मार्क ट्विन ने एक बार कहा था, “ प्रतिदिन सुबह सबसे पहले एक ज़िंदा मेंढक खाएँ और सारे दिन आपके साथ कुछ भी  बुरा नहीं होगा।”

यदि उसने इस प्रकार की बात वास्तव में कही हो तो यह बहस के योग्य है। यदि आप ,जो दृश्यमान हो रहा है उसे त्याग दें तो यह छोटी सी सलाह अमूल्य है।

ब्रायन ट्रेसी ने अपनी पुस्तक में “उस मेंढक को खाओ” इस पुरानी कहावत के बारे में अधिक विस्तार से लिखा है ।

आपका मेंढक आपका सर्वाधिक बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, वह कार्य  जिसे आप अधिकांशतया  टालना चाहते हैं, अथवा  जिसके बारे में आप कुछ नहीं करना चाहते हैं। यह वह कार्य भी है जो आपके जीवन पर महान सकारात्मक प्रभाव डालता है और उसी क्षण परिणाम लाता है।

मेंढक खाने का सर्वप्रथम नियम है” यदि आपको दो मेंढक खाने हैं तो जो सबसे कुरूप है उसे सबसे पहले खाना है।”

यह कहने का अर्थ है कि,यदि आपके सामने दो महत्वपूर्ण कार्य हैं , तो जो कार्य सबसे बड़ा, कठिन और सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उससे शुरुआत करें । स्वयं को तुरंत कार्य आरम्भ करने हेतु अनुशासित करें और किसी अन्य पर जाने से पूर्व जब तक यह पूर्ण न हो जाए टिके रहें।

इसके बारे में ऐसे सोचें कि यह एक परीक्षा है । इसे  व्यक्तिगत चुनौती की भाँति लें । सरल काम से आरम्भ करने के लालच  को रोकें।  हर दिन आपने जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है ; जैसे कि क्या  तत्काल करना है और क्या आप बाद में करेंगे, उसे  स्वयं को निरंतर स्मरण कराते रहें ।

मेंढक खाने का दूसरा नियम है “ यदि आपको पूरा मेंढक खाना है, तो  इसका यह अर्थ नहीं है कि आप बहुत देर तक बैठकर मेंढक को देखते रहें।”

प्रदर्शन और उत्पादकता के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचने की चाभी आपको  हर सुबह सबसे पहले सबसे बड़े कार्य को करने की  आदत बनाना है ।आपको कुछ और करने के पूर्व तथा  बिना इसके बारे में अधिक विचार किए “अपने मेंढक को खाने” की दिनचर्या को विकसित करना होगा।

सभी सफल लोगों के जीवन में सर्वथा महत्वपूर्ण एकमात्र बात यह है कि वे हमेशा अपना दिन एक फलोत्पादक सुबह के साथ करते हैं।वे चाहे कुछ भी हो अपनी दिनचर्या पर दृढ़ रहते हैं। अधिकांश लोग जिनको हम विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न कहा करते हैं, वे सामान्य रूप से कठोर अनुशासन , समर्पण और कठिन परिश्रम का परिणाम होते हैं।जब आप एक सृजनात्मक व्यक्ति जैसे कि एक कवि, एक लेखक या एक चित्रकार की ओर देखते हैं, हो सकता है वह संगीतज्ञ हो या कोई और सफल व्यक्ति हो तो आप यह सोचने लगते हैं कि उनके साथ कुछ विशिष्ट होता है। जैसे  कि  सुबह जब वे जागते हैं तो कोई विशिष्ट प्रतिभा उनके ऊपर कौंध जाती है या अन्य लोक से कुछ उनको प्राप्त होता है। जिसमें भी आप निपुणता हासिल करना चाहते हैं, प्रतिदिन नियमित रूप से उसे थोड़ा समय दें और आपको मालूम पड़ेगा  उसके पहले ही आप  अपने सर्वश्रेष्ठ सृजनात्मकता और दक्षता के समुद्र में गोते लगा  रहे होंगे । मनोविज्ञान के अनुसार अक्षमता से निपुणता तक चार अवस्थाएँ होती हैं। मैने अनेक कार्यों में क्षमता को देखा है किंतु  पियानो के अभ्यास में ग्राहम फ़िंच ने जो इसका सार गर्भित विवरण दिया है, वह मेरी पसंद है। नीचे श्रीमान फ़िंच द्वारा बतायी गयी चार अवस्थायें  ( उनको मोटे अक्षरों में) दी जा रही हैं, जिनके साथ मेरी स्वयं की व्याख्या भी है।

१: अचेतन क्षमता (नौसीखिया)

हम नहीं जानते कि  हम नहीं जानते,

यह एक ऐसे अति आत्मविश्वासी मनोवृत्ति वाले व्यक्ति में प्रगट होती है, जो यह सोचता है कि यह  कठिन नहीं हो सकता या इसमें प्रवीणता हासिल करने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा। जो वास्तव में हमारे भीतर अंतर्निहित रहता है उसके प्रति हम  अज्ञानी बने रहते है।

