यह फरवरी २०११ के अंत का समय था। १०,००० फुट की ऊंचाई पर, हिमालय के एक वन में, जहां उस छप्पर की कुटिया के बाहर बर्फ के हिमलम्ब लटक रहे थे, मैं गहन ध्यानावस्था में बैठा था। तन और मन दोनों की सुदृढ़ स्थिरता में बैठे १० घंटे इतनी सुगमता से व्यतीत हो चुके थे जिस प्रकार रात्रि भोर में रूपांतरित होती है।

पूर्ण चंद्रमा की शीतल किरणें मेरे सम्मुख रखे श्री यंत्र पर उतर आईं। यह यंत्र कुंडलिनी अथवा माँ जगजननी का ज्योमितिकीय द्योतक था एवं मेरे उस समय के ध्यान के नियम का एक अनिवार्य अंग था। उस कुटिया में इतनी अधिक दरारें एवं छेद थे कि प्रकाश व वायु, जहां से चाहे वहाँ से प्रवेश कर सकते थे। श्री यंत्र का मध्य भाग चंद्रमा की किरणों द्वारा प्रकाशित होना, यह एक अति शोभायमान दृश्य था।

मैंने उसे पेंसिल द्वारा एक कागज़ के टुकड़े पर चित्रित किया था और उस साधारण कागज़ के टुकड़े का सात माह तक उपयोग किया था। वह जर्जर सी लघु कुटिया पूर्णत: अंधकार में डूबी थी, केवल उस श्री यंत्र को छोड़ कर जिसे चंद्रमा का प्रकाश दीप्तिमान कर रहा था, एक दिव्य अनुपम जगमगाहट द्वारा, यदि उसे विस्मयकारी न भी कहें तो। मैं संध्या के पाँच बजे ध्यान के लिए बैठा था व इस समय प्रातः के तीन बज चुके थे। मुझे यहाँ तक पहुँचने में वर्षों का समय लगा, वह अवस्था जब मैं जितना समय तक मुझे आवश्यक हो, एक ही मुद्रा में बैठ पाऊँ, बिना अपने ध्यान की सुबोधगम्यता को प्रभावित किए, अथवा अपनी एकाग्रता की सुस्पष्टता को कम किए।

मैंने ईश्वर, विभिन्न ऊर्जाओं, एवं प्रकृति की शक्तियों को धन्यवाद देते हुए अपनी प्रार्थना की कि उन्होंने एक और दिवस की साधना सम्पूर्ण करने की स्वीकृति दी। अपने ध्यान को प्रत्येक सचेतन प्राणी के कल्याण हेतु समर्पित करते हुए, मैंने ध्यान की गहन साधना से प्राप्त ऊर्जाओं को दिशा देने हेतु दस हस्त-बंध मुद्राएँ कीं। कुटिया में उपस्थित ढेरों मूषक हर दिशा में कूदने फांदने लगे मानो उन्हें ज्ञात था कि यह मेरा आसन से उठने का व उनका उस आसन से हटने का समय था।

मैं एक ही स्थान पर बैठता, ध्यानस्थ होता, व सोया करता था। उस मिट्टी के फ़र्श पर तीन लकड़ी के तख़्ते एक साथ जुड़े मेरे ३ x ६ फुट के बिस्तर का रूप लिए थे। उन तख्तों के ऊपर एक पतला सूती गद्दा था। उस के ऊपर एक कंबल था और उस कंबल के ऊपर एक तकिया। यह था वह आसन जिस पर मैं सात माह तक, लगभग २० घंटे प्रतिदिन बैठ कर ध्यान किया करता था। अधिकांश दिन मैं १८ से २२ घंटे के बीच ध्यान करता। ध्यान की समय-तालिका की एक कठोर पद्धति का पालन करते हुए मैं नित्य प्रति एक ही समय पर ध्यान आरंभ करता, हर दिन- प्रतिदिन, अपने अभ्यास को दृढ़ता से आगे बढ़ाते हुए।

