क्या आपको कभी ऐसी अनुभूति हुई कि आपने अपने जीवन में कोई सार्थक कार्य नहीं किया? अथवा तो यह कि आप अपने स्वप्नों के अनुरूप जीवन नहीं जी पाये? यदि हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं। प्रायः, जीवन को हम एक अविभक्त इकाई के रूप में ही देखते हैं। हमें लगता है चूंकि अब हम युवावस्था से बहुत आगे आ चुके हैं, अतः अब सब कुछ खो चुका है। कि, अब अधिक कुछ नहीं किया जा सकता। आज, मैं आपके समक्ष एक भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहता हूँ। कुछ ऐसा जिसका मैंने अपने जीवन में अवलोकन किया व ऐसे अनेक लोगों के जीवन में भी, जिन्हें मैं जानता हूँ व भेंट कर चुका हूँ। (स्वयं को एक लंबा लेख पढ़ने हेतु सज्ज रखें। यहाँ जीवन पर बात हो रही है, जो मात्र बालक्रीड़ा नहीं)।

जीवन भले कुछ भी हो, किन्तु यह एक इकाई कदापि नहीं। वास्तव में यह अनेकानेक क्षणों व अनुभवों का क्रमबद्ध रूप है। कैसा लगता यदि मैं आपसे कहता कि वास्तव में हम एक जीवन में अनेक जीवन जीते हैं? और, यह हम पर निर्भर करता है कि हम उन अनेक के हर जीवन को भरपूर जिएँ जो हम एक जीवन में जीते हैं। जीवन का हर दशक जो हम जी लेते हैं, वह हमें एक भिन्न व्यक्ति बना देता है। हर दशक स्वयं में एक नए जीवन की भांति है।

० – १०

० – १० वर्ष की आयु में प्रायः हम अपने माता-पिता के संपूर्ण संरक्षण में होते हैं। हमारी पहचान उनकी पहचान से गहराई पूर्वक जुड़ी होती है। हम बोल-चाल, व्यवहार करना, खाना-पीना इत्यादि सीखते हैं। उनके श्रद्धा-विश्वास ही हमारे श्रद्धा-विश्वास होते हैं। हम उन्हें ध्यान पूर्वक देखते हैं और तदनुसार अनुसरण करने लगते हैं। प्रेम-पूर्वक व निष्कपट भाव से, हमारा समाज हमें इस संसार को एक निश्चित दृष्टि से देखने की ओर अनुबंधित कर देता है। हमें आभास भी नहीं होता कि कब अपने माता-पिता, अध्यापकगण एवं अन्य लोगों की ही भांति, हम स्वयं भी वैसा व्यवहार करने लगते हैं। हम स्वयं की धारणाएँ एवं पूर्वाग्रह बना लेते हैं। हमारे मन में, अपने परिवेश को देख देख कर एवं स्वयं द्वारा ग्रहीत विभिन्न भावों पर आधारित, संसार के प्रति एक दृष्टिकोण बनना आरंभ हो जाता है। हमारी कल्पना विस्तृत व लक्ष्यहीन होती है। हमारे खेल-खिलौनों में ट्रांसफोरमेर्स एवं गुड़िया आदि व साथ-साथ लीगो सेट्स शामिल हो जाते हैं। टॉफी-चॉक्लेट का स्वाद विस्मयकारी प्रतीत होता है, साथ ही मीठे से बने सभी अन्य पदार्थों का भी। हमारे स्वप्न विलक्षण होते हैं; हों भी क्यों न, स्वप्न तो स्वप्न होते हैं। हम नई चीजें सीखने को आतुर रहते हैं व हमें लगता है कि दुनिया में हम जो चाहें और जैसा चाहें वैसा बन सकते हैं।

