रूमी के प्रसिद्ध पुराण “मसंवी” में एक दरिद्र एवं एक कंजूस की सुंदर अपितु धृष्ट कथा है।

अरब में गर्मी के एक दिन, एक दुर्बल, वृद्ध भिखारी ने भिक्षा की आस में एक धनी व्यक्ति के द्वार पर दस्तक दी। उसकी दयनीय अवस्था को देखकर द्वारपालों ने उसे भीतर आने दिया और उसे बरामदे में प्रतीक्षा करने को कहा।

जैसे ही घर का मालिक आया, भिखारी ने याचना की “महोदय, कृपा कर आप मुझे एक रोटी का टुकड़ा दें?”
“तुम्हें क्या लगता है?” मालिक ने उसे फटकारा “क्या यह कोई बेकरी है?”
“मात्र एक कटोरी आटा?” उसने आशापूर्वक पूछा।
“क्या तुम्हें यहाँ कुछ ऐसा दिखता है जिससे लगे कि यह आटा की मिल है?” कंजूस ने खिल्ली उड़ाई।
“कृपया मुझे मास का बचा हुआ टुकड़ा ही दे दें।” भिखारी डटा रहा।
“यहाँ से निकल जाओ” कंजूस चिल्लाया। “तुम्हें लगता है कि यह कसाई की दुकान है?”
“आपको परेशान करने के लिये क्षमा चाहता हूँ” भिखारी ने जाते-जाते कहा “क्या मुझे कम से कम एक गिलास पानी मिल सकता है?”
“क्या तुम्हें यहाँ कोई नदी बहती दिख रही है?”

मालिक ने अपने सैनिकों को उस बूढ़े व्यक्ति को बाहर फेंकने को कहा।
“ठहरो” भिखारी ने हाथ से इशारा किया।
इससे पहले कि वे उसे रोक पाते भिखारी तुरंत घर के अंदर घुसा और पेशाब करने लगा।

रूमी काव्यात्मक रूप से कहते हैं –

सदमें से अवाक मालिक चिल्लाया ‘अरे!’
‘अब जब यह जगह निश्चित ही खँडहर है’ रूखा जबाब आया,

‘जहाँ कोई भी वस्तु किसी काम की नहीं,
तो कम से कम यहाँ दैनिक क्रिया ही सही।’

यहाँ मैं यह संदेश स्पष्ट कर दूँ।
कि न एक बाज़, जिसे शिकार की राजसी शिक्षा मिली।

न ही मोर जो नयनों को प्रसन्न करने, आकर्षित करने के लिये बना है।
न ही तोता जिसे वाणी का वरदान है, जो आह भरने को विवश कर दे।

न ही बगीचे की बुलबुल, जो प्रेमियों के जैसे पुकारती है।
न ही संदेशवाहक हुदहुद, न ही सारस, जो ऊंचाई पर घोसला बनाती है।

तो फिर ऐसा क्या गुण है तुममें,
जो कोई तुमसे खरीदने की इच्छा करे?

जबकि मैं न तो भिखारी और न ही मालिक के आचरण की सराहना करता हूँ, मुझे इस कथा में निहित संदेश बहुत पसंद आया। प्रकृति सुंदर एवं उपयोगी जीवों से भरी पड़ी है। इसमें पेड़ पक्षी और जानवर हैं जो उत्तरजीविता एवं संपोषण के दैवी, जटिल खेल में एक प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। मोर, तोता या बुलबुल के विपरीत, रूमी कहते हैं, हममें कुछ भी विशेष गुण नहीं है। तो हम संसार के लिये क्या कर रहे हैं? और यदि हमारे पास जो कुछ भी है, उसके छोटे से भाग को भी बांटने के लिए हम इच्छुक नहीं तो फिर हमारा जीवन किस काम का है?

मेरा आज के लेखन का केंद्र दान है। यदि आप आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो दान करना भी संभव नहीं है क्योंकि जो कुछ भी हमारे स्वामित्व में है, वह सब हमने अन्य किसी से लिया हुआ है। हम इसे प्रमाणिक कमाई या नीतिवान लेनदेन कह सकते हैं। फिर भी सत्य तो यही है कि हमारे पास जो कुछ भी है वह समाज में जो कुछ भी पहले से विद्यमान था उसका व्यक्तिगत संचयन है। मैं यह नहीं कह रहा कि आप वैद्य मालिक नहीं हैं या फिर आपको सब कुछ दे देना चाहिये। किंतु साथ ही साथ दान एक गहन आध्यात्मिक कर्म है।

