एक समय की बात है, एक गाँव में एक विशिष्ट व्यापारी रहता था। वह धनी, प्रख्यात, आदरणीय व समाज में विशेष स्थान रखता था। तथापि, वह बेचैन व चिंतित रहता था। वह अपनी असफलता, अपना सब कुछ गँवा बैठने, व इस तरह के अकथित भयपूर्ण विचारों से छुटकारा पाने में असमर्थ था।

वह अपने आध्यात्मिक गुरु के समक्ष जा कर विनती करता है, “आपकी कृपा से मैं हर प्रकार से सम्पन्न हूँ, तथापि मैं सदा भयभीत व चिंतित रहता हूँ। कृपया मुझे ऐसा ज्ञान दें कि, भले ही कुछ भी हो जाये, मैं हर प्रकार की परिस्थिति में शांतचित्त रह पाऊँ।”
“आप हर संभव परिस्थिति में शांत रहना चाहते हैं?” गुरुजी ने पुनः दोहराया।
“जी हाँ, सद्गुरु।”

गुरु ने एक पवित्र भोजपत्र का टुकड़ा उठाया, भोजपत्र यानि वृक्ष की छाल, अपनी कलम को सिंदूर से बनी स्याही में डुबोया व उस पर कुछ लिखा। उन्होंने उसे सूखने के लिए रखा व अति करुणामय भाव से अपने शिष्य को निहारा।

गुरु ने उस मंत्र लिखे भोजपत्र को मोड़ा व शिष्य को दिया। “यह लो, इसे सदा अपने पास ही रखना व उसी समय खोलना जब तुम्हें लगे कि तुम्हारा सबसे बड़ा भय सत्य हो गया है।”

व्यापारी ने गुरु को दंडवत किया व वापिस चला गया। दो वर्ष पश्चात, उस क्षेत्र में विकट दुर्भिक्ष की स्थिति बन गई व व्यापारी की वित्तीय स्थिति अति दयनीय स्तर पर आ गई। उसके पास बेचने के लिए कोई सामान नहीं था; भुगतान करने वाले भुगतान देने में असमर्थ थे व कर्जदार अपना धन वापिस लेने का दबाव बना रहे थे। उन्होंने उसे कोर्ट में घसीट लिया, उसका घर बेचने को मजबूर कर दिया; पत्नी के आभूषण गिरवी रखवा दिये व उसके गोदाम लूट लिए। उसने बहुत अनुनय-विनय की, हाथ-पैर जोड़े, लेकिन कोई बात नहीं बनी।

उसके गुरु एकांतवास हेतु, अंजान पर्वत-शिखरों के लिए प्रस्थान कर चुके थे। उसने सोचा कि यही उचित समय है जब गुरु द्वारा लिखे ज्ञान का अवलोकन किया जाये।

उसने वह भोजपत्र खोला; उसमें लिखा था – “दृढ़ रहो; अडिग रहो। यह समय बीत जाएगा।”

उन शब्दों का उस पर चमत्कारिक प्रभाव हुआ। उसने आशावान बने रहने का निर्णय लिया। उसे आभास हुआ कि परिस्थितियाँ सदा ऐसी विकट नहीं रह सकतीं; यह सब अल्पकालिक है। और, वास्तव में वह सब अल्पकालिक ही था, चूंकि आने वाले तीन सालों में मानसून बहुत अच्छा आया; फसल भरपूर हुई, उसका अच्छा समय लौट आया। धन व सम्मान पुनः उसके जीवन में लौट आए। अब वह अति प्रसन्न था। उसके गुरु भी लौट कर आ चुके थे। उसने तत्क्षण अनेकों प्रकार की भेंट एकत्र कर गुरु के दर्शन की व्यवस्था की।

गुरु के सम्मुख दंडवत करते हुए वह बोला, “आपकी कृपा से मैं अति प्रसन्न हूँ। मेरा व्यापार इससे अच्छा पहले कभी न था।”
“क्या तुम्हारे पास वह भोजपत्र है?” गुरु ने शांत मुद्रा में पूछा। “उसे खोलो व उसमें जो लिखा है वह पुनः पढ़ो।”

उसने गुरु के कथनानुसार किया व उन शब्दों ने उसे यह स्मरण करवाया कि यह समय भी अल्पकालिक है। बुरे समय के समान ही, यह सब भी जाने वाला है। उसकी मनःस्थिति हर्ष व उत्तेजना से उठ कर आनंद व शांति में पहुँच गई।

“यही परम ज्ञान है, मेरे पुत्र,” गुरु ने कहा। “सदा समता में स्थित रहो। सब कुछ एक चक्र में चलता रहता है।”

