“मैं सदा से एक अच्छा अभिभावक रहा हूँ और मैंने अपने बच्चों का हर कदम पर साथ दिया है,” एक, कुछ व्यथित से, अभिभावक ने मुझे कुछ सप्ताह पूर्व कहा, “और, फिर भी वे वास्तव में मेरा आदर नहीं करते। वे अपने अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझ रहे हैं और मुझे कहते हैं कि मैं सदा से एक असहनीय पिता रहा हूँ। मुझे यह समझ नहीं आता। मैंने सदा उन्हें प्रेम किया है, उन्हें उनकी इच्छानुसार हर कार्य करने की छूट दी है। उन्हें सबसे बढ़िया कपड़े मिले, ऐशो-आराम मिला। मुझे नहीं लगता मैंने कभी किसी के भी साथ कोई धोखाधड़ी की; मैं सदा से ईश्वर सत्ता से डर कर रहा। मैंने कभी न सोचा था कि मेरे बच्चे अंततः ऐसा व्यवहार करेंगे। मुझसे कहाँ गलती हो गई?”

इसी प्रकार के प्रश्न प्रायः मुझसे पूछे जाते हैं। एक तथ्य जो वास्तव में विलक्षण है वह है अधिकांश रूप से सभी बच्चे व अभिभावक एक दूसरे के सुहृद हैं। वे अत्यधिक प्रयत्न करते हैं । बच्चे चाहते हैं कि उनके माता पिता को उन पर नाज़ हो, और माता पिता चाहते हैं कि बच्चों को उन पर। तब फिर बेमेल क्या हो जाता है? मैं सदा यह सुनता रहता हूँ कि फलां फलां व्यक्ति एक बुरा पिता या माता है, वे अधार्मिक हैं, असभ्य, अनैतिक हैं इत्यादि, तथापि उनके परिवार फल फूल रहे हैं और उनके बच्चे बहुत सफल हैं। इसमें न्याय कहाँ है?

मेरी दृष्टि में जीवन को देखने का यह अनुचित दृष्टिकोण है। मैं मानता हूँ कि बात जब बच्चों के पालन पोषण की हो तो मैं उसमें सर्वेसर्वा नहीं (स्मरण रहे कि मैं एक सन्यासी हूँ)। तथापि, गत कुछ वर्षों में हजारों अभिभावकों एवं बच्चों से व्यक्तिगत रूप से मिलने के उपरांत, अपने अवलोकन एवं जीवन के निरूपण के आधार पर मुझे अपने कुछ विचार साझा करने में हर्ष हो रहा है। मैं स्टीफेन होज़ की “ज़ेन मास्टर क्लास” से ली एक कथा से आरंभ करना चाहूँगा।

डोजेन के मठ में बहुत से भिक्षुओं ने समीप ही एक हिरण को चरते हुए देखा। उन्होंने उसे भोजन के ग्रास देने आरंभ कर दिये। कुछ समय उपरांत हिरण को उन पर विश्वास हो गया और वह उनके हाथ से भोजन लेने लगा। डोजेन के करुणा इत्यादि पर बताए गए व्याख्यान पर चल कर भिक्षु स्वयं पर नाज़ कर रहे थे। तथापि, डोजेन ने जब हिरण के विषय में सुना तो वह कुछ कम प्रसन्न था। जब एक उपयुक्त समय व परिस्थिति आई तो उसने हिरण पर टहनियाँ व पत्थर फेंके , जिससे वह डर कर भाग गया।

डोजेन के इस कृत्य से भिक्षु विक्षुब्ध थे और उन्होंने उसका सामना करते हुए इस कार्य के औचित्य की मांग की। “हम हिरण को दयाभाव से चारा देते थे, किन्तु आपने उस पर निर्ममता से पत्थर फेंके जिससे वह अब इस ओर नहीं आता।”
“तो आपको लगता है आपका कृत्य करुणामय था? हैं न!” डोजेन ने उत्तर दिया। “एक हिरण के लिए मानव से मैत्री संकटपूर्ण है।”
भिक्षु विरोध के स्वर में बोले, “हम कभी भी उसे हानि पहुंचाने वाला कोई कार्य नहीं करेंगे। हम तो उसे मात्र चारा खिलाते थे।”
“यह उचित है कि तुम्हारा उद्देश्य हिरण को कष्ट देने का नहीं था, किन्तु तब क्या होगा यदि तुम्हारे द्वारा रिझाये गए हिरण का सामना किसी शिकारी से हो गया!”