११ – २०

११ – २० के मध्य, हम अपनी स्वयं की पहचान बनाना आरंभ कर देते हैं। हमें स्वयं की लैंगिगता का आभास होता है, यौन-अनुभवों से सामना होता है। हमें विभिन्न मतों को प्रश्नचिन्ह की दृष्टि से देखना आ जाता है व हमारे जीवन, हमारे सपनों में, माता पिता का स्थान कुछ पीछे चला जाता है। हमें उनकी आवश्यकता तभी होती है जब हमें उनसे कोई अपेक्षा होती है। हम हर प्रकार से, हर तथ्य के लिए, अपनी स्वयं की राय बना लेते हैं (और, अधिकांशतः, व दुर्भाग्य से, जीवनपर्यंत हम अपने उसी मत के साथ बंधे रहते हैं)। हमें लगता है कि मित्र अधिक महत्वपूर्ण हैं; मेरे अपने लक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण हैं, मेरे माता-पिता उबाऊ हैं, व उनकी धारणाएँ बहुत पुरानी। हम जीवन का अन्वेषण निर्भीक हो कर करने लगते हैं व नए नए आयाम खोजने लगते हैं।

लड़कियाँ, मोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, बाइक्स, अथवा तो लड़के, सपने व फ़ैशन – ये हमारे मन-मस्तिष्क पर हावी रहते हैं। संभवतः विडियो गेम्स एवं पुस्तकें भी (पाठ्यक्रम की पुस्तकें नहीं)। हर दिन नया आकर्षण, नया प्रेमोन्माद। आप प्रेम में इतनी तीव्रता से पड़ते हैं जैसे केले के छिलके पर फिसलना। हम कुछ स्तंभित करने वाली भूल करते हैं (देखा जाये तो ऐसा हम जीवन के हर दशक में करते हैं)। हमारे मस्तिष्क में स्वयं को लेकर अपनी धारणाएँ ठोस होती जाती हैं। अपने किशोरावस्था के वर्षों से बाहर आते आते प्रायः सभी किशोर अपने को पराजित अथवा सफल की श्रेणी में डाल लेते हैं। तदनुसार, हमारा जीवन रूप लेने लगता है। अन्यमनसक्ता (ध्यान भंग) बढ़ने लगती है।

हमें लगता है कि हम जीवन के लगभग सभी बड़े निर्णय ले चुके हैं। विशेषकर, शिक्षा में पढ़ने हेतु एक मुख्य विषय अथवा कोई नई विधा सीखने से संबन्धित (जैसे संगीत, नृत्य, खेल इत्यादि)। तथापि, यह दशक विगत दशक का मात्र आगामी सत्र नहीं था, व यदि आप इसके बारे में विचार करें तो यह पूर्णत: नवीन दशक था। जैसे जैसे आपने स्वयं को जाना अथवा अपनी किशोरावस्था के वर्षों में अपना आधार खोजा, अपनी भ्रांतियों से पार पाया, तो आपने एक पूर्ण रूप से नए जीवन को जिया। प्रथम दस वर्ष में जो शिशु आप थे, इस दशक की समस्याएँ सुलझाते समय आप वह शिशु कदापि न थे। आपके नए रूप ने यह सब संभाला। जब तक आप २० के पार पहुँचते हैं, आप एक भिन्न व्यक्ति के रूप में उभरते हैं।

२१ – ३०

२१ से ३० वर्ष में, हालांकि हम अभी भी निर्भीक (संभवतः लापरवाह भी) हैं, तथापि इस संसार की वास्तविकता हममें हमारे स्वप्नों व लक्ष्यों के प्रति एक व्यापक परिवर्तन ले आती है। हम क्या कर सकते हैं और क्या नहीं – इसके प्रति हमारी जो धारणाएँ बन चुकी हैं, हम स्वयं को उसी के अनुसार ढाल लेते हैं, हालांकि प्रायः वह धारणाएँ विकृत व भ्रामक जानकारी पर आधारित होती हैं। आप कुछ और इधर उधर भटकते हैं, किन्तु कहीं न कहीं आप “अपने उस एक” की तलाश आरंभ कर देते हैं। आप कुछ और व्यावहारिक हो चुके हैं। जीवन के इस दशक के मध्यान में, हममें से अधिकांश अपनी औपचारिक शिक्षा समाप्त कर चुके होते हैं व एक ऐसी नौकरी पा कर अति हर्षित होते हैं जिससे हमारा भविष्य आर्थिक रूप से सुरक्षित रहेगा। हमें अनुभव होता है कि हमने अपनी स्वतन्त्रता खोज ली है। आप अपने कमरे से फ़रारी (अथवा अपने पसंदीदा पॉप गायक) के पोस्टर हटा देते हैं और ‘अपनी’ पहली कार लोन ले कर खरीदते हैं। जब तक हम ३० तक पहुँचते हैं, हममें से अधिकांश स्वयं को (अथवा माता-पिता द्वारा प्रेरित) एक जीवनपर्यंत के रिश्ते के लिए तैयार पाते हैं, और विवाह कर लेते हैं।

