आखिर मैं ही क्यों? मुझे आज तक ऐसा कोई नहीं मिला जिसने अपने जीवन में कभी न कभी यह प्रश्न न पूछा हो। अधिकांश व्यक्ति जो अपनी दुखद गाथा लेकर मेरे पास आते हैं वे पूछते हैं, “आखिर यह मेरे साथ क्यों हो रहा है?” यह एक स्वभाविक प्रश्न है। हम सभी ने इस विषय पर सोचा है। मैं आपसे एक छोटी सी कहानी साझा करता हूँ।

आर्थर ऐश (१९४३-९३) एक उभरते टेनिस खिलाड़ी थे जिनमें असीम क्षमता थी। अपने करियर के ३३ ख़िताबों के साथ, जिनमें ३ ग्रैंड स्लैम खिताब भी थे, वे १९६८ में विश्व के नंबर एक खिलाड़ी थे। ३६ वर्ष की आयु में उनको भारी हृदयाघात लगा जबकि वे एक टेनिस की कक्षा ले रहे थे। यह विशेषकर दहला देने वाला था क्योंकि किसी भी प्रमुख खिलाड़ी की भांति आर्थर भी अत्यंत तंदुरुस्त और चुस्त थे। उसी वर्ष उनकी चौहरी बाई पास शल्य क्रिया हुई। वे जिस प्रकार का क्रियाशील जीवन जीते थे उसका अंत हुआ। उन्हें अब सावधानी पूर्वक जीना था, मैदान पर बिना उछले कूदे। धीरे धीरे उन्होंने इससे समझौता कर लिया।

जैसे कि इतना ही पर्याप्त न था, आपरेशन के तुरंत बाद, आर्थर को अपनी दाहिनी बाह में पस्चाघात हुआ। और भी जाँचों से पता चला कि वे एच-आइ-वी से ग्रस्त थे। यह अत्यंत सदमा पहुँचाने वाला था क्योंकि आर्थर को यह बीमारी उनकी किसी गलती के कारण से नहीं मिली थी। उनके चिकित्सकों ने निष्कर्ष निकाला कि उनकी दूसरी शल्यक्रिया के समय जो लहू आर्थर को चढ़ाया था वह एच-आइ-वी से संक्रमित था।

शीघ्र ही सम्पूर्ण विश्व से उनके चाहने वालों के सहानुभूतिपूर्ण पत्र आने लगे। बहुत से लोगों ने उनसे पूछा – “आखिर आप ही क्यों आर्थर? आखिर ईश्वर आपके साथ ऐसा कैसे कर सकता है?”

हालांकि भविष्य में उनके लिए और क्या लिखा है, इस बात से वे कुछ भयभीत थे, उन्होंने अविचलित होकर निर्लिप्त भाव से उत्तर दिया –

“सम्पूर्ण विश्व में कम से कम ५ करोड़ बच्चे टेनिस खेलने आते है, और उनमें से ५० लाख से भी कम बच्चों को टेनिस का मूलभूत प्रशिक्षण मिल पाता है। उन ५० लाख में से लगभग १०% यानि की ५ लाख बच्चों को ही व्यावसायिक टेनिस का प्रशिक्षण मिल पाता है। केवल ५०,००० ए सर्किट में खेल पाते हैं। कुछ ५,००० ग्रैंड स्लैम में भाग लेते हैं और मुश्किल से ५० विम्बलडन तक पहुँच पाते हैं। केवल चार लोग ही सेमीफाइनल तक जा पाते हैं और फाइनल तक मात्र दो व्यक्ति ही जा पाते हैं। मात्र एक व्यक्ति उस कप को उठा पाता है। मात्र एक विजेता होता है।”

“इन सभी वर्षों में जो सफलता मुझे मिली या जो कप मैंने उठाये, मैंने कभी नहीं पूछा, आखिर मैं ही क्यों? जब ईश्वर ने मुझे विजय और खुशियां दीं तो मैंने कभी नहीं पूछा, मैं ही क्यों? और अब जब मुझे यह बीमारी हो गयी है तो मैं किस आधार पर उसे चुनौती दूँ? क्यों, आखिर मैं ही क्यों?”

अक्सर हम अपने अंधकारपूर्ण समय में ही पूछते हैं, ‘आखिर मैं ही क्यों’। हम संभवत: अपने अच्छे समय में भी ऐसा सोचें किंतु वह सोचना ऐसा नहीं होता जैसा कि जब हम दुखी होते हैं। जब मौसम नर्म, खुशनुमा होता है तब हम कोई शिकायत नहीं करते। हम संभवत आश्चर्य प्रकट करें किंतु शिकायत नहीं करते। हृदय में हमारा यह विश्वास होता है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है, हम उसके पात्र हैं, कि हमने वह सब अर्जित किया है।

लोग मुझसे प्रेम करते हैं क्योंकि मैं इतना अच्छा हूँ, मेरी कंपनी मुझे अच्छी पगार देती है क्योंकि मैं अच्छा काम करता हूँ, मुझे वंशागत इतनी संपत्ति मिली क्योंकि मैंने अपने अच्छे कर्मों के कारण एक अच्छे कुल में जन्म लिया। किंतु फिर, यदि लोग मुझे प्रेम नहीं करते तो ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अकृतज्ञ हैं। मुझे अपने काम के बदले उतने पैसे इसलिए नहीं मिलते क्योंकि लोग मेरे काम की सराहना नहीं करते। मुझे विरासत में एक भी पैसा नहीं मिला क्योंकि मेरे माता पिता ने ठीक से काम नहीं किया। और इसी प्रकार के अन्य विचार। क्या आप यहाँ असंगति को देख रहे हैं?

