एक दिन मैंने स्वामी राघवनंद या रघु स्वामी, जैसा की मैं उन्हें बुलाता हूँ ( अति समर्पित साधकों में से एक, एवं जीवन-ऊर्जा व अनासक्त भाव से परिपूर्ण ) से पूछा कि क्या मैं अपने ब्लॉग पर उनके जीवन का एक प्रसंग साझा कर सकता हूँ; श्रद्धा और अनुग्रह, सरलता और नैतिकता की एक अनुपम गाथा। एक उदार हृदय से, व्यापक मुस्कान बिखेरते हुए, उन्होंने सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी। यदि आपने मेरी जीवनी पढ़ी है तो आप रघु स्वामी को जानते ही हैं। वे पूर्व-आश्रम के प्रदीप ब्रह्मचारी हैं, जिन्होंने मेरे हिमालय प्रवास व ध्यान-साधना के समय मेरा ख्याल रखा।

अनुमानतः 33 वर्ष पूर्व, जब रघु स्वामी मात्र 7 वर्ष के थे, उनके पिता को छ: मास से अपना वेतन प्राप्त नहीं हुआ था। इसका कारण अति सामान्य था – उन्हें एक दूरस्थ स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया था, और यदि वे उस नए स्थान पर जाकर अपना पदभार संभाल लेते तो उन्हें एक लंबे अंतराल तक उनके पुराने कार्यालय में पुनः नहीं बुलाया जाता। नए स्थान पर जाकर कार्यभार संभालने का तात्पर्य था उन्हें एक किराये का घर लेना पड़ता ( जबकि वर्तमान कार्यस्थल में उनके पास अपना निजी निवास था ), बच्चों का विद्यालय बदलना पड़ता, और पूरी गृहस्थी ही हिलानी पड़ती। उनके अल्प सरकारी वेतन को देखते हुए यह सब वित्तीय रूप से पूर्णत: अव्यावहारिक था। अतः हर किसी ने उन्हें यही परामर्श दिया कि वे नए स्थान पर कार्यभार न संभालें, बल्कि स्थानांतरण निरस्त करने हेतु प्रार्थना पत्र कार्यालय में दे दें। उन्होंने इस परामर्श को मान लिया।

किन्तु छ: मास एक लंबा समय होता है, और इस परिवार के पास जो कुछ थोड़ी से बचत राशि थी, वह समाप्त हो गई। बिजली के बिल का भुगतान न कर पाने के कारण, आरंभिक तीन महीनों के दौरान ही बिजली का कनैक्शन काट दिया गया था। मोमबत्ती अथवा लैम्प में तेल के लिए भी पैसे नहीं थे। और तो और, एक दिन ऐसा भी आया कि रसोईघर में खाने या पकाने के लिए अनाज का एक दाना भी न बचा, चावल और नमक भी नहीं। इस परिवार को मालूम नहीं था कि कल सुबह उनके भोजन का प्रबंध कैसे होगा, और उस शाम का भी। भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों ने कोई सहायता न की और उनकी स्थानांतरण निरस्त करने की प्रार्थना को आगे बढ़ाने के लिए और पैसे मांगते रहे। रघु स्वामी के पिता अपनी पत्नी की सोने की बालियाँ व गले की चेन पहले ही गिरवी रख चुके थे ( उनके पास बस यही जेवर थे, एक मंगलसूत्र व नाक की कील छोड़ कर )।

रसोई के खाली बर्तनों को देख, और, दूसरा कोई विकल्प न होने की स्थिति में, उन्होंने नए स्थान पर ही अपना कार्यभार संभालने का मन बनाया, किन्तु वहाँ भी उन्हें कम से कम एक और महीने तक वेतन न मिलता। उस शाम तो कोई चमत्कार ही उनकी थाली में भोजन ला सकता था।

