हमारा मन आलोचना को अतिक्रमण के रूप में देखता है। यही सत्य है। विशेषकर जब दूसरी ओर से नकारात्मक प्रतिक्रिया अवांछित हो। प्रायः किसी भी रिश्ते में शत्रुता का बीज तब अंकुरित होता है जब आलोचना, जो अनिवार्य है, या तो व्यक्त की जाती है या निर्दयता से परिष्कृत की जाती है। तत्पश्चात दूसरे व्यक्ति के सार्थक व उपयोगी शब्दों को भी पक्षपातपूर्ण राय के रूप में अस्वीकार कर दिया जाता है। “आलोचना भले ही अनुकूल ना हो, परंतु यह आवश्यक है। यह मानव शरीर में कष्ट के रूप में कार्य करती है। यह हमारा ध्यान अस्वास्थ्यकर स्थिति पर आकर्षित करती है।” विंस्टन चर्चिल के ये शब्द संक्षेप में सुंदर ढंग से बताते हैं कि आलोचना को किस दृष्टिकोण से देखना चाहिए। फिर भी, आलोचना के लिए तैयार होना एक दुर्लभ गुणवत्ता बनी हुई है जो केवल कुछ ही व्यक्तियों में होती है।

कई बार, मैंने देखा है कि लोग आपसे सच्ची प्रतिपुष्टि की उपेक्षा करते हैं और सच्चे शब्द पर महत्व देते हैं। परंतु जब आप वास्तव में इसे प्रस्तुत करते हैं, तो वे संवेदनशील व रक्षात्मक हो जाते हैं। परंतु, आलोचना हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है और यदि हम सकारात्मक विधि से उसे स्वीकार करें तब हम उससे बहुत कुछ सीख सकते हैं। जो व्यक्ति विवेकपूर्ण रूप से आलोचना का सामना करना सीख जाते हैं उनका संघर्ष कम हो जाता है और वे जहाँ कहीं भी जाते हैं उन्हें अधिक आदर प्राप्त होता है। यद्यपि मैंने इस विषय पर अतीत में लिखा है (यहाँ), आज मुझे अपने विचारों को एक अन्य रूप में साझा करने की अनुमति दें। आलोचना का सामना शांति से करने के लिए प्रस्तुत हैं तीन स्वर्णिम सिद्धांत। अगली बार जब आप अस्वीकृति का सामना करें, जो उचित हो या ना हो, इन सिद्धांतों पर चिंतन करें और आप अधिकतम अविचलित रहेंगे।

क्या यह लाभदायक है?

प्रायः जब हम अपनी आलोचना सुनते हैं, तब अहंकार अपना सर उठाता है और हममें से अधिकतर रक्षात्मक बन जाते हैं बिना यह पूरी तरह से सुनें कि दूसरा व्यक्ति क्या कहना चाहता है। हम यह समझते हैं कि हमें अपने विषय में पूरी जानकारी है और हमें पता है कि हम क्या कर रहे हैं। और जब कभी हमें इस विषय में चुनौती दी जाती है तब हमारा आत्मविश्वास हिल जाता है और हम घबरा जाते हैं। कुछ व्यक्ति तुरंत आक्रामक प्रतिक्रिया करते हैं और कुछ पीछे हट जाते हैं। परंतु उत्तम यह होगा कि आप स्वयं से यह प्रश्न पूछें: क्या यह लाभदायक है? जब दूसरों की आलोचना या सलाह, जो यद्यपि अयाचित या नकारात्मक है, वास्तव में आपके लाभ के लिए है, तब उस पर ध्यान देना बुद्धिमत्ता है। आपको उनकी राय लेकर भावुक अथवा कुपित होने की आवश्यकता नहीं है। केवल उसे सुनें, उस पर चिंतन करें और यह निर्णय करें कि वह योग्य है या नहीं। फिर आप उनके विचारों को स्वीकार या अस्वीकार करने का सचेत चयन कर सकते हैं। इस दृष्टिकोण से आप अहिंसा पूर्वक आलोचना का सामना कर सकते हैं, अप्रसन्नता का अनुभव किए बिना।

क्या यह सत्य है?

