सन १९७३ की बात है सूज़न जो कि ४ वर्ष की थी, ने  अपने अतिथि गृह की आलमारी को खोला तो एक छोटे से थैले  से अनेक शतरंज के मोहरे  गिर पड़े ,और  उसके ठीक सामने शतरंज की बिसात लिपटी हुई पड़ी हुई थी।उसने उनको बाहर निकाला और शतरंज के  मोहरों को भ्रमित होकर उसी प्रकार देखा जैसे कि उसकी आयु के बच्चे को देखना चाहिए।

सूज़न ने एक मोहरे  को हाथ में लेकर परीक्षण करते हुए भोले पन से पूछा  माँ यह क्या है ?

जसूजसा  की माँ ने अधिक उत्साहित न होते हुए, इस चिंता से  कि कहीं उसका उत्तर  सूज़न के उत्साह को कम न  कर दे, अत्यंत सावधानी से उत्तर दिया, ये शतरंज के मोहरे हैं । जब माता पिता किसी चीज़ के बारे में परिचय देने में बड़े उत्साहित रहते हैं तो अधिकतर बच्चा इसको अस्वीकार कर देता है।मैं नहीं सोचता कि बच्चा यह जान बूझकर करता है, यह आरम्भ में एक प्रतिक्रिया मात्र होती है। क्योंकि वे माता पिता को हर चीज़ में न कहते हुए सुनते हैं और यह माता-पिता की सामान्य  प्रतिक्रिया भी होती है।और जब एक बार बच्चा विद्रोह के आनंद को जान लेता है, तो वह अपनी वास्तविक नहीं  पर लम्बे समय तक टिके रहता  है। क्लारा पोलगर इसके लिए अच्छी तरह तैयार थी

आठ वर्ष पहले १९६५ में हंगरी में एक शिक्षक लैज़्लो पाल्गर ने क्लारा के साथ प्रणय निवेदन हेतु पत्र व्यवहार  आरम्भ किया। उनके पास दो उपाधियाँ थीं एक मनोविज्ञान में और दूसरी शिक्षण में और   प्रबंधन क्षमता में उन्होंने शोध की थी ।अपने अतिरिक्त समय में वे शतरंज खेला करते थे। अपने प्रेमालाप के समय में लैज़्लो ने क्लारा से कहा कि वह प्रतिभावान बनाने को लेकर एक जीवन भर का प्रयोग कर रहा है  और उसे ऐसा करने के लिए पत्नी की आवश्यकता है। क्लारा ने भी तीन डिग्रियाँ ले रखी थीं और वह आठ भाषाएँ बोल सकती थी। वह ऐसे व्यक्ति के साथ शादी करना चाहती थी जो उसकी बुद्धि के साथ मेल खा सके। वह लैज़्लो की शोध,प्रकल्पना और  उसके व्यक्तित्व को पसंद करती थी  और अंततः उन दोनों ने विवाह कर लिया तत्पश्चात यू एस एस आर  से वे हंगरी चले गए और उन्होंने बुदापेस्ट में एक  आधुनिक अपार्टमेंट में अपना जीवन आरम्भ किया।

१९६९ में उनकी पहली बेटी का जन्म हुआ  जिसका नाम ज़सुज़्सा था जिसे  सूज़न पाल्गर के नाम से भी जाना जाता था। अनेकों बार दोनों माता पिता एक दूसरे को उस वादे को याद कराते  थे कि उनको एक प्रतिभावान नहीं बल्कि ऐसा प्रतिभावान बनाना है जो प्रसन्न भी हो । जीवन में प्राप्ति तो महत्वपूर्ण थी, ही लेकिन पूर्णता की भावना उससे अधिक महत्वपूर्ण थी। जब आप अनुभव करते हैं कि आप अपने चाहे गए क्षेत्र में प्रगति कर रहे हैं तो आप अधिक पूर्णता का अनुभव करते हैं और यह आपको प्रसन्न  रहने और प्रेरित रहने में सहायता करता है।जिस समय उनकी प्रकल्पना के परीक्षण का समय सूज़न का शतरंज के मोहरों के साथ सम्मोहन के साथ आया। यह एक जीवन भर के और अंतर्दृष्टि पूर्ण परीक्षण का समय था।यह ऐसा प्रतीत हो सकता है कि सूज़न ने शतरंज के मोहरों को खोजा परंतु वास्तविकता में यह इसके सिवा कुछ और था। क्लारा और लैज़्लो ने अपनी बेटी के जन्म से बहुत पहले ही निर्धारित कर लिया था कि वे शतरंज में एक प्रयोग करेंगे जिससे ब्रेन पौवर  को मापना आसान होगा।