जहाँ एक ओर मैं सम्पूर्ण रात्रि ध्यानावस्था में रहता, वहीं मूषक आ कर मेरे समीप रखे तकिये पर सो जाते। अपने दस घंटे लंबे एक सत्र में मैं वहाँ अविचल बैठा रहता, भले ही वे मेरी गोद में कूदने लगते हों। ऐसा नहीं कि मेरा उनसे कोई घनिष्ठ संबंध था, मैं बस उन चूहों के झुरमुट के कारण अपने ध्यान को भंग होने देने को बिलकुल भी तैयार न था, ध्यान रोक देने का तो प्रश्न ही नहीं था। प्रारम्भ में तो अपने चारों ओर चूहों को कूदते फाँदते देखना बहुत भद्दी सी अनुभूति देता था, किन्तु समय के साथ साथ, मैंने उनके साथ एक प्रकार की मित्रता का सा संबंध विकसित कर लिया था। वे मेरे सहचर थे, व वही परमात्मा उनके अंदर भी विराजमान थे।

“तुम भी कुछ ध्यान का आनंद ले लो”, मैंने समीप छुपे उस मूषक के सम्मुख फुसफुसा कर कहा जो मेरी हिलचाल का अनुमान लगाने हेतु आगे पीछे गर्दन घुमा घुमा कर देखता जा रहा था। एक तत्व जिसे ध्यान तुरंत नियंत्रित कर देता है, वह है मन की दुर्दम प्रवृतियाँ।

उन सम्पूर्ण सात महीनों में, जब तक मैं वहाँ था, चूहों ने एक भी वस्तु अनछुई नहीं छोड़ी। मेरी इकलौती शाल भी नहीं, न ही मेरी टॉर्च के लिए रखा एक बैटरी का जोड़ा। मेरे पास लौंग के तेल की एक छोटी सी शीशी थी, उसको वे पहले सप्ताह में ही ले गए। हालाँकि वह एक बहुत छोटी शीशी थी, लगभग मेरे हाथ के अंगूठे के बराबर, और वे जंगली मूषक अपने शहरी बंधुओं से कहीं बड़े आकार के थे। चूहों ने हर वस्तु को खुरच दिया था – चाहे वह लकड़ी के टुकड़े हों जिनसे उस कुटिया की दीवार बनी हुई थी, वह मिट्टी व गाय के गोबर के मिश्रण द्वारा भरे गए दीवार के बीच के गड्डे हों, वह टूटी फूटी छत हो, अथवा वे थोड़े से प्लास्टिक हों जिनका उपयोग छत के छेद भरने में होता था ताकि वर्षा का जल वहाँ से अंदर न आने पाये। उन्होंने हर उस वस्तु को कुतर डाला था जिस पर उनके दांतों की पकड़ पहुँच पाई।

तथापि, इन उपद्रवी मूषकों ने मेरे बिस्तर को कभी कोई हानि नहीं पहुंचाई जिसमें मात्र मेरी एक पतली रज़ाई, गद्दा व दो तकिये थे (मैं एक तकिये का उपयोग बैठने के लिए करता व दूसरा अपने एक ओर रखा करता), मानो वे जानते हों कि अपने बिस्तर के अभाव में मेरे लिए निर्वाह करना अति दुष्कर हो जाएगा। एक शांत मन के अलावा, उस टूटे फूटे गाय के तबेले में जिसे लकड़ी के टुकड़ों, तारपोलीन, गोबर व घासफूस से बनाया गया था, वह बिस्तर ही मेरे आराम का एक मात्र साधन था। मूषकगण ने कभी भी मुझे कोई चोट नहीं पहुंचाई, एक बार भी नहीं। उससे भी बड़ी बात यह कि वे कभी भी मेरे उस दिव्य श्री यंत्र के समीप तक नहीं गए। एक अवसर भी ऐसा नहीं आया जब उन्होंने उस लाल रंग के कपड़े को कुतरा हो जिससे श्री यंत्र उस समय ढका रहता था जब वह उपयोग में न होता, और न ही कभी श्री यंत्र चित्रित किए हुए कागज़ को ही छुआ। मानो उन्हें इसका पूर्ण आभास था कि वह एक कागज़ का टुकड़ा न हो कर ऊर्जा का भंडार-क्षेत्र था, पूर्णत: विशुद्ध व दिव्यता से परिपूर्ण।