मानव जीवन का विस्तार मात्र सकारात्मक एवं नकारात्मक भावनाओं की सीमा तक है। द्वैत का स्वभाव यही है। अपने गत लेख में दिये वचनानुसार, आज मैं विभिन्न बौद्ध ग्रन्थों में लिखित आठ सांसरिक भावनाओं की विवेचना करूंगा। वे दो श्रेणियों में विभजित हैं – सकारात्मक व नकारात्मक। इसके साथ साथ, भगवदगीता में भी द्वैत में रहते हुए ही समता में स्थिति बनाए रखने पर विशेष बल दिया गया है। यही आधारभूत तथ्य है, परम-चेतन अवस्था में स्थित रहने का मूल मंत्र है।

चार सकारात्मक भावनाएं

जब एक सकारात्मक भाव उदय होता है तो आप स्वयं को प्रफुल्लित, विशिष्ट, प्रेरित, एवं शक्ति-सम्पन्न अनुभव करते हैं। आप को लगता है मानो आप पूरे विश्व से लोहा ले सकते हैं। आप बाहर से वही पहले वाले व्यक्ति ही हैं, किन्तु सकारात्मक होने पर आपके अन्तःकरण में कुछ परिवर्तित हो जाता है। ऐसी सकारात्मकता के चार विभिन्न स्वरूप इस प्रकार प्रस्फुटित होते हैं –
हर्ष – प्रसन्न होने के लिए आप अपनी कर्मेन्द्रियों व देह द्वारा जो कुछ भी करते व अनुभव करते हैं, वह इस श्रेणी के अंतर्गत आता है।
प्रशंसा – यदि आपको व आपके कार्यों को सम्मान अथवा प्रोत्साहन मिलता है तो स्वाभाविक ही आप को अच्छा लगता है।
लाभ – जब आपको लगता है कि आपने कुछ प्राप्त किया है – भौतिक अथवा अन्य कुछ। इसकी सीमा एक लॉटरी का टिकट जीतने से ले कर एक छोटा सा मच्छर मारने तक व्याप्त हो सकती है – एक आपकी बैंक पूंजी बढ़ा सकता है व दूसरा आपके अहम को अथवा मात्र संतुष्टि को।
सुमधुर शब्द – कोई आपकी प्रशंसा में एक वाक्य कहता है तो यह तत्क्षण आपमें एक सकारात्मक भाव उत्पन्न करता है; मुख्यरूप से तब यदि वह प्रशंसा वास्तव में सत्य हो।

चार नकारात्मक भावनाएं

चार नकारात्मक भाव उपरोक्त के पूर्णत: विपरीत हैं। वे आपको दीन, उदासीन, पंगु व बलहीन कर देते हैं। ये उस समय उत्पन्न होते हैं जब आप अप्रसन्नता, आलोचना, हानि व अपशब्दों द्वारा उद्विग्न हो जाते हैं।

तथापि, सभी भाव अल्पकालिक होते हैं। जब आपको यह ज्ञात नहीं होता कि किसी भी भावनात्मक स्थिति से बाहर किस प्रकार आया जा सकता है; उस समय ये भावनाएं भय, व्यसन, सम्मोह, व व्याधि (शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार की), का रूप ले लेती हैं। और, भावनाएं व्यक्ति-सापेक्ष होती हैं। आपके लिए जो सकारात्मक है वही अन्य किसी के लिए नकारात्मक हो सकता है। उदाहरणस्वरूप, आपका लाभप्रद क्रय दूसरे व्यक्ति का हानिपूर्ण विक्रय हो सकता है; आपको शिकार से मिला हर्ष उस निरीह वनप्राणी का दर्द से उत्पन्न असंतोष हो सकता है। वही शब्द प्रसन्नता का या कष्ट का कारण हो सकते हैं – यह शब्दों के माध्यम पर निर्भर करेगा।

एक प्रकार से, सकारात्मक व नकारात्मक भावों में जीना अपरिहार्य है; अवश्यंभावी है। तथापि, यह आवश्यक नहीं कि एक सीमा के उपरांत, इन भावनाओं को अपने ऊपर प्रभाव डालने दिया जाये। जब आपके जीवन में अच्छा समय चल रहा हो तो उसका यह स्मरण रखते हुए आनंद लें कि यह सदा रहने वाला नहीं। जब कभी कष्टकारी परिस्थितियों का सामना हो तो उसे भी यह स्मरण रखते हुए शालीनतापूर्वक सहें कि यह समय भी सदा रहने वाला नहीं। यही है द्वैत से पार होना; समता में रहना । संक्षेप में यही होता है अंतर्मुख होना। अच्छा अथवा बुरा, यदि आप एक बार विजयी हुए हैं तो आप पुनः ऐसा कर सकते हैं। यदि सफलता आप पर हावी नहीं हो पाती, तो असफलता कैसे हो सकती है; यदि स्वीकृति ने आपको नहीं हिलाया तो अस्वीकृति कैसे हिला पाएगी! कमल के समान जीयें – इस संसार में रहते हुए भी इससे विरक्त।

जाएँ, व भयरहित हो विचरें! केवल वही जिसे आप अनुमति देते हैं, आपको प्रभावित कर सकता है।

शांति।
स्वामी