हामिन सुनीम जो दक्षिण कोरिया के एक उत्तम ज़ेन शिक्षक हैं, उनके द्वारा रचित ‘द थिंग्स यू कैन सी ओन्ली वेन यू स्लो डाउन’ में उन्होंने अपने जीवन से एक गहन घटना साझा की है।

जब मैं लगभग बीस-पच्चीस वर्ष का था, मैं अपने मठ के एक घनिष्ठ मित्र के साथ दो सप्ताह के लिए यूरोप की यात्रा पर गया। जब हम रोम में हवाई अड्डे पर पहुँचे, तब हम अत्याधिक उत्साहित थे। हम एक दूसरे को कुछ वर्षों से जानते थे और हमारी एक दूसरे के साथ बहुत अच्छी मित्रता थी। मुझे उसका हास्य व दयालु स्वभाव पसंद था और उसे मेरी साहसिक व आशावाद भावना पसंद थी। चूंकि वह अधिक अंग्रेज़ी नहीं बोलता था, इसलिए मुझे लगा कि मुझे उसके समीप रहना चाहिए। सात दिनों तक प्रत्येक क्षण एक साथ व्यतीत करने के बाद, हमारी बातों के प्रसंग समाप्त हो गए और हम दोनों कुछ चिड़चिड़े हो गए। यह हमारी मित्रता में किसी ठोस समस्या के कारण नहीं था, यह केवल इतना था कि हम कुछ समय एकांत में व्यतीत करना चाहते थे। तो अगली सुबह मैंने सुझाव दिया कि हम अलग-अलग मार्ग लेते हैं और रात में छात्रावास में मिलते हैं। मेरे मित्र ने मेरे सुझाव को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया।

जैसे ही मैंने छात्रावास को छोड़ा, मैं निश्चिंत हो गया। मुझे पता था कि मैं दिनभर जो कुछ भी मुझे पसंद है वह कर सकता हूँ। मुझे अपने मित्र से सहमति की आवश्यकता नहीं है कि पहले कहाँ जाएं और आगे क्या देखें। परंतु जैसे ही सुबह दोपहर में बदली, तब मुझे अपने मित्र के साथ यात्रा करने के लाभों का स्मरण हुआ। जब मुझे शौचालय जाना पड़ता था, तब मैं किसी मित्र को अपने बैग को देखने के लिए विश्वास नहीं कर सकता था। अकेले भोजन करने में आनंद नहीं था। आनंद व विश्राम की तुलना में यह एक दैनिक कर्म जैसा प्रतीत होने लगा। उस दिन मैंने स्वयं की कोई तस्वीर नहीं ली क्योंकि मैं अपरिचित व्यक्तियों को परेशान नहीं करना चाहता था। जब मैंने कोई सुंदर वस्तु देखी, जैसे कि एक प्रसिद्ध कलाकृति, मैं रोमांचित नहीं हुआ क्योंकि उत्साह साझा करने वाला कोई नहीं था। जब मैं दिन के अंत में हमारे छात्रावास पहुँचा, तो मैं अपने मित्र को देखकर बहुत प्रसन्न था। रात्रिभोज के समय हमने अपने-अपने दिन की यात्रा का वर्णन करते समय कईं नई बातें पाईं।

इस अनुभव से मुझे साधित हुआ कि एक अच्छा संबंध बनाए रखने की कला की तुलना एक अंगीठी के समीप बैठने से की जा सकती है। यदि हम बहुत लंबे समय तक बैठते हैं, तो हम गर्म हो जाते हैं और संभवतः झुलस जाते हैं। यदि हम बहुत दूर बैठते हैं, तो हम गर्मी प्राप्त नहीं कर सकते। उसी प्रकार चाहे कोई व्यक्ति हमारा परम मित्र ही क्यों न हो यदि हम सदैव मित्र के समीप ही रहें और उस रिश्ते में स्वयं के लिए एकांत व स्वतंत्रता का समय ना दें तो हम शीघ्र ही उलझ और झुलस जाते हैं। संबंधों में असावधानी होना, और पर्याप्त गोपनीयता व स्वतंत्रता के न होने से अप्रसन्न रहना बहुत सहज है। दूसरी ओर, यदि हम मित्रों और परिवार के संपर्क में रहने हेतु कोई प्रयास ही नहीं करते हैं, तो हम उनका स्नेह प्राप्त नहीं कर सकते। संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है।