कभी कभी मुझे लगता कि वे मात्र अपने मनोरंजन हेतु ऐसा करते हैं, मेरी परीक्षा हेतु, मुझे कुछ परेशान करने के लिए मेरे साथ व्यंग्य करते हों। प्रकृति हर उस प्राणी के साथ ऐसा ही करती है जो इस सबसे ऊपर उठने का आकांशी हो। आपको परम आनंद एवं अंतर्दृष्टि से सुशोभित करने, सिद्धियाँ एवं समर्थता से भरपूर करने से पूर्व, वह यह पूर्णत: सुनिश्चित कर लेना चाहती है कि आप उसके लिए उपयुक्त प्राप्तकर्ता हैं। बहुत कुछ दाव पर लगा होता है। एक अनुचित व्यक्ति, एक हिटलर, सम्पूर्ण मानव जगत को अपूरणीय व अपार क्षति पहुंचा सकता है।

मैंने वह छोटा सा किवाड़ हटाया , वह जोड़-तोड़ कर के बनाया गया किवाड़ जिसमें लकड़ी के कुछ टुकड़े कीलों से आपस में मिला दिये गए थे, और उसे एक ओर रखा। मैं आधा झुका और बाहर कदम रखा। उस सर्द रात्रि के अंधकार में, दीप्तिमान चंद्रमा की शीतलता घुलमिल गई थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उस चमक ने प्रेमवश होकर, इस प्रकृति की विशालता को सम्पूर्णता प्रदान करते हुए, स्वयं को समर्पित कर दिया हो, जैसे यह प्रमाणित करने हेतु कि अंधकार एवं प्रकाश दोनों साथ साथ भी रह सकते हैं। हमारे अस्तित्व की सुंदरता यह द्विविधता ही है। सुख व दुख, ग्रीष्म व शीत, अच्छा व बुरा; सब साथ साथ रहते हैं। अन्तःकरण की वह सम्पूर्ण विश्रांतिपूर्ण अवस्था, मेरेपन व स्वार्थ की लहरों से मुक्त, जो ध्यान से उजागर होती है वह आपको जीवन के अंतर्विरोधों के मध्य रहने में न केवल सहायक होती है वरन उसकी उपयोगिता भी उजागर करती है।

चारों ओर व्याप्त हिम, चंद्रमा की प्रशांतिपूर्ण सुषमा से आलोकित हो अति शोभायमान प्रतीत हो रही थी। वृक्ष स्थिर थे मानो टहनियाँ व उन पर लटकती पत्तियाँ भी निद्रा में हों। बर्फीली हवाएँ चल रही थीं। पहले ही क्षण में मेरे कान व नाक जम गए। कुछ दूरी पर मैंने वन्य प्राणियों को अकस्मात हिलचाल करते सुना, मानो वे मेरी असमय उपस्थिती से अचंभित हो गए हों। एक मृग तीक्ष्ण ध्वनि में घुरघुराया और दूसरे ने बहुत गुंजायमान “बा” की आवाज निकाली। पलभर में सम्पूर्ण विस्तृत क्षेत्र विभिन्न क्रिया कलापों से परिपूर्ण हो गया। जंगली सूअरों ने मिले जुले स्वर निकाले व पर्वत की चोटी की दिशा में भागने लगे। मृग-मृगियाँ जंगल की ओर कूच कर गए। दूसरे जानवर, संभवतः एक रीछ, जो कुछ अधिक दूरी पर था, वह भी वन की ओर प्रस्थान कर गया।

