन’ आपके लिए नहीं है, चूंकि यदि ऐसा होता तो यह बात आप तक प्रत्यक्ष संपर्क द्वारा साझा की गई होती। ऊपर से हम तो यह भी नहीं जानते कि यह किस संदर्भ में कही गई थी। अतः, मेरे विचार में, ऐसी जानकारी पर प्रतिक्रिया देने का न तो कोई औचित्य बनता है और न ही सार्थकता।

हम पर लदे भावनात्मक बोझ का एक बड़ा हिस्सा ऐसी ही सुनी सुनाई बातों, या विषय से बाहर के संदेशों का होता है जिन्हें हम बिना कोई सच्चाई जाने ही स्वीकार कर लेते हैं। साथ ही, बहुत कम लोग ही सच्चाई जानने या ढूंढने हेतु कुछ साझा करते हैं। अधिकांश ने तो अपनी धारणा पहले से ही बना रखी होती है। उनकी राय को बदलने का प्रयास करने से कोई विशेष लाभ नहीं।

राजदरबार का नाई राजा की दाढ़ी बनाते हुए बोल उठा, “महाराज की दाढ़ी श्वेत होनी आरंभ हो गई है।”
राजा इस टिप्पणी से नाराज़ हो गया और उसने आदेश दिया कि इस नाई को दो वर्ष के लिए कारागार में डाल दिया जाये।
“क्या तुम्हें मेरी दाढ़ी में कोई श्वेत बाल दिखाई दे रहा है?” उसने एक दरबारी से पूछा।
“महाराज, शायद एक भी नहीं।” दरबारी ने सहमते हुए कहा।
“शायद से तुम्हारा क्या मतलब है?” राजा क्रोध में चिल्लाया और उसे तीन वर्ष के लिए कारावास में डलवा दिया। राजमहल का हर व्यक्ति अति भयभीत हो गया।

राजा अभी भी शांत नहीं हुआ व एक अन्य कर्मचारी से वही प्रश्न पुनः किया।
“श्वेत! बिलकुल नहीं महाराज,” कर्मचारी आश्चर्य दिखाते हुए बोला। “आपकी चमकती हुए काली दाढ़ी तो किसी घनघोर काली रात्रि से भी अधिक काली दिखती है।”
“झूठे इंसान”, राजा चिल्लाया।
“इसे पीठ पर दस कोढ़े लगाए जाएँ व चार वर्ष के लिए कारावास।” राजा ने आदेश दिया।
अंत में उसने नसरुद्दीन की ओर देखा और कहा, “मुल्ला! मेरी दाढ़ी किस रंग की है?”
“जहाँपनाह! नसरुद्दीन ने जवाब में कहा, “मैं तो वर्णांधता के रोग से ग्रस्त हूँ, इसलिए इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ।”

आपका उत्तर भले कितना भी सत्य व सटीक क्यों न हो, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। यदि सामने वाले व्यक्ति ने अपने मन में पहले ही कुछ निश्चय किया हुआ है तो उनका दृष्टिकोण बदलने का प्रयास अनौचित्यपूर्ण होगा। उन्हें उनकी अपनी राय के साथ ही रहने दें, चूंकि अंतत: आपका आंतरिक बल इस बात पर निर्भर नहीं कि अन्य लोग आपके विषय में क्या सोचते हैं, वरन आप स्वयं अपने प्रति क्या राय रखते हैं।

यदि आपकी निष्ठा अपने कार्यों के प्रति दृढ़ है व जब तक आप अपने व अपने लक्ष्य के प्रति सच्चे हैं, तब तक अफवाहें व किसी भी प्रकार के मत आपको कण मात्र भी हिला नहीं सकते। इसके साथ साथ, बहुत से लोगों का तो अपनी ही कही बातों से भी कोई तादात्मय नहीं होता – भले ही वे अच्छी बातें हों या बुरी। हर किसी के पास एक बातूनी सा मन है और अक्सर मन की वह निरर्थक बकबक उन शब्दों के रूप में मुख पर आ जाती है जिनके पीछे न कोई अर्थ होता है न कोई आशय। कुछ ऐसा ही जैसे एक नन्ही बच्ची अपने खिलौनों के साथ खेलते समय बातें करती है।

उदाहरण के लिए, जब आप विमान की प्रतीक्षा में एयरपोर्ट पर बैठे होते हैं, आपके आसपास सभी लोग लगातार बोल रहे होते हैं। आप उसे शोर समझ कर अनसुना कर देते हैं। उसी प्रकार, जब कोई आपको अफवाहों का अंग बना ले तो स्वयं के मन की शांति के लिए उस सब की उपेक्षा कर दें, उसे छोड़ते चलें। स्वयं को स्मरण करवाएँ कि ऐसी कोई जानकारी जो आपको प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करके न कही जाये, वह आपके लिए नहीं है। यदि आपके विषय में कुछ कहा गया है तो इसका अभिप्राय यह नहीं कि वह सब सुनना आपके लिए आपेक्षित है।

कोलाहल का अर्थ निकालने में स्वयं को क्यों खपाना, जबकि आप नया संगीत रचने की क्षमता रखता हों?

शांति।
स्वामी