“मैंने भगवान को एक मोटरसाईकल देने को कहा, किंतु मैं जानता हूँ कि भगवान अपना कार्य इस प्रकार से नहीं करते। अतः, मैंने एक मोटरसाईकल चुरा ली और इसके स्थान पर क्षमा मांग ली।” लेखन हेतु मैं एक अति उत्कृष्ट सॉफ्टवेर उपयोग में लाता हूँ जो पूर्णत: विक्षेप रहित है। उसका नाम है ‘राइट मंकी’। जब भी मैं उसे आरंभ करता हूँ तो मेरी स्क्रीन पर एक उद्धरण आता है (अधिकांशतः व्यंगात्मक)। आज जब मैं आस्था पर कुछ लिखने का विचार कर रहा था तो उपरोक्त पंक्ति मेरी स्क्रीन पर आई।

कुछ समय पूर्व मैंने आस्था पर अपने विचार लिखे थे। मेरा मत सदा से यह रहा है कि श्रद्धा-विश्वास के समक्ष तर्क अथवा औचित्य का कोई स्थान नहीं। यदि आपकी ईश्वर में आस्था है तो आपको यह भी स्वीकार करना चाहिए कि आपको किसी वैज्ञानिक प्रमाण के आधार पर अपनी आस्था की प्रतिरक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं। वे सब जो आपकी आस्था के समर्थक नहीं हैं उन्हें अपने मत पर बने रहने का पूर्ण अधिकार है। महत्त्व इस बात का है कि आपका व्यक्तिगत दृष्टिकोण क्या है। यदि आप शांत एवं आनंदित हैं, यदि अपनी आस्था के रहते आप शुभ कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं, ऐसे में आपको अपनी आस्था अवश्मेव बनाए रखनी चाहिए, उसे छोड़ने का कोई कारण नहीं बनता।

मैं आपको अपनी व्यक्तिगत धारणा बताता हूँ। मुझे ईश्वर पर विश्वास है। मुझे दूसरे शब्दों में कहने दें – मैं ईश्वर को जानता हूँ (चूंकि मैं स्वयं को जानता हूँ; ईश्वर को जानने के लिए स्वयं को जानो)। मैंने अनगिनत बार निर्गुण ईश्वर का अनुभव किया है और मैं आपमें ईश्वर देखता हूँ। मात्र कहने भर को नहीं, मैं वास्तव में ईश्वर को देखता हूँ। किसी रब्बी ने आईंस्टाइन को पत्र लिख कर पूछा कि क्या वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं? उत्तर में आईंस्टाइन ने टेलीग्राम भेजा और लिखा, “मैं स्पिनोज़ा के ईश्वर में विश्वास रखता हूँ जो सर्वव्यापी, सुव्यवस्थित एकता, व तालमेल में अपना रूप दिखाता है, न कि उस ईश्वर में जो मनुष्य जाति के भाग्य एवं कार्यों से स्वयं को संबंधित रखता है।” यदि आप परिचित नहीं, बारूच स्पिनोज़ा (१६३२-१६७७), एक डच मूल के दार्शनिक विचारक थे (जी हाँ, केवल मेधावी इंजीनियर ही नहीं, नेदरलैंड देश में विचारक भी हुए हैं)। उस समय में, इस अपरंपरागत, स्वतंत्र विचारक का दृष्टिकोण अतिक्रांतिकारी था। उनका दर्शन विचारोत्तेजक था, व वेदांतिक भी। आपकी इच्छा हो तो उनके विषय में पढ़ें। तो, आस्था के संबंध में वह हमें कहाँ छोड़ते हैं?