हालांकि हमारा सामना निराशाओं से भी होता है, तथापि अधिकांश समय हम आशान्वित व हर्षित ही रहते हैं। हमें यह आभास भी होता है कि वास्तव में यह दुनिया उग्ररूप से स्पर्धा से भरी है व किसी के भी पास दूसरे के लिए समय नहीं है। चूंकि अब हमारे जीवन का प्राथमिक केंद्र हमारा कार्य-क्षेत्र (कैरियर) है, तो अब हम उस तरह से स्वप्न नहीं लेते जिस तरह से पहले लिया करते थे। जीवन से अपनी अपेक्षाओं के प्रति हम अधिक व्यावहारिक हो गए हैं। हमें स्वयं को एक अनुभवी, समझदार व “व्यावहारिक” रूप में देखना भाता है। हालांकि अभी भी हम जीवन में खोजरत ही हैं, तथापि, एक प्रकार की स्थिरता आना आरंभ हो जाती है। ऐसे बहुत कम लोग हैं जो एक बार २५ के पार हुए तो फिर कुछ नया सीखना आरंभ करें।

३१ – ४०

३१ से ४० के मध्य हम अपने कार्य-क्षेत्र में उन्नति कि दिशा में अपने सर्वोत्तम प्रयास करते हैं। हममें से अधिकांश इस पूरे दशक को अपने काम व पारिवारिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाते हुए व्यतीत करते हैं। हमारे बचपन व कॉलेज के मित्र न जाने कहाँ गुम हो चुके हैं। हो सकता है हम उनमें से कुछ एक के संपर्क में हों, किन्तु, कुछ भी हो, उनमें से अधिकांश अपने अपने जीवन में व्यस्त हैं। अब आपके अपने बच्चे बड़े हो रहे हैं, तो घर-प्रांगण में ही बहुत कुछ घट रहा होता है। आप गणना करते हैं कि सब कुछ महंगा होता जा रहा है। आपकी आय का एक बड़ा भाग घर का लोन चुकाने में जा रहा है। आप बचत करने का भी विचार करते हैं, कि मुझे नया फोन या नए जूते नहीं लेने चाहियें।

दूसरों का हमारे प्रति क्या भाव है, इस तथ्य से हम कुछ हद तक, अछूते रहने लगते हैं। अधिकांश व्यक्ति इस सत्य से परिचित हो जाते हैं कि हम हर किसी को प्रसन्न नहीं रख सकते; कि, हमें अपनी स्वयं की प्रसन्नता की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आप स्मरण करते हैं कि जब आप बड़े हो रहे थे उस समय किन विधाओं से आपको खुशी मिला करती थी। उस समय, संभवतः आप गिटार बजाते थे या क्रिकेट खेलते थे। अथवा तो, शायद आप चित्रकारी करते हों, या फिर नृत्य। किन्तु, अब ये सुदूर की स्मृतियाँ हैं। शायद आप हमेशा से तैराकी सीखना चाहते थे या टैनिस खेलना, और, कभी कभी, आज भी आप यह सब पुनः आरंभ करने का विचार करते हों।

