गत लेख में मैंने दो प्रकार के ध्यान पर चर्चा की थी। आज मैं “एकाग्रतापूर्ण ध्यान” पर विस्तृत चर्चा करूंगा।

एकाग्रतापूर्ण ध्यान एक विचार पर केन्द्रित रहने की कला है। यह चिंतनशील ध्यान से मूलतः इस बिन्दु पर भिन्न है कि इस ध्यान के दौरान किसी प्रकार का बौद्धिक परीक्षण नहीं किया जाता। यह मुख्यतः आपको अपना मन स्थिर करने व शारीरिक स्थिरता पाने में सहायतार्थ रचा गया है। एक तरह से एकाग्रतापूर्ण ध्यान, सम्पूर्ण ध्यान की ओर बढ़ने का प्रथम स्तरीय अभ्यास है। जैसे जैसे आप इस अभ्यास में आगे बढ़ते हैं, आप एक अवर्णनीय शांति अनुभव करेंगे, आपके चारों ओर दिव्य-प्रेम का आवरण छाने लगेगा; आपको एक चिरस्थायी निश्चल प्रशान्ति का अनुभव होगा।

श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं –

यत्रोपरमते चित्तम निरुद्धम योगसेवया।
यत्र चैव आत्मनात्मानम पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥ (भगवद गीता ६.२०)
अर्थात – योग के निरंतर अभ्यास से, मन की अचल स्थिरता की अवस्था में, योगी को स्वयं के सत्य स्वरूप का अनुभव होता है। निरंतर ध्यान के फलस्वरूप प्राप्त पूर्णत: शुद्ध अन्तःकरण सहित, वह सदा अपने दिव्य स्वरूप में स्थित रहता है।

इसी अध्याय में आगे वे आज्ञा देते हैं –

शनैः शनैरूपर मेद्बुद्ध्या धृतिग्रहीतया।
आत्मसंस्थम मनः कृत्वा न किंचिद्पि चिंतयेत ॥ (भगवद गीता, ६.२५)
अर्थात – धीरे धीरे, अभ्यास में रत, ऐसे योगी को धैर्य व दृढ़ निश्चय सहित ध्यान करना चाहिए व अपने अस्थिर चित्त को पुनः अपने दिव्य स्वरूप में स्थित करने का निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।

ध्यान के विषय पर विभिन्न बौद्ध-ग्रन्थों में भी यही सूत्र यथारूप से मिलता है। मुख्यतः “मध्यमका हृदया” में लिखा है –
यदि किसी को भटकाव ने घेर लिया है तो उसे पुनः अभ्यास आरंभ करना चाहिए व इसे विपथन का चिन्ह मानना होगा।
और, “प्रज्ञापरमिता” में लिखा है की सुदृढ़ एकाग्रता इंद्रियगत सुखों की लालसा को संतुष्ट करती है।

शरीर व मन की स्थिरता गहन अभ्यास द्वारा प्राप्त होती है। इस अभ्यास के निम्न चरण हैं –
१. किसी आरामदायक मुद्रा में बैठ जाएँ, घुटने मोड़ कर बैठना अधिक श्रेयस्कर होगा।
२. अपने मेरुदंड व सिर को सीधा रखें। गर्दन हल्की सी झुकी हो, केवल मामूली सी।
३. हर प्रकार की शारीरिक गतिविधि पूर्णत: बंद कर दें।
४. अपना ध्यान किसी एक वस्तु पर केन्द्रित करें।
५. गहन सतर्कता बनाए रखें।
जब भी मन इधर उधर भटकने लगे, उसे उसी समय ध्यान की वस्तु पर पुनः स्थापित करें। समय के साथ साथ आप में तीव्र-तीक्ष्ण सजगता विकसित होने लगेगी; और आप अपने हर नए उपजते विचार के प्रति सजग रहने लगेंगे। उस विचार के भटकाव का रूप लेने से पूर्व ही आप उसे संभाल लेंगे।

उपयुक्त विधि से ध्यान का अभ्यास करने में मेरुदंड सीधा रख कर सही विधि से बैठने की प्रमुख भूमिका है। जब हम शारीरिक रूपान्तरण की चर्चा करेंगे, उस समय मैं सही विधि से बैठने के विभिन्न लाभों का वर्णन करूंगा। अभी के लिए कृपया जान लें कि एक सुस्थिर, आरामदायक व सही आसन पाँच मूलभूत ऊर्जाओं के नियंत्रण में आपका सहायक होता है एवं एकाग्रतापूर्ण ध्यान की विधि पाँच अनुपूरक ऊर्जाओं को स्थिर करती है। आगामी लेख में मैं दस प्रमुख ऊर्जाओं का संक्षेप में वर्णन करूंगा। ऊर्जाओं का परिचालन व नियमन आपको एक ही मुद्रा में स्वेच्छा से जितना समय आप चाहें उतने समय तक स्थिर बैठने में सहायक होगा।

यहाँ इस तथ्य को समझना अति आवश्यक है कि एकाग्रतापूर्ण ध्यान के दौरान आपको हर प्रकार के बौद्धिक निरीक्षण-परीक्षण, चिंतन व मनन से पूर्णत: दूर रहना है। उदहरणस्वरूप मान लें कि आप एक वस्तु पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, और आप श्री कृष्ण की प्रतिमा पर अभ्यास कर रहे हैं। सतर्क रहें कि आप उस प्रतिमा की सुंदरता आदि का परीक्षण न आरंभ कर दें, न ही श्री कृष्ण के विषय में विचार करना आरंभ करें – जैसे उनकी विभिन्न लीलाओं, उनके जीवन चरित्र का चिंतन आदि। केवल मात्र उस प्रतिमा पर ध्यान संकेंद्रित रखें। प्रारम्भिक स्तर पर, यदि आप एकेन्द्रीय एकाग्रता दृढ़ करने से पूर्व, चिंतन आरंभ कर देते हैं तो आप का मन इधर उधर भटकने लगेगा व आपको संभवतः इसका भान तक न होगा।

अपने विचारों के पीछे न दौड़ें; विचारों का मंथन, उन्हें मानना, न मानना, उनका परीक्षण इत्यादि में न उलझें। कोई क्रिया-प्रतिक्रिया न दें। बस प्रेमपूर्वक अपनी एकाग्रता बनाए रखें । एकाग्रता के अभ्यास के लिए चार विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के विषय में जानकारी हेतु आप मेरा “एकनिष्ठ एकाग्रता” पर लेख पढ़ सकते हैं। ध्यान के अभ्यास के लिए अल्पकाल के लिए, किन्तु केन्द्रित व सतर्कतापूर्वक बैठें। वह मन जो अपने वश में नहीं होता, वह तीन सेकंड से अधिक समय तक किसी एक विचार पर स्थिर नहीं रह पाता। मेरा मत यह है कि निरंतर 45 मिनट तक अभ्यास करने के स्थान पर आप तीन बार 15 – 15 मिनट के लिए अभ्यास में बैठें। ऐसा करने से अधिक लाभ होगा। धीरे धीरे, जैसे जैसे दिन बीतेंगे, आप अपने ध्यान का समय बढ़ाते चलें।

मैं आपको इस बात से भी अवगत कराना चाहता हूँ कि एकाग्रतापूर्ण ध्यान के वास्तविक अभ्यास के दौरान किसी प्रकार का आनंद अनुभव नहीं होता। किन्तु एक बार मन की निश्चल व शांत अवस्था का आस्वादन हो जाने पर आपको ध्यान में एक प्रकार की आसक्ति हो जाएगी।

शांति।
स्वामी