जब आलोचना हितकारी या रचनात्मक नहीं होती तब यह आपको आपकी विश्वसनीयता व आपकी प्रतिभा पर एक कठोर हमले के समान प्रतीत होती है। हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण हम नकारात्मक आलोचना से पूर्णतया विरत हो जाते हैं या हिंसक प्रतिक्रिया देते हैं। हम आलोचक को अपना शत्रु मान लेते हैं और उसे नकार देते हैं। परंतु क्या होगा यदि वे वास्तव में सही हैं? और यह दूसरा प्रश्न है जो हमें अपने आप से पूछना चाहिए। क्या यह सत्य है? यदि वे सत्य कह रहे हैं यद्यपि वह अप्रिय व कड़वा हो, उसे क्रुद्ध होकर ठुकराने की जगह हमें शांत होकर उन्हें सुनना चाहिए। दूसरे व्यक्ति का कोई नैतिक दायित्व नहीं है कि वह अपने वक्तव्य को सुसाध्य बनाए। यहाँ तक कि जब उनकी आलोचना हितकारी नहीं प्रतीत होती है, परंतु सत्य है, उस पर चिंतन करना उचित होगा। संभव है यह सारगर्भित विचार है जो हमें अपने कार्यों में श्रेष्ठतर बनने में सहायता कर सकता है।

क्या उनका आशय नेक है?

कभी-कभी उनकी आलोचना न तो सत्य होती है और न ही हितकारी होती है। यह एक पेचीदा स्थिति है और विशेष रूप से कठिन है क्योंकि आप जानते हैं कि उनकी आलोचना सही नहीं हैं। किंतु अपनी शांति बनाए रखने के लिए उनके आशय की जाँच करें। यदि उनके इरादे बुरे नहीं हैं और वे आपके शुभचिंतक हैं, तब आप क्रुद्ध प्रतिक्रिया की जगह करुणा का चयन करें और जाने दें। यह दूसरों को अपना दृष्टिकोण समझाने का समय नहीं है। आंधी पारित होने के बाद आप इस वितर्क को फिर से देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त बस याद रखें कि यदि उनका आशय नेक नहीं तब उनकी आलोचना का वास्तव में कोई मूल्य नहीं। क्यों इसे व्यक्तिगत तिरस्कार के रूप में लें जब हम जानते हैं कि यह सत्य नहीं है? और यदि उनका आशय नेक है तब आलोचना को अपमान के रूप में लेने कि जगह हमें उस दिशा में कार्यरत होना चाहिए।

मौलिक स्तर पर, आलोचना एक हिंसक अभिव्यक्ति है। परंतु फिर भी कई बार हमें प्रतिकूल समीक्षा करनी पड़ सकती है। आप पूछेंगे कि इसे कैसे संबोधित करें? किसी व्यक्ति की निंदा करने और उनकी कमियों को उजागर करने में अंतर है।

उदाहरण के लिए यदि कोई टेनिस खिलाड़ी कड़ी मेहनत के पश्चात भी किसी प्रतियोगिता में सफल नहीं रहा तब हिंसक और अहितकारी आलोचना ऐसी होगी, “तुम कभी नहीं जीतते। तुम्हें क्या हुआ है?”।
रचनात्मक आलोचना होगी, “मुझे लगता है कि आपको अपने बैकहैंड पर कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है। निर्बल बैकहैंड के कारण आज आप कईं अंक हार गए।”
और सकारात्मक प्रतिक्रिया होगी, “आपका फोरहैंड स्ट्रोक आज अभूतपूर्व था। आपके खेल में कुछ सुधारों की आवश्यकता है। परंतु मुझे लगता है कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हमें आप के बैकहैंड पर अधिक अभ्यास करनी चाहिए। उस के कारण आपके प्रतिद्वंद्वी ने १४ अंक बनाए।”

मुल्ला नसरूद्दीन के मित्र को जीवन में पहली बार एक अंतिम संस्कार में उपस्थित होना था। वह क्रिया कर्म संबंधी शिष्टाचार को नहीं जानता था तो सुझाव के लिए उसने मुल्ला से संपर्क किया।
“मुझे शवयात्रा में कहाँ होना चाहिए?” उसने मुल्ला से पूछा। “पीछे, सामने, या किसी और दिशा में?”
मुल्ला ने कहा, “आप कहाँ हैं यह अधिक महत्व नहीं रखता है, जब तक कि आप शवपेटी में नहीं हैं।”

आलोचना का सामना करना इससे कोई भिन्न नहीं। इसका उतना महत्व नहीं कि आप इसे कैसे लेते हैं यदि आप इसे अपने आत्मसम्मान को नष्ट नहीं करने देते। जिस दिन आप आलोचना, जो उचित या अन्यथा हो, उस का प्रतिक्रियाहीन व अहिंसक प्रकार से सामना करना सीख जाएंगे तब आप आनंद के एक नए तट पर पहुँच जाएंगे। प्रतिरोध, संघर्ष और आलोचना तब आपकी शांति को प्रभावित करने में सक्षम नहीं होंगे। आप अपने नये रूप की खोज कर पाएंगे।

शांति।
स्वामी