उस रात्रि वे अन्य रात्रियों की अपेक्षा अधिक दृष्टिगोचर थे, चूंकि वह न केवल पूर्णिमा की रात थी बल्कि आकाश भी साफ था। यह गत तीन माह में प्रायः आने वाले तूफान, वर्षा, हिमपात व ओलावृष्टि से भरपूर दिनों में, बहुत ही कम घटने वाली घटना थी। मेरे सम्मुख व्याप्त वह सम्पूर्ण क्षेत्र इस प्रकार दैदीप्तिमान था जैसे वह चाँदी के कणों से सुसज्जित ईश्वर का वृहद क्रीडा स्थल हो।

उन वन्य जीवों को यत्र तत्र घूमते देखना दिव्य आनंद से भरपूर था।

मुझे किसी भी प्रकार के भय का अनुभव न हुआ (निर्भीकता, गहन-सुव्यवस्थित ध्यान का प्राकृतिक उपफल होता है)। मैं अपने चहुं ओर व्याप्त प्रत्येक पदार्थ से एकाकार अनुभव करते हुए उनके प्रेम से परिपूर्ण था। वेदों में इसे “अद्वैत” कहा गया है। भय की उत्पत्ति द्वैत भाव में होती है, पृथक होने की अनुभूति में कि कहीं आप दूसरे को खो न दें अथवा कहीं वे आपको हानि न पहुंचा दें। किन्तु भला कौन आपको हानि पहुंचा सकता है जब चारों ओर आप स्वयं ही हैं? दिव्य-एकता में भय का किंचित मात्र भी स्थान नहीं। यह दिव्य-एकता की परम स्थिति ही ध्यान की चरम सीमा है। ऐसी अवस्था में ध्यान एक कार्य नहीं रह जाता। बल्कि यह एक दृगविषय बन जाता है, मन की परम स्थिति।

वन्य जीवन के ये सुंदर जीव मेरे अस्तित्व का ही तो विस्तार थे। यहाँ पहुँच कर आप अपनी स्वयं की देह से भी भयभीत नहीं रह जाते। ब्रह्मांड में उपस्थित प्रत्येक पदार्थ की ही भांति, चारों ओर के सभी वन्य जीव भी कुछ और नहीं वरन मेरा ही प्रतिबिंब थे। वे मेरे अतीत के जीवन थे। मैं ही कभी एक वाराह, एक रीछ, एक मृग, एक बाघ था। आपके आस पास का हर प्राणी व हर पदार्थ कभी आपका ही भाग थे व आप उनके एक भाग थे। अरबों-खरबों वर्षों की हमारी अनंत योनियों की चिरकालिक यात्रा में हम जो कुछ भी थे उसका सम्पूर्ण योग हमारे अंतस्थ में अनंतकाल से विराजमान है, हमारे साथ है, हमारे समक्ष है, आसपास है। सदा सर्वदा। यह मात्र कहने भर के लिए एक कथन नहीं है। यदि आप ध्यान के मार्ग पर निरंतर चलते चलें तो एक दिन आप स्वयं मेरे शब्दों की सत्यता का अनुभव कर पाएंगे, उसे जान पाएंगे व समझ पाएंगे।