खर्च को आधा करने और खुशी को दोगुना करने के आशय से, एक परिवार में एक ही समय पर दो शादियां रखी गईं। उनकी पुत्री का विवाह एक डॉक्टर से हुआ जबकि पुत्र ने एक कलाकार से शादी की।

“तुम्हारी बहू कैसी है?” किसी ने चार महीने बाद गृहस्वामिनी से पूछा।
“हाय, मैं कहाँ से आरंभ करूँ,” उसने उत्तेजित होकर कहा। “पूरे दिन वह अपनी अंगुलियाँ चटकाती घर में बैठी रहती है। हर हफ्ते उसे खाने पर बाहर जाना होता है। वह मात्र कुछ विशेष प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों का ही प्रयोग करती है। वह मेरे बेटे पर दबाव डालती है कि वह अपना पैसा उसके कपड़ों और छुट्टियों पर खर्च करे। वह सचमुच बहुत कष्टकारी है।”
“यह तो बहुत बुरा हुआ,” उसकी मित्र ने सहानुभूति जताई। “मुझे आशा है कि कम से कम तुम्हारी पुत्री तो अपने नए घर में प्रसन्न होगी।”
“हाँ, उसका समय तो बहुत अच्छा बीत रहा है!” उस महिला ने कहा, उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। “मेरा दामाद उसे राजकुमारी की तरह रखता है। वह उसे कभी भी काम नहीं करने देता। उसे हर हफ्ते सिनेमा दिखाने और बाहर खाना खिलाने ले जाता है, उसके लिए अच्छे ब्रांड की चीजें खरीदता है। पिछले चार महीनो में वे लोग अब तक तीन बार घूमने जा चुके हैं! वह इस से अधिक खुश हो ही नहीं सकती।”

हम अपनी सुविदानुसार अपना दृष्टिकोण परिवर्तित कर लेते हैं। इस सीमित और स्व-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ हम सुखी नहीं रह सकते। स्वकेंद्रित होने से मेरा तात्पर्य स्वार्थी होने या मात्र अपनी चिंता करने से नहीं है। इसके बजाय स्वकेंद्रित होने से मेरा तात्पर्य यह बताना है कि हमारी स्वयं के विष्य में धारणा बहुत ऊंची होती है, हम स्वयं को अत्यधिक महत्व देते हैं। हम में से अधिकतर यह समझते हैं कि हम दूसरों से अधिक कुशल हैं, हमारा कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है या हम किसी भी प्रकार से अपरिहार्य हैं। हम इस संकीर्ण दृष्टिकोण के साथ कभी भी ‘आखिर मैं ही क्यूों’ का उत्तर नहीं जान पाएंगे।

एक महत्वपूर्ण बात यह है पूर्वी और पश्चिमी साहित्य की सैकड़ों भिन्न भिन्न धार्मिक और आध्यात्मिक पुस्तकों को पढ़ने के बाद मैं यह बता सकता हूँ कि इस प्रश्न का उत्त‌र वास्तविकता में किसी के पास भी नहीं है। हर किसी की अपनी परिकल्पना है पर उत्तर किसी के पास भी नहीं। कर्म, पूर्वजन्म, ज्योतिष, अतींद्रिय दृष्टि, आत्मिक शक्ति, चाहे कुछ भी, कोई भी हो, आपको उत्तर देने में असमर्थ है। यहाँ प्रस्तुत है ऐसा क्यों –

गहन साधना के लंबे अंतरालों में, मैंने इस प्रश्न पर उत्तर पाने, कुछ अंतर्दृष्टि पाने हेतु विचार किया। सत्य तो यही है कि कोई उत्तर है ही नहीं। अंतर्दृष्टि केवल यह है कि हमारा किसी पर भी नियंत्रण नहीं है। अपने जीवन के कुछ पहलूओं को छोड़कर, हमारा शायद ही और किसी वस्तु पर नियंत्रण है। जबकि प्रकृति एक वृहद् स्तर पर बड़ी निर्मम परिशुद्धता से कार्य करती है, यहाँ फिर भी चक्कर में डाल देने वाले, यहाँ तक कि विचलित कर लेने वाले, बेतरतीब यादृक्छिक घटनाएं हैं जो हमारे साथ, हमारे आस पास होती हैं।

