संभवतः आपने आकर्षण के सिद्धान्त के बारे में पढ़ा हो। यह बताता है कि किस प्रकार ब्रहमाण्ड से अपना इच्छित पदार्थ प्राप्त किया जाये। कि, आप अपने जीवन में प्रेम, धन-ऐश्वर्य, अच्छे व्यक्ति और कई अन्य पदार्थ आकर्षित कर सकते हैं। कई बार लोग मेरे पास आ कर इस सिद्धान्त के विषय में मेरे विचार जानना चाहते हैं कि क्या इसमें कुछ सत्यता छिपी है। वे पूछते हैं कि क्या वास्तव में यह संभव है कि हम जो चाहें बिलकुल वही पा सकें, आकर्षित कर सकें, अपने जीवन में ला सकें। और, यदि ऐसा है तो उनसे कहाँ त्रुटि हो रही है, क्यों उनके स्वप्न अभी भी अपूर्ण ही हैं? वे मुझे बताते हैं कि उन्होंने कोई बुरा कर्म नहीं किया (सच में!!), उन्होंने पुस्तक में वर्णित कल्पना की प्रक्रिया (visualisation) अपनाई, तथापि वे ऐसी परिस्थिति में हैं जिसकी उन्हों ने कभी इच्छा नहीं की।

आइये मैं आपके साथ एक रहस्य साझा करता हूँ – आपको सदा वही मिलता है जो आप बाँटते हैं। आप धन बाँटे, आपको धन मिलेगा; आप प्रेम बाँटे, आपको प्रेम मिलेगा; आप प्रशंसा करें, आपको प्रशंसा मिलेगी, इत्यादि। एक बार आप कुछ बांटना आरंभ करते हैं तो न केवल आप को वह लौट कर मिलने लगता है, अपितु उससे कहीं अधिक मात्र में। और, प्रकृति सदा कई गुना बढ़ा कर लौटाती है। यह प्रकृति का अकाट्य नियम है, आकर्षण का नियम। आप जो कुछ भी पाने की इच्छा रखते हैं, पहले उसे बांटने को तैयार रहें।

यदि आप कभी पर्वतों पर गए हों तो शायद आपने प्रतिध्वनि सुनने की प्रक्रिया अनुभव की हो। आप जो कुछ भी ज़ोर से बोलते हैं, वही शब्द पुनः कई बार लौट कर सुनाई पड़ते हैं। आप जितना अधिक ज़ोर से बोलते हैं, उतनी अधिक प्रतिध्वनि सुनाई देती है। यही सिद्धान्त है – प्रमुख नियम। यदि आप पुकारते हैं मैं…मैं…, तो सम्पूर्ण ब्रह्मांड पीछे पुकारता है मैं…मैं…मैं…मैं…। यदि आप कहते हैं – मुझे धन चाहिए तो वह कहता है मुझे धन चाहिए, मुझे धन चाहिए। यदि आप बोलते हैं मुझे प्रेम दो, तो वह प्रतिध्वनि करता है – मुझे प्रेम दो, मुझे प्रेम दो, इत्यादि। प्रकृति का परिमाण आपके सामर्थ्य से कहीं अधिक विस्तृत है। पुकारने से आप विजयी नहीं हो सकते। जितना अधिक आप चाहते हैं, उतना अधिक वह भी चाहती है।

एक बार आप देना आरंभ करते हैं, वह आपको लौटाना आरंभ कर देती है। जब आप कहना शुरू करते है कि – मैं देना चाहता हूँ, वह कई गुना अधिक बार दोहराती है कि मैं देना चाहती हूँ। जब आप चिल्लाते हैं कि मैं कृतज्ञ हूँ, वह प्रतिध्वनि करती है – मैं कृतज्ञ हूँ। जब आप कहते हैं कि मुझे किसी पदार्थ की इच्छा नहीं तो वह भी कहती है – मुझे किसी पदार्थ की इच्छा नहीं…। आप एक किलो चावल उगाते हैं, आपको चार किलो वापिस मिलते हैं। आप केवल वही काट सकते हैं जो कुछ आपने बोया है और आप ऐसा उस स्थिति में ही कर सकते हैं यदि आपने कुछ बोया होगा।