इस अवस्था में हम सर्वोच्च  अवस्था तक पहुँचने के लिए क्षमता  की जो उपयोगिता है और जिस प्रयास की आवश्यकता है, हम उसको यदि पूर्णतया अस्वीकार नहीं करते तो उसका मूल्याँकन कम करते  हैं  ।

हम ध्यान को लेते हैं और हम सोचते हैं कि मैं  इसमें कुछ सप्ताह में या महीनों में निपुण हो जाएँगे , या  मुझे उतना समय नहीं लगेगा  जितना इसमें दक्ष लोगों कहा करते हैं।  और  यह सोचना तो इससे भी बुरा है कि,  मैं  तो खेल खेल में ही यह सब कर लूँगा और यह मेरी चेतना को अकल्पनीय ऊँचाइयों तक पहुँचाने हेतु  पर्याप्त होगा । हम सोचते हैं कि सचिन तेंदुलकर और मोज़ार्ट के भीतर ये  योग्यताऐं  जन्मजात थीं । या मैं इतना बुद्धिमान हूँ कि मैं बिना पुस्तक हाथ में उठाए कठिन से कठिन  प्रवेश परीक्षा को उत्तीर्ण कर सकता हूँ। नौसीखिया चीज़ों को अवसर पर छोड़ देता है। सर्वश्रेष्ठ के लिए प्रार्थना करता है और बिना कुछ किए अनुकूल परिस्थितियों के आने की आशा करता है।यदि  सीखने की तीव्र   इच्छा हो जिसके पीछे एक अनुशासित और निश्चित प्रयास हों तो ही मात्र व्यक्ति दूसरी अवस्था तक विकास करता है।

२: निरंतर अक्षमता  (काम सिखाना )

हम जानते हैं कि हम नहीं जानते।

ओह! यह जितना मैंने सोचा था उससे अधिक कठिन है। मुझे निश्चित नहीं है कि मैं इसे पूरा कर पाउँगा।सीखने की इस अवस्था में प्रेरणा और  प्रोत्साहन की अक्सर आवश्यकता होती है क्योंकि यह वह अवस्था है, जहाँ कार्य को  त्याग देना सरल होता है।

अधिकांश लोग जब किसी चीज़ को लेते हैं, सबसे पहले वे थोड़े से प्रयास से बहुत अधिक होने की अपेक्षा करते हैं। लेकिन अंततः आप पहचान लेते हैं कि जहाँ आप वर्तमान में हैं और जो आप बनना चाहते हैं ( या जो आप बनने की कल्पना करते हैं) उसमें बहुत अधिक अंतर है। यह दूसरी अवस्था है ; आप अब समझते हैं कि आप नहीं जानते। अब वह समय है जब आपको  यह जानते हुए कि इसमें बहुत समय और प्रयास लगेगा  मुझे इस कार्य को करते रहना  चाहिए या इसे त्याग देना चाहिए और स्वयं एक प्रवीण बनने के स्थान पर अन्य प्रवीण लोगों को देखने में आनंदित होना चाहिए इन दोनों में से एक का निर्णय करने की आवश्यकता है । अधिकांश भ्रमित साधक इस अवस्था में छोड़ देते हैं। लेकिन जो नहीं छोड़ते और ग़लतियाँ करने में शर्माते नहीं वे तीसरी अवस्था को जाते हैं।

३: प्रबुद्ध क्षमता  (कारीगर )

हम जानते हैं कि हम जानते हैं।

यह वह अवस्था है जो सबसे अधिक लम्बी है। यह कठिन और अजीब लगता है और हम विश्वास करते हैं, कि बहुत अधिक कार्य करने के पश्चात हम अपने लक्ष्य पर पहुँचेंगे। हम काम के लिए सही संसाधनों के लिए धीरे धीरे समस्याओं और चुनौतियों को तोड़ते हुए  निरंतर संघर्षरत हैं।

आपकी योग्यता को प्रदर्शित करने के लिए वहाँ इस  अनुपयुक्त  प्रयास और कभी कभी बाह्य सहायता की आवश्यकता होती है। आपको यह स्पष्ट होता है कि आप क्या जानते हैं और क्या नहीं। आप जो करना चाहते हैं वह करने में सक्षम होते हैं लेकिन यह बिना प्रयास के  नहीं होता। यह आप पर भार डालने वाला होता है और सामने बैठा व्यक्ति आपकी चुनौतियों और संघर्ष को देख सकता है। कुल मिलाकर कैसे भी आप कार्य को पूर्ण करने में योग्य हो जाते हैं। आपकी सामर्थ्य के साथ एक चिंता, घबराहट और अनिश्चितता आपकी नसों  में दौड़ती है। यदि आप कार्य को छोड़ते नहीं हैं तो आप बहुत उन्नति कर लेते हैं। तब यह कारीगर ( स्त्री या पुरुष) शीघ्र अंतिम अवस्था को बढ़ता है।

