कुछ सप्ताह पूर्व किसी ने मुझे यह ई-मेल लिखा

मै आपसे पूछना चाहता हूँ कि एक आत्म-मोही साथी के साथ कैसे रहा जाए? उनसे आध्यात्मिक दृष्टि से कैसे व्यवहार किया जाए? आत्म-मोहित व्यक्ति ऐसे क्यों होते हैं? और आत्म-मोहित व्यक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है?

मेरे विचार से इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए एक दार्शनिक से अधिक एक मनोवैज्ञानिक श्रेष्ठतर रूप से प्रशिक्षित है। फिर भी मैं से इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करता हूँ।

मैंने एक समय एक उक्ति पढ़ी थी “मेरे विषय में मेरे विचार मैंने बहुत कह लिए। अब हम आप के विचार सुनेंगे, मेरे विषय में।” यही एक आत्म-मोही व्यक्ति का सारांश है।

एक बहुत बड़े गर्म हवा के गुब्बारे के विषय में सोचिये, एक अंतरिक्ष यान से भी विशाल। एक आत्म-मोही व्यक्ति के “अहं” के सम्मुख यह एक छोटे से बुलबुले से अधिक कुछ भी नहीं। एक आत्म-मोही व्यक्ति को निरंतर प्रशंसा किये जाने की अतृप्त आवश्यकता होती है, और वह अहंकार से भरा होता है। (वैसे बहुत से धर्मोपदेशक, स्वामी, धार्मिक एवं राजनैतिक नेता इसी श्रेणी में आते हैं)। अधिकतर खंडित सम्बन्धों में कम से कम एक साथी में आत्म-मोह की यह विशेषता अवश्य दिखाई देती है।

एक नदी के देवता एवं अप्सरा का पुत्र, नारसिसस एक लंबा, शक्तिशाली, सुंदर युवक एवं शिकारी था। वह अपनी सुंदरता से इतना मोहित था कि वह उन व्यक्तियों का भी तिरस्कार करता था जो उसे प्रेम करते थे। उसका यह मानना था कि उनमें से कोई भी इतना योग्य न था कि उसका प्रेम पा सके। स्वर्गीय प्रतिशोध की देवी नेमिसिस (ग्रीस पौराणिक कथाओं में) उसे एक तालाब के पास ले कर गयी, जहाँ उसने जल में अपना प्रतिबिंब दिखा और स्वयं से प्रेम कर बैठा। उसकी जीने की अभिलाषा ही समाप्त हो गयी , क्योंकि उसे लगा कि उसे अपने प्रतिबिंब से अधिक सुन्दर कोई नहीं मिल सकता था। अपनी परछाई को देखते-देखते उसने अपने प्राण त्याग दिये।

नारसिसिस्ट (आत्म-मोही) शब्द नारसिसस की इसी पौराणिक कथा से उपजा है। इसका मूल अर्थ है स्वयं के प्रति असाधारण आसक्ति।

आपने मुझसे पूछा कि एक आत्म-मोहित जीवन साथी के साथ किस प्रकार निपटा जाए। सत्य तो यह है कि आप उनके साथ ‘निपटा’ नहीं जा सकता। आप स्वयं को सुरक्षित करने के उपाय कर सकते हैं। यदि आप एक आत्म-मोहित व्यक्ति के साथ जी रहे हैं, तो संभवतः आप अत्यधिक सहानुभूति पूर्ण, दूसरों की अधिक देख-भाल रखने वाले व्यक्ति हैं। आपने बहुत कुछ सहा है। आप बहुत ही सौम्य व्यवहार कर रहे हैं, इस आशा में कि आपकी सौम्यता से एक दिन आपके जीवन-साथी का हृदय-परिवर्तन हो जाएगा। आप अपने जीवन साथी की आवश्यकताओं से सामंजस्य बैठाते रहते हैं, इस आशा में कि वह फिर नहीं फट पड़ेंगे या फिर अपने हाव-भाव या शब्दों से आपको आहत कर देंगे। सत्य तो यह है कि एक आत्म-मोहित व्यक्ति के साथ यह युक्तियाँ कुछ काम नहीं करतीं। वह जैसे हैं, वैसे आपके कारण नहीं हैं। वह मात्र कुछ अधिक ही मनोग्रहीत हैं।