क्लारा पाल्गर ने शतरंज की बिसात को खोला और अपनी चार वर्षीय पुत्री को दिखाया कि शतरंज के मोहरे किस प्रकार चलते हैं।एक बार फिर वह सतर्क थी कि सूज़न को वह अत्यधिक उत्साहित न लगे और उसे यह अनुभव न हो कि वह शतरंज को इसलिए खेल रही है क्योंकि उसके माता पिता ऐसा चाहते हैं। इसके स्थान पर उसने अपनी बात को  शांति से और खेल खेल में सूज़न के सामने रखा। आप किसी से भी कोई काम तब करवा सकते हैं जब आप उनको यह सोचने के लिए तैयार करें कि यह उसका स्वयं का विचार है। अन्य शब्दों में जब लोग या  विशेष रूप से बच्चे अनुभव करते हैं कि  कुछ करने का उनका स्वयं का निर्णय है तो वे इसे करने की  प्रेरणा लेते हैं और चुनौतियों का सामना होने पर भी  अडिग  रहते हैं।

शाम के समय जब लैज़्लो घर वापस आया तो क्लारा ने उसे बताया कि किस प्रकार सूज़न ने शतरंज में रुचि प्रदर्शित की। माता पिता दोनों नीचे बैठ गए और शतरंज की बिसात बिछाकर एक खेल  खेलने लगे। जैसा कि बच्चे सामान्य रूप से करते हैं जब वे माता पिता को किसी गतिविधि में आनंद लेते देखते हैं, वही  सूज़न ने भी किया । वह  अभी तक आस पास खेल रही थी अब आकर पास में बैठ गयी और प्रश्न पूछ रही थी। अब वह माता-पिता के आस-पास मँडरा रही थी।और शतरंज के मोहरों के प्रति और अधिक मोहित होती जा रही थी। वे सावधान थे कि सूज़न को  खेल को ध्यान से देखने या खेलने या इसे सीखने के लिए न कहें।वे बस खेल रहे थे और स्वयं आनंद ले रहे थे ( या कम से कम आनंद लेने का दिखावा कर रहे थे।)

बड़े ही धैर्य, दृढ़ता और दृढ़ निश्चय से लैज़्लो ने सूज़न को प्रशिक्षित करना आरम्भ किया । यात्रा विशेष रूप से कठिन सिद्ध हुई। इसलिए नहीं कि सूज़न शतरंज नहीं खेलना चाहती थी या लास्लो उसे सिखाने हेतु जानकार  नहीं था। ऐसा इसलिए था क्योंकि उस समय शतरंज में उस समय पुरुषों का वर्चस्व था। लैज़्लो और क्लारा जानते थे कि उनकी बेटी किसी भी अन्य पुरुष या स्त्री के समान खेल सकती थी।

इसलिए अक्सर  जब लैज़्लो  सूज़न को शतरंज के क्लब में लेकर जाता तो क्लब के अन्य सदस्य सोचते कि लैज़्लो स्वयं खेलने आया है और अपनी बेटी को साथ लेकर आया है।वे सोचते कि वह अपनी बेटी को शतरंज सिखाने में समय बर्बाद करने हेतु पागल है। और जब उसकी  सात या आठ वर्षीया पुत्री सूज़न अनुभवी खिलाड़ियों को मात दे देती तो तो अनेक अंत में सामान्य रूप से या तो हाथ मिलाने से इंकार कर देते या यह तर्क देते कि “ मैं बीमार हूँ, मुझे सिर में दर्द है, मैं कल रात को सो नहीं पाया,” आदि। लेकिन यह व्यवहार  पिता और पुत्री दोनों को ही रोक नहीं पाया।इसके विपरीत यह  उनके संसार को यह सिद्ध करने इस संकल्प को और अधिक दृढ़ करता था कि लड़कियाँ यदि लड़कों से श्रेष्ठ नहीं हैं तो उनके समान श्रेष्ठ  हैं ।

