नौ वर्ष पूर्व, हमने अपने व्यवसाय हेतु एक स्थान किराए पर लिया। यह एक चार मंजिल की इमारत थी और हमने इसे अपनी रुचिनुसार ठीक-ठाक करवाया था। इसके रख-रखाव के लिए हमने एक ‘हाउस-कीपिंग ऐजेंसी’ की सेवाएँ लीं जिसने हमें उपयुक्त कर्मचारी प्रदान किए। हम प्रसन्न थे कि हमें अपने अन्य कार्य-कलापों, प्रशिक्षण, उन्हें बनाए रखना इत्यादि की चिंता करने की आवश्यकता नहीं थी। मात्र कुछ अधिक राशि के भुगतान से एक बाहरी ऐजेंसी के ऊपर यह सब दायित्व था। मैंने उनमें से एक कर्मचारी, उसका नाम “ऐ-जे” रख लेते हैं, से बात कर समझाया कि मुझे कार्यालय में किस स्तर की स्वच्छता की अपेक्षा थी। कृपया यहाँ स्वीफ्फर से सफाई करें, वहाँ गीला पोचा लगाएँ, उधर नरम कपड़े का उपयोग करें, इत्यादि।

ऐ-जे ने हर बात भली भांति समझ ली व अपना दायित्व उत्कृष्ट ढंग से निभाया। मैं इस युवक से प्रभावित था, जो देखने में अठारह-उन्नीस का था किन्तु एक वरिष्ठ प्रबन्धक जैसी परिपक्वता प्रदर्शित करता। केवल एक समस्या तब भी बनी हुई थी। हर बार जब वह सफाई करता, तो मेरे पूरे कक्ष में एक तीक्ष्ण गंध भर जाती। मेरे लिए वह असहनीय थी। ऐ-जे वहाँ काम कर रहे चार सफाई कर्मचारियों में से एक था व मैंने सोचा कि मैं उसके स्थान पर उसके किसी अन्य सहयोगी से काम करा लूँ किन्तु मैं उसको ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था।

मुझे समझ नहीं आ रहा था की उसे ठेस पहुंचाए बिना कैसे इस बात का हल निकाला जाये। मैंने अपने प्रबन्धकों में से एक को कहा की ऐ-जे को प्रेमपूर्वक कहें कि वह सुबह काम पर आने से पूर्व स्नान अवश्य किया करे। ऐ-जे ने सुनकर हाँ में सिर हिलाया। कुछ दिन और बीते किन्तु समस्या अभी भी बनी रही। उसके इस अशिष्ट आचरण से मैं कुछ चिड़चिड़ा होने लगा था। पुनः एक बार हमारे संचालन प्रबन्धक की ऐ-जे से बात हुई और उसने हमें अवगत कराया कि उसकी ऐजेंसी उन्हें केवल दो कमीज़ें देती है। तत्क्षण हमने उस ऐजेंसी से बात की और कुछ अधिक राशि देने का प्रस्ताव रखा, यदि वे हमारे यहाँ कार्यरत लोगों को पाँच पाँच कमीज़ें दें।

कुछ दिन के लिए समस्या हल हो गई, किन्तु पुनः प्रारम्भ हो गई। हमारा कार्यालय पूर्णत: वातानुकूलित होने से सभी दरवाजे अक्सर बंद रहा करते थे और जब जब वह मेरे कक्ष में आता, मुझे उसके जाने के उपरांत कई मिनट तक सांस लेने में कठिनाई महसूस होती। हमने सबके लिए डीयोडरंट मँगवाए किन्तु उससे मेरी कठिनाई और बढ़ गई। एक, डीओ की तीक्ष्ण गंध मेरी एलर्जि को बढ़ा देती और मेरा अस्थमा बिगड़ जाता। दूसरे, डीओ की गंध व उसके शरीर की दुर्गंध का मिश्रण एक ऐसी गंध का आभास देते कि क्या कहा जाये। आप समझ रहे होंगे।

अंत में मैंने सोचा कि मैं स्वयं उससे बात करूंगा चूंकि समस्या का समाधान न होता देख मुझे लगा (हालांकि गलती से) कि मेरे लोग यहाँ होने वाली असुविधा का सही अनुमान नहीं लगा रहे। मैंने ऐ-जे को बुलवाया। वह भयभीत लग रहा था।

“ऐ-जे, मैं तुम्हारे काम से बहुत खुश हूँ,” मैंने कहा। “हम सभी खुश हैं।”
उसके मुख पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई। “धन्यवाद” वह बोला।
“हर किसी के शरीर की अपनी गंध होती है,” मैंने बताने का प्रयास किया। “क्या तुम प्रतिदिन धुले हुए कपड़े पहनते हो और स्नान करते हो?”