इसी दिन, रविवार, को उन्हें रामचरित मानस के पाठ का आमंत्रण मिला था ( यह एक धार्मिक समारोह होता है जिसमें प्रभु राम की दिव्य लीला का गायन होता है ) । उनकी बड़ी दीदी को कहीं भी जाने में संकोच होता था। और फिर उनके माता पिता भी नहीं जा रहे थे। उन्होंने घर पर ही ठहरने का मन बनाया चूंकि उनके पास पूजा की थाली में भेंट रखने के लिए कुछ भी नहीं था ( कथा-वाचक को कुछ धन अथवा कोई और भेंट दी जाती है )। अंत में 7 साल के रघु स्वामी और उनके 13 वर्षीय भाई ने जाने का निर्णय लिया, क्योंकि जहां तक उनकी स्मृति जाती है रघु स्वामी तब से ही प्रभु राम की भक्ति के प्रति समर्पित थे। और हाँ, वहाँ स्वादिष्ट भोजन का भी तो प्रबंध था।

समारोह स्थल की और जाते हुए जब दोनों मार्ग में सामान्य चाल से, कुछ उत्सुकता से भरे, आगे बढ़ रहे थे तभी स्कूटर पर सवार एक व्यक्ति उनके निकट से गुजरा। कुछ दूर आगे उन्होंने देखा की उसकी जेब से कुछ नीचे गिरा। रघु स्वामी और उनके भाई उस व्यक्ति की ओर दौड़े, किन्तु वह आगे जा चुका था। सड़क पर गिरी वस्तु को देख कर उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं। वह लाल रबड़ चढ़ा नोटों का एक बंडल था। और वह व्यक्ति एक मोड़ से मुड़ कर आँखों से ओझल हो चुका था। फिर भी वे उस सड़क के मोड़ तक भागे किन्तु स्कूटर वाले व्यक्ति का कोई निशान न था।

कहीं भोजन के लिए देरी न हो जाये, इसलिए उन्होंने उस बंडल को जेब में रखा और समारोह स्थल की और भाग लिए। उन्हें वहाँ भोजन में सलाद, चावल, दाल, आलू की रसेदार सब्जी, सीताफल की भाजी, पूरी, आचार, दही, चावल की खीर व हलवा परोसा गया। पेट भर भोजन करने के उपरांत वे घर की छत पर जा पहुंचे ( जहां आसपास कोई नहीं था ), और पैसे गिनने लगे। वह पूरे 1500 रुपये थे।

वे दोनों तत्काल पास की ही किराने की दुकान की ओर सरपट भागे, और उस पैसे से 700 किलो चावल और नमक के 10 पैकेट खरीद लिए। एक छोटे से ठेले से वे सारा समान घर लाये। रघु स्वामी ने बताया कि उन्होंने सोचा कि और कुछ न सही, अब कम से कम कुछ महीने तक वे नमक वाले चावल तो उबाल कर खा पाएंगे। घर में सभी इतने प्रसन्न थे मानो उन्होंने कोई बड़ी लॉटरी जीत ली हो। उनकी माताजी ईश्वर को अपने आंसुओं से धन्यवाद दे रहीं थीं कि उस रात कोई भूखा नहीं सोएगा।

एक सप्ताह के उपरांत, रघु स्वामी और उनकी 10 वर्षीय बहन ने विद्यालय से छुट्टी मारी और दोनों मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सी॰ एम॰ ओ॰) के सम्मुख जा पहुंचे – सी॰एम॰ओ॰ ही वह व्यक्ति थे जो उनके पिताजी का स्थानांतरण निरस्त कर सकते थे। दोनों ने कार्यालय के बाहर उनकी प्रतीक्षा की व जिद्द पकड़ ली कि उनसे भेंट किए बिना वे वहाँ से नहीं जाएँगे। एक सज्जन व्यक्ति ने उन्हें अंदर जाने दिया। वे उन अधिकारी के सम्मुख रो पड़े और रोते हुए अपनी पूरी कहानी ब्यान की। उसी क्षण, सी॰एम॰ओ॰ ने संबन्धित फ़ाइल मँगवाई और उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए, उनके पिता का स्थानांतरण रद्द कर दिया। उन्होंने यह ऑर्डर भी दिया कि दो घंटे के अंदर उनकी लंबित वेतन राशि उन्हें दे दी जाये।

