श्रीमद भागवत पुराण में एक सुंदर वृतांत है। एक अवधूत, अर्थात आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष, के ज्ञान से प्रभावित हो राजा यदु ने उनसे उनके गुरु के विषय में जानना चाहा, जिसके उत्तर में उन्होंने बताया कि उनके अनेकों गुरु थे, जिनमें एक वैशया भी उनकी गुरु थी।
“एक वैशया?” राजा ने घृणा के भाव से पूछा।
“हाँ, क्यों नहीं?” अवधूत बोले। “सुनो, मैंने उससे क्या ज्ञान पाया।” और, उन्होंने पिंगला का वृतांत आरंभ किया।

पुरातन विदेह नगरी में पिंगला एक अति सुंदर गणिका थी। अपने रक्तवर्ण ओष्ठों की ताजगी व अति सुंदर यौवन से भरपूर मनमोहक आकर्षण लिए वह सदा एक असाधारण सुरभि-सुगंध से ओतप्रोत रहती। उसका दर्शन मात्र प्रत्येक हृदय को लालायित कर देता। उंसकी मदमोहक सौंदर्यता ने ही उसे राज गणिका का पद प्रदान किया था, अन्यथा राजा एवं अन्य शक्तिशाली व्यवसायी उसे प्राप्त करने के लिए परस्पर विवादों में ही उलझे रहते। पिंगला को जो राजकीय सम्मान व स्थान प्राप्त था वह सम्पूर्ण प्रदेश में अन्य किसी भी गणिका को प्राप्त न था।

विगत व्यतीत किए अनेकों वर्षों में उसने प्रेम करने की कला में उसी विरक्तता से निपुणता प्राप्त कर ली थी जैसी एक चिकित्सक की अपने रोगी के प्रति होती है। तथापि, जैसा कि प्रेम का मार्ग होता ही है – रहस्यमय व अतर्कसंगत, वह अपना हृदय एक राजकुमार को समर्पित कर बैठी। उस युवा राजकुमार ने एक तय तिथि को उसे प्रणय मिलन का वचन दिया।

उस तय दिन पिंगला ने किसी न किसी बहाने सभी आने वालों को लौटा दिया। उसने स्वयं को एक विलासमय सौन्दर्य-स्नान का आनंद प्रदान किया, विभिन्न सुगंधियुक्त द्रव्यों, जड़ीबूटियों व प्रसाधनों द्वारा अपना रूप संवारा, अति सतर्कतापूर्वक अपने केश सुगंधित मोगरा व चमेली की कलियों से सजाये। स्वर्ण, माणिक, हीरा जवाहरात जटित सुंदर आभूषणों से उसका मस्तक, कर्ण, ग्रीवा, कलाई इत्यादि अंग-प्रत्यंग विभूषित था। उस दिन वह किसी महारानी को भी मात दे रही थी।

इस प्रकार सर्व भांति से सुसज्जित हो वह अति उत्सुकता पूर्वक अपने राजकुमार की प्रतीक्षा करने लगी, उंसके आलिंगन एवं सामीप्य की तृष्णा से व्याकुल। अपराहन का समय संध्या में बदल रहा था किन्तु राजकुमार नहीं पहुंचा। इस बीच ऐसे बहुत से लोग जो उसके सामीप्य के इच्छुक थे, उन सब को लौटा दिया गया। वह तो केवल मात्र एक व्यक्ति से ही मिलना चाहती थी। प्रेम एवं समर्पण के भावों ने उसके हृदय की अन्य सभी कामनाओं को पूर्णत: आच्छादित कर दिया था और वह केवल राजकुमार की ही प्रणयाकांशी थी।

हर कुछ क्षण में उसकी पायल तब तब झनक उठती जब जब वह द्वार की ओर यह सोच कर दौड़ पड़ती कि संभवतः अब राजकुमार ही पधारे हैं, अथवा तो कहीं असावधानी से द्वारपालों ने उसे बाहर ही तो नहीं रोक दिया, और इसी के साथ उसके रूप की सुंदर आभा चारों ओर व्याप्त जाती। वह सेवकों को डांटती व उन्हें और अधिक सतर्क रहने का आदेश देती। अपनी अट्टालिका से प्रत्येक आते जाते रथ एवं पालकी को वह अत्यंत आशापूर्वक निहारती व मन ही मन सोचती कि संभवतः इसी में उसका राजकुमार सवार होगा। उसकी प्रमुख सहायिकाएँ भी अपनी स्वामिनी को इतना व्यग्र देख अचंभित थीं। अपना मुखमण्डल शीतल, तरोताजा व लालिमापूर्ण बनाए रखने हेतु उसने उस दिन भोजन भी ग्रहण नहीं किया और मात्र पान ही चबाती रही।

