यदि आपको कोई मिल जाये जो बोले कि वो आपको कुछ भी दे सकता है तो आप उस से क्या क्या लेना चाहेंगे? अवश्य ही आपका मन कल्पनाओ से भर जायेगा और आप इस अवसर का मुल्यांकन करना शुरु कर देगे। वो मुझे कितना दे सकता है? क्या वो सारा दे सकता है? वो मुझे ही क्यूँ दे रहा है? मुझे इसे प्राप्त करने के लिये क्या करना होगा? मुझे इसे किस के साथ बांटना होगा? इस प्रकार एक से एक बढ कर एक प्रशन पैदा होते जायेंगे।

मन बहुत ही जोड–तोड करता है। हर चीज की गणना के लिये आपको बाध्य करता है। जब कि भावनायें कभी भी गणना के ऊपर निर्भर नही करती। यह सहज ही प्रतिक्रिया करती है। जैसे एक बच्चे को गुदगुदाने से वह सहज ही मुस्कुरता है,ऐसा ही कुछ हमारी भावनायों के साथ भी है। अगर आपको कोई कुछ देने के लिये मिलता है, तो आप उससे क्या लेना चाहोगे? अगर वो व्यक्ति सिर्फ संसारिक वस्तुये देने में ही सक्षम है, तो क्या आप सिर्फ यह कहेगे, ”मुझे ढेर सारा धन दो।” परन्तु इससे आगे और क्या मांग सकते हो?

आपको क्या चाहिये, इसकी सूची बनानी तो बहुत आसान है क्योंकि मन यही तक सोचने के लिये सीमित है। लेकिन एक क्षण के लिये इस को उल्ट दिया जाये और कोई आपसे पूछे कि आप क्या दे सकते हो? तो आपका क्या उत्तर होगा? अब ऐसी दो तुलनात्मक सूचियां बनाओ, एक लेने वाली तथा दूसरी देने वाली। एक मे लिखो एक आप क्या लेना चाहते हो तथा दूसरी मे लिखो के क्या-क्या दे सकते हो? जिसकी लेने वाली सूची देने वाली से ज्यादा लम्बी है उसको अपने जीवन मे हमेशा एक कमी महसूस होगी। अगर आप की दोनो सूचियां एक बराबर है तो आप बधाई के पात्र है। इसका अर्थ यह है कि आपको पता है कि एक संतुलित जीवन कैसे जीया जाता है। अगर आपकी देने वाली सूची, लेने वाली सूची से ज्यादा लम्बी है, तो आप सम्मान के पात्र है। जरुर आप में कुछ विशेष है, क्योंकि अधिकतर मनुष्य तो केवल लेना जानते है, देना नहीं।

जिसकी लेने की सूची में कुछ ना हो और देने कि सूची में सब कुछ हो वह तो दण्डवत् प्रणाम का अधिकारी है। ऐसा मानो एक मानव के शरीर मे साक्षात भगवान चल रहे हैं। संसार के सारे धर्मो में केवल उसी व्यक्ति को श्रेष्ठ माना गया है, जिसने इस संसार को कुछ दिया है। मनुष्य दूसरे के त्याग तथा सेवा को याद रखते हैं। दान देने से एक अन्तरिक संतुष्टि मिलती है। अगर आपकी दोनो सूचियां खाली है तो आप दया के पात्र है, यदि आपने ना लेना सीखा और ना ही देना, तो अभी आपके सिखने के लिये बहुत कुछ शेष है।

ज़ेन गुरु सयस्तू का बहुत बडा शिष्य मण्डल था। उनके भक्तों की भीड़ दिन प्रतिदिन बढ रही थी। इसी कारण उन्हे अपने मठ के लिये एक बडे परिसर की आवश्यकता थी क्योंकि वर्तमान परिसर छोटा पड रहा था। उनके अनुयायियो के बीच में एक अमीर व्यापारी ऊमेज़ू भी था। उसने इस कार्य में सहयोग देने का निर्णय लिया। यह उन दिनों की बात है जब एक साधारण परिवार का वार्षिक खर्चा तीन सोने के सिक्को से ज्यादा नही था।

ऊमेज़ू ने आपने गुरु को भेंट देते हुए कहा, “ये मेंरी तरफ से पांच सौ सोने के सिक्को की थैली है और इससे आश्रम के निर्माण की सारी आवश्यकतायें पूरी हो जायेगी।”
सयस्तू ने एक सामान्य स्वर में, जैसे कि दान नहीं अपितु कोई पाप का भार ले रहे हो, उत्तर दिया, “ठीक है, मैं इसे रख लेता हूं।”

ऊमेज़ू के सम्मान को ठेस लगी। उसे लगा कि उसके गुरु ने अशिष्ट तथा कृत्ध्न तरीके से उसकी सेवा स्वीकार की है। डर और अज्ञानता, अहंकार और पैसे के बीच में अजीब रिश्ता है। दोनो एक दूसरे के लिये आग में घी जैसा काम करते है।

उसने फिर से गुरु का ध्यान अपनी ओर केन्द्रित करते हुए बुदबुदाया, “इस थैली में सोने के पांच सौ सिक्के है।”
सयस्तू ने शान्ति पूर्वक उत्तर दिया, “यह तुम पहले भी बता चुके हो।”

ऊमेज़ू क्रोध् मे बोलता है, “एक अमीर आदमी के लिये भी पांच सौ सोने के सिक्के बहुत बडी राशि होते है।”

सयस्तू धीरे से बोले, “तो क्या इसके लिये तुमको ध्नयावाद करूं?”
“हां, लेने वाले को थोडा सा आभारी तो होना ही चाहिये।” ऊमेज़ू ने तुरन्त उतेजित हो कर उत्तर दिया।
“मैं क्यों अभार प्रकट करूं,” सयस्तू ने हंसते हुए कहा, “देने वाले को आभारी होना चाहिये।”

वास्तव मे ही दाता को आभारी होने चाहिये और यह सच भी है। क्योंकि अगर प्रकृति ने आपको किसी को कुछ देने का माध्यम बनाया है तो आपको इसकी प्रसन्नता होनी चाहिये। यदि ले रहे हो तो भी आभारी रहो तथा यदि दे रहे हो तो भी आभारी रहो।

अन्त में, मैं यही कहूंगा कोई भी लेने या देने वाला नही होता। प्रत्येक व्यक्ति एक माध्यम मात्र है।

शान्ति।
स्वामी