दान को मात्र आर्थिक दान से नहीं नापा-तोला जा सकता है। दया भी एक दान है जैसे कि सहानुभूति है। जब आप किसी की सहायता जिस किसी भी प्रकार से करते हैं, आप दान कर रहे हैं। यह इतना सरल भी हो सकता है जैसे एक विमान में एक महिला को उनका सामान सर के ऊपर रखने वाले विभाग में सहज कर रखने में मदद करना। या खिड़की वाली सीट अपने पास बैठे बच्चे को बैठने के लिये देना। जिसने कभी आपको दुख दिया हो उसे देखकर मुसकुराना भी दानकर्म है, जैसे कि अपनी रोटी किसी के साथ बाँटना।

दिलचस्प बात यह है (हालाँकि इसमें कोई आश्चर्य नहीं) कि शब्दकोष में दान शब्द के पर्यायवाची शब्दों की सूची है- करुणा, अनुकंपा, सहानुभूति, दयालुता, शालीनता, विचारशीलता, चिंता, सहनशीलता, नरमी। जब आप इनमें से किसी को महसूस कर रहें या अमल कर रहें हैं तो आप दान कर रहे हैं।

दान कोई खर्चा या उपहार नहीं है। यह समाज में आपका योगदान है। यदि आप मुझसे पूछें तो यह प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत या सामाजिक दायित्व है। इसके अतिरिक्त आपके अंदर क्या भंडार है, यह इसी बात से जाना जा सकता है कि आप बाहर क्या देते हैं। चाहे आपके पास प्रेम, धन, अहंकार, क्रोध, दया या सहानुभूति है, आप वही दे पाएंगे जो आपके पास है।

जिस प्रकार आप पैसे बचाते हैं, थोडा-थोडा करके एक-एक पैसा जुड़ता है, उसी प्रकार दयालुता का प्रत्येक छोटा कर्म मायने रखता है। दया का हर छोटा भाव आपकी आध्यात्मिक बचत बढ़ाता है। क्योंकि दया यही तो है, यह आपका आध्यात्मिक बचत खाता है। जब आपको शांति व आंतरिक शक्ति की आवश्यकता होती है आप इस खाते से ले लेते हैं। यहीं आपके अच्छे कर्मों को अभिलिखित किया जाता है।

एक व्यक्ति जो कि एक बहुत धनी परिवार में पैदा हुआ था, एक अत्यधिक खर्चीला, स्वकेन्द्रित जीवन जीता था और कभी कुछ विशेष दान नहीं देता था। फार्महाउस से पेंटहाउस के बीच उसके पास कईं घर थे। जब वह मरा और उस पार दूसरी दुनिया में पहुँचा, उसे रहने के लिये एक छोटी कोठरी मिली। उसे वहाँ लेटने में बड़ी कठिनाई होती थी।

“अवश्य कोई भूल हुई है” उसने विरोध किया “मेरा जन्म एक हवेली में हुआ था और पृथ्वी पर मेरे भोग-विलास हेतु सब कुछ था। फिर मेरे रहने के लिये यह कबूतर खाना क्यों? क्या मेरे अच्छे कर्म खर्च हो गये या फिर कुछ और?”
देवदूत ने कहा “आपने जो कुछ भी हमें भेजा था उससे हम जो भी बना सकते थे हमने बनाया।”

जबकि दान से स्वर्ग में आपके लिये महल नहीं बन रहा, फिर भी यह निश्चित रूप से दूसरी दुनिया में आपकी संपत्ति बना रहा है। और “दूसरी दुनिया’’ कहकर मैं किसी दिव्य, स्वर्गिक स्थान की ओर संकेत नहीं कर रहा, वरन इसका तात्पर्य आपकी भावनाओं के आन्तरिक संसार से है। यदि आप धन-दान नहीं कर सकते, यदि आप अपने धन का दसवाँ भाग नहीं दे सकते तो अपने पुराने वस्त्र या कुछ और दान करने पर गौर करें। यदि कुछ नहीं तो कम से कम अच्छे वचन ही भेंट करें। विनम्र बनें।

यहाँ दान का सारांश है-कभी भी, कहीं भी, कैसे भी, और किसी की भी मदद करें, जो कुछ भी आप समझदारी से दे सकते हैं।

इस बात को समझ लें कि दान कोई साधारण कृत्य नहीं वरन असीम सौभाग्य की स्थिति है (यहाँ पढ़ें )। इस पर विचार करें और आप पाएंगे कि इस संसार में कुछ भी वापस देने में समर्थ होना कितना बड़ा आशीर्वाद है।

शांति।
स्वामी