हमारे जीवन के कुछ पहलुओं को हम परिवर्तित कर सकते हैं। कुछ पहलुओं को हम नियंत्रित या प्रभावित कर सकते हैं। किंतु बहुत से पक्षों से हमें सामंजस्य बैठाना पड़ता है। यही सबसे बड़ी चुनौती है। यह सरल नहीं है कि जीवन आपको जैसा रखना चाहता है आप वैसे ही बन जाएं। हालाँकि आनंद का सबसे सहज मार्ग तो यही है।

इतना सब कहने के पश्चात मेरे आज के लेखन का उद्देश्य यह कतई नहीं कि कुछ समायोजन करने के पश्चात कैसे “प्रसन्न” रहा जाए। आज का विषय आनंद-चित्त होने पर है। यदि आप संतुष्ट नहीं तो आप आनन्दित नहीं रह सकते। संतुष्ट होना आनंद-चित्त होने के समकक्ष है। तो संतुष्ट महसूस करने के लिये क्या करने की आवश्यकता है?

पिछले लेखन ‘आनंद’ की धारा को आगे ले जाते हुए मैं आपसे विल ड्यूरांट द्वारा रचित एक सुंदर लेख “कईं दीपों का प्रकाश” (लाइट फ्रम मेनी लाइट्स) साझा करता हूँ –

“कईं वर्षों तक मैंने आनंद को खोजा। प्रथम बार मैंने संभवत: उसे अपनी माँ के वक्ष की नर्म गरमाहट में, उनके स्नेहल हाथों के दुलार में तथा उनकी चमकती आंखों की मृदुलता में पाया। फिर मैंने उसे खेल में पाया क्योंकि पराजय की पीड़ा में भी मैं लड़कपन के हर्षोन्माद को जानता था। मैंने उसे पहले प्यार में पाया। यह तब हुआ जब एक साधारण सी लड़की ने अपना हाथ मेरे हाथों में दिया और उसके बालों की चोटी की भीनी महक मेरे होंठों के इतने पास आ गयी कि मैंने उसके जाने बिना ही उन्हें चूम लिया। फिर जब वह मुझसे दूर चली गयी तो खुशी भी जाने कहाँ भटक गयी।

फिर मैंने उसे दूसरों का जीवन पुनर्निर्मित करते खोजा। मैं समाज सुधारने लगा। मैंने मानवता की विधियों की भर्त्सना की और अपने समय के पिछडेपन पर पछताया और केवल उस महान युग का गुणगान किया जो बहुत पहले बीत चुका था या फिर आगे आने वाला था। मैं चाहता था कि बहुत से नियम-कायदे ऐसे हों जिनसे मेरे व मेरे जैसे युवाओं के लिये जीवन सहज हो जाए। किंतु संसार ने मेरी नहीं सुनी। और मैं और कड़वा होता गया। मैंने बुद्धिहीनता पर व्याख्यान एकत्र किये और मनुष्यों की अनर्थकता व अन्याय पर रोक लगा दी। एक दिन एक शत्रु ने मुझसे कहा- “तुम दूसरों के जिन अवगुणों का तिरस्कार करते हो, वे सभी अवगुण तुम में भी हैं। तुम भी स्वार्थी और लोभी हो और यह संसार ऐसा इसलिये है क्योंकि इसमें तुम्हारे जैसे मनुष्य भरे पड़े हैं।”

मैंने एकांत में इस पर मनन किया और पाया कि यह सत्य था। तब मुझे लगा कि बदलाव तो स्वयं से आरंभ करना है और उस दिन के पश्चात मुझे समाज सुधारने का समय ही नहीं मिला।

मैंने पाया कि यदि मैं वह नियत-कार्य करता रहूँ जिसे करने योग्य जीवन ने मुझे सज किया है तो मुझे संतुष्टि मिलेगी। फिर मैं आनंद की शांत डगर पर वर्षों चल सकूँगा। मैंने स्वयं को प्रकृति की प्रेम परक पितृत्व आज्ञा एवं उसकी प्राचीन मनीषा पर विश्वास करते हुए समर्पित कर दिया। जैसा कि दंते ने आनंद में प्रवेश करते समय जाना था “उसकी इच्छा एवं सेवा में ही हमारी शांति है।”

जहां तक मैंने पढ़ा है यह आनंद की सबसे स्वस्थ-चित्त परिभाषा है। विशेषकर अंतिम परिच्छेद तो अप्रतिम है। हममें से प्रत्येक का एक उद्देश्य है। यह सबके लिये एक समान नहीं है और न ही हो सकता है। कभी-कभी हम दूसरे प्रकार के जीवन के लिये इस आशा में संघर्ष करते रहते हैं कि हमें वर्तमान बाधाओं को दूर करने के बाद अपने सपनों का संसार मिलेगा।

