मुझे यह कैसे पता चले कि मैं सही मार्ग पर हूँ? मैं अपनी आध्यात्मिक उन्नति किस तरह मापा करूँ? और, एक सच्चे आध्यात्मिक अनुभव का सूचक क्या होता है? ये वह तीन सर्वाधिक पूछे जाने वाले प्रश्न हैं जो हर सच्चा साधक अपनी यात्रा के दौरान कभी न कभी मुझसे पूछता है। बहुधा वे अपने अनुभव बताते हैं और मुझसे पूछते हैं कि जो उन्होंने अनुभव किया, क्या वह वास्तविक था।

अपने अनुभव पर शंका करना स्वाभाविक है, मुख्य रूप से तब जब किसी गहन आध्यात्मिक लगने वाले प्रकरण के पश्चात भी आपके जीवन की किसी भी समस्या का निवारण नहीं होता। इतना कहने के उपरांत, आपके मन में शंका रह जाना आपके अनुभव को निरस्त नहीं कर देता। ऐसे में किसी अस्थायी, आभासी एवं एक वास्तविक अनुभव में अंतर कैसे किया जाये? आइये मैं एक सुंदर कथा साझा करता हूँ।

अनुमानतः 1700 वर्ष पूर्व, रोम में एक प्रसिद्ध कलाकार की बहुत मांग थी। वह अपने नाटकों व हास्य-प्रसंगों (कॉमेडी) द्वारा जनमानस का मनोरंजन किया करता था। रोम का सम्राट डेकलीशियन विशेष रूप से उसका प्रशंसक था। हर प्रमुख समारोह में उसे अपने नाटक मंचन के लिए आमंत्रित किया जाता था।

जीनेसियस नाम का यह कलाकार राजमहल के दर्शकगण का मनोरंजन ईसाई धर्म पर व्यंग्य कसकर करता था। अपने व्यंग्यों में वह ईसामसीह का उपहास करता व ईसाई धर्म की परम्पराओं का अपशब्द कह कर निरादर करता। यही था उसका अपनी आजीविका कमाने का माध्यम व अपने दर्शकों को जोड़े रखने की शैली। व्यंग्य करना उसका स्वाभाविक गुण था चूंकि उसके हृदय में यीशु अथवा ईसाई धर्म के प्रति कोई श्रद्धा भाव न था (क्योंकि आप उसे अपने परिहास का विषय कदापि नहीं बनाते जिसके प्रति आपमें श्रद्धाभाव है या जिसे आप आदर-मान देते हों)।

एक दिन जब पूरी राजसभा भरी हुई थी, जीनेसियस (जिलेसीनस नाम से भी जाना जाने वाला) सदा की भांति अपनी कलाप्रदर्शन कर रहा था। आज वह दीक्षा-संस्कार (बप्तिस्म) पर व्यंग्य कस रहा था और उसके सम्मुख जल से भरा एक बहुत बड़ा कुंड रखा था। ईसाइयों के आध्यात्मिक शुद्धता एवं पुनर्जन्म को दर्शाने वाले अनुष्ठान पर नाटक करते हुए वह बाईबल की पंक्तियाँ उच्चरित करते हुए कुंड से जल लेने हेतु कुछ झुका। उसी क्षण वह फिसल गया और कुंड के भीतर जा गिरा।

उसने स्वयं को पूरी तरह जल में डूबा हुआ पाया व जब उसने कुंड से बाहर पाँव धरा, तो उसके अन्तःकरण की गहराई में कुछ रूपान्तरण सा हो चुका था। अब वह, वह जिनेसियस न था जो उस कुंड में गिरा था, वरन वह एक नवीन व्यक्ति था। यीशु की कृपा से पूर्णतः आच्छादित, उसने उसी क्षण से स्वयं को एक ईसाई घोषित कर दिया व अपना सम्पूर्ण जीवन प्रभु यीशु की सेवा में समर्पित करने का प्रण किया।

केवल मात्र एक अनुभव ही बहुत था उसे पूर्णत: रूपांतरित करने के लिए। सम्राट ने उसे प्रलोभन दिये व उसे अपना निश्चय बदलने के लिए परिताड़ित भी किया, किन्तु वह अपने मार्ग पर दृढ़ रहा। उन्होंने उसे जेल में भी डाला किन्तु वह सुधरा हुआ नायक अडिग रहा। डेकलीशियन ने उसे मृत्युदंड का भय भी दिखाया, तथापि जिनेसियस ने अपनी आस्था बदलने से इंकार कर दिया। अंततः, 303 सी.ई में, सरेआम उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया जबकि वह अपना मन यीशु को समर्पित कर पूरी तरह शांत रहा – नज़ारेथ के यीशु – जो उसके तारनहार थे।

एक सच्चे आध्यात्मिक अनुभव का प्रमुख द्योतक है – आत्म परिवर्तन।

जितना गहन आपका अनुभव होगा उतना ही व्यापक एवं प्रगाढ़ आत्म-परिवर्तन। एक सामान्य बुद्धि के जीव के लिए जिनेसियस द्वारा बप्तिस्म पर व्यंग्य करते समय कुंड में गिरने की घटना किसी भी तरह से आध्यात्मिक नहीं हो सकती। किन्तु जिनेसियस के लिए वह एक जीवन-रूपान्तरण करने वाला अनुभव था। वह भी इतना पवित्र एवं पावन कि उसने अपनी नई प्राप्त श्रद्धा से विचलित होने के स्थान पर अपनी मृत्यु को गले लगाना स्वीकार किया। इतनी निश्चित श्रद्धा कि जिनेसियस एक हास्यकार से संत जिनेसियस बन गया। इतनी लंबी यात्रा मात्र एक डुबकी में सम्पूर्ण हो गई!

