मेरा सदा यह प्रयास रहता है कि मुझसे जो भी प्रश्न किया जाये मैं उसका जितना संभव हो उतना स्पष्ट उत्तर दूँ। किन्तु कुछ प्रश्न ऐसे भी हैं जिनका उत्तर मैं नहीं देना चाहूँगा। इसलिए नहीं कि मेरे पास कहने को कुछ नहीं, वरन इसलिए कि प्रश्नकर्ता के लिए सत्य बहुधा कष्टदायी होता है।

गत वर्ष, मेरी विदेश यात्रा के दौरान, एक दंपति व्यक्तिगत भेंट के लिए प्रवचन के उपरांत मेरे पास आए। समय की वहाँ अत्याधिक कमी थी और मैं किसी को भी पाँच मिनट से अधिक का समय नहीं दे रहा था। उनका नाम पूर्वनिर्धारित सूची में भी नहीं था। तथापि मैंने अपने सहायक से कहा कि उन्हें भी मिलने का समय दे दिया जाये।

उन्हें आने दिया गया व किवाड़ ढांप दिया गया। उनके चेहरे पर किसी भी प्रकार की मुस्कान न थी; वे आए, विनम्रतापूर्वक बैठ गए व पहले कुछ मिनट तक चुप रहे।

मेरे अन्तःकरण ने प्रेरणा दी कि उन्हें कुछ और समय की आवश्यकता है। उनकी समस्या साधारण नहीं थी। मैं उठा और अपने सहायक से बोला कि २० मिनट का समय इनके लिए रखें।

“बीस मिनट?” वह अचंभित हो कर बोला।
“हाँ, बिना व्यवधान के २० मिनट। हो सकता है २५ भी”।

मैं पुनः अपने स्थान पर बैठ गया। एक मिनट और बीता, व ये सज्जन रुदन करने लगे। तीव्र स्वर में। कहीं न कहीं, मैं जानता था कि उन्हें इससे राहत मिल रही है और मैंने कुछ क्षण के लिए उनके आंसुओं को बहने दिया। इस समय के दौरान, उनकी पत्नी शांत भाव से मुझे देखती रही। वह भी बिना आवाज़ किए रो रहीं थीं। अंत में उन्होंने अपने आँसू पोंछे, स्वयं को शांत किया और एक गहरी श्वास ली।

“स्वामी”, वह बोले, “हम… हम….” और उन्हें पुनः रोना आ गया। अब वे दोनों ही रो रहे थे। अपने स्थान से उठ, मैं उनके समीप गया व उनके सिर पर हाथ फेरा, जैसे माता-पिता अपने बच्चे का सिर सहलाते हैं।

“जो भी है, सब ठीक है”, मैंने कहा, “मैं इस सब का सामना करने में आपकी सहायता करूंगा। आपके जीवन में आए रिक्त स्थान को भरा नहीं जा सकता, तथापि सुबह तो होनी ही है”।
“आप जानते हैं स्वामी, आप सब कुछ जानते हैं”। और वे और अधिक रोने लगे।

मैंने अपने हाथ उनके सिर पर ही रहने दिये व शांति हेतु प्रार्थना की। वे शांत हो गए।

“स्वामी”, वह महिला बोलीं, “यह पहला अवसर है कि पिछले पाँच वर्षों में इनके आँसू आए हैं। मैं बहुत चिंतित थी कि…”

“नहीं, मुझे बोलने दें”, उन सज्जन ने बीच में ही टोका। “आज मैं अपनी कहानी बताना चाहता हूँ। स्वामी, वह मेरा 50वां जन्मदिवस था। मेरे दो पुत्र व दो पुत्रियाँ थीं। हम सब मिल कर रात्रि भोज के लिए बाहर गए थे व बहुत अच्छा समय साथ साथ बिताया। सब कुछ ठीक ही लग रहा था, हम सब घर लौट आए। अगली सुबह मेरा बड़ा बेटा अपने कमरे से बाहर नहीं आया। कुछ समय बीतने पर हम सब चिंतित हो गए और दरवाजा तोड़ दिया। वह बाथ-टब के पास अपने ही रक्त से सना, निढाल पड़ा था। उसने अपनी कलाई की नस काट ली थी”।

