कुछ सप्ताह पूर्व मैंने इस विषय पर लिखा की सत्य बताते समय किस प्रकार सावधानी पूर्वक शब्दों का चयन किया जाये ताकि हम सुनने वाले को आहत न करें। मैंने इस तथ्य पर भी बल दिया कि किस प्रकार एक मत रखने व सत्य बोलने में अति सूक्ष्म भिन्नता होती है। चूंकि हम किसी बात पर भरोसा रखते हैं अथवा किसी विशेष रूप से कुछ करते हैं और कोई दूसरा व्यक्ति वैसा नहीं करता, ऐसे में इसका यह अभिप्राय नहीं कि अपनी राय बता कर अथवा निंदा करके हम सत्य बोल रहे हैं। दोनों के अंतर को जानें।

बहुत से लोगों ने पलट कर लिखा कि कभी कभी सामाजिक, व्यावसायिक अथवा व्यक्तिगत परिवेश में हमें कोई मत देना पड़ता है। कभी कभी हमें विरोधी तथ्य प्रस्तुत करने पड़ते हैं। क्या किया जाये जब सामने वाले व्यक्ति को कष्ट पहुंचाना अपरिहार्य हो? संक्षेप में कहें तो सकारात्मक आलोचना किस प्रकार की जाये?

मैं यह पूर्णत: समझ पा रहा हूँ कि आपका क्या अभिप्राय है। हम में से ऐसा कौन होगा जिसने टेढ़े लोगों को न झेला हो! तथापि, मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है कि हम एक स्नेह भरे व सकारात्मक ढंग से भी सत्य-कथन अथवा अपनी सोच बता सकते हैं। कुछ समय पहले मैंने अजन ब्रहम (Ajahn Brahm) की पुस्तक ‘डोंट वरी, बी ग्रंपी’ (Don’t Worry, Be Grumpy) पढ़ी। उसने विरोधी मत प्रस्तुत करने के एक शानदार ढंग को विस्तार से वर्णित किया, जिसे उसने अति उपयुक्त ‘सैंडविच-विधि’ की उपमा दी –

पहले उन लोगों की प्रशंसा करें जिनकी आप आलोचना करना चाहते हैं। यह सब कहें अवश्य, किन्तु ईमानदारी पूर्वक। प्रशंसा करने का उद्देश्य है कि हम यह संस्थापित करना चाहते हैं कि हम उनका आदर करते हैं, उनके योगदान का मान करते हैं और हम उन्हें नीचा नहीं दिखा रहे।

प्रशंसा द्वारा लोगों का ध्यान सुनने की ओर आकर्षित करने का कार्य भी हो जाता है। हम इस ओर बहुत कम ध्यान देते हैं कि लोग हमें क्या कह रहे हैं, वरन उनकी बातों के प्रति हमारे जो विचार हैं, हम वह सुनना अधिक श्रेयस्कर मानते हैं। प्रशंसा वह चुग्गा है जो हमें हमारे अंतर के पूर्णत: सुरक्षित एवं संरक्षित कक्ष से बाहर आने को लालायित करता है ताकि हम जो कुछ भी कहा जा रहा है, उसे पूरा सुन सकें। हमें प्रशंसा सुनना बहुत भाता है, इसलिए हमारे कान कुछ और सराहना सुनने के लिए और अधिक खुलने लगते हैं।

उस समय हम उन्हें आलोचना का कर्कश बाण मारते हैं, कुछ मिठास में रूपांतरित करके ही – “…… किन्तु…….” और वह फटकार उन खुले कानों से होते हुए सीधा अंदर तक पहुँच जाती है।

अंत में हम प्रशंसा की एक और मोटी परत ऊपर बिछा देते हैं, इस तथ्य को सुदृढ़ करते हुए कि हम उन्हें एक व्यक्ति के रूप में बहिष्कृत नहीं कर रहे, केवल उनमें विद्यमान इतने सारे सद्गुणों, जिनका कि हमने अभी अभी वर्णन किया, के साथ साथ एक या दो त्रुटियों को भी बता रहे हैं।