मैंने कुटिया के छप्पर की ओर हाथ बढ़ा कुछ बर्फ उठा ली। वह अपेक्षाकृत अधिक ठोस थी चूंकि वह ताजी बर्फ न थी। गत रात्रि के हिमपात से वह एकत्र हुई थी। कुछ भी हो, वह स्वादिष्ट थी। उसने मेरी देह में गहन ध्यान के चलते उत्पादित अत्याधिक ऊष्णता को कुछ शांत किया। मेरे शरीर में व्याप्त सूक्ष्म तरंगें शनैः शनैः गहन संवेदनाओं का स्वरूप ले चुकी थीं जो मेरी सम्पूर्ण देह में संचारित हो रही थीं व मेरे मस्तिष्क में इस प्रकार प्रगाढ़ होती जा रहीं थीं जिस प्रकार हिमालय की चोटियों से गिरते जल प्रपात व झरने, व गंगा में उठती गिरती वेग पूर्ण लहरें। मेरे मस्तिष्क में व्याप्त झनझनाहट असहनीय व अवर्णनीय थी। मैंने अभी तक यह नहीं सीखा था कि किस प्रकार इन तीव्र झंझनाहटों से छुटकारा पाया जाये। एक विलक्षण स्पष्टता जो मन, इंद्रियों, व भूत-वर्तमान और भविष्य से संबन्धित थी, मेरी चेतनता रूपी सरिता से प्रवाहित हो रही थी। कभी तो उन झंझनाहट भरी संवेदनाओं के प्रति मेरी अनिच्छा उपजने लगती चूंकि वे मुझे कुछ भी अन्य क्रिया कलाप करने के लिए पूर्णतःअक्षम कर देतीं। स्नान के उपरांत अपने मस्तक पर एक तिलक लगाना तक भी मेरे लिए चुनौतीपूर्ण हो जाता।

मैं एकमात्र ध्यान ही कर पाने की स्थिति में था और जब भी मैं ध्यान करता, वे संवेदनाएँ उस स्तर तक निर्मित हो एकत्रित हो जातीं कि मुझे अनुभव होता मानो मेरी देह हाड़-मांस की न हो कर, मात्र संवेदनाओं का एक पुंज हो, ऊर्जा का एक संयंत्र, जो स्वयं भी मात्र ऊर्जा से हो बना हो, ऊर्जा से ही भरा हो। मुझे ऐसे स्पंदन होते जैसे मेरे अपने अस्तित्व की कोई भौतिक सत्ता ही नहीं रही। तथापि, शरीर को तो प्रकृति के नियमों के आधीन ही कार्य करना था, अस्तु मुझे अपने हिस्से के शारीरिक कष्ट, दर्द व पीड़ा से गुजरना ही पड़ा। किन्तु, उन कष्टों व पीड़ाओं ने मेरे इस निश्चय को और दृढ़ कर दिया कि मुझे ध्यान की उन गहराइयों को छूना है जहां मैं इस देह के बंधनों को लांघ कर पार चला जाऊँ।

केवल मात्र यह जानकारी रखना कि शरीर तो एक माध्यम भर है, अथवा तो यह कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड हमारे अंदर ही विराजमान है – यह अधूरा ज्ञान है। यह बिना अनुभव का ज्ञान है जो परमानंद नहीं वरन अज्ञानता की ओर जाता है। मैं अज्ञानता इसलिए कह रहा हूँ चूंकि आप इस प्रकार की संकल्पनाएँ बिना किसी अनुभवयुक्त बोध के ही बना लेते हैं। ध्यान में आने वाली कठिनाईयां भीरु प्रवृति वालों के लिए नहीं हैं। और, अन्य बातों से ऊपर, इस अभ्यास के प्रारम्भिक चरण के दौरान, असाधारण धैर्य एवं आत्म-अनुशासन की परम आवश्यकता होती है।

मैं और गहन एकांत की अभिलाषा में हिमालय के वनों के गहरे भीतर तक चला गया था। कुछ ग्रामीण बहुत दूर से वहाँ तक इसलिए आ गए कि वे वन में मेरे ध्यान की अवधि के अंतिम दिवस पर मेरे दर्शन कर सकें। जब मैं सात माह उपरांत अपनी कुटिया से बाहर आया, तो वे सब अचंभित थे। उनकी अपेक्षा यह थी कि कुटिया से एक जीर्ण-शीर्ण, दुबला पतला साधु बाहर आएगा, चूंकि मैंने उन भयानक परिस्थितियों में अत्याल्प भोज्य पदार्थ पर ही निर्वाह किया था। यदा कदा, अर्ध रात्रि के भयावह अंधकार में मैं बाहर निकलता व बर्फ ही भोजन की तरह खा लेता।