वह सज्जन पुनः सुबकने लगे। मैंने उन्हें टिशू बॉक्स दिया। उन्होंने अपने बेटे द्वारा लिखे सुसाइड नोट के बारे में बताया व अपने जीवन में चल रहे अन्य संघर्षों से मुझे अवगत कराया। उन्होंने कहा कि उस घटना के पश्चात वे कभी भी बाहर खाना खाने नहीं गए और न ही कभी कोई यादगार दिन आदि मनाया।

“स्वामी, हम दृढ़-कैथोलिक ईसाई हैं”, उन्होंने कहा। “वह रविवार की चर्च-सेवा में कभी भी अनुपस्थित नहीं रहा। उसे पता था कि आत्महत्या एक पाप है। वह एक बहादुर बच्चा था। उसने ऐसा कायरता पूर्ण कदम क्यों उठाया”?

मैंने उनके दर्द को महसूस किया। संसार में ऐसे माता पिता के दु:ख से बड़ा और कोई दुःख नहीं जिन्हें अपने से पहले अपने बच्चे को इस दुनिया से अलविदा होते देखना पड़े।

“हर कोई यह सोचता है कि उसकी मृत्यु के लिए हम उत्तरदायी हैं”। वह बोलते रहे। “मुझे अपराध बोध होता है। क्या मैं एक बुरा पिता था? उसने ऐसा क्यों किया? वह मात्र २४ वर्ष का था”।
“क्या आप सत्य को मेरे दृष्टिकोण से जानना चाहेंगे, मैंने कहा, “अथवा आप वह सुनना चाहते हैं जो पवित्र ग्रन्थों में वर्णित है”?
“हमें आप पर पूर्ण आस्था है स्वामी”, वे बोले। “कृपया हमें “सत्य” से अवगत कराएं”।

यह सत्य है कि अधिकांश धर्म आत्महत्या को पाप मानते हैं। ईसाई धर्म में इसे स्वयं की हत्या ही माना जाता है। हिन्दू धर्म भी इसे आत्महत्या की संज्ञा देता है। विभिन्न धर्मों के ग्रंथ हमारी देह को ईश्वर का मंदिर कह कर संबोधित करते हैं। (कोरिन्थ्यीयन ३:१६-१७, अथवा भगवदगीता १७.६) यह सब उचित है (हालांकि मैं इस दावे से सहमति नहीं रखता कि सूइसाइड स्वयं की हत्या है) सत्य यह है कि वास्तविक दुःख के समक्ष धर्म बहुत रूखा व बेमेल हो सकता है। यह लोग ऐसे पहले दंपति नहीं थे जिन्हें मैं मिल रहा था जिन्होंने सूइसाइड से अपना बच्चा खो दिया हो, इसलिए ऐसे अन्य अवसरों के अनुसार ही आज भी मैं ग्रन्थों की किसी बात का यहाँ उल्लेख नहीं करना चाहता था, भले ही वे ग्रंथ कितने भी पवित्र व दिव्यता से भरपूर हों।

“आपके पुत्र ने कोई पाप नहीं किया”, मैं बोला, “मृत्यु का कारण तो कुछ भी हो सकता है। हम सब एक ही गाड़ी में यात्रा कर रहे हैं। हम में से हर एक को किसी न किसी स्टेशन पर उतरना ही है। कुछ थोड़ा जल्दी बीच में ही उतर जाते हैं। वे अपनी यात्रा बीच में ही छोड़ देते हैं। यही है जिसे मृत्यु कहा जाता है, यह एक विराम है, एक मध्यांतर, हालांकि एक अति कष्टकारी विराम!”
“यदि आप को मुझ पर विश्वास है तो मैं आपको बताना चाहूँगा कि मैं ऐसा नहीं मानता कि आत्महत्या एक पाप है और मुझे नहीं लगता कि यह एक कायरतापूर्ण कृत्य है। आपका पुत्र नरक में कदापि नहीं है। उससे स्वर्ग छीना नहीं गया है। बस उसकी आत्मा अपना नया घर ढूंढ लेगी।”
“और, अपने पुत्र की मृत्यु के लिए ‘आप’ उत्तरदायी नहीं हैं। अपने जीवन का अपने ही हाथों अंत करने का विचार गहन विषाद की अवस्था से उत्पन्न होता है, यह एक मानसिक रोग का सर्वाधिक विनाशकारी परिणाम है। जिस प्रकार एक डॉक्टर को किसी रोगी के कैंसर के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, उसी प्रकार किसी बच्चे द्वारा आत्महत्या कर लेने के लिए उसके माता पिता कभी भी जिम्मेदार नहीं हो सकते।”