लैज़्लो और क्लारा निरंतर सूज़न को गहन  और विशिष्ट प्रशिक्षण देते रहे। इसी बीच दो अन्य कन्याओं का जन्म हुआ  सन १९७४ में सोफ़िया पाल्गर और जुडिट पाल्गर सन १९७६ में । समस्त कठिनाइयों के बाद भी उन्होंने सोफ़िया और जुदिट के पालन और प्रशिक्षण में वही सिद्धांत को अपनाया। इसका क्या परिणाम हुआ आप पूछ सकते हैं?

मैं इसे  क्रमशः बताता हूँ :

सूज़न पाल्गर चार वर्ष की आयु में  ११ वर्ष से कम आयु  के शतरंज के टूर्नामेंट में प्रथम स्थान लायी, १२ वर्ष की आयु में उसने १६ वर्ष से कम आयु की वर्ल्ड चैंपियनशिप में विजय प्राप्त की। १५ वर्ष की आयु में वह संसार की सर्वोच्च शतरंज की खिलाड़ी बन गयी। कन्वेंशनल ग्रेंड मास्टर अवार्ड में पुरुषों के लिए निर्धारित मानकों को पार करते हुए वह २२ वर्ष की आयु में शतरंज की ग्रेंड  मास्टर बन गयी। सन १९९६ में २२ वर्षीय सूज़न पोलगर को विमन चेस चैंपियन अवार्ड से सम्मानित किया गया।

सूज़न को बड़ा करते हुए उसके माता पिता क्लारा और लैस्लो ने पालन और गहन  प्रशिक्षण के बारे में और अधिक सीखा, जिसका परिणाम था  कि वे अपनी दूसरी पुत्री को और अधिक अच्छा वातावरण और प्रशिक्षण प्रदान कर सके जो कि ११ वर्ष की आयु में १४ वर्ष से कम आयु की लड़कियों की चेस चैंपियनशिप में विश्व विजेता बन गयी।

और अधिक अनुभव और परिज्ञान  से संयुक्त होने के कारण यह स्वाभाविक ही था कि उनकी तीसरी बेटी जुदिट का लालन-पालन ऐसे वातावरण में हुआ जो एक प्रतिभावान के निर्माण  हेतु अत्यंत  संवाहक था  । उसकी बहनें शतरंज खेलती थीं इसलिए इस खेल के बारे में घर में, भोजन की मेज़ पर  सर्वाधिक चर्चा की जाती थी।   जैसा कि सामान्य रूप से माता-पिता अपने पहले बच्चे के साथ किया करते हैं उनकी भाँति उसके माता-पिता अधिक सावधान  या उत्सुकता  नहीं प्रदर्शित करते  थे। उनकी बच्चे को पालने की क्षमता भी अब तीक्षण  हो गयी थी। वे अब अपनी बेटी को व्यक्तिगत स्वतंत्रता देने। और एक अनुशासन से जीने के मध्य श्रेष्ठ संतुलन बना सकते थे।परिणाम स्वरूप जुदिट की उपलब्धियाँ उनकी अपेक्षाओं से भी अधिक ऊँची हो गयीं ।

१२ वर्ष की आयु में जुदिट के पास  एफ आइ डी ई रेटिंग ( वर्ल्ड चेस रेटिंग) में भूतपूर्व वर्ल्ड विमन चेस चैम्पियनशिप। से   ३५ प्वाईंट अधिक थे। १५ वर्ष की आयु में वह सबसे छोटी  ग्रेंड मास्टर बन गयी  इस खेल के इतिहास में कोई  पुरुष खिलाड़ी भी यहाँ तक नहीं पहुँचा था।   सामान्य रूप से हमेशा उसे सबसे शक्तिशाली  फ़ीमेल चेस प्लेअर माना जाता था। १० वर्ष की आयु में वह  शतरंज  के ग्रेंड मास्टर लेव गुट मन के साथ के साथ खेली  और उस पर  विजय भी प्राप्त की।