मैंने महीनों से स्वयं का मुख नहीं देखा था। २४ घंटों में एक बार मैं बर्फीले शीतल जल से स्नान के उपरांत अपने मस्तक पर एक छोटे से दर्पण में देख तिलक लगाया करता। वह दर्पण मेरे सम्पूर्ण मुख का बिम्ब दिखाने हेतु अति सूक्ष्म था। मुझे नहीं पता था कि मैं कैसा दिख रहा था। मुझे ज्ञात था कि मेरा वजन कम हो गया है किन्तु मुझे कभी भी ऊर्जा की कमी का आभास नहीं हुआ।

वे सब इसलिए अचंभित थे चूंकि मुझमें शारीरिक दुर्बलता अथवा थकावट का कण मात्र भी लक्षण न था। क्षण भर को तो मैं स्वयं अपना चेहरा देख आश्चर्यचकित हो गया था, अपने नेत्रों की आभा देख – हालांकि पल भर को ही, चूंकि मैं जानता था कि सभी प्रकार के सम्बन्धों के बंधन; धर्मों, व संसार से पूर्ण विमुक्त मेरी आत्मा, दिव्य परम आनंद से भरपूर ब्रह्मांड में उन्मुक्त विचर रही थी। मेरी ऊर्जा का स्रोत मेरे द्वारा ग्रहीत वह भोज्य पदार्थ न हो कर, वह विचार थे जिनका मैं चिंतन करता था। और, मैं कुछ भी नहीं सोचता था। अब तक मैं एक लंबी अवधि से विचारशून्य था। जो एक मात्र विचार मेरे अंतर में रहता वह था केवल ईश्वर का, अथवा प्रेम का।

जब आप दूध को मथते हैं तो क्या होता है? वह माखन में रूपांतरित हो जाता है, और एक बार यह रूपान्तरण हो जाये, तो पुनः वह कभी भी दूध का रूप नहीं ले सकता। यदि दूध, कुछ दिन तक खराब न हो कर ठहर सकता है, तो माखन कुछ सप्ताह तक ताजा रहता है। यदि आप माखन को गरम करें तो वह घी बन जाता है, और घी सालों तक टिका रह सकता है। आप उसे जैसे भी रखें, वह पुनः माखन अथवा दूध कभी नहीं बन सकता।

दिव्य आनंद की चरम अवस्था दूध से घी बनने के संरूप है – वह अपरिवर्तनशील है।

मैं कभी भी हिमालय से लौट कर नहीं आना चाहता था। वह असाधारण दिव्य आनंद अनिर्वचनीय है, मेरे हर संभव शाब्दिक वर्णन से कहीं परे। मैंने सैंकड़ों बार अपने अंतर में अनहद नाद सुना। असंख्य बार मैंने स्वयं को देह से बाहर, जहां कहीं मैं चाहूँ, वहाँ जाते हुए अनुभव किया। अनेकानेक अवसरों पर मैंने अतिशय मधुर ध्वनियाँ सुनीं, अनेक अतिभव्यशाली दर्शन किए। मेरा जगत सम्पूर्ण था। लौटने की न कोई आवश्यकता थी, न ही लालसा। इसके विपरीत, मैं अपनी देह का त्याग कर देना चाहता था।