संध्या का समय रात्रि में परिवर्तित होने लगा व अंधकार और गहन होता चला गया। पिंगला की भोजन की क्षुधा मानो मृत हो गई, और प्रत्येक बीतते पल के साथ उसकी व्यग्रता बढ्ने लगी। आकाश में यत्र तत्र तारागण टिमटिमा रहे थे। कुछ समय और बीता, अब कुछ और तारों के साथ चंद्रमा भी विराज चुके थे। कीट-पतंग किट किट कर रहे थे व यदा कदा चकोर अपनी गहरी लंबी ध्वनि से अपने साथी को आकर्षित करने का यत्न कर रहा था। पिंगला के हृदय में प्रतीक्षा एवं प्रेम पूर्ववत जागृत थे किन्तु राजकुमार के आगमन का कहीं भी कोई चिह्न दृश्यमान न था।

सम्पूर्ण रात्रि पिंगला जागती रही, उसके नेत्र बोझिल हो गए। उसने अनगणित बार अपने वस्त्राभूषण इत्यादि व्यवस्थित किए, अनेकों बार स्वयं को दर्पण में निहारा एवं सौन्दर्य प्रसाधनों से अपना मुख संवारा, इत्र आदि छिड़के। यह सब इसलिए कि राजकुमार के आगमन के क्षण वह पूर्णत: नवीन व परिपूर्ण दृष्टिगोचर हो। किन्तु, राजकुमार नहीं आया। उसकी वेणु के कोमल पुष्प-कलियाँ मुरझाने को थे और बेला-चमेली के श्वेत सुमन अब भूरे हो चले थे।

भोर से कुछ क्षण पूर्व, जब अन्य लोग रात्रि शयनोपरांत उठने को थे, पिंगला भी एक गहन बोध लिए, अपने अज्ञान से बाहर, एक जागृत अवस्था में आ गई।

अवधूत राजा को बताते हैं –

न ह्य अङ्गाजातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति ।
यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप ।। 
(श्रीमद भागवत पुराण, ११.८.२९)

हे राजन! जिस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान से अछूता मनुष्य अनेकों सांसारिक वस्तुओं के प्रति अपने झूठे स्वामित्व को छोड़ने की इच्छा कभी नहीं रखता, उसी प्रकार जिस व्यक्ति में वैराग्य भाव नहीं उपजा होता वह कभी भी देह के प्रति आसक्ति के त्याग की कामना नहीं करता।

किन्तु पिंगला उस दिन अपने असत दैहिक अस्तित्व से ऊपर उठ गई। उसने असीम वैराग्य, विरक्ति एवं आनंद का अनुभव किया। उसे यह जागृति आ गई कि वह पहले से ही स्वयं में परिपूर्ण है, उसे स्वयं को पूर्ण बनाने हेतु किसी भी पुरुष की आवश्यकता नहीं। कि, ऐसा कोई जिसे वास्तव में प्रेम करना चाहिए व कोई ऐसा जिसके लिए उसे दिन रात प्रतीक्षा में ही व्यतीत न करने पड़ें, कोई जो उसका कभी भी त्याग न करे, वह तो पहले से ही उसके अंतर में विराजमान है – ईश्वर, परमात्मा।

श्रीमद भागवत में पिंगला का वृतांत इस प्रकार वर्णित है –

पिङ्गलोवाच
अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मन: ।
या कान्ताद असत: कामं कामये येन बालिशा ।।३०।।

सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय । 
अकामदं दु:खभयाधिशोक-मोहप्रदं तुच्छमहं भजेग्ज्ञा ।।३१।।

अहो मयात्मा परितापितो वृथा साङ्केत्यवृत्त्यातिविगर्ह्यवार्तया । 
स्त्रैणान नाराद्यार्थतृषोग्नुशोच्यात् क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती ।।३२।।

यद अस्थिभिर्निर्मितवंशवंस्यस्थूणं त्वचा रोमनखै: पिनद्धम् । 
क्षरन्नवद्वारमगारमेतद् विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या ।।३३।।

विदेहानां पुरे ह्य अस्मिन्न अहमेकैव मूढधी: ।
यान्यमिच्छन्ति असत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात् ।।३४।।

पिंगला बोली - देखो न, मैं कितने गहन मिथ्या भ्रम से भरी हूँ! क्योंकि मैं अपने मन को वश में नहीं रख सकती, एक मूर्ख की भांति मैं एक तुच्छ व्यक्ति से लोलुपता पूर्ण लालसा रख रही हूँ। ।।३०।।