एक आत्म-मोहित व्यक्ति अपनी बात मनवा लेने में निपुण होते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि किसी व्यक्ति से एक निश्चित ढंग का व्यवहार कैसे करवाया जाए। हालाँकि इसे एक विकार के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है फिर भी जब एक आत्म-मोहित व्यक्ति के साथ संबंध की बात आती है, तो उसके जीवन-साथी को (न कि स्वयं आत्म-मोहित व्यक्ति को) अधिकांश कष्ट उठाना पड़ता है। जब दो आत्म-मोहित व्यक्तियों में संबंध होता है, तो अधिकतर सभी वस्तुओं पर बहुत बहस एवं झगड़ा होता है। कोई भी आलोचना नहीं सह सकता। वे प्रत्येक अवसर पर एक दूसरे को नीचा दिखाते रहते हैं। और अंततः या तो वे अलग हो जाते हैं या फिर एक ही छत के नीचे दो अपरिचित व्यक्तियों की भांति जीवन व्यतीत करते हैं।

एक आत्म-मोहित व्यक्ति के चार स्पष्ट संकेत प्रस्तुत हैं –

वे सत्य का समाना नहीं कर सकते

चाहे आपकी आलोचना कितनी ही रचनात्मक क्यों न हो उस को सुनाने की एकमात्र विधि यही है कि उसे प्रशंसा से भर कर सुनाया जाए। तब भी यदि आत्म-मोहित व्यक्ति वह नहीं सुनना चाहते जो आप कहना चाहते हैं, वे अवांछनीय प्रतिक्रिया देंगे, क्रोधित होंगे। यहाँ तक कि हिंसक भी हो सकते हैं। एक आत्म-मोहित व्यक्ति का शांतिपूर्वक सामना करना लगभग असंभव है। यदि आपको अपने साथी से बातचीत करना बहुत कठिन लगता है, तो हो सकता है कि आपको एक आत्म-मोहित साथी मिला हो।

वे कभी गलत नहीं होते

यदि आपका जीवन साथी आत्म-मोहित व्यक्ति है, तो गलती सदैव आपकी ही होगी। यदि उसका कोई कार्य ठीक नहीं हुआ तो संभावना यही है कि आपने कुछ सही नहीं किया। यदि वह क्रोधित हो जाए, तो यह आपने किया है। यदि वह दुखी है, तो ऐसा इसलिये है कि आप उसे अधिक प्रेम नहीं करते। यदि आप में बहस हो रही है, तो इसी लिये कि आपने उसकी बात नहीं सुनी। एक आत्म-मोहित व्यक्ति आपको अपनी भावनाओं के लिये दोषी महसूस कराता है। किसी प्रकार वे आपको ये ग्लानि महसूस करा देंगे कि आप जो भी कर रहे हैं वह पर्याप्त नहीं है।

वे सदैव प्रथम आते हैं

एक आत्म-मोहित व्यक्ति के हृदय में अपने अतिरिक्त किसी के लिए भी सहानुभूति की कमी होती है। उसे किसी भोजनालय के बफ़े में धक्का मुक्की करके, प्रथम प्लेट हथियाने में कोई भी रंज नहीं होगा। या आपसे यह कहने में कोई शंका नहीं होगी कि आप गलियारे वाली सीट पर बैठ जाएं क्योंकि वह खिड़की वाली सीट पर बैठना चाहते हैं। या फिर आप उनकी पसंद के भोजनालय में रात्रि-भोज करें या आप उनकी चुनिंदा जगह पर छुट्टियां बिताएं। कभी-कभी आपको यह प्रतीत होगा कि वे दूसरे व्यक्ति की भावनाओं, आवश्यकताओं व उनकी प्राथमिकताओं के प्रति उदासीन हैं।

उनके मार्ग पर चलें अन्यथा आप को अकेला जाना होगा

एक आत्म-मोहित व्यक्ति के साथी के लिये सम्भवत: कोई मध्यम मार्ग ही नहीं होता। “मैं ऐसा ही हूँ” आप बहुधा सुनेंगे, या कि “मेरी परवरिश ऐसी ही हुई है” या “तुम मुझे नहीं समझते” या “मुझे कोई प्रेम नहीं करता, कोई मेरी सहायता नहीं कर सकता”… इत्यादि। स्वयं को विपत्ति-ग्रस्त प्रदर्शित कर वे अपना काम करवा लेते हैं। अधिकतर समय वे ऐसा जान बूझ कर नहीं किंतु अवचेतन रूप में करते हैं।