सभी अच्छे कर्मों, इरादों और विकल्पों के बाद भी, आप उस अपहृत विमान में हो सकते हैं जो कुछ ही क्षणों में राख होने जा रहा है, या आप एक ईमारत में पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रहे हों जहाँ यह विमान टकराने वाला है। आप स्वयं को एक दुर्व्यवहारी, दुराचारी, या एक डकैत के चंगुल में पा सकते हैं। एक शराबी आके आपकी गाड़ी से टकरा सकता है जिसे आप इतनी सावधानी से चला रहे थे, सभी नियमों का पालन करते हुए। आपको गंभीर रूप से घायल करदे। घाव, जिनकी भरपाई संभव न हो। एक कार जिसे आपने अपनी मेहनत की कमाई से खरीदा, एक शरीर जिसकी आपने इतने वर्षों तक इतनी देखभाल की। क्षतिग्रस्त, दुरुस्ती के परे।

मैं यह नहीं कह रहा कि कर्म का सिद्धांत असत्य है, किंतु जैसा कि मैंने पहले भी कहा, यही सब कुछ नहीं है। इसमें सभी प्रश्नों का उत्तर नहीं है। हमारे जीवन में हमारे साथ जो कुछ भी होता है वह सदैव इसलिए नहीं होता कि हमने कुछ अच्छा किया है अथवा कुछ बुरा किया है जिसके कारण हमें उसका फल प्राप्त हो रहा है। इसका कोई भी क्यों या क्यों नहीं, नहीं है। अच्छे लोगों के साथ बहुधा बुरी बातें होती रहती हैं। धोखेबाज़ व्यक्ति नेता बन जाते हैं। संतों के साथ दुर्व्यवहार होता है और पापियों को हार पहनाये जाते हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे साथ अधिकतर समय जो कुछ भी होता है वे हमारे कर्मों और विकल्पों से प्रभावित होता है, किंतु कभी कभी, कुछ घटनायें निरुद्देश्य हो जाती हैं। यह जीवन को परिवर्तित कर देने वाली घटना हो सकती है या कभी कभी सर्वथा नगण्य घटना। जहाँ तक प्रकृति का प्रश्न है तो यह मात्र तुक्ष्य, साधारण घटना है। अधिकतर भूकंप कुछ क्षणों से अधिक नहीं ठहरते किंतु फिर भी हज़ारों जीवन नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक की एक सड़क दुर्घटना भी एक पल के कुछ हिस्से में ही हो जाती है। प्रकृति की दृष्टि में यह एक छोटी सी घटना है, चाहे आप पर इसका प्रतिघात जीवन भर रहे।

दूसरे शब्दों में, मैं ही क्यों प्रश्न को एक परिकल्पना के द्वारा अधिक कुशलतापूर्वक देखा जा सकता है अथवा कुछ सांत्वना के साथ, परंतु वास्तव में इसका कोई भी स्थायी उत्तर नहीं है। हम इसे जितनी शीघ्रता से स्वीकार कर लें, जीवन में स्वभावतः उतना ही सुखी हो जायेंगे।

मैं एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा यह लेख लिख रहा हूँ और सुखद बयार चल रही है। कुछ पौधे नृत्य कर रहे हैं जबकि कुछ धीरे धीरे झूम रहे हैं। एक कुत्ता, जो ब्रेड के आठ टुकड़े (क्रीम लगे) खाकर तृप्त है, मेरे पास बैठा है। पास ही तीन नेवले खेल रहे हैं जबकि चार अन्य भोजन की खोज में इधर उधर भाग रहे हैं। एक बिल्ली उत्सुकतापूर्वक अपने शिकार की ओर देख रही है – एक चिड़िया जो कि एक निचली शाखा पर बैठी है। प्रकृति के चक्र की भांति नदी की मर्मराहट निरंतर हो रही है। कुछ फूल प्रसन्न लग रहे हैं जबकि अन्य कुछ उदासीन। पत्तियाँ फड़फड़ा रही हैं जैसे कि वे प्रकृति की जीत और शक्ति का उत्सव मना रही हों। हर कुछ मिनटों में एक पत्ती पेड़ से नीचे घास पर आ गिरती है। कुछ सूखी पत्तियाँ जो अपनी आयु से अधिक समय जी चुकी हैं अभी भी शाखा पर लगी हैं जबकि कुछ हरी पत्तियाँ गिर चुकी हैं। आखिर क्यों?

यहाँ क्यों का कोई अर्थ नहीं।

प्रकृति अपना जीवन जी रही है। बिल्लियों, कुत्तों, पेड़, पत्थर और नदियों की ही तरह हम लोग भी इस ब्रह्माण्ड में नन्ही सी कुछ कोशिकायें हैं। अनंत सृष्टि में सीमित अस्तित्व। शाश्वत गृह में कुछ पल रुकने जैसा। यह प्रकृति का खेल है। पुन: पुन: आने वाला, नितान्त सुंदर व अज्ञेय।

ऐसा ही है यह जीवन; एक अलिखित नाटक। इसे चाहे तो प्रसन्न होकर खेलें या अप्रसन्न होकर, खेलना तो पड़ेगा। नाटक को तो चलते रहना होगा।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - Why Me?