मैं इतनी अज्ञानी हूँ कि मैंने उस सर्वेश्वर की सेवा त्याग दी जो सदा-सर्वदा हमारे अन्तःकरण में विद्यमान है व वास्तव में हमारा प्रेमी है। वह सर्वप्रिय इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी ही सच्चे प्रेम एवं आनंद का दाता व समृद्धिमूलक है। हालांकि वह मेरे हृदय में ही है, तथापि मैंने उसे पूर्ण रूप से तिरस्कृत किया हुआ है। उसके स्थान पर मैंने अज्ञानता वश ऐसे क्षुद्र पुरुषों की सेवा की जो कभी भी मेरी वास्तविक अभिलाषाओं को संतुष्ट नहीं कर सकते और जो मेरे लिए केवल अप्रसन्नता, भय, बेचैनी, विलाप एवं भ्रम का हेतु बने। ।।३१।।

अहो ! मैंने अपनी आत्मा को बिना किसी लाभ के ही इतना कष्ट पहुंचाया। मैंने अपनी देह उन लोभी, लम्प्ट व्यक्तियों के समक्ष प्रस्तुत कर दी जो स्वयं दया के पात्र हैं। ये मेरी कैसी विकट अज्ञानता है कि मैंने देह से धन प्राप्ति की कामना की। ।।३२।।

यह स्थूल देह तो एक भवन के समान है जिसमें मैं आत्मा निवास कर रही हूँ। वह अस्थियाँ जिनसे मेरा मेरुदंड, वक्ष की हड्डियाँ, भुजाएँ व पाँव बने हैं वे उस भवन के शहतीर व स्तम्भ हैं, और यह सम्पूर्ण भवन जो मल-मूत्र विष्ठा से भरा है, वह त्वचा, केश, नखों से ढका हुआ है। इस भवन के नौ प्रवेश द्वार निरंतर दुर्गंधयुक्त पदार्थ विसर्जित करते रहते हैं। मुझे छोड़ कर ऐसी और कौन सी स्त्री इतनी मूर्ख होगी जो स्वयं को इस स्थूल देह के प्रति पूर्ण समर्पित कर देगी, इस विचार से कि इस साधन द्वारा उसे सुख व प्रेम प्राप्त होगा? ।।३३।।

वास्तव में इस सम्पूर्ण विदेह नगरी में केवल मैं ही पूर्ण रूप से मूर्ख हूँ। मैंने उस परम सत्ता का निरादर किया जो हमें सर्वस्व प्रदान करती है, हमारा मूलभूत आत्मिक स्वरूप भी, और उसके स्थान पर मैंने अनेकों पुरुषों के साथ भोग व इंद्रिय सुखों की कामना की। ।।३४।।

(श्री मदभागवत, श्रीला प्रभुपाद का अनुवाद, ११.८.३०-३४)

मुझे नहीं पता कि मेरे पास अभी और कहने को कुछ है या नहीं, पिंगला की कथा स्वयं में ही एक संदेश है।

कहीं न कहीं, यह केवल उसकी ही कथा नहीं, अपितु हर उस मनुष्य की कथा भी है जिसने कभी भी किसी से प्रेम किया है व प्रतिदान में प्रेम की कामना रखी है। कई हजार लोगों से मुलाकात के उपरांत मैंने यह देखा कि दु:ख का सबसे सामान्य कारण लोगों द्वारा अपने सम्बन्धों से अपेक्षाएँ रखना नहीं, वरन प्रायः वह संबंध ही एक कारण है। सभी सांसरिक सम्बन्धों में संघर्ष होना अनिवार्य है, मुख्यतः इसलिए कि हम चाहते हैं कि सामने वाला हमें संपूर्णता का रसास्वादन दे (और दूसरा भी आपसे यही अपेक्षा रख रहा है) । इतना कहने के पश्चात, मैं यह संकेत नहीं दे रहा कि संबंध बुरे होते हैं अथवा कि आपको किसी संबंध में पड़ना ही नहीं चाहिए। भले कुछ भी हो, हमारी प्रसन्नता का बहुत बड़ा भाग हमारे व्यक्तिगत एवं सामाजिक आदान-प्रदान की गुणवत्ता पर ही निर्भर होता है। तथापि सत्य का मूलस्वरूप तब भी यही है कि यदि हमें यह नहीं पता की स्वयं को कैसे प्रसन्न रखा जाये, तो अन्य कोई कभी भी यह कार्य हमारे लिए करने में समर्थ नहीं होगा।