सत्य तो यह है कि प्रकृति ने आपको कुछ सामर्थ, प्रतिभा, योग्यता दी है तो आप चाहें या न चाहें, वह उसे उसकी अधिकतम उत्पादकता तक अवश्य ले जाएगी। इससे कोई अंतर नहीं कि आप कहाँ हैं और क्या हैं, वह आपको उस प्राकृतिक क्षेत्र में खींच लाएगी जहां इसकी प्रणाली एवं कार्यों का अपेक्षित अधिकतम परिणाम मिले।

इसलिये ईश्वर ने जो कुछ भी जोड़ कर रखा है मनुष्य को उसे अलग नहीं करना चाहिये। (मार्क १०:९)

जीवन आपसे जो कहना चाहता है उसे सुन लेने में कुछ तो अर्थ है ही।

असीसि के सेन्ट फ्रान्सिस की एक प्रार्थना हृदय को द्रवित करने वाली है। निस्वार्थ ध्येय से लेकर समर्पण के भाव तक (जबकि दोनों ही आनंद के स्थायित्व के लिये गुणागुणज्ञ हैं) इसमें सभी कुछ है।

 हे ईश्वर, मुझे शांति का माध्यम बना
 जहाँ घृणा है, वहाँ प्रेम बोऊँ
 जहाँ द्वेष है वहाँ क्षमा करूँ 
 जहाँ निराशा है वहाँ आशा बनूँ
 जहाँ अंधेरा है वहाँ प्रकाश बनूँ
 जहाँ विषाद है वहाँ आनंद बनूँ
 हे ईश्वर मुझे आशीष दे कि -
 मैं जितनी सांत्वना चाहूँ उससे अधिक दूँ
 जितना समझा जाऊँ उससे अधिक समझूँ
 जितना प्रेम बटोरूँ, उससे अधिक दूँ
 क्योंकि-
 हम देने में ही तो पाते हैं
 क्षमादान से क्षम्य होते हैं और
 स्वविलगित हो अमर होते हैं।

यदि यह आनंद नहीं तो और क्या है? यदि यह संतुष्टि नहीं तो और क्या है?

मुल्ला नसरुद्दीन अपने नये गधे को घर ले जा रहा था। जब उसके एक मित्र ने उसे रास्ते में रोका
“मुल्ला क्या यह नया गधा है?”
वार्तालाप के अनिच्छुक मुल्ला ने हामी में केवल सर हिलाया।
“किंतु तुम इसे रखोगे कहाँ? तुम्हारे पास तो केवल एक कमरा है जिसमें तुम्हारी एक बीवी व छह बच्चियाँ रहती हैं।”
“क्यों? यह भी हमारे साथ कमरे में रहेगा।”
“क्या तुमने दुर्गंध के विषय में सोचा है?”
“चिंता मत करो” मुल्ला ने उसकी चिंता को अनदेखा करते हुए कहा “मेरी तरह यह भी उसका आदी हो जाएगा।”

मैं सोचता हूँ कि जीवन के साथ भी कुछ ऐसा ही है। हम और भी गधे खरीदते और इकट्ठा करते जाते हैं यह सोचते हुए कि वह हमारे जीवन शैली के आदी हो जाएगें। और दूसरी ओर जीवन कुछ और ही विचार कर रहा होता है कि इन गधों का आदी कैसे हुआ जाए।

जीवन की किसी विशेष विधि का आदी होने का तात्पर्य सदैव यह नहीं होता कि उसे “जिया” जा रहा है। उसे पूर्णता से जीने के लिये कहीं हमें आत्मा की आवाज सुननी पड़ेगी। यह बहुत ही क्षीण होती है क्योंकि यह इच्छाओं व उत्तरदायित्वों के कचरे के नीचे दबी होती हैं। इसे साफ करना शुरू करें और शीघ्र ही आप इसे खोज निकालेंगे। इसका उद्धार करें। मेरा विश्वास करें कि यह इसकी चेष्टा में किये गये हर रत्ती प्रयास के योग्य है क्योंकि यह सीधा आपको अपनी आंतरिक जीवन वृत्ति की ओर ले जाएगा।

और अपनी वृत्तियों के प्रति समर्पण करने का सबसे सुंदर पहलू यह है कि इस राह पर लिया गया प्रत्येक कदम संतोष देता है। यात्रा उतनी ही आनंदमय होती है जितनी कि गंतव्य प्राप्ति।

आपके लिये क्या महत्व रखता है उसका पता लगाएं तथा अपना सर्वस्व उसे दे दें। फिर आपका जीवन पुनः वैसा नहीं होगा। यही आनंद की पुकार है।

शांति।
स्वामी