जब वह ५ वर्ष की थी तब उसने एक पारिवारिक मित्र को शतरंज की बिसात की ओर देखे बिना ही  हरा दिया था।

उसकी  मित्र ने खेल समाप्त होने पर मज़ाक़ किया तुम शतरंज में अच्छी हो “, लेकिन मैं खाना अच्छा पकाती  हूँ।”

जुदिट ने कहा हाँ! शतरंज की बिसात की ओर देखे बिना मैने तुम्हें हरा दिया क्या तुम बिना गैस के चूल्हे की ओर देखे खाना बना सकती हो?”

सभी तीनों बेटियों ने घर से ही पढ़ाई की शतरंज में विशिष्टता के साथ। उनके माता-पिता ने  यह एक लम्बे समय पहले ही  यह जान लिया था  ( हालाँकि आज ऐसे माता-पिताओं की संख्या बढ़ रही है।)कि अपने बच्चे को एक परम्परागत विद्यालय (जहाँ कि, प्रत्येक बच्चे की व्यक्तिगत प्रगति  और प्रकृति  का ध्यान नहीं रखा जाता , जहाँ अधिकांश बच्चे दोपहर में घर आते हैं, वे थक जाते हैं और सारा दिन गुज़र जाता है ) में भेजने का कोई  अर्थ नहीं है ।और यदि ऐसा किया जाता है तो  इसके बाद बच्चों से यह अपेक्षा रखना कि  वे किसी भी चीज़ में गहन  प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे , न तो  व्यवहारिक ही है न ही तर्क संगत है।

सूज़न की तुलना में जुदिट धीमी शुरुआत करनेवाली लेकिन बहुत ही अधिक मेहनती थी।लैज़्लो ने भी कहा कि वह प्रतिभावान जो प्रसन्न भी रहता है वह,  मेहनत, भाग्य , प्रेम और  स्वतंत्रता का सम्मिलित परिणाम होता है। जब वह यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो उसने प्रतिभा के बारे में पढ़ा था और उसने बाद में याद किया और कहा “ जब मैने प्रतिभावान लोगों के जीवन को देखा तो मैने यही चीज़ पायी कि उन सबने इसका आरम्भ अपने बचपन से किया और निरंतर प्रयत्न करते  रहे।” यहाँ तक कि पिता बनने के पूर्व उसने सोकरेट से लेकर आइंस्टीन तक ४०० लोगों की जीवनी पढ़ीं और देखा कि हर किसी  ने बार बार इसी विधि को अपनाया । लैज़्लो ने कहा   “ यह प्रयोग अभी समाप्त नहीं हुआ है।यह २३ वर्ष पहले आरम्भ हुआ था एक सरल वादे के साथ : कि प्रत्येक  बच्चे के भीतर किसी भी चुने गए क्षेत्र में प्रतिभावान  बनने की जन्मजात क्षमता होती है, लेकिन उसका प्रशिक्षण  उसके तीसरे जन्मदिन के पूर्व आरम्भ कर दिया जाना चाहिए  और  वे छठवें वर्ष में उस क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करना आरम्भ कर देते हैं ।”

मेरे स्वयं के दृष्टिकोण से बच्चों और मानवीय मनोविज्ञान पर किए गए कुछ दशकों के अध्ययन का सार निम्नानुसार है