कोई अन्य आपको केवल कुछ थोड़ा ही प्रदान कर सकता है। अंततः आपकी प्रसन्नता आपके द्वारा किए निष्काम कर्मों पर ही निर्भर है और साथ ही इस पर कि आप स्वयं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। अपने किसी प्रिय प्रेमीजन के लिए कुछ करना सदा निष्काम नहीं होता। स्वयं के लिए एक घड़ी के स्थान पर अपनी पत्नी के लिए कंगन खरीदना वास्तव में एक अच्छा एवं विचारशील कृत्य है, किन्तु आवश्यक नहीं कि यह निष्काम भाव से ही हो, यदि आप समझ पाएँ कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। ऐसे संबंध में आपका प्रचुर मात्रा में भावनात्मक निवेश हुआ होता है। सर्वोत्कृष्ट निष्कामता तब होती है जब आप, न्यूनतम अथवा पूर्णत:, बिना किसी भी अपेक्षा के कोई कर्म करते हैं, संभवतः जब आप उसे बिना किसी भावनात्मक अथवा अन्य छुपे हुए स्वार्थ से रहित हो करते हैं।

जीवन में संपूर्णता अनुभव कर पाना, हर हाल में, मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है। किसी दूसरे पर निर्भर रह कर कौन आज तक प्रसन्नता का सिंधु खोज पाया है? हमारे अंतर में वह साहस एवं ज्ञान होना चाहिए जो हमें धर्म के मार्ग पर आत्म-संतुष्टि एवं कृतज्ञता के भाव के साथ प्रशस्त करे, न कि हम अपनी प्रसन्नता के लिए सदा दूसरों पर ही आश्रित रहें।

यदि पिंगला की प्रसन्नता उसके राजकुमार के आगमन व इस पर निर्भर रहती कि कितने गहन भाव से वह उसका ध्यान रख पाता है, उसे अपनाता व प्रेम कर पाता है, तो उसे वास्तविक व स्थायी प्रसन्नता का अनुभव कभी भी न हो पाता, चूंकि प्रेम में कुछ चाहना एवं भावनाओं की प्रबलता ये सब अनित्य व चलायमान है। और साथ ही, पहले स्वयं सम्पूर्ण हुए बिना किसी अन्य को प्रेम कर पाना संभव नहीं । और, संपूर्णता का भाव एक अन्तःकरण का अनुभव है । अन्य हमें उसका हल्का सा भान तो करवा सकते हैं किन्तु अंततः, आपके स्वयं के चरित्र एवं अस्तित्व की गहराई ही यह निर्धारित कर सकती है कि आप कितने संतृप्त हैं।

आप किसी अन्य से जो कुछ भी चाहते हैं, प्रथम वह स्वयं को प्रदान करना सीखें। प्रेम में निःस्वार्थ होने का अभिप्राय यह है कि अन्य व्यक्ति को उस प्रकार से प्रेम किया जाये जिस प्रकार से वह प्रेम पाना चाहता है। स्वयं से आरंभ करें। उत्तरदायित्व लें। तब आप स्वयं को किसी ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा में रत नहीं पाएंगे कि वह आपके हृदय पटल पर दस्तक देने आए । बल्कि तब आप यह जान पाएंगे कि आपका हृदय तो इस नभ की भांति अति विशाल है, जिसके कोई द्वार नहीं, इतना विस्तृत कि वहाँ हर प्राणी के लिए पर्याप्त स्थान है।

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब तक आप पिंगला के आत्मबोध के स्तर तक नहीं पहुँच पाते, तब तक यदि आप किसी संबंध में हैं तो उसे ठीक प्रकार से निभाया कैसे जाये? यह आगामी लेख में।

और, एक अंतिम शब्द : आप अपनी ऊर्जा एवं प्रेरणा सदा वहाँ से प्राप्त करते हैं जो आपके जीवन का केंद्र बिन्दु होता है। प्रेम में आप वही हो जाते हैं जिससे आप प्रेम करते हैं। यदि वह एक भौतिकतावादी प्राणी है तो आप पाएंगे कि आप भी कुछ और भौतिक होते जा रहे हैं। यदि वह एक आध्यात्मिक व्यक्ति है तो आप भी एक शांत व्यक्ति कि रूप में उभरेंगे। यदि वह बेचैन, आधीर व आत्मरतिक प्रकार का है तो आप स्वयं भी बेचैन व चिंतित ही रहेंगे। यदि आपके जीवन का केंद्र बिन्दु सौंदर्य, ईश्वर, दिव्यता, करुणा एवं ऐसा ही कुछ है तो आप उसी का प्रतिरूप, उसी की अभिव्यक्ति हो जाएंगे।

कृपया ध्यानपूर्वक चयन करें।

शांति।
स्वामी