यदि एक साथी आत्म-मोहित व्यक्ति हो तो अधिकतर समय वह रिश्ता खंडित व अपमानजनक होता है। दूसरे साथी को अत्यंत मानसिक क्षति व तनाव का सामना करना पड़ता है। क्योंकि बहुधा एक आत्म-मोहित व्यक्ति अपने साथी को छोड़कर समस्त विश्व के लिए खुशामदी ढंग से मदद करने को सज रहता है। तो अन्य व्यक्ति इस बात को नहीं समझ पाते कि अपने साथी की अधिक चिंता करने वाले एक मृदुल साथी होने के नाते आप पर क्या बीत रही है।

मैंने इस्सॉक असिमोव का एक हास्य पढ़ा था। उसे थोड़ा परिवर्तित कर प्रस्तुत कर रहा हूँ –

जब आप एक मूर्ख को एक चुटकला सुनाते हैं तो वह तीन बार हँसता है। पहला जब आप उसे सुनाते हैं, दूसरा जब आप उसे समझाते हैं, तीसरा जब वह समझता है।

जब आप एक जमींदार को एक चुटकुला सुनाते हैं, तो वह दो बार हँसता है। पहला जब आप सुनाते हैं और दूसरा जब समझाते हैं।

जब आप एक सैन्य अधिकारी को एक चुटकुला सुनाते हैं, तो वह मात्र एक बार हँसता है। जब आप उसे सुनाते हैं। वह आपको समझाने नहीं देगा और संभावना है कि वह समझेगा भी नहीं।

किंतु जब आप एक आत्म-मोहित व्यक्ति को चुटकुला सुनाते हैं, तो वह आपको बताता है कि उसने यह पहले भी सुन रखा है, और आप इसे गलत सुना रहे हैं, किसी भी प्रकार से।

मैंने भले ही यह चित्रित कर दिया हो कि आत्म-मोहित व्यक्ति क्रूर प्रवृत्ति के होते हैं। किंतु ऐसा नहीं है। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है। वह बहुत ही संवेदनशील मनुष्य होते हैं, जो अपने अहंकारी मुखौटे के पीछे, बहुत ही असुरक्षित व अति संवेदनशील होते हैं। आत्म-मोह अधिक कुछ नहीं, एक प्रक्रिया है। बाहरी परिस्थितियों का सामना करने की प्रक्रिया।

यदि आप अपने आत्म-मोहित साथी का त्याग नहीं कर सकते तो फिर दूसरी एक ही विधि बची है। जो भी स्वीकार कर सकते हैं, स्वीकार करें और स्वयं का बचाव करें। यदि आप इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते तो बेहतर तो यही होगा की अनंत सहानुभूति, अनंत प्रेम व अनंत धैर्य धारण कर लिया जाए। यही आध्यात्मिक मार्ग है। अपनी भलाई को अपने साथी के व्यवहार से ऊपर उठने दें। आप उसी व्यवहार को चुनें जो आपको शोभा देता है।

जैसा कि गाँधीजी ने कहा था “मैं किसी को अपने गंदे पैरों से मेरे मन में प्रवेश नहीं करने दूँगा।” किसी और के व्यवहार को स्वयं का व्यवहार बदलने की अनुमति न दें। यथार्थ आप अविनाशी हैं। आपकी आत्मा इन सब से परे है। आपको कोई भी कष्ट नहीं दे सकता। कोई भी आपकी आज्ञा के बिना वहाँ नहीं जा सकता। जब आप उन्हें बदल नहीं सकते, तो प्रेम के स्पंदन फैलायें। अंत में आप अपने हृदय पर हाथ रख कर यह कहने के योग्य हों कि “मैं अपनी अच्छाई के मार्ग से नहीं डिगा”। अंत में यही मायने रखता है। जैसा कि होना ही चाहिये।

शांति।
स्वामी