यही तथ्य माता पिता व बच्चों के संबंध में भी लागू होता है। “वे जो कुछ भी चाहें, उन्हें वह सब दे देना” यह आवश्यक नहीं कि ऐसा करना आपको एक अच्छा अभिभावक बना देगा। बच्चों को बहुत कुछ चाहिए होता है। हर किसी की चाहतें होती हैं । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि जो कुछ भी वे चाहते हैं, वह सब उनके लिए सही ही हो। मैं एक पल के लिए भी यह नहीं कह रहा कि आप एक निष्ठुर अभिभावक बन जाएँ। तथापि, यह जानना महत्वपूर्ण है कि कहाँ कठोर होना आवश्यक है। यदि आप बच्चों का वास्तविकता से संबंध बनाए रखते हैं तो जब वे बड़े होकर बाहर की दुनिया में पदार्पण करेंगे तो उनके लिए वास्तविक जगत के साथ सामंजस्य बनाना सुगम हो जाएगा।

ईश्वर-प्रेमी , नैतिकवादी, सच्चे-ईमानदार इत्यादि होने का अर्थ है कि आप एक अच्छे व्यक्ति हैं। यदि आप अपने कार्य -क्षेत्र में सफल हैं तो इसका अर्थ है कि आप एक योग्य कार्यकर्ता हैं। यदि आप अपने जीवन साथी को प्रेम करते हैं व उसका ध्यान रखते हैं तो यह दर्शाता है कि आप एक अच्छे पति अथवा पत्नी हैं। किसी भी क्षेत्र में आपकी योग्यता तदनुरूप सफलता भी लाएगी। तथापि, इसमें से कुछ भी यह नहीं दर्शाता कि आप एक अच्छे अभिभावक हैं। नि:संदेह, यह सारे घटक एक परिवार के कल्याण में हेतु हैं। किन्तु, जब बात सम्पूर्ण पालन पोषण की हो तो निश्चित रूप से बच्चों की इच्छाओं का हर सामान जुटाने के अलावा भी बहुत कुछ किया जाना होता है।

जैसा कि ऊपर के कथानक से विदित है, एक अच्छे अभिभावक को यह मालूम होना ही चाहिए कि कब और कहाँ कठोर होना है। प्यार से यह अभिप्राय नहीं कि सदा वही करते रहना जो वे आप से करवाना चाहते हों। ऐसा करना कभी भी, आगे चल कर, किसी को भी प्रसन्न नहीं कर पाया। इसके स्थान पर, प्यार से अभिप्राय है अपने बच्चों की उन्नति के लिए जहां आवश्यक हो वहाँ अपने मत पर दृढ़ रहना। वे अपनी अप्रसन्नता अवश्य दिखायेंगे और उदास बच्चे का चेहरा देखने के लिए पत्थर दिल होना पड़ता है, तथापि आगे चल कर वे आपको धन्यवाद देंगे। एक बार पुनः मेरा कहना है कि आपको कर्कश नहीं होना है। उनके साथ चिल्ला कर तर्क-वितर्क करने की अथवा उन पर झल्लाने की भी कोई आवश्यकता नहीं। आप मधुरता से बात करते हुए भी अपने मत पर दृढ़ रह सकते हैं।

करूण रहें, दृढ़ रहें, किन्तु ऐसा सावधानीपूर्वक करें। बस स्मरण रखें कि कोई भी असफल नहीं होना चाहता, कोई भी क्रुद्ध अथवा उदास अथवा तो पीछे नहीं रहना चाहता। बच्चों के जीवन में भी उतना ही तनाव एवं उत्तरदायित्व का बोझ होता है जितना कि उनके माता पिता के जीवन में। अतः सब कुछ थोड़ा सहजतापूर्वक लें, हाँ, यह सब सतर्क हो कर करें। जब मैं बड़ा हो रहा था, तो मुझे एक भी ऐसा प्रसंग स्मरण नहीं आता जब मेरी माताजी चिल्लाई हों अथवा उन्हें क्रोध आया हो, तथापि ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब वे दृढ़ रहीं। उदाहरण के लिए एक नियम यह था कि हमारे रिपोर्ट कार्ड जिस पर अभिभावक के हस्ताक्षर अनिवार्य थे, वह सदा पिताजी ही करेंगे। यदा कदा, जब गणित अथवा भौतिकी में मेरे अंक मात्र उतने आते जितनी मेरे पालतू कुत्ते की आयु, तब हम अनुनय विनय करते, चिल्लाते, किन्तु हमारी माँ अपनी बात पर दृढ़ रहतीं। यह बात किसी भी समझौते से पूरी तरह दूर थी। हस्ताक्षर पिताजी ही करते। धीरे धीरे हमें समझ आ गया और हमने अपने को अच्छे अंक लाने के लिए तैयार कर लिया।