“स्वामी”, वह पिता बोले, “एक सप्ताह पूर्व मेरा उसके साथ कुछ विवाद हुआ था, किन्तु मैंने सोचा कि हममें सुलह हो गई है।”
“क्या वह पहला अवसर था जब आपकी उसके साथ कुछ कहा सुनी हुई हो?”, मैंने पूछा।
“नहीं।”
“तो, वह बहस न तो उकसाने की वजह थी और न ही कारण । वह तो उसकी स्वयं की मानसिक दशा थी।”
“आपकी हानि अपरिमित है”, मैंने कहा, “जख्म बहुत गहरा है। इसे भरने में बहुत अधिक समय लगेगा। कोई भी आपके पुत्र का स्थान नहीं ले सकता। किन्तु अपनी जिंदगी को न जी कर आपको नहीं लगता कि आप स्वयं व अपने दूसरे बच्चों के साथ अन्याय कर रहे हैं?”

उसी क्षण, उस कक्ष में व्याप्त ऊर्जा का स्वरूप परिवर्तित हो गया। वह ऐसा था मानो वे किसी बुरे स्वप्न से जगे हों। अकस्मात उन्हें आभास हुआ कि केवल अपने पुत्र की मृत्यु के शोक में डूबे रह कर मानो वे अपने अन्य बच्चों को जीवन जीने के उपहार से वंचित कर रहे हों। वह एक प्रभु-प्रकाश (epiphany) का क्षण था।

“ओह स्वामी!”, वह बोले, “मुझे महसूस हो रहा है मानो मेरे मन के ऊपर से एक भारी बोझ हट गया है। आप सही हैं। हमें अपने दूसरे बच्चों के लिए जीना चाहिए, अपने लिए, व अपने पालनहार प्रभु के लिए जीना चाहिए।”

वे दोनों मुस्कुराए। दोनों ने एक दूसरे की ओर प्रेमपूर्वक दृष्टि डाली और फिर मुझे देखा व हल्के से हँसे।

मेरा मानना है कि आत्महत्या को कायरतापूर्ण कृत्य कहना उस व्यक्ति के रोग को अति लघु-दृष्टि से देखना होगा जो व्यक्ति अब इस दुनिया में नहीं है। उनकी पीड़ा इस सीमा तक बढ़ चुकी होगी; उनका दुःख, उनकी निराशा, उनका मार्ग इतना अधिक अंधकारमय, कि इस सबसे बाहर निकल पाने का मात्र एक मार्ग जो उन्हें दिखाई दिया वह था अपना जीवन समाप्त कर देना।

वैसे देखा जाये तो मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति को नहीं जानता जिसने कभी न कभी मृत्यु को ही एक उपयुक्त विकल्प न समझा हो, भले ही मात्र एक क्षण के लिए, अपने जीवन के कष्टों से छुटकारा पाने के लिए। केवल मानव जाति ही आत्महत्या करती/कर सकती है। हमारे समक्ष विभिन्न प्रकार की धार्मिक धारणाएँ विद्यमान हैं व हम सोचते हैं कि हमने सब कुछ समझ लिया है, कि जिंदगी को एक विशेष प्रकार से ही होना चाहिए। किन्तु, जीवन को इस सब की कोई परवाह नहीं। जब जब यह हमें अलविदा का संदेश भेजता है, हमें लगता है हमारे साथ धोखा हो गया, हम निराशा में डूब जाते हैं। हम सोचते हैं जिंदगी कठोर है (जो कि यह वास्तव में है), और, उस मचलते हुए अधीर बालक की भांति जिसे टॉफी चाहिए, हम भी इसकी मिठास पुनः चखना चाहते हैं। हम अपने दुःख से बाहर आना चाहते हैं। हम किसी तत्कालिक हल की लालसा करते हैं, और उसके आसान होने की भी।

