सुभूति, बुद्ध के प्रमुख शिष्यों में से एक थे व बहुत समय से अपने गुरु की शिक्षाओं को चहुं ओर पहुंचाने के इच्छुक थे। एक सुबह, जब बुद्ध जेतवन में आए हुए थे, तो सुभूति ने उनके ठहरने के स्थान, गंडकुटीर के बाहर बुद्ध को दंडवत प्रणाम किया, व उनके संदेश को चारों दिशाओं में फैलाने हेतु उनकी आज्ञा मांगी।

“उठो सुभूति,” बुद्ध ने कहा। “शिक्षक बनना कोई सरल कार्य नहीं होता। यदि आप बहुत अच्छे शब्द भी कह रहे होंगे, तब भी ऐसे बहुत से लोग होंगे तो आपकी आलोचना व निरादर करेंगे।”
“हे शास्ता! आपकी कृपा एवं आशीर्वाद से मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस सब का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। क्या मुझे तथागत की अनुमति है?”

बुद्ध कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए व कोई टिप्पणी नहीं दी। सुभूति अपना मस्तक नीचे किए वहीं बैठे रहे। इस बीच अन्य भिक्षु जेतवन व अन्य विहारों से संबन्धित महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए बुद्ध के पास आते जाते रहे, चूंकि बहुत से नए एकांतवास व मठ सम्पूर्ण भारतवर्ष में बनाए जा रहे थे। तीन घंटे के उपरांत बुद्ध ने भोजन ग्रहण किया व विश्राम हेतु अपनी कुटिया में चले गए।

कुछ घंटे और व्यतीत हो गए और जब शाम को प्रवचन हेतु बुद्ध बाहर आए, सुभूति उस समय भी मस्तक झुकाये बाहर ही बैठे थे।

“सुभूति,” बुद्ध बोले, “तुम अभी भी यहीं बैठे हो। मुझे लगा था कि मेरे मौन में तुम्हें अपना उत्तर मिल गया होगा।”
“प्रभु! मैं इतना बुद्धिमान नहीं कि तथागत के मौन का अर्थ जान पाऊँ। कोई भी इतना बुद्धिमान नहीं।”
बुद्ध मुस्कुराए व अपनी कमलासन मुद्रा में विराजमान हो गए।

“यदि तुम किसी गाँव में कुछ संदेश समझाने जाते हो और लोग तुम्हें सुनना ही पसंद न करें; तब तुम क्या करोगे, सुभूति?”
“प्रभु, मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगेगा। मैं स्वयं को स्मरण कराऊंगा कि कम से कम लोग मुझे बुरा भला तो नहीं न कह रहे या मुझे गाली तो नहीं न दे रहे।”
“और यदि वे ऐसा करें तब क्या?”
“हे तथागत! ऐसे में भी मैं मुस्कुराऊंगा कि आपका संदेश लोगों तक पहुंचाने का यह तो अति-लघु मूल्य है जो मुझे चुकाना पड़ रहा है। यह भी कि वे इससे भी बुरा कुछ और कर सकते थे, जैसे मुझे शारीरिक कष्ट पहुंचाना।”
“और तब क्या, यदि वे सच में तुम पर पत्थर बरसाने लगें?”
“तथागत के आशीर्वाद से मैं तब भी प्रसन्न रहूँगा। मैं स्वयं को स्मरण करवाऊँगा कि कम से कम उन्होंने मुझे चाकू आदि के वार से घायल तो नहीं न किया।”
“तब क्या यदि वे ऐसा ही करें?”
“मैं यह सोच कर प्रोत्साहित महसूस करूंगा कि चलो उन्होंने मुझे जान से तो नहीं मारा।”
“और सुभूति, यदि उन्होंने तुम्हें जान से ही मार डाला तो?” बुद्ध ने अपने स्वाभाविक अनासक्त भाव से कहा।
“तथागत! मैं अतिशय हर्षित होऊँगा” सुभूति ने पहली बार अपना मस्तक उठा कर कहा। नेत्रों में अश्रु व हृदय में बुद्ध का सलोना रूप सजाये, सुभूति कहते गए, “तथागत के चरण-कमलों में प्राण त्यागने के अलावा, निर्वाण का इससे सुंदर मार्ग क्या होगा कि तथागत के संदेश का प्रसार करते हुए ही मेरे प्राण चले जाएँ।”

“सुभूति,” बुद्ध बोले और अपने आसन से खड़े हो उसे गले से लगा लिया, “तुम शिक्षक बनने के पूर्णत: योग्य हो। सुबह तुम्हारे धैर्य की परीक्षा थी। तुम्हारे अंदर एक महान ध्येय के प्रति समर्पण की आध्यात्मिक प्रवृति विराजमान है।”

किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रवृत्ति को व्यक्त करते हुए तीन प्रमुख गुणों को और कुछ भी शायद इससे अधिक अच्छे प्रकार से परिभाषित नहीं कर पाता, वे गुण हैं – धैर्य, पूर्णत: निःस्वार्थ भाव, व दृढ़ संकल्प। सुभूति के व्यक्तित्व में मुझे कृतज्ञता का भाव एवं समर्पण भी दिखाई दिये। धैर्य एवं निःस्वार्थ भाव को बढ़ाए बिना हम एक निष्काम आध्यात्मिक रुझान विकसित नहीं कर सकते।

मनुष्य को अनुभव होते कष्टों के मूल में बहुधा इच्छाओं व अपेक्षाओं का पूर्ण न होना ही हेतु बनता है। लोग मुझे महत्त्व क्यों नहीं देते? मेरा साथी मुझे प्रेम क्यों नहीं करता? सम्पूर्ण विश्व मेरी प्रतीक्षा में रत क्यों नहीं? मेरे कार्य की प्रशंसा क्यों नहीं की जाती? और न जाने क्या क्या।

यदि मैं इस तथ्य पर लंबा सा प्रवचन देना आरंभ कर दूँ कि क्यों अपेक्षाएँ रखना एक बुरी बात है, तो इससे कोई लाभ नहीं क्योंकि आप वह सब पहले से ही जानते हैं। हम अपनी भावनाओं एवं आकांशाओं द्वारा इस तरह जकड़े व उनके नियंत्रण में होते हैं, व उनकी तीव्र वेदना से भरे अन्तःकरण को अपना दृष्टिकोण इतना सही व वैध प्रतीत होता है कि उस समय कोई और तर्क सफल नहीं होता। तथापि, आध्यात्मिक यात्रा में आगे न बढ्ने का वह कोई कारण नहीं हो सकता।

और, यह बात मुझे आज के विषय के मूल तक ले जाती है – एक आध्यात्मिक प्रवृत्ति। जब तक हम अपने स्वयं के व दूसरों के जीवन के प्रति एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण नहीं अपनाते व उसे प्रोत्साहन नहीं देते, तब तक हम अपने निम्न स्तर के विचारों एवं भावनाओं से ऊपर उठने का सोच भी नहीं सकते। हम सदा अपने आराम पर ही आवश्यकता से अधिक बल देते हैं, कि क्यों मेरे साथ ही इस प्रकार का व्यवहार किया जा रहा है अथवा तो मुझे पूछा नहीं जा रहा? कैसा हो यदि “मैं” थोड़ा और निःस्वार्थी बन जाऊँ? क्यों न “मैं” कुछ और बाँटने वाला हाथ बन जाऊँ? सुभूति के विरोध में खड़ी भीड़ का हिस्सा बनने के स्थान पर “मैं” स्वयं ही सुभूति क्यों नहीं बन जाता?

एक आध्यात्मिक प्रवृत्ति का मूल रूप से यह अर्थ होता है कि विभिन्न निर्णयों व कार्यों को करते समय हम सदा स्वयं को ही केंद्र में न रखें। शायद हमेशा हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि इसमें “मेरे” लिए क्या है? क्यों हमेशा हमारे हर उदार कार्य को प्रतिदान में कुछ मिलना ही चाहिए? अंततः वह वास्तव में एक निस्वार्थ कर्म है तो उसे वैसा ही रहने दें।

क्या आपने कभी गौर किया है कि कभी कभी हम जब किसी को उपहार देते हैं तो कैसे हम यह जानने को उत्सुक रहते हैं कि उसने उस उपहार का क्या किया? और, शायद हमें यह जान कर दुःख भी होता हो कि उसने उपहार का उपयोग न कर उसे आगे किसी ओर को दे दिया। इसका अर्थ यह हुआ कि वास्तव में हमने उपहार से जुड़े अपने लगाव को तो छोड़ा ही नहीं। तब उपहार ‘देने’ की क्रिया का समापन ही कहाँ हुआ?