परिणामतः, दोषी व्यक्ति, आलोचना को बिना किसी दुर्भावना के, स्वीकार करता है; हम मैनेजर की भूमिका में अपने दायित्व का निर्वाहन बिना कोई कड़वाहट छोड़े सम्पूर्ण करते हैं, और समस्या का भी निपटारा हो जाता है।

प्रशंसा का प्रथम दौर सैंडविच की ऊपर वाली तह है, और प्रशंसा की अंतिम परत नीचे वाली ब्रेड है। आलोचना बीच में रखा खाद्य है। अतः इसे “सैंडविच विधि” कहा गया है।

सैंडविच विधि कोई चतुराईपूर्ण रीति नहीं, न ही यह अपने शब्दों के उपयोग की कोई चालकीपूर्ण शैली है। वरन, यह कुछ महान सकारात्मक तथ्य समेटे हुए है। यह विधि आपको दूसरे व्यक्ति की अच्छाइयों पर सोच-विचार करने को बाध्य करती है। यह आपको उनके द्वारा किए गए उपयोगी कार्यों पर पहले कुछ विचार करने की दिशा प्रदान करती है, इससे पूर्व कि आप उनकी त्रुटियों को लेकर बुरा अथवा नकारात्मक महसूस करें। यह आपको तथ्यों को एक उपयुक्त परिपेक्ष्य से देखने में सहायक होती है।

यदि आपके पास दूसरों से संबन्धित, कहने के लिए, केवल नकारात्मक तथ्य ही हैं तो सावधानी बरतें। संभावना इस बात की है कि जो तथ्य आपके पास हैं वह आलोचना न होकर (और, सकारात्मक आलोचना तो कदापि नहीं) आपकी कुंठा हो जिसे आप बाहर उढेल रहे हों। ऐसी कुंठित अभिव्यक्ति कुछ बेहतर करने की अपेक्षा हानि अधिक करेगी। अंततः आप स्वयं को हिंसात्मक विचारों अथवा बातों में घिरा पाएंगे। एक आध्यात्मिक व्यक्ति पर ये दोनों ही शोभा नहीं देते। किसी भी स्थिति में, एक संरक्षित परामर्श, विशेष रूप से बिन-मांगा, प्रायः, सदा ही अस्वीकार कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, दूसरे व्यक्ति के पास प्रायः किसी काम को अपनी तरह से करने के लिए अपने ही कारण होते हैं।

एक आई टी कंपनी में, एक सामूहिक रात्रि-भोज के दौरान किसी बने-ठने, स्मार्ट दिखने वाले प्रोग्रामर ने अपने एक साथी से, जिसने भोजन करने का कांटा गलत हाथ में पकड़ा हुआ था, कहा, “क्षमा करें, किन्तु मैं आपसे कहना चाह रहा था कि छुरी को दायें हाथ में और कांटे को बाएँ हाथ से पकड़ा जाता है।”
“अच्छा, तो ऐसे में क्या सही होगा यदि मैं खब्बू (बायाँ हाथ उपयोग करने वाला) हुआ तो?”
उसके सहयोगी ने उत्तर दिया, और पुनः अपना भोजन खाने में व्यस्त हो गया। यह घटना 17 वर्ष पूर्व सिडनी में घटी, और मैं ही वह प्रोग्रामर था जिसने अपनी राय प्रस्तुत की थी। मैंने अपनी अगली ग्रास के साथ साथ अपने कहे शब्दों को भी मानो धीरे धीरे चबा लिया, और जीवन-पर्यंत के लिए एक सबक लिया – कभी बिन-मांगी सलाह न दें।