मेरे लिए आस्था एक मनोभाव है; यह एक भावना है। जिस प्रकार आप प्रेम में पड़ते हैं व पूर्णत: समर्पित हो जाते हैं; व आप पाते हैं कि आप उस व्यक्ति के लिए कुछ भी कर गुज़रने को सदा तत्पर रहते हैं जिसे आप प्रेम करते हैं – आस्था के साथ भी ऐसा ही है। आस्था प्रेम है। जब आपमें आस्था है तो आप भविष्य की सभी चिंताओं को छोड़ देते हैं, आप अपने अतीत की ग्लानि को छोड़ देते हैं, चूंकि आपने ईश्वरीय-इच्छा के सम्मुख स्वयं को समर्पित कर दिया है। आप एक भद्रता व कर्मशीलता से भरपूर जीवन जीने के प्रति दृढ़ता से प्रतिबद्ध रहते हैं। किंतु आप यह भी पहचान पाते हैं कि ब्रह्मांड के इस विस्तृत आयाम में अन्य कई गुना विशाल शक्तियाँ भी क्रियाशील हैं, और उनके साथ समन्वय भाव बना कर आगे बढ़ने में ही आपका कल्याण निहित है।

आपके अंतःकरण में साहस, उत्साह, कठिन परिश्रम करने की उद्धता, प्रत्येक कार्य को सर्वोत्कृष्ट रूप से करने का उद्यम, व लोक सेवा की योग्यता का विकास-विस्तार होने लगता है। ऐसे में जीवन अति सुंदर एवं हर वस्तु अनमोल प्रतीत होती है, चूंकि वास्तव में ऐसा ही है। और तो और, हमारे दुख-दर्द भी अनमोल हैं। यह हमें बल प्रदान करते हैं; हमें स्वयं को समझने में सहायक होते हैं। यह अमूल्य हैं, चूंकि आप जीवन का मूल्य जानने लगते हैं, यह आपको स्वयं के निकट लाते हैं, आपके वास्तविक स्वरूप के निकट। यहाँ मुझे जपजी साहिब के कुछ अतिसुंदर, गहन पद्य स्मरण हो आए हैं – जपजी साहिब गुरु नानक देव जी की रचना है जो सिखों के दस आत्मसाक्षात्कारी गुरुओं में प्रथम गुरु थे। ग्यारहवें गुरु स्वयं गुरु ग्रंथ साहिब (पवित्र ग्रंथ) हैं जहां आप यह चौपाइयाँ पढ़ सकते हैं।

नानक पातशाही पातशाहू।
अमुल गुण अमुल व्यापार,
अमुल व्यापारी-ए अमुल भंडार। 
अमुल आवही अमुल लई जाही, 
अमुल भा-ए अमुला समा ही।
अमुल धर्म अमुल दीबान,  
अमुल तुल अमुल परवान।
अमुल बख्सीस अमुल नीसान, 
अमुल करम अमुल फरमान। 
अमुलों अमुल आखि-आ ना जा-ए,
आख आख रहे लिव लाये।

ऐ नानक, वह राजाओं का भी राजा है।
उसका लेन-देन और उसके गुण अमूल्य हैं।
उसके साथ लेन-देन रखने वाले और उसकी सम्पदा, सब अमूल्य है। 
जो उसके सम्मुख जाते हैं वे अमूल्य हैं, और जो उससे कुछ प्राप्त करते हैं वे भी अमूल्य हैं। 
उसका प्रेम अमूल्य है और उसकी शरण भी अमूल्य है।
उसका धर्म-नियम अमूल्य है व उसका न्याय अमूल्य है। 
उसकी तुला-तराजू अमूल्य हैं व उसका तौल अमूल्य है।
उसकी कृपा अमूल्य है व उसका प्रतीक-चिन्ह अमूल्य है। 
उसकी दया अमूल्य है और उसके दिये दिव्य-आदेश अमूल्य हैं। 
सब कुछ ऐसा अमूल्य-अनमोल है कि शब्दों में इसका ब्यान करना असंभव है। 
बस निरंतर उसके गुणगान में लगे रहो व साथ ही उसके प्रेम में सराबोर। 
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, महल १, ४.२५-२६)

इसे अपने अंतर में समाहित होने दें। ऐसे देखता हूँ मैं आस्था को, और ऐसे देखता हूँ ईश्वर को। हर वस्तु, हर स्थिति, अनमोल है, अमूल्य है। इस जगत के हर प्राणी की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। निष्काम सेवा से बढ़ कर और कोई आस्था-विश्वास नहीं हो सकती।