१: हर बच्चा विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न  है।

२ यह प्रतिभावान बन सकता है

३ यह प्रतिभावान एक प्रसन्न व्यक्ति हो सकता है।

४: इसका  प्रशिक्षण तब आरम्भ होता है जब बच्चे  बहुत छोटे होते हैं

५: यह प्रशिक्षण खेल खेल में और आनंद दायक होना चाहिए

किसी भी प्रकार से मेरी यह सलाह नहीं है कि हर माता- पिता को अपने बच्चे को  खेल, कला , विज्ञान या अन्य किसी क्षेत्र में प्रतिभावान बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। न मैं यह कह  रहा हूँ कि  प्रतिभावान लोग इस संसार को एक श्रेष्ठ स्थान बनाते हैं  या कि आपको जीवन में प्रसन्न बनने के लिए प्रतिभावान होना होगा। एक माता पिता होने के नाते आप कौन सा मार्ग अपने बच्चे के लिए  चुनते हैं अथवा बच्चे  स्वयं के  लिये कौन सा मार्ग चुनते हैं  और आप बस उनको प्रोत्साहन  देते हैं यह आपका व्यक्तिगत मामला है। यह आपके और आपके बच्चे के बीच है और यह मेरा विशेषाधिकार नहीं है। न ही मेरा  यह कहना है  कि प्रत्येक बच्चे के ऊपर जितना वह सह सके उस  सीमा तक दबाव डाला जाए  और वह सरल जीवन न व्यतीत करे। इसके विपरीत वास्तव में मेरा यह विश्वास है कि जो वे न करना चाहते हों उन पर दबाव डालने के द्वारा एक बच्चे  की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीन लेने का कोई विशेष लाभ नहीं है । ऐसा करने से माता पिता और बच्चे के बीच संघर्ष  शीघ्र ही विषाक्त  हो जाएगा।

आप और मैं क्या सोचते हैं उससे निरपेक्ष रहते हुए सत्य यह है कि वह बच्चा जो आपके घर में है , महानता के बीज लेकर आता है। वह  प्रचुर मानवीय क्षमता के अन्वेषण  के अवसर को अभिव्यक्त करता है  ।  हमारे संसार के लिए कुछ भिन्न करने हेतु  वे जो भी कार्य हाथ में लें आप उसमें सर्वश्रेष्ठ बनने में उसकी सहायता कर सकते हैं। माता पिता होने से आप उनको उनकी  संभावनाओं  के प्रति इस तरीक़े से  जागरूक कर सकते हैं, जिससे वे आपकी बातों को समझ सकें  और इस प्रकार आप  जिस पथ पर वे चलना चाहते हैं उसमें सहायता कर सकते हैं।

यहाँ मैं साझा कर रहा हूँ कि किस प्रकार एक बच्चे के मन में उस चरित्र का निर्माण किया जाए जिससे कि वे आने वाले तूफ़ानों को गरिमामय तरीक़े से झेलने में सक्षम हों और शांति से आगे बढ़ते रहें। प्रत्येक बच्च  स्वयं के  भीतर  एक गांधी, आइंस्टीन  या मोजार्ट की खोज होने हेतु प्रतीक्षारत है। प्रत्येक बच्चे में एक पिकासो, एक रोनल्डो या एक नेलसन मंडेला बनने की क्षमता है। हर चीज़ हमारे नियंत्रण में नहीं है किंतु महत्वपूर्ण यह है कि माता-पिता होकर  आप अपने बच्चे को  बिना अतिमहत्वाकांक्षी या उपदेशात्मक  हुए महानता की ऊँचाइयों तक पहुँचने  के अवसर में बहुत अधिक  वृद्धि कर  उसका  वहाँ  तक पहुँचना सुनिश्चित कर सकते हैं

इसका आरम्भ  जीवन के सभी पहलुओं में एक श्रेष्ठता  का भाव भरने के साथ होता है, जो कि मैं जोड़ूँगा कि  एक जीवन भर की यात्रा है।

यह अंश मेरी नवीन पुस्तक “द चिल्डरन ओफ़ टुमारो” से उद्धृत है। इस पुस्तक में  मैने लालन – पालन पर मेरे विचार साझा किए हैं, ये  जिस प्रकार मैं  इसे देखता हूँ ,  अनुभव , शोध, और विभिन्न मनोवैज्ञानिक अध्ययनों पर आधारित हैं। यह पुस्तक हारपर कॉलिंज़ इंडिया द्वारा प्रकाशित की गयी है।इस हेतु नीचे लिंक दी जा रही हैं। आप वहाँ से अपनी प्रति प्राप्त कर सकते हैं।

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