एक दिन कार्य-समाप्ति के पश्चात, राजकीय नाई ने राजा से कहा, “महाराज, आपकी दाढ़ी सफ़ेद होनी आरंभ हो चुकी है।”
क्रोधित व रुष्ट राजा ने निर्देश दिया कि नाई को एक वर्ष के लिए कारावास में डाल दिया जाये। उसने अपने एक दरबारी से पूछा कि क्या वास्तव में उसकी दाढ़ी में सफ़ेद बाल हैं!
“नहीं, जहाँपनाह!, शायद एक भी नहीं” दरबारी भयभीत हो कर बोला।
“शायद” से तुम्हारा क्या तात्पर्य है?” राजा चिल्लाया, और उसे दो वर्ष के कारावास की सजा सुना दी।
फिर वह दूसरे दरबारी की ओर मुड़ा और पूछा, “क्या तुम्हें मेरी दाढ़ी में कोई सफ़ेद बाल दिखता है?”
“सफ़ेद?”, दरबारी अपने हाथ ऊपर उठाते हुए बोला, मानो वह दुआ कर रह हो, “आपकी सुंदर, विलक्षण दाढ़ी तो काले से काले कोयले से भी अधिक काली है जहाँपनाह!”
“झूठ, बिलकुल झूठ”, राजा चिल्लाया। “सिपाहियो, इस आदमी की पीठ पर दस कोढ़े मारो और इसे तीन वर्ष के लिए कारावास में डाल दो”।
अंततः, वह नसरुदीन की ओर मुड़ा और बोला, “मुल्ला, मेरी दाढ़ी का क्या रंग है?”
“जहाँपनाह,” नसरूदीन शांत स्वर में बोला, “मुझे वर्णांधता (कलर ब्लाईंडनेस) का रोग है, मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ”।

जैसा कि कहा जाता है कि चूंकि हमारे पास बोलने के लिए कुछ है, इसका यह अभिप्राय नहीं कि हमें वह बोलना ही चाहिए। और, चूंकि हम वह बोलने में समर्थ हैं, इसका अभिप्राय यह नहीं कि हमें वह सब कुछ पूरा ही बोल देना चाहिए। यदि आप अपने शब्दों को ले कर सचेत हैं, तो आप संभवतः दूसरे को आहत नहीं करेंगे। और, यदि आप दूसरों को आहत नहीं करते तो आपके संबंध कटु नहीं होंगे। यह बिलकुल साधारण सा तथ्य है।

द्वि-अर्थी प्रशंसा (वाह, इस पौशाक में तो आप मोटी नहीं दिखती!); व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी (मुझे तुम पर ‘भरोसा’ है, तुम यह काम कर लोगे); संरक्षित समानुभूति (मैंने तुम्हें यह बताया था…); दुराग्रही शब्द (तुम यह पूर्णत: गलत कर रहे हो); अकारण दी गयी राय (यदि तुमने किसी दूसरे रूप में जिया होता तो तुम अधिक सफल होते, इत्यादि), ऐसे वाक्य भले किसी भी स्वर-शैली में बोले जाएँ, सदा दूसरे को नीचा दिखाने वाले ही होते हैं। कोई भी श्रोता ऐसे शब्दों का स्वागत नहीं करेगा। क्या आप करेंगे, यदि सुनने वाले के स्थान पर आप हों? संभवतः नहीं।

हम अपने चारों ओर जितने भी मुसकुराते हुए चेहरे देखते है, कौन जाने वे अपने व्यक्तिगत जीवन में, दिन-प्रतिदिन, किस-किस प्रकार की परिस्थितियों से जूझ रहे होंगे। हर किसी को मन में कुछ करुणामयी, प्रेममयी, सुहृदयता एवं समानुभूति रखनी ही चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि दूसरे की हर त्रुटि की ओर संकेत किया ही जाये। कभी कभी हम उसकी उपेक्षा भी तो कर सकते हैं। भले कुछ भी हो, यदि आपके पास कुछ अच्छा बोलने को नहीं है तो शायद आप चुप रह सकते हैं, तटस्थ रह सकते हैं।

किसी को गरमा-गर्म, मिर्ची वाली पैटी परोसने से पूर्व ब्रैड के बढ़िया टुकड़ों व कुछ सलाद के साथ उसे सजा लें, भलमनसाहत की मीठी चटनी व अच्छेपन का जायकेदार मसाला छिड़क लें। सामने वाले के लिए आपके सैंडविच को पचा पाना कुछ आसान कर दें। और, कुछ लाभकारी देखना व बोलना भी कभी न भूलें। यही सब तो एक बढ़िया सा बदलाव लाता है। और हम में से हर कोई यहाँ कुछ बदलाव लाने हेतु ही है। स्वयं के लिए, दूसरों के लिए, इस जगत के लिए। कृपया यह सब शालीनतापूर्वक करें। करुणापूर्वक। सजगता के साथ।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - The Art of Criticism