एक अच्छा संबंध बनाए रखने की कला एक अंगीठी के समीप बैठने के तुलनीय है।

सुनीम की कथा में मुझे एक और बात अति सुंदर लगी और वह है दैनिक-कर्म शब्द का प्रयोग। अधिकांश विवाह इसलिए वियुक्त हो जाते हैं क्योंकि साझेदार बहुत गंभीर हो जाते हैं, बहुत अधिक नियोजन होने लगता है। लगभग सब कुछ एक दैनिक-कर्म बन जाता है। ऐसे संबंधों में मित्रता के स्थान पर केवल अपेक्षाएं और उत्तरदायित्व रह जाती हैं। संतोषप्रद क्या है के स्थान पर दूसरा व्यक्ति आपके लिए क्या नहीं कर रहा है ध्यान उस पर चला जाता है। शीघ्र ही एक दूसरे के प्रति द्वेष उत्पन्न हो जाता है। और जब आप अपने जीवन-साथी के साथ प्रसन्नता से अधिक द्वेष का अनुभव करते हैं, तो यह उत्कृष्ट संकेत है कि आप थके हुए हैं और क्लांत हैं।

प्रायः अधिकतर दम्पतिओं का मानना है कि यदि वे एक बार प्रेम की अनुभूति करना बंद कर दें, तो वे इसे फिर कभी अनुभव नहीं करेंगे। यहाँ तक कि मैंने भी कुछ वर्षों पहले अपनी एक पोस्ट में प्रेम विहीनता को एक सेब के सूखने से तुलना की है। सच्चाई यह है कि यदि आप एक संबंध की सफलता चाहते हैं तब आपको एक-दूसरे को स्वतंत्रता व स्थान देना होगा। इसमें परिपक्वता का एक निश्चित स्तर होना चाहिए, जहाँ आप अपने विचारों, चिंताओं और भय को व्यक्त करने में सक्षम हों। संचार की आवश्यकता और प्रकृति में पुरुषों और महिलाओं के बीच में मुख्य अंतर है। मैं टकसाली ढंग से नहीं कहना चाहता, परंतु पुरुषों और महिलाओं की अभिव्यक्ति और अपेक्षा अलग प्रकार की होती हैं। यह लगभग जैविक है, उनके नियंत्रण से परे। आशय भले ही नेक हो किंतु अधिकतर व्यक्ति अपने रिश्तों में अप्रसन्न रहते हैं, चाहे वे अनेक सहवास करते हों या विवाहित हों। इन सबका निष्कर्ष है कि आप दूसरे व्यक्ति के साथ वैसा व्यवहार करें जैसा उन्हें प्रिय हो (आपकी पसंद के अनुसार नहीं)।

मेरे अनुसार यहाँ पर आध्यात्मिक शिक्षा वास्तव में एक व्यक्ति के लिए लाभकारी हो सकती है। विशेष रूप से अनासक्ति के साथ प्रेम-कृपा की भावना को विकसित करने में। यह समझना कि एक सच्चे जीवन के प्रति बद्धता अधिक संतोषप्रद है बजाय इसके कि आप दूसरे व्यक्ति को अपनी अपेक्षा अनुसार ढालने का प्रयत्न करें। स्वतंत्रता की तुलना में कुछ भी अधिक सुंदर नहीं है। इस का कोई महत्व नहीं कि आप कौन हैं, नर या नारी, कुत्ते या एक पक्षी, हम सभी सुरक्षा, प्रेम इत्यादि सब कुछ चाहते हैं, परंतु सर्वप्रथम हम स्वतंत्रता चाहते हैं। जब प्रेम के विषय में पूछा जाता है, तो मैं सदैव यही सुनता हूँ कि प्रेम अपने आप में सक्षम होने के समान है, प्रेम हमें स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने में सक्षम करता है। क्या यह स्वतंत्रता नहीं?