एक सज्जन को इंटरव्यू हेतु पहुँचने में विलंब हो रहा था और वे अतिव्यग्रता पूर्वक पार्किंग स्थल पर एक स्थान ढूँढ़ने हेतु चक्कर लगा रहा था।
“हे प्रभु!” वह बोला, “यदि आज आप खाली स्थान ढूँढ़ने में मेरी सहायता कर दें तो मैं सम्पूर्ण जीवन, प्रतिदिन, आपकी आराधना किया करूंगा।”
और, एक चमत्कारिक ढंग से बिलकुल उनके सामने एक पार्किंग हेतु खाली स्थान निकल आता है।
“प्रभु! आप परेशान न हों, मुझे स्थान मिल गया है!” , वह सज्जन बोला।

आस्था कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम किसी २४/७ सुविधा-स्टोर से क्रय कर सकते हैं। यह तो वह हंस है जो केवल शुद्ध जल में ही विचरण किया करता है। वह जानता है कि किस प्रकार से केवल उस मूल-तत्व को ग्रहण करना है, केवल मोती चुगने हैं। जब आपकी आस्था, आपका विश्वास सच्चा हो, जब वह किसी लेन-देन पर आधारित न हो कर, पूर्णत: शुद्ध हो, तब आप प्रकृति के प्रबल माध्यम बन जाते हैं। ऐसे में प्रकृति आपको शक्ति-सामर्थ्य एवं उत्तरदायित्व, दोनों से ओतप्रोत कर देती है; ये दोनों सदा साथ-साथ ही चलते हैं।

ईश्वर से तुच्छ वस्तुएँ मांग कर स्वयं को एक सीमा में न बाँधें। प्रकृति की असीम व्यापकता पर विश्वास रखें। आस्था का अर्थ यह नहीं कि आपके सभी स्वप्न साकार हो उठेंगे। इसका तात्पर्य मात्र यह है कि आप जीवन में प्राप्त प्रत्येक वस्तु, स्थिति को आशीर्वाद के रूप में देख पाते हैं; ईश्वरीय कृपा के रूप में। केवल अपने कर्मों के ऊपर अपना सम्पूर्ण ध्यान लगाएँ, और, अतिशीघ्र आप स्वयं को अपरिमेय, अपरिमित दिव्यता से ओतप्रोत पाएंगे।

आपको यह ज्ञात है कि आपके जन्मदिवस उत्सव पर किस प्रकार आपको अनेकों उपहार प्राप्त होते हैं। आप उन सभी को पसंद नहीं करते, कभी कभी एक ही प्रकार के दो उपहार भी हो जाते हैं। जो कोई आपको वास्तव में भाते हैं, आप उन्हें सदा के लिए अपने साथ रखना चाहते हैं। किंतु, एक अंतराल के बाद वे भी जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं, अथवा तो आप उनसे ऊब जाते हैं। जीवन भी कुछ ऐसा ही है। यह एक उत्सव है। कुछ उपहार आपको पसंद आएंगे व कुछ नहीं, कुछ आप पुनः पुनः पाएंगे। किंतु, कुछ भी सदा रहने वाला नहीं। रह सकता नहीं। कुछ भी इस रूप में नहीं बना कि वह सदा-सर्वदा बना रहे।

इस जगत की नश्वरता को, और इसकी सनातन नश्वरता को स्वीकारना ही आंतरिक शांति की ओर जाने वाला एक निश्चित मार्ग है। या तो सम्पूर्ण समर्पण के भाव से रहें अथवा तो सम्पूर्ण नियंत्रण का प्रयोग करें। यदि आपकी नैया न तो लंगर के सहारे ठहरी है और न ही किसी दिशा-सूचक के आधीन है तो वह मात्र होले होले भटकेगी। वह आपके विचारों, इच्छाओं एवं भावनाओं की दिशा में बढ़ेगी। आज यहाँ, कल वहाँ।

सार्वभौमिक बुद्धिमत्ता, वैयक्तिक बुद्धिमत्ता से अनंत गुना अधिक सूक्ष्म, तीव्र-तीक्ष्ण, सुनियोजित एवं निःस्वार्थ है। यदि आप नाव चलाते चलाते थक चुके हैं तो अपनी नाव का लंगर डाल दीजिये। आस्था रखें।

शांति।
स्वामी