पिछले कुछ दिन के लिए मैं आश्रम से बाहर था। मुझे अपने संवेदनशील मसूड़ों के उपचार हेतु एक दँत-चिकित्सक से मिलना था। जब मैं हिमालय में था, वहाँ अक्सर मैं बर्फ को ही भोजन की तरह खा लेता था, और शायद इसी कारण मेरे मसूड़े संवेदनशील हो गए थे। इन दंत-चिकित्सक से मेरी यह प्रथम भेंट थी। उन पेरिओडेंटिस्ट का क्लीनिक सभी आधुनिक उपकरणों द्वारा सुसज्जित था। वह सज्जन जीवनशक्ति से भरपूर, सम्पूर्ण ज्ञानवान, मधुरभाषी व अपने व्यवसाय के अच्छे जानकार थे, जिन्होंने अति करुणामय भाव के साथ बहुत ध्यानपूर्वक अपना कार्य किया। दो बार जाने से दाँतो का उपचार पूर्ण हो गया। अंत में जब मैंने बिल चुकाना चाहा तो उन्होंने पैसे लेने से मना कर दिया। वे बोले कि जो मानसिक भाव मेरी ओर से उन्हें प्राप्त हुए, वे ही उनकी फीस है, कि उनके लिए यह कुछ अच्छा करने का सुअवसर था, कुछ सेवा करने का। मैंने उनसे लगभग याचना के स्वर में कहा कि वे पैसे स्वीकार करें। प्रमुखतः इसलिए चूंकि मैंने कभी भी अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिए कोई भी पदार्थ, उपहार, धन आदि स्वीकार नहीं किया है। मैं कुछ भी ऐसा अपने पास न रखने का प्रयास करता हूँ जो आगे दिया जा सकता हो। मेरे लिए उपभोग की सामाग्री को भेंट स्वरूप स्वीकार करने से अधिक बोझदायक और कुछ नहीं हो सकता। किन्तु वे सज्जन अपनी बात पर डटे रहे। बहुत अधिक मशक्कत के बाद उन्होंने फीस का एक हिस्सा स्वीकार किया।

निश्चित रूप से उनके कर्म ब्रह्मांड द्वारा निबद्ध कर लिए गए हैं। उन्हें उसका सहस्त्र गुना अधिक मिलना तय है। मैं यह किसी कारण से जानता हूँ कि भविष्य में यह चिकित्सक अपार दौलत में खेलेंगे; इसलिए नहीं कि उन्होंने ‘देने’ की चाहना रखी, बल्कि अपने शुद्ध आचरण व शुद्ध भाव के चलते। इसी प्रकार से होता है प्रकृति का हर कार्य। उन्होंने बिना प्रतिदान की चाह के बांटा, और प्रकृति उन्हें बिना शर्त लौटाएगी। वे निष्काम सेवाएँ प्रदान करने को प्रस्तुत थे और, इसीलिए, प्रकृति भी उन्हें इसी तरह वापिस लौटाएगी।

यदि आप मात्र स्वयं के लिए जी रहे हैं, तो आकर्षण का सिद्धांत सिद्ध होने की कामना कुछ अनाड़ीपन जैसा है। यह अपेक्षा रखना कि प्रकृति आपको सब कुछ प्रदान कर देगी क्योंकि आप उन सब के लिए उससे याचना कर रहे हैं, यह उच्चाकांशा ही होगी। यदि आप किसी परोपकारिता के कार्य हेतु मात्र एक डॉलर का भी योगदान नहीं कर सकते, तो आप कुछ मृदु वचन, करुणा, प्रशंसा आदि तो दे ही सकते हैं। यदि आप किसी की जेब धन से नहीं भर सकते तो शायद आप उनका हृदय तो प्रेम द्वारा अवश्य भर ही सकते हैं। प्रकृति को आपके धन की आवश्यकता नहीं है। यह धन-व्यवस्था पर निर्भर हो कर कार्य नहीं करती, अपितु यह प्रेम एवं करुणा पर संचालित होती है। यदि आप अपने हिस्से का कार्य करते हैं तो यह सदा अपने हिस्से का योगदान करती ही है। देने से ही आप पाने के अधिकारी बनते हैं।

आपके लिए महत्त्वपूर्ण क्या है – अपनी इच्छा की वस्तुएँ पाना या अपनी आवश्यकता की; आज तक प्राप्त वस्तुओं के प्रति सजगता रखना या अप्राप्त को लेकर चिंतित रहना? बाँटना आपको हल्का-फुल्का रखता है।

यदि प्रकृति आपको बाँटने हेतु माध्यम चुनती है तो आप एक सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं। अपना इच्छित पदार्थ पाने के लिए, आपको पहले बांटने से प्रारंभ करना होगा। और, धैर्य का अभ्यास करना सीखें। प्रकृति के खेल में कुछ भी क्षणभर में नहीं होता। यह है ‘आकर्षण का सिद्धान्त’।

लोहे को आकर्षित करने के लिए आपको एक चुंबक बनना होगा, मधुमक्खियों को आकर्षित करने के लिए आपको एक पुष्प बनना होगा। यहाँ कृत्रिमता के लिए कोई स्थान नहीं। सचमुच में चुंबक बनें, और आप स्वाभाविक ही आकर्षित करने का गुण पा लेंगे।

शांति।
स्वामी