अगले ही दिन उनके पिता ने कार्यालय में अपना पदभार संभाल लिया व शाम को छ: महीने के वेतन के साथ लौटे। रसोईघर की सामाग्री खरीदने, गिरवी रखे गहने वापिस लाने, अथवा बिजली का बकाया भरने से पूर्व, उन्होंने वह सारी धन राशि घर के पूजास्थल पर रखी और प्रार्थना की। तत्पश्चात, उन्होंने रघु स्वामी को बुला कर 1500 रुपये दिये।

“जाओ और यह राशि किसी मंदिर के दान-पात्र में डाल कर आओ,” उन्होंने सजल नेत्रों से कहा। “हमारी आवश्यकता के समय ईश्वर ने हमारी सहयाती की, अब हमें वह राशि लौटनी होगी।”

जब जब मुझे यह प्रसंग स्मरण में आता है, मैं भाव विह्वल हो जाता हूँ। कौन कहता है कि श्रद्धा सहाय नहीं होती? ईश्वर की कृपा बरसने में भले कुछ समय लग जाये, परंतु यह बरसती अवश्यमेव है। हमारी दुनिया में ऐसे बहुत लोग होंगे जो दूसरों को कष्ट व हानि पहुंचाते हों; किन्तु यहाँ कुछ ऐसे सज्जन व्यक्ति भी मौजूद हैं जो दूसरों की मदद हेतु सदा तत्पर रहते हैं। जो व्यक्ति सत्यवादी, धैर्यवान एवं ईमानदार होता है, प्रकृति उसे कभी निराश नहीं करती। ऐसे व्यक्ति के लिए मार्ग निर्माण के कार्य में संपूर्ण ब्रह्मांड कार्यशील हो जाता है। वह आपको उचित समय पर उचित व्यक्ति से मिला देता है।

इस कथा-प्रसंग का उत्कृष्टम भाग है रघु स्वामी के पिता द्वारा धनराशि लौटाना। यह सत्य व नैतिकता का श्रेष्ठतम स्वरूप है, चूंकि यह पूर्ण ईमानदारी है। लिपिबद्ध करने हेतु, ऑक्सफोर्ड शब्दावली के अनुसार, ईमानदारी की परिभाषा प्रस्तुत है – कपट से दूर, सत्यवादी और सच्चा।

एक ऐसा व्यक्ति जो सत्यतापूर्ण जीवन जीता है, कभी भी ईश्वरीय कृपा के कार्यक्षेत्र से बाहर नहीं होता। हो सकता है ऐसे व्यक्ति के जीवन के घटना प्रसंग सदा उसके अनुसार न हों, तथापि, वे उसके प्रतिकूल भी नहीं होंगे। यदि आपकी मंशा, आपके शब्द व आपके कर्म सच्चाई से भरे हैं तो यह मेरा वायदा है कि आप एक दिव्य तेज से परिपूर्ण रहेंगे। आपका एक साधारण दृष्टिपात भी लोगों पर शांति की वर्षा करने में समर्थ होगा।

किसी भी स्थिति में, अपने हृदय को ईर्ष्या, द्वेष और लोभ से जलाने से कहीं उत्तम होता है कि सत्य व करुणा की ज्योति जलायी जाये। यह सभी वेदनाओं को भस्म कर देती है।

परम आनंद की ज्योति, एक निष्कपट प्राणी के हृदय में सर्वाधिक तेजस्वितापूर्वक प्रज्जवलित होती है।

शांति।
स्वामी