आज से लगभग ६०० वर्ष पूर्व, जिस समय भारतीय समाज का वैचारिक स्तर, बहुत गहराई तक जातिवाद में फँसा हुआ था, तब धन्ना जाट नाम का एक प्रभु भक्त हुआ।

निरक्षर, समर्पित भाव वाला, परिश्रमी धन्ना एक ब्राह्मण के गृह- चाकर के रूप में काम करता था। उसका मालिक समाज का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता था। वह वेद मंत्रों का प्रगाढ़ पंडित, व धार्मिक कर्म-काण्ड की प्रवृतियों में निपुण था। वह वैष्णव ब्राह्मण, श्री कृष्ण का भक्त था। अपनी धार्मिक दिनचर्या के प्रति वह पूर्णतः समर्पित था। गण्डकी नदी से प्राप्त शालिग्राम नामक पाषाण में विराजित श्री कृष्ण-रूप का वह नित्य उपासक था। वैष्णव भक्तों में चिरकाल से यह प्रथा चली आ रही है कि वे शालिग्राम की आराधना कृष्ण रूप में करते हैं।

धन्ना के मन में सदा उस शालिग्राम के प्रति एक नैसर्गिक आकर्षण बना रहता था और वह श्री कृष्ण के शालिग्राम विग्रह की पूजा-अर्चना करने के लिए सदा लालायित रहता। उसने अनेकों बार ब्राह्मण देव से एक शालिग्राम शिला व उसकी पूजा की विधि बताने के लिए अनुनय विनय किया। किंतु ब्राह्मण की दृष्टि में धन्ना मात्र एक साधारण मनुष्य था। जब जब धन्ना अपनी प्रार्थना ब्राह्मण के सम्मुख रखता, वह धन्ना को शालिग्राम की पूजा के लिए अयोग्य व कुपात्र बताता व कहता कि ईश्वर की पूजा-अर्चना का व्यापक विधि विधान होता है, चूँकि धन्ना जाति से ब्राह्मण नहीं है अतः वह यह सब नहीं कर सकता। इस सबसे धन्ना निराश तो हुआ किंतु वह हतोत्साहित बिल्कुल नहीं हुआ।

वह ब्राह्मण देव की चाकरी में ही रहा व जब भी अनुकूल परिस्थिति होती, शालिग्राम पाने की अपनी प्रार्थना वह पुनः प्रस्तुत कर देता। अंततः, उसके मालिक ने विचार किया कि धन्ना को कोई भी अन्य साधारण पाषाण शालिग्राम कह कर देने में कोई हानि नहीं, क्योंकि धन्ना तो उनमें अंतर नहीं कर पाएगा। उसने धन्ना को एक साधारण पत्थर दे दिया। धन्ना ने अपने मालिक का आभार व्यक्त किया व उस पत्थर को वास्तव में शालिग्राम ही माना। उसने अपने मलिक से पूजा-अर्चना की विधि भी जाननी चाही। ब्राह्मण बोला, “इसे नित्य स्नान करवाना व दिन में दो बार भोजन अर्पण करना। संक्षेप में यह कि इसे अपनी ही तरह सजीव मानते हुए, इसका ध्यान ऐसे रखना जैसे अपने प्रभु का रखा जाता है।” धन्ना ने ब्राह्मण के वचनों का संपूर्ण आस्था सहित पालन करना आरंभ किया।

भोजन के समय उसने उस “साधारण पत्थर” को स्नान करवाया, धरती पर एक पुराने किंतु धुले हुए वस्त्र का टुकड़ा बिछा कर उसे प्रतिष्ठित किया। तब उसने अपनी भोजन की गठरी खोली जिसमें चार सूखी चपाती थीं जो मक्का व पालक मिला कर पकाई गई थीं। उसने उन्हें पाषाण के सम्मुख रखा व श्री कृष्ण का संपूर्ण आस्था व उत्साह पूर्वक आह्वान किया। कुछ घड़ियाँ बीतीं किंतु कृष्ण नहीं आए। और कुछ समय बीता, फिर भी श्री कृष्ण का वहाँ कोई चिन्ह नहीं था। धन्ना ने अपनी दृढ़ता को तीव्र करते हुए संकल्प लिया कि जब तक कृष्ण उसका भोजन ग्रहण नहीं करते, तब तक वह भी कुछ नहीं खाएगा। भोजन का समय बीत गया, कृष्ण नहीं आए। धन्ना की भूख व्यग्र हो चुकी थी, किंतु वह अपने संकल्प पर अडिग रहा।