“पिताजी, मुझे मेरा रिपोर्ट कार्ड मिल गया है”, 14 वर्षीय जॉनी बोला।
उसके अंक बहुत कम थे और उसे भय था कि आज उसे भयंकर वाली डांट पड़ने वाली है। उसके पिता ने रिपोर्ट कार्ड देखने के लिए चश्मा उठाया।

“और, देखो पिताजी, मुझे ये क्या मिला है!” जॉनी ने उन्हें एक पुराना सा कागज देते हुए कहा। “मुझे अटारी में आपका वो रिपोर्ट कार्ड मिला जब आप 14 वर्ष के थे। हम दोनों के एक समान अंक हैं!”
“….. आ आ …..” अपनी और बेटे की रिपोर्ट कार्ड मिलाते हुए पिता बोले, “जॉनी, तुम बिलकुल सही कह रहे हो। दोनों लगभग एक जैसी ही दिखती हैं।”

जॉनी जीतने की खुशी से मुस्कुरा उठा।

“इसलिए, पुत्र”, उसके पिता ने जूता उठाते हुए कहा, “मैं भी तुम्हें वही दूँगा जो मेरे पिता ने मुझे दिया था।”

नहीं, जॉनी को कोई टॉफी अथवा एक्स-बॉक्स नहीं मिला। और न ही यह कोई माता पिता की करुणा का उदाहरण है। परिहास से हट कर, वास्तविकता यह है कि अप्रत्याशित सजा एक संबंध पर बुरा असर डालती है। चूंकि इस तरह की सजा कितनी हो, यह तथ्य सदा ही विवाद का विषय होता है। बच्चे को पढ़ाई में बुरा प्रदर्शन दिखाने की स्थिति में क्या सजा मिलेगी यह बात पहले से ही तय कर लेनी चाहिए, ताकि बच्चे व माता पिता, दोनों को यह जानकारी रहे कि उन्हें एक दूसरे से क्या अपेक्षा है। यह साधारण प्रतीत हो रहा है किन्तु आप यह देख कर आश्चर्यचकित होंगे कि कितने सारे अभिभावक अपनी अपेक्षाएँ सीधे तौर पर व प्रेम से बताने के स्थान पर व्याख्यान देना प्रारम्भ कर देते हैं। मैं इसे ओ॰एल॰डी॰ (OLD – Obsessive Lecture Disorder) कह कर बुलाता हूँ। यह कभी किसी के लिए भी सहायक सिद्ध नहीं हुआ। साधारणतः अभिभावक कि आयु जितनी अधिक हो, उतना ही गंभीर OLD का रोग होता है। कुछ समय पहले मैंने लिखा था कि पीड़ा अवश्यंभावी है किन्तु पीड़ित होना वैकल्पिक है। उसी कड़ी में : बुढ़ापा अवश्यंभावी भावी है, किन्तु OLD ऐच्छिक है। कृपया मृदुता बनाए रखें।

यदि आप OLD का सावधानीपूर्वक सामना कर लें व अभिभावकीय करुणा को समझते हुए व्यवहार में लाएँ , तब आपका बच्चों के साथ संबंध बहुत बेहतर हो जाएगा। और वे एक संतुष्ट वयस्क के रूप में, अधिक समन्वय रखते हुए, हमारे संसार को और बेहतर बनाते हुए, बड़े होंगे। हालांकि केवल सावधानीपूर्वक बरती गई करुणा अथवा प्रेम भरा अनुशासन अपने आप में सम्पूर्ण नहीं हैं (आपसे किसने कहा कि यह सब आसान था)। अच्छे पालन पोषण के चार अन्य पहलू भी हैं। वह अगले सप्ताह के लिए।

शांति।
स्वामी