मनुष्य का मन एक अजीबोगरीब दृगविषय है। अपने क्रूर क्षणों में यह मृत्यु को जीवन से भी अधिक सुंदर दिखाने की क्षमता लिए है; किसी स्वप्न से भी अधिक आकर्षक। तथापि, इसका यह अभिप्राय कदापि नहीं कि मृत्यु एक विकल्प है। आत्महत्या अपने आप होने वाला कृत्य नहीं, न ही यह सचेतन चुनाव है । भले ही यह जिस प्रकार से आए, कोई भी अपना जीवन समाप्त करने का “चयन” नहीं करता। इस बात का संज्ञान लेते हुए कि इस दुनिया में रहने वाले ७०० करोड़ लोगों में से अधिकांश का जीवन कितना कठिन व कष्टों से भरा हुआ है यदि आत्महत्या “चयन” का विषय ही होता, तो अब तक बहुतों ने इसे हँसते हँसते अपना लिया होता।

आत्महत्या एक अंतिम चरण पर पहुंचा रोग है। यह एक मानसिक रोग की अंतिम अवस्था है।

यदि आप में आत्म हत्या के विचार निरंतर विद्यमान हैं तो आपको तत्काल सहायता लेनी चाहिए। आत्महत्या के विचार आने का यह तात्पर्य नहीं कि आपका जीवन बहुत बुरा है, इसका अभिप्राय यह है कि आपके विषाद (डिप्रेशन) से भरे मन ने पूर्ण रूप से आपको नियंत्रित कर लिया है। इसका अर्थ है कि आपकी विचार करने की स्वतन्त्रता अब आपके ही मन द्वारा पूर्ण रूप से बाधित कर दी गई है। जीवन की सुंदरता को पुनः स्थापित करने का कोई मार्ग सदा होता ही है और जब मृत्यु ही केवल मात्र एक द्वार दिखे तो आप अवश्य ही सही दिशा की ओर नहीं देख रहे।

एक प्रख्यात उपदेशक एक बगीचे में बैठे थे जब उन्होंने किसी युवा लड़के द्वारा अपने मित्र को कहते हुए सुना कि कोई भगवान नहीं होते।
“मेरी उपदेश-सभा में आना”, उपदेशक बोले, “मैं तुम्हें ईश्वर का मार्ग दिखाऊँगा।”
लड़का बोला, “श्रीमान, यह तो बताएं कि जब घोड़ा, गाय और हिरण – सब घास ही खाते हैं तो क्यों उनका उत्सर्जित किया पदार्थ अलग होता है? हिरण छोटे छोटे कण निकालता है, जबकि गाय समतल रूप से गोबर, वहीं घोड़ा मोटे मोटे चकते उत्सर्जित करता है!”
“आ आ आ ….., मुझे कोई अंदाज़ नहीं”, उपदेशक प्रश्न पर हँसते हुए बोला।
“ओ, ये बात है”, बालक ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया। “तो क्या आपको नहीं लगता कि यह कुछ ज़्यादा ही है जब आप कहते हैं कि आप मुझे ईश्वर का मार्ग दिखायेंगे, जबकि आपको तो गोबर का भी ज्ञान नहीं!”

एक क्षण के लिए अपने भय, अपनी धारणाएँ और अपने विश्वास – सब कुछ त्याग दें। अपने अन्तःकरण की आवाज़ सुनें। कोई भी व्यक्ति, वस्तु, या स्थिति आप में भय उत्पन्न करने में अथवा आपमें अपराध बोध जगाने में सफल नहीं होना चाहिए। यह जीवन, यह पल, बस यही है। यह ही सत्य है। बिलकुल यहीं पर। ये ही स्वर्ग अथवा नरक हैं। चूंकि हम यहाँ “हैं”, तो बेहतर होगा कि हम इसे जिएँ। आइये, जीवन रूपी नदिया के साथ साथ बहते चलें। आपका अतीत जैसा भी था, उसे एक ओर कर दें, उसे जाने दें। अपने वर्तमान को इतना सुंदर बना दें, इतना उपयोगी और अर्थपूर्ण कि मृत्यु भी आपके चरणों में आकर झुक जाये, और आपसे प्रार्थना करने लगे कि कुछ देर और यहाँ रुको; क्योंकि आप आसपास हो तो मृत्यु भी जीवन का आनंद लेने लगती है।

कृतार्थ रहें। दूसरों की सेवा-सहायता करें। स्वयं से कहीं बड़ा कोई लक्ष्य धारण करें। और, मैं वचन देता हूँ कि आपकी जिंदगी बिलकुल नए मायने लिए, एक नितांत नूतन-नवीन रूप में खिल उठेगी।

शांति।
स्वामी