तब, आपका ध्यान अपने दायित्वों एवं अन्य वचन-बद्धताओं की ओर जाता है, और आप अपने स्वयं के स्वप्न व इच्छाएँ एक ओर कर देते हैं। एक प्रकार की उदासी आपको आ घेरती है, चूंकि भले ही आप जानते हों कि आपको स्वयं की उपेक्षा नहीं करने चाहिए, तथापि आप ऐसा करते हैं, ताकि दूसरे लोगों (आपका साथी, बच्चे, इत्यादि) को बुरा न लगे अथवा वे आपको उनका ध्यान भली प्रकार से न रखने का दोषी न मानें। यह आपकी आत्मा को कष्ट देने लगता है – यह जानना कि आपकी प्रसन्नता किस में है, उस कार्य को करने का सामर्थ्य भी है, तथापि वह सब न करना, अपने परिजनों के विमुख हो जाने के भय से। कभी कभी यह सब कष्टकारी होता है। इस सब के मध्य जीवन में खालीपन बढ़ता चला जाता है।

४१ – ५०

४१ से ५० का एक और दशक होता है। अधिकांश व्यक्तियों में, ४५ से पहले ही अधेड़ावस्था के लक्षण प्राररंभ हो जाते हैं, विषेशरूप से वे जिन्होंने अपना जीवन पुस्तक-विद्या पर आधारित रखा। मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? मैंने अपने लिए ऐसे जीवन की कल्पना तो नहीं की थी, जब मैं किशोरावस्था में, अथवा २०-३० वर्ष का था। क्या मैंने अपना जीवन विफल कर दिया? मैंने अपने जीवन के विगत २० वर्ष अपने परिवार को दे दिये, तथापि कोई भी प्रसन्न नहीं लगता, आभार मानना तो दूर की बात है। मैंने अपना ध्यान बिलकुल भी नहीं रखा, सदा उनके बारे में पहले सोचा, किन्तु फिर भी आज मैं एक ऐसा एकाकी बादल हूँ जो बिना किसी दिशा-बोध अथवा बल के, बस उड़ रहा है। तथापि, आप राजनीति, खेल-जगत, पर्यावरण-परिवर्तन एवं अन्य सांसरिक विषयों पर बातचीत करते हैं। संभवतः, अब आप “ध्यान” की ओर आकर्षित हो रहे हैं व ईश्वर में आपकी आस्था अब पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हो चली है।

आप जानते हैं कि आप अभी भी युवा हैं व आप में अथाह बल है, तथापि आपके आसपास का कोई भी आपके बारे में ऐसा नहीं सोचता। आपको एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाता है जिसने “अधेड़ावस्था” में पदार्पण कर लिया है। यह दौर आसान नहीं है। आपको लगता है कि अब आप इतने युवा नहीं रहे कि निर्भीक निर्णय ले पाएँ, किन्तु इतने वृद्ध भी नहीं कि इससे दूर रहें। बुद्धि एवं ऊर्जा से ओतप्रोत, बहुत से लोगों में अपने ४० के दशक में एक प्रकार की कुंठा घर करने लगती है। कुछ तो कटु भी होने लगते हैं। उनके पास बुद्धिमत्ता, ऊर्जा जैसे सभी दिव्य-उपहार उपलब्ध हैं किन्तु उनके उपयोग हेतु अवसरों की कमी होती है। जीवन के इस पड़ाव में, अधिकांश लोग जीवन में कुछ नया करने के विचार से भी कांप जाते हैं। उन्हें लगता है कि यही उनकी नियति है कि अपने बीते वर्षों में लिए गए निर्णयों पर वे चलते चलें। जीवन के इस दौर में केवल वे लोग जिनमें जीवन के प्रति एक अदम्य उत्साह भरा होता है, वे ही किसी नयी यात्रा (बौद्धिक, वित्तीय अथवा अन्य) पर निकल पाते हैं।