यदि आप दूसरों की सहायता से जुड़ा कोई कार्य करना चाहते हैं, कोई ऐसा ध्येय जो आपके अस्तित्व को दूसरों के लिए उपयोगी बनाए, और प्रतिफल में जो आपके जीवन को ओर संतुष्टिपूर्ण बना दे, तो जीवन के प्रति व सम्पूर्ण जगत के प्रति एक आध्यात्मिक प्रवृत्ति विकसित करना अनिवार्य है। इस सब से यह अर्थ निकलता है कि चूंकि दूसरा व्यक्ति मेरे कष्ट का हेतु बन रहा है, अथवा लोग मुझसे असहमति रख रहे हैं, और सही प्रतिक्रिया नहीं दे रहे तो क्या मैं धैर्य, निःस्वार्थ भाव एवं करुणा का त्याग कर दूँ? नहीं। और, कई बार अपनी छोटी-छोटी व्यक्तिगत समस्याओं से ऊपर उठने का एक मात्र मार्ग यही होता है कि अपनी ऊर्जा किसी बड़े कार्य में संप्रेक्षित कर दी जाए। चिंता करना अथवा हर समय तनाव से थके मांदे से रहना – यह हमारी मूल प्रवृत्ति है, हमारा स्वभाव-संस्कार। तो क्यों न हम किसी बृहद एवं परोपकारिता के ध्येय की दिशा में चिंतित हों, बजाय अपने निम्न स्तर की चिंताओं से धराशाही होने के।

मुल्ला नसरूदीन अपने मित्र के साथ बाहर घूम रहे थे कि अचानक न जाने कहाँ से आकाश में बादल छा गए। इससे पहले कि वे कुछ कर पाते, वर्षा आरंभ हो गई।
“मुल्ला, अपना छाता तो खोलो,” उसका मित्र चिल्ला कर बोला, “प्रभु का शुक्र है कि हमारे पास छाता है।”
“यह छाता किसी काम का नहीं”, बारिश के शोर में मुल्ला तेज आवाज़ में बोला। “इसमें बहुत से छेद हैं।”
“तो तुम इसे अपने साथ ले कर क्यों घूम रहे हो?”
“अब मुझे कहाँ पता था कि बारिश होने वाली है!”

मुल्ला की ही भांति हम अपना बोझा लिए घूमते हैं, अपना “मैं” सबसे पहले का छाता, यह सोच कर कि यह हमारी सहायता करेगा, हमें बचा लेगा, किन्तु इसमें तो छेद ही छेद हैं। यह हमें या जो भी हमारे आसपास हैं उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता। न तो धूप से और न ही वर्षा से। इसमें कोई दो राय नहीं कि आप को स्वयं का ध्यान रखना ही है, स्वयं की प्रसन्नता का ध्यान, किन्तु अपना पूरा जीवन मात्र ऐसा करने में ही व्यतीत कर देना, अज्ञानता है। यह आध्यात्मिक तो कदापि नहीं, और यह कभी संतुष्टि प्रदान करने वाला भी नहीं होगा।

यदि आपको आत्म-संतुष्टि की तलाश है तो अपने से आगे देखना सीखें। और तो और, ध्यान की सभी विधियों, योग आदि से भी आगे। ये विधियाँ आपको आत्म-संतुष्टि तक ले जाएँ, यह अनिवार्य नहीं। भले ही यह सब हमें शब्दों, कार्यों व बातचीत के प्रति सजग व सचेत बनाए, किन्तु, अंततोगत्वा, वह हमारी प्रवृत्ति ही है जो हमारी संतुष्टि को ईंधन प्रदान करती है। इतिहास के पन्ने ऐसे कई विभिन्न धर्मों से संबन्धित संतों के निःस्वार्थ भाव से भरे जीवन से भरे पड़े हैं, जिन्होंने न कभी ये किया और न वो, वे कभी भी ग्रन्थों में वर्णित रीतिनुसार न तो कभी ध्यान में बैठे, और न योग ही किया। तो क्या वे किसी भी दृष्टि से कुछ कम प्रबुद्ध थे? मुझे ऐसा नहीं लगता। जिस गुण से उन सब का व्यक्तित्व सुसज्जित था वह है एक करुणा से भरा, सौहार्दपूर्ण विश्वव्यापी दृष्टिकोण।

जितना अधिक आध्यात्मिक आपका दृष्टिकोण, उतना विशाल आपका जीवन बनता जाता है। तब क्षमा, निस्वार्थ भाव, धैर्य, करुणा एवं कृतज्ञता, स्वाभाविक ही, बिना किसी व्यवधान के, इस प्रकार बहने लगते हैं जैसे मानसून में हिमालय से गिरते जल-प्रपात।

धैर्यवान बनें। जितना आप प्राप्त करना चाहते हैं, उतना लेने से पूर्व उससे कहीं अधिक देना आरंभ करें। प्रकृति प्रतिदान में आपको भर देगी। वह कभी भी ऐसा करने से चूकती नहीं।

शांति।
स्वामी