उसकी मुस्कुराहट अचानक विलुप्त हो गई व उसने अपना सिर नीचे कर लिया। उससे कोई बात निकलवाने के लिए मुझे उसे बहुत बहलाना पड़ा व खुशामद करनी पड़ी। मैंने उसे बार बार कहा कि मैं उससे नाराज नहीं, न ही उसे काम से हटा रहा हूँ, कि मैं तो बस इस समस्या को समझ कर उसका हल निकालना चाहता हूँ।

“यदि मैं चाहूँ तो भी हर रोज धुली हुई कमीज नहीं पहन सकता” वह बोला, “मैं हर रोज अपना मुंह अच्छे से धो कर यहाँ आता हूँ।”
भारत देश में तापमान सच में बहुत अधिक बढ़ जाता है और सब कुछ बहुत गरम, और पसीने से भर जाता है। मैं उसकी दिनचर्या में स्वच्छता की पूर्ण अनुपस्थिति देख दंग रह गया।
“ऐ-जे मुझे क्षमा करना,” मैंने दृढ़ शब्दों में कहा, “किन्तु तुम्हें हर रोज घर से आने से पहले स्नान अवश्य करना चाहिए, इसका कोई दूसरा रास्ता नहीं।”
“किन्तु, सर, मेरे पास घर नहीं है।” वह बोला और सुबकने लगा।
“क्या कहा?” मैं परेशानी के साथ साथ बहुत बुरा भी महसूस कर रहा था।

“मेरे पास घर नहीं है” उसने दोहराया। “मैं एक टूटी-फूटी झोपड़पट्टी में रहता हूँ। वह तारपोलीन से बनी है और हम नौ लोग एक साथ उसमें रहते हैं।”
“क्या?”
“हमारी बस्ती में केवल एक पानी का नल है जहां लगभग ५०० से अधिक लोग ५० झोपड़ियों में रहते हैं। पानी सुबह शाम केवल दो घंटे के लिए आता है। भले ही मैं पूरी रात प्रतीक्षा करता हुआ पंक्ति में सबसे आगे ही क्यों न खड़ा रहूँ, किन्तु वहाँ के बड़े लड़के मुझे मार कर भगा देंगे। हमेशा वे ही सबसे पहले नहाते हैं। और, उनसे भी पहले, औरतों को पीने व खाना बनाने के लिए पानी भरने दिया जाता है। जब तक उनका काम समाप्त होता है, नल से पानी चला जाता है।”
यह सुन कर मुझे एक झटका लगा। “यह तो बहुत मुश्किल स्थिति है।” मैंने कहा, “किन्तु हम तुम्हें इतना वेतन देते हैं कि तुम एक ठीक-ठाक जगह में किराए पर रह सको, अलग नहीं तो कमरे में और लोगों के साथ। तुम्हें हर सप्ताह दो अवकाश और ९००० रुपये मिलते हैं। मुझे विश्वास है कि तुम एक बेहतर स्तर का जीवन जी सकते हो।”

उसने मुझे आगे बताया कि उसे उस वेतन का एक तिहाई ही मिलता था और कभी कभी ही एक दिन का अवकाश मिलता। यहाँ से अवकाश के दिनों में उसे ऐजेंसी के मालिक के घर साफ-सफाई, पौधों की देखभाल आदि, अथवा कहीं दूसरे स्थान पर लगा दिया जाता था।

मैंने उस हाउस कीपिंग ऐजेंसी को फोन किया और फटकार लगाई।
“क्या आपने कभी रोजगार नियमों के बारे में सुना है?” मैंने मालिक से कहा। “तुम लोग एक कंपनी नहीं उत्पाद संघ चला रहे हो।”

उसके मालिक ने अपनी कोई गलती नहीं मानी और यही कहता रहा कि अवश्य कोई गलतफ़हमी हो गई है। मैंने खीझ कर फोने रख दिया। हमने उसी क्षण सभी हाउस कीपिंग कर्मचारियों को बुलाया और उन्हें सीधे अपने यहाँ नौकरी दे दी। मैंने उनकी शिक्षा का खर्च वहन करने का प्रस्ताव रखा, उनके काम करने का समय और घटा दिया ताकि वे स्कूल, कॉलेज अथवा जहां वे चाहें जा सकें। उनमें से किसी का भी पढ़ाई में रुझान नहीं था और न ही मैं उन्हें शिक्षा का महत्त्व समझा पाया। ऐसी अमानवीय परिस्थितियों में रहना और इतना अधिक शोषण सहने के अलावा शिक्षा के प्रति उनकी पूर्ण अरुचि एक सर्वाधिक दुखद पहलू था।

यहाँ यह बताता चलूँ कि शरीर की दुर्गंध वाली समस्या अंततः हल हो गई। तथापि, हमने कर्मचारियों के शौचालय में एक शावर भी लगवा दिया। तीन सप्ताह के उपरांत ऐ-जे एक किराए के कमरे में रहने लगा। उसके लिए एक मकान मालिक ढूंढने में सभी को मेहनत करनी पड़ी क्योंकि वह अपने परिवार के सात अन्य लोगों को साथ लेकर नए मकान में जाना चाहता था।