५१ – ६०

५१ से ६० का समय पुनः एक बिलकुल भिन्न प्रकार का खेल है। आपके मस्तिष्क-पटल की पृष्ठभूमि में रिटायरमेंट के उपरांत के जीवन संबंधी योजनाएँ प्रारूप ले रही होती हैं। इस बात का दबाव भी बना रहता है कि आपके बच्चे अपने अपने जीवन में भली भांति रच बस जाएँ। आप व आपका साथी, इस दौरान, एक दूसरे को कुछ और जान पाते हैं। आप एक प्रकार से थोड़ा विनम्र हो जाते हैं। अधिकांश लोग इस दौर को स्वीकृति के भाव के साथ जीते हैं कि मैं अपने जीवन के साथ जो कुछ भी कर सकता था वह मैं कर चुका, और अब मुझे शालीनतापूर्वक वृद्धावस्था की ओर पग बढ़ाना है। मुझे एक विशेष रूप में ही जीना है। अब आप कुछ अधिक वेतन पाने के लिए नौकरी बदलना नहीं चाहते, चूंकि आप इधर-उधर की भाग दौड़ से थक चुके हैं। आप सब कुछ सहज भाव से लेना चाहते हैं।

संभावना यह बनती है कि अब तक आपके बच्चे घर से दूर कहीं और रह रहे हों व अपने अपने जीवन में व्यस्त हों, अपने नए परिवार के साथ। नए रिश्ते जुड़ रहे हैं (समधियों के साथ), नयी परेशानियाँ उभर रही हैं। आपको लगता है कि आपके बच्चे आपको समझते नहीं, और, वे सोचते हैं कि आप उन्हें। धीरे धीरे, आप आत्म-निर्भर होना सीख लेते हैं। अंततः, आपको समझ आ जाता है कि अपना सम्पूर्ण जीवन दूसरों को प्रसन्न करने में लगा देना, अपने स्वयं का ध्यान न रखते हुए, यह बिलकुल बेतुका व अक्खड़तापूर्ण है। और, यह एक संतुष्टिपूर्ण जीवन की दिशा में नहीं जाता।

६१ – ७०

६१ से ७० की अवस्था में आप लगभग हमेशा अपने ही सानिध्य में होते हैं। आपका साथी आपके साथ है, तथापि, अपनी प्रसन्नता के लिए जिस एक व्यक्ति पर आप निर्भर रह सकते हैं वह है स्वयं आप। आपके आसपास उपस्थित हर व्यक्ति यही कहता है, “मैं भी थक चुका हूँ।” आपको सुनने को मिलता है कि “आपने जो कुछ भी किया वह आपका कर्तव्य था”। यह वाक्य एक अजीब सा ‘वैराग्य’, अनासक्त-भाव, उत्पन्न कर देता है। आप दादा-दादी या नाना-नानी हो सकते हैं, तथापि आप स्वयं छोटे बच्चे की भांति बन जाते हैं। आप अतीत की स्मृतियों में डूब जाते हैं और हो सकता है आपको अपने माता-पिता की याद सताने लगे, वे माता-पिता जिनके लिए आपने कभी ये सोचा था कि उनकी आपके जीवन में कोई आवश्यकता नहीं। आप अपने बचपन का स्मरण करते हैं, अपने बीते वर्षों की सुंदर यादें सँजोते हैं। संभवतः, आप नित्य समाचार पत्र पढ़ते हों, कुछ समय टीवी देखते हों, कभी कभी आपके बच्चे मिलने आ जाते हों, अथवा आप उन्हें फोन कर लेते हों, शायद आप अवसर पा कर कभी लोगों से भी मिलते जुलते हों, किन्तु, अधिकांश समय आप अपने साथ ही होते हैं, अपने स्वयं की दुनिया में।

अधिकांश लोग इस दशक में कुछ भी नया करने की सोचते तक नहीं। वे सोचते हैं कि उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए कि अब वे ‘वरिष्ठ नागरिक’ हैं और जीवन में जो कुछ वे देख-सुन चुके हैं, उससे अधिक जीवन में कुछ होता भी नहीं। किन्तु यह तथ्य सत्य से कोसों दूर है।