किन्तु, साक्षात्कार आपके अन्तःकरण में कुछ सदा के लिए रूपांतरित कर देता है। अब आप मात्र अपने बारे में ही नहीं सोच पाते। भले ही आप पर कोई दायित्व शेष न हो, अथवा आपका परिवार न हो; आप मात्र वह ही कार्य नहीं कर पाते जो “आपको” प्रसन्न करे। कहीं न कहीं आपको यह आभास होता रहता है कि आप पर एक प्रकार की प्रबल दिव्य कृपा बरस रही है और अब यह आपका दायित्व है कि आप उस परमानंद को उन जिज्ञासु जनों के साथ बांटें जिन्हें इसकी प्यास है। आप भले ही इस तथ्य को विस्मरित करने का कितना भी यत्न करें, किन्तु आप अपने चारों ओर के जगत के प्रति समर्पण भाव से जीने को अपना अहोभाग्य मानने लगते हैं। जिस प्रकार एक गाय को अपने बछड़े को दूध पिला सुख अनुभव होता है, उसी प्रकार आपको अपना परमसुख, मानव मात्र की सेवा में प्राप्त होता है। भले ही जगत आपके साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार करे , आप सदा करुणामय भाव में ही जीते हैं। यह स्वतः होता है कि आप सदा सर्वदा अन्य जीवों की आवश्यकताओं को स्वयं से ऊपर ही रखते हैं। आपके निःस्वार्थ सेवा भाव में ही आपको अपने परम सुख की प्राप्ति होती है।

ऐसे निःस्वार्थ भाव से ओतप्रोत प्राणी के जीवन में कुछ चमत्कारिक घटित होता है। ब्रह्मांड के सभी प्रमुख घटक आपके चरणविंद के समक्ष उपस्थित रहते हैं, आपके आदेशों के पालन हेतु सज्ज। आप तब तक स्वार्थ रहित नहीं हो सकते जब तक आप हर किसी को स्वयं का ही रूप देखना आरंभ नहीं करते, और स्वयं को हर किसी का रूप देखना। जब तक आप में उस एकात्मता के अनुभव की वह अंतर्दृष्टि विकसित नहीं होती, तब तक आप स्वयं को दूसरे से भिन्न देख कर ही व्यवहार करते हैं। किन्तु, एक बार आपको वह अनुभव युक्त बोध मिल जाता है (केवल बौद्धिक स्तर की जानकारी नहीं) जिससे आप अपने मन व आसपास की वास्तविकता को समझ लेते हैं, समस्त सचेतन प्राणी-जगत के प्रति निरंतर, अविरल बहता करुणा का भाव स्वतः ही उजागर हो जाता है।

किसी भी प्रकार की प्राप्ति निरर्थक है यदि वह संसार को आगे बढ़ने में सहायक न हो। हर ध्यान असंगत है यदि उससे आपकी चेतना में जागृति न बढ़े, यदि वह आपकी सत्ता को और विराट न कर पाये व आप में करुणा, सकारात्मकता व प्रेम न जगा पाये। ध्यान इन्हीं सब का मूर्त रूप है। यही रही है मेरी यात्रा।

जाएँ, व अपनी यात्रा का आरंभ करें।

यह मेरी ध्यान पर लिखी पुस्तक “अ मिलियन थोट्स” का उपसंहार है। मैंने उपसंहार को इसलिए साझा करने हेतु चुना चूंकि आरंभिक अध्याय तो आप अमेज़न के ‘लुक इनसाइड’ द्वारा भी पढ़ सकते हैं। “ध्यान” पर एक विस्तृत जानकारी देती यह पुस्तक जो जयको पब्लिशिंग हाऊस द्वारा प्रकाशित की गई है। इस पुस्तक के क्रय हेतु कुछ उपयोगी संपर्क-लिंक इस प्रकार हैं –

१) Amazon India (यदि यहाँ लिखा हो “उपलब्ध नहीं” तो एक दो दिन में पुनः देखें।
२) Paperback on Amazon.com, e-book on amazon.com (भारत से बाहर के सभी पाठकों के लिए)

अंत में, व आवश्यक रूप से, उन सब के प्रति मेरे हृदय से आभार जो अमेज़न (Amazon) पर अपने सत्य रिवियू लिखते हैं। मैं हर एक रिवियू को स्वयं पढ़ता हूँ। आप सब का धन्यवाद। सच में…

शांति।
स्वामी