दो घंटे के पश्चात उसका मालिक धन्ना को ढूंढता हुआ वहाँ पहुँचा। पूछने पर धन्ना ने उसे सारा वृतांत कह सुनाया। ब्राह्मण यह सुन कर हँसने लगा व धन्ना को अब तक का सर्वोच्च मूर्ख प्राणी बताने लगा। उसने कहा कि ईश्वर ऐसे भोजन ग्रहण नहीं करते। धन्ना को केवल भोजन अर्पण करके मान लेना है कि प्रभु ने भोजन ग्रहण कर लिया। किंतु धन्ना अविचल रहा व बोला कि जब वह स्वयं सजीव है, उसका भोजन भी वास्तविक है, तब यदि प्रभु ने भोजन वास्तव में ग्रहण किया होता तो कृष्ण को प्रत्यक्ष रूप से वह भोजन खाना चाहिए था। ब्राह्मण धन्ना की बात से क्रोधित होते हुए बोला कि वह उसी समय अपने काम पर लग जाए अन्यथा उसे नौकरी से हटा देगा। धन्ना तो अपने ही विचारों में निमग्न था, उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

धन्ना के नेत्रों से प्रेम व समर्पण का अश्रुपात आरंभ हो गया। वह वहाँ निश्चल बैठा श्री कृष्ण को पुकारने लगा; किन्हीं वैदिक मंत्रों द्वारा नहीं बल्कि अपनी सीधी सादी भाषा में। कई घंटे इसी तरह बीत गये। उसके उदर में शुधा का तीव्रतम वेग विष-बाणों की भाँति कष्ट-कर प्रतीत हो रहा था। उसने अपने संकल्प पर अडिग रहने की ठान ली। उसके संकल्प व प्रभु की कृपा के मध्य मानो एक युद्ध छिड़ गया। भोजन बासी होने लगा। एक के बाद एक, आठ दिन बीत गये। धन्ना मृतप्रायः हो गया, मानो वह अंतिम श्वास ले रहा हो।

अश्रुपात का अथाह सागर, सहस्त्र-कोटि दारूण पुकार, आठ संपूर्ण दिवस व लगभग २०० घंटे का समय बीत जाने के उपरांत – श्री कृष्ण ने धन्ना के सम्मुख अपना स्वरूप प्रकट किया। री कृष्ण, अपने समग्र ऐश्वर्य को धारण किए; अपनी मनमोहक मुस्कान सहित; अंग-प्रत्यंग से विक्षिप्त बना देने वाली सुरभि सुगंध बिखेरते हुए; लाखों कोटि सूर्यों की आभा अपने नेत्र मंडल में समेटे हुए; असंख्यों पूर्णिमा के चाँद की शीतलता व तेजस्वी मुख मंडल लिए, वहाँ, धन्ना के सम्मुख विराजमान थे। उन्होंने वह सूखी चपाती ग्रहण करना आरंभ किया। धन्ना अपलक उन्हें निहारता रहा, किंतु वह अचंभित नहीं हुआ क्योंकि उसकी अगाध निष्ठा व दृढ़ संकल्प के सम्मुख श्री कृष्ण का वास्तव में उसका भोजन ग्रहण करने आना भी निम्न हो गया था।

कृष्ण ने एक चपाती उठाई व खा ली। धन्ना अत्यंत प्रसन्न हुआ। कृष्ण ने अगली चपाती भी खा ली, व एक और उठा ली। ईश्वर स्वयं अपने भक्त की प्रसन्नता व संतुष्टि हेतु अपने साकार स्वरूप में वहाँ विराजमान थे। सम्राटों के सम्राट, अत्यंत ऐश्वर्य पूर्ण जीवन जीने वाले प्रभु आज भूमि पर बैठे अपने भक्त द्वारा अर्पित रूखा सूखा भोजन ग्रहण कर रहे थे। जब कृष्ण तीन चपाती खा चुके व अंतिम चपाती भी उठा ली तो, तिरछी निगाह से देखते हुए, धन्ना ने कृष्ण का हाथ थाम लिया व बोला कि वह भी तो बहुत भूखा है और कम से कम एक चपाती तो उसके लिए भी बचानी चाहिए क्योंकि उसने पूरे आठ दिन से अन्न का एक दाना भी नहीं खाया। अपनी मंद मंद सुमधुर स्मित लिए, श्री कृष्ण ने अपना दिव्य हस्त अपने भक्त के मस्तक पर रख दिया। धन्ना की देह में अरबों, परमानंद में भीगे शल्यो ने एक साथ प्रवेश पा लिया। अनेकों स्वादिष्ट व्यंजनों का वहाँ प्राकट्य हो गया व प्रभु ने स्वयं अपने हाथों से धन्ना को भोजन खिलाया।

संकल्प बल वह अटूट शक्ति है, वह उत्कृष्ट भाव है, जिसका कोई पार नहीं पा सकता। संकल्प जब चेतन मन द्वारा स्वीकार्य हो जाए, तो वह विश्वास बन जाता है। वह विश्वास जब समर्पण का साथ पा ले तो श्रद्धा का उदय होता है। और, मेरी जानकारी में, ऐसा कुछ भी नहीं तो श्रद्धा द्वारा अप्राप्य हो। तथापि, केवल श्रद्धा पर्याप्त नहीं होती। आत्म-साक्षात्कार हेतु श्रद्धा के संग अन्य गुणों का होना भी परम आवश्यक है। इस पर मैं किसी अन्य समय प्रकाश डालूँगा।

इस श्रंखला का अगला लेख संकल्प के अभ्यास पर केंद्रित होगा।

शांति।
स्वामी