७० – ८० & onwards

७० – ८० का दौर बहुत अजीब होता है। बहुत से लोगों का जीवन एक तय नित्य-क्रम से पूर्ण रूप से बंध जाता है। कोई भी मरना नहीं चाहता किन्तु अधिकांश लोगों में जीने की इच्छा समाप्त हो चुकी होती है। जीवन में कोई विशेष आकर्षण नहीं बचता। एक सीमा के बाद तो नाती-पोते भी आपको आकर्षण में नहीं बांध पाते। आपको लगता है कि हर कोई केवल इस बात के लिए उत्सुक है कि आप उन्हें क्या दे सकते हैं। गूढ़ आध्यात्मिक व्यक्ति अपने मन के एकांत में दिव्य-शांति अनुभव करते हैं, किन्तु अधिकांश बेचैन ही रहते हैं। वे अपने बच्चों के लिए ‘परेशानी’ बन जाते हैं, जो स्वयं अपने वयस्क जीवन के दायित्वों से जूझ रहे होते हैं। और, एक दिन बच्चों के पास एक संदेश आता है, व सब लोग आपकी अंतिम यात्रा के लिए एकत्रित हो जाते हैं। हाँ, कुछ समय के लिए वे अवश्य ही उदास होंगे। किन्तु, मात्र कुछ समय के लिए। वे उस अवसर पर एक दूसरे से मिलेंगे, बातचीत करेंगे, उनको यह अवसर एक पुनर्मिलन जैसा प्रतीत होगा। वे यह भी पुनः-स्मरण करेंगे कि आप कितने महान व्यक्ति थे। किन्तु, यह मुख्य बिंदु नहीं होगा। आपका जीवन उनके उस दिन का मुख्य आकर्षण कदापि न होगा। वे तो विभिन्न प्रकार की तैयारी में जुटे होंगे।

हालांकि ऐसी मेरी मंशा न थी, किन्तु मुझे लग रह है कि मैंने मानव जीवन की एक बुझी सी तस्वीर आपके सम्मुख प्रस्तुत की है। इसके पीछे एक कारण है। चूंकि जो मैं आपको बताना चाहता हूँ वह यह है कि वास्तव में इसे ऐसा होने की कोई आवश्यकता नहीं। आपका जीवन कोई एक बड़ी भूल नहीं है। चूंकि आप शतरंज, पियानो या गणित के महान ज्ञाता नहीं – इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं कि आप अब कुछ कर ही नहीं सकते। कोई भी आपको नई कोशिशों में प्रयासरत होने से रोक नहीं सकता (भले ही इस समय आपकी आयु कुछ भी हो)। चूंकि आप जीवनपर्यंत एक अति धार्मिक अथवा एक नास्तिक व्यक्ति रहे – इसका यह अर्थ नहीं कि आप अपनी धारणा बदल नहीं सकते। यदि आप अपने जीवन का आनंद लेना चाहते हैं तो जीवन को तरोताजा रखें।

अंततः, प्रस्तुत है वह परिदृश्य जिसकी ओर मैंने लेख के प्रारंभ में संकेत किया था –

कल्पना करें यदि आपने अपने जीवन के हर दशक को एक नए जीवन के रूप में जिया होता। एक नया आरंभ। हर नए दशक के प्रारंभ से एक नूतन आरंभ।

० – १० के बीच मैंने अंक-ज्ञान, ज्योतिष-ज्ञान सीखा व वेद इत्यादि पढ़े। १० – २० का समय मैंने कम्प्युटरस सीखने व कार्य-जगत में काम पाने में लगाया। मैंने व्यवसाय खड़े किए। अपने तीसरे दशक के प्रारम्भिक कुछ वर्ष मैंने ‘अपनी स्वयं की खोज’ में समर्पित किए। तत्पश्चात, अपने सीमित सामर्थ्य अनुसार लोगों की सहायता में। ४० – ५० में मेरी योजना कुछ और लिखने की है। हालांकि मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन-काल में कई गलतियाँ की होंगी, किन्तु मेरे निर्णय आकस्मिक कभी नहीं रहे। मैं आने वाले दशक के लिए, उसके दस्तक देने से पूर्व ही, अपने लक्ष्य तय कर लेता हूँ।