इस घटनाक्रम से मैंने एक नया सबक सीखा – केवल दूसरे व्यक्ति को देखने मात्र से हम यह अनुमान नहीं लगा सकते की वे अपने जीवन में किस प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हमारे आसपास बहुत से लोग बहुत कठिन, चुनौतीपूर्ण व अपमानजनक वातावरण में जीते हैं, अक्सर बिना अपनी किसी गलती के। यदि कुछ देर के लिए कर्म के सिद्धान्त को अलग कर दिया जाये तो मुझे नहीं लगता कि ऐ-जे ने कभी इतने कष्टकारी वातावरण में जन्म लेने की इच्छा की होगी, अथवा अपने पालन-पोषण के दौरान उसने कभी कल्पना भी की होगी कि उसका जीवन इस प्रकार का होने वाला है। इसके अतिरिक्त, भले ही किसी ने कैसे भी कृत्य किए हों, उसको प्रताड़ित करने का अधिकार किसी को भी नहीं।

अतः मेरे विचार में, किसी के प्रति हमारा सर्वप्रथम भाव करुणा का ही होना चाहिए, हमें उन्हें संदेह का लाभ तो देना ही चाहिए। हमारे पालन-पोषण का ढंग एवं हमारे मस्तिष्क-संचालन की विधि – इनके कारण हम लोगों के प्रति अपनी धारणा व मत बनाने से नहीं चूकते। यह सब स्वाभाविक रूप से होता है। हम सड़क किनारे किसी व्यक्ति को लेटे हुए देखते हैं और मान लेते हैं कि अवश्य ही वह नशे में होगा, जबकि वस्तु स्थिति यह भी हो सकती है कि अभी अभी उसे दिल का दौरा पड़ा हो। जाति-कुल, रूप-रंग, वेश-भूष, परिधान, भाषा इत्यादि को आधार बना हम दूसरे पर अति शीघ्र एक वर्ग-विशेष का ठप्पा लगा देते हैं। अपने आसपास की चीजों एवं लोगों का इस तरह के आधे-अधूरे अस्वाभाविक ढंग से वर्गीकरण कर देना आध्यात्मिक नहीं, यह अविवेकपूर्ण है।

यदि आप आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक हैं तो अवश्य ही आपको करुणा एवं कृतज्ञता के भाव, समानुभूति एवं विनम्रता के गुण स्वयं में अंतर्निष्ट कर आचरण में लाने होंगे। इसका कोई अन्य विकल्प नहीं है। आप दृढ़ रह सकते हैं, न भी कर सकते हैं, किसी की प्रार्थना को अस्वीकार कर सकते हैं, आप ऐसा कुछ भी कर सकते हैं किन्तु करुणा का त्याग किए बिना। यदि प्रकृति ने आप पर इतनी कृपा रखी है कि आप यह लेख फोन, टैब्लेट अथवा कम्प्युटर पर पढ़ पा रहे हैं तो कहीं न कहीं यह आपका कर्तव्य है कि आप इस संसार को थोड़ा और बेहतर बनाने में अपना तुच्छ योगदान अवश्य दें। मैं इस बात से इंकार नहीं कर रहा कि जीवन में जिस भोग-विलास का आप आनंद ले रहे हैं वह सब आपके कड़े परिश्रम का ही फल है। यह तो एक और अच्छा कारण है कि आप दूसरों के कल्याण के लिए भी कुछ योगदान दें। चूंकि यदि आप में इतना सब प्राप्त कर पाने की योग्यता है तो आप थोड़ा और भी सरलता से कर सकते हैं।

एक बार रेलगाड़ी पर सवार होते समय गांधी जी का एक जूता उतर गया। वे लोगों से खचाखच भरी रेलगाड़ी पर चढ़ तो गए किन्तु उनका जूता नीचे गिर गया। ट्रेन कुछ ही आगे बढ़ी, तभी उन्होंने तत्परतापूर्वक अपना दूसरा जूता भी उतार कर प्लैटफ़ार्म पर फैक दिया।
“आपने ऐसा क्यों किया?” एक सहयात्री बोल उठा।
“जिस किसी को भी वह मिलेगा, कम से कम उसे दोनों जूते मिल जाएंगे, मेरे लिए एक जूते का क्या उपयोग?” गांधी जी बोले।

हमारे समक्ष ऐसा कोई कारण नहीं कि हम अपनी अच्छाई का त्याग कर दें, अपने को प्राप्त सुख-समृद्धि के लिए कृतज्ञ न रहें, दूसरों की सहायता न करें, विनीत आचरण न अपनाएँ। हमारा जीवन कितना भाग्यशाली है, क्यों न दूसरों को भी अपने खुशियों व सुख-सुविधाओं का थोड़ा स्वाद चखने दें। जिस किसी को भी आध्यात्म की चाह है उसके लिए सदाचार की राह अतिशय फलदायक है।

सदाचारी बनें।

शांति।
स्वामी