४: अचेतन सामर्थ्य ( प्रवीण)

हम नहीं जानते कि हम जानते हैं,

इस अवस्था में हम अपना टुकड़ा ( पियानो का) बिना किसी सजग विचार के बजा सकते हैं। यह सरल अनुभव होता है, और हम अक्सर आश्चर्य करते हैं कि हम हमेशा संघर्ष क्यों करते थे। हम अब स्वयं मार्गदर्शक बन गए हैं और ख़तरा मोल ले सकते हैं या बहाव के साथ बह सकते हैं।

अब योग्यता आपका द्वितीय स्वभाव बन जाती है। अब कार्य स्वाभाविक रूप से और आराम होता है। लोग सोचते हैं कि आप वरदान प्राप्त या योग्यता सम्पन्न हैं या आपके पास कोई विशेष क्षमता या संसाधन हैं। इस अवस्था पर आपको किसी प्रेरणा की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती।आप इसका सृजन करते हैं। वास्तव में आप स्वयं  प्रेरणा बन जाते हैं।चाहे आप प्रसन्नता की कला  या ध्यान  में निपुणता प्राप्त करना चाहें, शरीर बनाना या वज़न कम करना चाहें, अपने व्यवसाय या काम में सफलता प्राप्त करना चाहें, बस यह स्मरण रखें कि यह सम्भव है। यह किया जा सकता है और यह उस योग्यता को सीखने के द्वारा, इसमें निपुणता  प्राप्त करने और इसको  प्रयोग में लाने के द्वारा किया जा सकता है ।

एलोन मार्क ने किस प्रकार लाभ देने वाली कम्पनियों की ऋंखला बनायी या एक जे के रोलिंग ने किस प्रकार उपन्यासों की  ऋंखला लिखी? इसी प्रकार। यह सब आरम्भ होता है एक निश्चित दिनचर्या रखने और उस पर दृढ़ रहने से। जो अनुशासित है,  उसके लिए चारों दिशाओं से प्रेरणा और प्रोत्साहन प्रवाहित होता है।

जैसा कि बिल गेट्स ने कहा है “ अधिकांश लोग जो एक वर्ष में कर सकते हैं उसका  अनुमान अधिक  कर  लेते हैं और जो वे दस वर्ष में कर सकते हैं उसका वास्तविकता से कम आकलन करते हैं।”

 नियमित रूप से प्रति दिन बहुत थोड़ा सा करना दूर तक जाता है। अधिक उबाऊ काम सुबह सबसे पहले करें। उन चीज़ों को जिनकी आप उपेक्षा करना चाहें, मात्र  उनको करें। सुबह के लिए आप उसके पहले वाली रात को योजना बना लें जिससे कि आप उसे सुबह  तुरंत कर सकें। इसे करें, इसे करें और बस इसे ही करें। ई मेल,  मैसेज करने और आलस में अपनी सुबह बर्बाद न करें।

एक धनी व्यक्ति ने मुल्ला नसीरूद्दीन को अपनी पत्नी का चित्र बनवाने के लिए बुलाया और कहा “ क़ीमत की चिंता न कीजिए बस उसका सबसे सुंदर चित्र बनाकर दें ,” अनेक  बैठकों के बाद, मुल्ला नसीरूद्दीन ने चित्र बनाकर प्रस्तुत किया किंतु वह व्यक्ति प्रसन्न नहीं हुआ।

“ उसने कहा यह मेरी पत्नी जैसी नहीं दिखती। यह एक कुरूप स्त्री है।”

मुल्ला नसीरूद्दीन ने कहा महोदय!” यदि आप मुझे एक सेब का चित्र बनाने के लिए कहें,  तो आपको  मुझे नाशपाती नहीं देना चाहिए।”

परिणाम मात्र कार्य करने से प्राप्त होते हैं न कि दिवास्वप्न देखने, टालमटोल करने या अभिपुष्टि से ।सही कार्य जब सही कौशल के साथ संयुक्त होते हैं तो जो परिणाम हम चाहते हैं वो प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए यदि आप अधिक बचाना चाहते हैं तो हमारा मूल ध्यान आय पर होना चाहिए न कि ख़र्च पर । यदि आप प्रगति करना चाहते हैं तो आपको उन कार्यों  में अपना समय लगाना चाहिए जो महत्वपूर्ण हैं।

चाहे आप मेंढक की कितनी भी प्रसंशा करें या उसे चूमें वह राजा नहीं बनने वाला। वास्तव में यदि आप इसे नहीं खाएँगे तो यह वहीं बैठा रहेगा और सारे दिन टर्राएगा।आप इसे निगल भी सकते हैं। या चटनी बनाए।

शांति,

स्वामी