यदि आपके अनुभव ने आपको रूपांतरित नहीं किया तो मेरी दृष्टि में, उसमें कोई आध्यात्मिक अर्थ नहीं था। मेरा तात्पर्य यह नहीं कि हर घटना जीवन को बदलने वाली ही होती है। तथापि, कोई सच्चा अनुभव, भले ही कितना भी तुच्छ हो, आपको एक सार्थक रूप से परिवर्तित कर देगा।

यदि आपको रात भर ईश्वर के स्वप्न आते रहे अथवा ईश्वर के दर्शन हुए किन्तु जब आप उठे तो वही पहले वाले ईर्ष्या, क्रोध, नकारात्मकता आदि के भाव जस के तस बने रहे, तो यह स्पष्ट है कि उस स्वप्न से जुड़ा कुछ भी आध्यात्मिक नहीं था। ऐसा कोई भी अनुभव जो आपको अधिक करुणाशील, प्रेम से भरा व दयालु बनने की ओर प्ररित नहीं करता, वह आध्यात्मिक अनुभव नहीं हो सकता।

मार्ग पर अपनी उन्नति मापने का एक मात्र पैमाना , यह जानने का एक मात्र उपाय कि क्या आप सही दिशा में जा रहे हैं – वह है अपने में आए सार्थक रूपान्तरण की मात्रा जानना। यदि आप स्वयं को करुणा, प्रेम, सच्चाई एवं लगन जैसे भावों से भरा पाते हैं तो आप जो भी कर रहे हैं वही करते रहें। वह सब आपके लिए सार्थक परिणाम ला रहा है। कोई भी ऐसा अभ्यास जो आपको और अधिक कट्टर, नकारात्मक, तुच्छ विचारों वाला व क्रोधी बनाए, वह संभवतः दिव्य नहीं हो सकता।

जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, एक स्त्री ने अपनी बाईबल निकाली व उसे भाव सहित पढ़ना आरंभ कर दिया।
“आप सच में इस सब में विश्वास रखती हैं? क्या वाकई?” उनके साथ बैठे यात्री ने पूछा, जो स्वयं नास्तिक था।
“बिलकुल! मुझे पूर्ण विश्वास है” उसने उत्साह से कहा। “यह तो ईश्वर के शब्द हैं।”
“अजी रहने दीजिये”, उस व्यक्ति ने सिर झटकते हुए कहा, “क्या आपको सच में लगता है कि वह बालक जोन्हा एक ह्वेल के भीतर तीन रात तक रहा था!”
“हाँ”
“तो आपको क्या लगता है वह वहाँ जीवित कैसे रहा?”
“मैं उससे पूछूँगी जब मैं स्वर्ग जाऊँगी।”
“अच्छा! और यदि वह नर्क में हुआ, तब क्या?”
“तब आप पूछ लेना”, उस स्त्री ने बिना नजरें उठाए कहा और पुनः पढ़ने में व्यस्त हो गई।

एक आध्यात्मिक मान्यता अथवा अनुभव का कोई तार्किक तथ्य नहीं होता और आपको दूसरों के समक्ष उसे उचित सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं। आध्यात्मिकता भाव है, न कि तर्क। यदि आप तर्क-तथ्य चाहते हैं तो उसके लिए अन्य कई विधाएँ हैं यथा, गणित, विज्ञान, इत्यादि। आध्यात्म के मार्ग का हर अभ्यास आपको उस विशुद्ध “भाव” की स्थिति तक पहुँचने में सहायतार्थ रचा गया है। एक ऐसी स्थिति जहां आपकी श्रद्धा एक पूर्णत: नए आयाम को छू लेती है और स्वतः आपमें एक सर्वमंगल एवं सर्वस्व के परोपकार की वृत्ति विकसित हो जाती है।

ऐसा कोई भी अनुभव जो आपमें परिवर्तन न ला पाये उसका कोई लाभ नहीं, और जो आपको प्रेम से सराबोर न कर पाये उसका कोई अर्थ नहीं। एक करुणामयी नास्तिक किसी निर्दयी आस्तिक से हर प्रकार से अधिक अच्छा है। चूंकि आध्यात्म यह नहीं कि आप ईश्वर अनुयायी हैं अथवा नहीं, बल्कि यह है कि आप प्रेमानुयायी हैं या नहीं। यह नहीं कि आप प्रार्थना करते हैं अथवा नहीं, बल्कि यह कि आप सहायता/सेवा करते हैं या नहीं।

तो क्या इसका तात्पर्य यह हुआ कि कोई भी आध्यात्मिक अभ्यास निरर्थक है? बिलकुल नहीं। तथापि, कोई भी अभ्यास अथवा अनुभव अंततः किसी अंतर्दृष्टि तक अवश्य पहुंचना चाहिए। जिस प्रकार संत जिनेसियस पर कुंड में गिरने का हुआ अथवा रामकृष्ण परमहंस पर काली माँ के दर्शन का हुआ।

किसी भी प्रतीति अथवा अनुभव, अथवा मत-आस्था से अभिन्न, सत्य यह है कि आप अपने विचारों, शब्दों एवं कृत्यों के अनुरूप ही आध्यात्मिक होते हैं – आध्यात्मिक सामंजस्य के तीन स्तम्भ। किसी भी अनुभव की सुनिश्चितता का उतना महत्व नहीं जितना उस प्रसंग से प्राप्त आत्मानुभूति का है। वास्तव में ऐसा ही तो होता है वह ईश-कृपा का क्षण – एक आत्मानुभूति।और, यही तो जिंदगी है – ईश-कृपा से भरपूर एक अनुभूती।

शांति।
स्वामी