मुझे आशा है कि आप इस विषय पर भली भांति चिंतन करेंगे – कि कैसा हो यदि आप हर नए दशक में एक नया जीवन जिएँ। आपकी वर्तमान आयु भले ही कुछ भी हो, आप इसके लिए क्या योजना बनाते हैं, आप अपना आने वाला दशक किस तरह व्यतीत करने की योजना बना रहे हैं? क्या आप उसमें से कुछ हिस्सा किसी ऐसे कार्य में नियोजित करेंगे जिसकी आपके लिए अहमियत हो, आपके जीवन में जिसका कुछ अर्थ हो? यह मात्र अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं हो सकता। क्या ऐसा कुछ है जिसे करने की इच्छा आपने आरंभ से ही की हो? समझें कि अब उसका समय आ गया है। अपने समय का एक मुख्य भाग आप उस कार्य में लगाएँ और जो भी आपकी रुचि हो, आप उसमें निपुण हो जाएँगे।

कृपया चिंतन करें कि आप अपने जीवन के आगामी दशक में क्या नया/भिन्न रूप से करने के इच्छुक हैं। २५–३५ या ३०–४०, ६०–७० या ७५-८५, यह सब असंगत है। बस अपना नया दशक एक नए जीवन के रूप में जिएँ। अपने नए रूप को प्रकट होने दें। वर्षों का कोई औचित्य नहीं, औचित्य है तो आपकी संकल्पबद्धता का।

सम्पूर्ण जीवन को ढोते रहने से कहीं व्यापक होता है संपूर्णता का एक पल।

एक ७ वर्षीय बालक ने अपने मित्र से पूछा, “क्या तुम सातन में विश्वास करते हो?”
“मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता,” मित्र ने उत्तर दिया। “हो सकता है वह भी सांता कि तरह, आपके पापा ही हों!”

सांता या सातन, बुद्धा या ‘बुद्धू’ – आप अपनी भूमिका स्वयं चुनें। आपका जीवन आपके अपने हाथों में है और एक बीज को बोने के लिए अभी भी देर नहीं हुई । कुछ नया आजमाने के लिए कभी देर नहीं होती। थोड़ा साहसी/उत्साही बनने के लिए हर उम्र उपयुक्त होती है। यदि आप जीवन को भरपूर जिएँ तो यह जीवन कभी भी उबाऊ नहीं होगा।

टैगोर ने एक बार कहा था, “मैं सो रहा था तो स्वप्न में देखा कि जीवन आनंदमय था। मैं उठा और देखा कि जीवन सेवा-कार्य था। मैंने उस पर कार्यान्वयन किया तो पाया, “सेवा ही आनंद था।”

यदि आप उस आनंद का आस्वादन चाहते हैं तो आपको स्वयं की सेवा से आरंभ करना होगा, स्वयं की अहमियत समझकर, स्वयं का ध्यान रख कर। सजगतपूर्वक। जैसा कि कहा जाता है, आपको केवल एक जीवन मिलता है। परंतु, ऐसा नहीं है। आप एक ही जीवन में अनेक जीवन जी सकते हैं। अनुमान से मैंने सोचा था कि मैं यह लेख १२०० शब्दों में समेट दूँगा, किन्तु उससे दो गुना लिख लेने के पश्चात, अभी भी मुझे बहुत कुछ कहना है।

आपका जीवन एक सुंदर, बहुमूल्य उपहार है; इसे खोलें, इसे संजोएँ, इसका उपयोग करें। यह जैसा भी है, आइये इसे कुछ इस प्रकार ढालें कि इसके प्रति आप में आकर्षण हो।

आप नियतिप्रद फेंके गए एक टुकड़े भर नहीं । आप अपनी किस्मत के दया-भरोसे नहीं हैं। आपका जीवन पर उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य का। आप इसी एक जीवन में अनेक सुंदर जीवन जी सकते हैं। अपने हर दशक को एक नए जीवन की भांति उसी प्रकार जिएँ जैसे आप बचपन में बालसुलभ तत्परता, अंजानपन, उत्सुकता व स्वप्नों के साथ जीते थे, जब आप लंगोटी पहनते थे (ठीक है, थोड़ा सा और बड़े सही)।

आप अपने आगामी दस वर्ष किस कार्य को समर्पित कर रहे हैं?

शांति।
स्वामी