एकाग्रता के विषय पर अपने पिछले लेख में मैंने एकनिष्ठ एकाग्रता का संक्षेप में वर्णन किया था। इस लेख में एकाग्रता के अभ्यास पर विस्तृत चर्चा करेंगे। एकाग्रता का अर्थ है – मन का एक बिन्दु पर केन्द्रित रहना। एकाग्र शब्द का विच्छेद करने पर एक + अग्र (यानि आगे बढ़ना) होता है। इसका अर्थ हुआ – किसी एक चिंतन बिन्दु पर सीमित होते हुए, व्यवस्थित रूप से केन्द्रित हो कर आगे बढ़ना।

रस्सी पर चलने वाले व्यक्ति का सोचें कि किस प्रकार वह अपनी सम्पूर्ण वृत्तियों को एकीकृत करके सफलतापूर्वक अपना कौशल दर्शाता है। अपनी एकाग्रता में क्षण भर का भटकाव उसे बहुत भारी पड़ सकता है। ध्यानावस्था में जाने से पूर्व, आपको पर्याप्त अंतराल तक अपनी एकाग्रता में अविरत स्थिति बना कर रखनी होती है। यदि आप एकाग्र होने की कला में निपुण हो जाएँ तो ध्यान में स्वाभाविक ही स्थिति होने लगेगी।

योगिक ग्रन्थों में एकाग्रता की कला में निपुण होने के विभिन्न अभ्यास संग्रहित हैं व उनमें से बहुत से ग्रन्थों में ‘एकाग्रता’ व ‘ध्यान’ इन दोनों का एक ही परिपेक्ष्य में उपयोग हुआ है। एकाग्रता के अंतर्गत ऐसे अनेकों अभ्यासों का वर्णन मिलता है जिससे ध्यानावस्था प्राप्त करने की योग्यता क्रमशः और विकसित हो पाये। इस लेख में मेरा ध्येय यह है कि मैं उन सब को आपके लिए सरल बना कर प्रस्तुत कर पाऊँ व आपके साथ वह अभ्यास विधियाँ साझा करूँ जिनसे मुझे मेरे मार्ग पर प्रत्यक्ष सहायता मिली।

साधारण शब्दों में एकाग्रता का अर्थ है मन को किसी एक वस्तु पर केन्द्रित कर पाने का अभ्यास। एकाग्रता विकसित करने के निम्न चार उपाय हैं –

क) बाह्य पदार्थ पर – इसमें आप किसी भी भौतिक वस्तु पर अपना मन केन्द्रित करते हैं। ऐसे अभ्यास के समय नेत्रों को खुला रखा जाता है।
ख) अन्तःकरण में किसी आकृति पर – ऐसी किसी भी वस्तु का विचार करें जो आपको प्रिय हो। यह ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जो आपको शारीरिक अथवा भावनात्मक रूप से भड़काए अथवा उत्तेजित करे; केवल ऐसा कुछ जो आपको प्रिय लगे। नेत्र बंद करके उस वस्तु को देखना आरंभ करें। वह आकृति बार बार आपकी अंत:दृष्टि से ओझल होती रहेगी, धीरे से उसे पुनः दृष्टि में लाते रहें। एक मानसिक बिम्ब को अंतःपटल पर निरंतर देख पाने के लिए उच्च स्तरीय एकाग्रता वांछित है।
ग) अपने श्वास पर – एकनिष्ठ एकाग्रता दृढ़ करने के लिए प्राणायाम अथवा अनुलोम-विलोम का अभ्यास ‘न’ करें। केवल अपने श्वासों को निहारें व श्वास के अंदर जाने व बाहर आने की प्रक्रिया पर ध्यान दें। अपने श्वास पर केन्द्रित हों। आप अपने नेत्र खुले अथवा बंद रख सकते हैं।
घ) किसी एक मंत्र पर – जिस मंत्र से आप दीक्षित हुए हैं, उसका मानसिक जाप करें। किन्तु, मंत्र-जाप करना कुंजी नहीं है, वरन हर जाप का श्रवण कुंजी है। इसके लिए गहन एकाग्रता आवश्यक है। अपने सामर्थ्य अनुसार, धीरे धीरे, नियमित हो कर मार्ग पर आगे बढ़ें। पवित्र मंत्र का केवल श्रवण करते रहें।