दूसरे शब्दों में, प्रेम की भावना का अर्थ है कि आपको अपने जीवन में जिस व्यक्ति से प्रेम है, उसकी संगति में अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करने का विशेषाधिकार। यह सर्वोच्च प्रकार की स्वतंत्रता है और यह तभी संभव है यदि आप जिस व्यक्ति से प्रेम करते हैं उसे भी ऐसी स्वतंत्रता हो। उनकी स्वतंत्रता का निर्धारण आप को नहीं करना है और वे आपकी स्वतंत्रता को निश्चित नहीं कर सकते हैं। आप उन्हें डार्क चॉकलेट पसंद करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते यदि वे सफेद चॉकलेट पसंद करते हैं।

संबंधों का निर्माण एक प्रकार की कढ़ाई के समान है। आप जितना चाहें उतना ही जटिल आकार बना सकते हैं या जितना चाहें उतना सरल रख सकते हैं। किसी भी प्रकार से, एक सुंदर आकार बनाने के लिए या वांछित आकार बनाने के लिए आपको ध्यान देना होगा और समय देना होगा, साथ ही साथ कुछ कौशल भी चाहिए। यहाँ विशिष्ट शब्द आपकी इच्छा है। प्राय अधिकतर व्यक्ति नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं। यहाँ तक कि, सबसे बड़ी मानवीय मूर्खता यह धारणा है कि जो भी मैं चाहता हूँ, इसकी पूर्णता मुझे आनन्दित करेगी।

मैंने एक बार ली रोस्टेन के द्वारा लिखित एक चुटकुला पढ़ा था। मैं उस चुटकुले को मुल्ला नसरूद्दीन को समायोजित करने के लिए थोड़ा बदल रहा हूँ।

“निःसंदेह मेरी यही इच्छा है,” मुल्ला ने अपने मित्र से कहा। “मेरे पास एक अच्छा लंबा जिराफ़ खरीदने के लिए पर्याप्त धन हो।”
“एक जिराफ़?” उसके मित्र ने कहा। “यह जिराफ़ क्या होता है?”
“एक ऐसा जानवर, जिसकी चमड़ी पर बड़े धब्बे होते हैं, बड़े गुठलीदार घुटने, ऊंची गर्दन, लगभग बीस फीट ऊँचाई होती है।”
“ओह वह जानवर। परंतु क्यों?”
“क्यों क्या?”
“आप जिराफ़ क्यों चाहेंगे?”
“मैंने कब कहा कि मैं जिराफ़ चाहता हूँ,” मुल्ला ने कहा। “मैंने कहा था कि मैं केवल इतना चाहता हूँ कि मेरे पास उसे खरीदने के लिए पर्याप्त धन हो।”

किसी भी संबंध में, चाहे वह अच्छा हो या बुरा जो कुछ भी अन्य व्यक्ति कहता है उस हर वाक्य का अर्थ सदा वही नहीं होता है। आप जो कुछ भी इच्छा व्यक्त करते हैं, उसे पूरा करने की इच्छा नहीं रखते हैं। कभी-कभी, हम केवल अपने विचार साझा करते हैं, उन पर चिंतन करते हैं या फिर विचारमग्न रहते हैं। अधिकतर व्यक्ति अपने सहयोगियों से यह आकांक्षा नहीं करते हैं कि वे उनके लिए आकाश से चंद्रमा और सितारे लेकर आएं। वे केवल यह सुनना चाहते हैं कि आप यह स्वीकार करें कि आपके जीवन में उनका कोई अस्तित्व है, कि वे आपके लिए महत्वपूर्ण हैं और आप उन्हें अपने जीवन में रखने की इच्छा रखते हैं। देखिए फिर से बात इच्छा पर आ पहुँची!

सुनीम की सलाह पर ध्यान दें। यदि यह परामर्श विफल हो जाता है, कदाचित पिंगला की खोज को प्रतिबिंबित करें (जैसा कि मेरी अन्य पोस्ट में लिखा है)। यदि वह भी काम नहीं करता है, तो फिर मैं और क्या कह सकता हूँ। संभवतः यही मान लें कि मानव जाति में आपका स्वागत है, ओ पृथ्वीवासी!

असंतोष प्रकट करने की विधियों की ओर ना देखें, वे स्वाभाविक रूप से हमारे पास होते हैं। कृतज्ञ होने के मार्गों की खोज करें। आप अकेले हों या किसी के साथ, अपनी प्रसन्नता के लिए स्वयं उत्तरदायित्व लें। जाएं और सार्थक जीवन जिएं।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - The Secret of a Good Relationship