एकाग्रता के समय ध्यान रखने हेतु प्रमुख तथ्य यह है कि आप किसी बौद्धिक स्तर के परीक्षण में न उलझें। अर्थात, जिसे आप अंतर्दृष्टि से देख रहे हैं, उस पदार्थ/आकृति का परीक्षण, प्रशंसा, निंदा या उसे समझने में न लग जाएँ। केवल उस पर अपना मन केन्द्रित करें व पूर्ण प्रयासरत रहें। आपका मन हर कुछ सेकंड के बाद भटकने लगेगा, उसे पुन: पुन: वापिस लाते रहें।

आरंभिक अभ्यास में, एकाग्र होने के लिए लंबी अवधि तक न बैठें। बल्कि, छोटे, पूर्णतः केन्द्रित, स्पष्ट व सुबोधगम्य अंतराल के लिए बैठें, जिन्हें धीरे धीरे बढ़ाते चलें। यदि आप एक घंटे के लिए अविचल बैठते हैं किन्तु आपका मन इस पूर्ण अवधि में इधर उधर भटक रहा है, तब इससे अधिक लाभप्रद यह होगा कि आप स्थिर हो कर केवल दस मिनट के लिए पूर्ण परिश्रम से एकाग्रचित्त हों व पूर्ण रूप से सतर्क रहें, यह अधिक तीव्रता से परिणाम ला सकता है।

एकाग्रता

 

उपरोक्त सूची का एक से अधिक बार, ध्यानपूर्वक विश्लेषण करें। मान लें कि आप १५ मिनट के लिए एकाग्रचित्त होने का अभ्यास कर रहे हैं। इन १५ मिनट कि अवधि में आपका आसन स्थिर चट्टान अथवा वृक्ष की भांति अविचल रहना चाहिए व आपको पूर्ण रूप से सतर्क रहते हुए अपने केन्द्रबिन्दु पर पूरा ध्यान केन्द्रित करना है। अपने सम्पूर्ण यत्न द्वारा पूर्ण सुबोधगम्यता बनाए रखने का प्रयास करें।

सुबोधगम्यता से अभिप्राय यह है कि जब आप आलस्य का अनुभव करें, अथवा आपकी दृश्य वस्तु अन्तःकरण से ओझल होने लगे, अथवा जिस मंत्र का आप मन से श्रवण कर रहे हैं, उसकी ध्वनि इधर उधर भटकन में कहीं लुप्त होने लगे – उस समय आप स्वयं को स्मरण दिला सकें कि आपको एकाग्रता के अभ्यास में रत रहना है। उस समय यदि आप अपने मन को पुनः अपनी केन्द्रित वस्तु पर स्थापित कर पाएँ इसी को सुबोधगम्यता कहा जाता है। यदि आप उपरोक्त निर्देशानुसार अभ्यास करते हैं तो आप अवश्य ही एक उत्तम ध्यानयोगी हो जाएँगे।

यदि आप उपरोक्त विवरणी के आधार पर एकाग्रता का अभ्यास करते हैं तो आप स्थिर रहें, मन को संतुलित करें, सतर्कता बरतें, व सुबोधगम्यता बनाए रखें। आरंभिक अभ्यास में मन की पूर्ण स्थिरता की संभावना आपेक्षित नहीं, किन्तु यदि आप अविचल बैठने में अक्षम होंगे तो आपका एकाग्रता का अभ्यास सम्पूर्ण नहीं माना जाएगा। कृपया पुनः आरंभ करें। इसी कारण आरंभ में छोटे छोटे किन्तु सतर्कता पूर्ण सत्रों का सुझाव दिया गया है।

आने वाले ४० दिन के लिए प्रतिदिन ३० मिनट एकाग्रता का अभ्यास करने का दृढ़ संकल्प लें व इस समय को १५ – १५ मिनट के दो सत्रों में अथवा १० – १० मिनट के तीन सत्रों में विभाजित कर लें।

एकाग्रता का विषय अत्यंत विस्तृत व गहन है, मैं इस विषय पर बहुत कुछ लिख सकता हूँ। किन्तु, संक्षेप में समझें तो इसमें इससे अधिक और कुछ नहीं जो मैंने इस लेख में वर्णित किया है।

इस श्रंखला के आगामी लेख में मैं आपका परिचय एकाग्रता के दिव्य, अद्भुत, आनंददायक रूप से करवाऊँगा।

शांति।
स्वामी