एक दिन एक सज्जन, जो आरंभिक दिनों से ही मेरे ब्लॉग व प्रवचन पढ़-सुन रहे हैं, मेरे पास आए। उन्होंने हृदय को द्रवित कर देने वाली एक घटना सुनाई। उन्हीं के शब्दों में वह यहाँ प्रस्तुत है –

“स्वामी”, वे बोले, “प्रातःकाल स्नान के उपरांत मेरा सर्वप्रथम कार्य होता है घर के पूजास्थल पर दीया जलाना व प्रार्थना करना। अगरबत्ती व दीये के संग मैं ताजे पुष्प भी अर्पण करता हूँ। मेरे यहाँ एक छोटा सा बगीचा है जो बाड़ द्वारा सुरक्षित है व जहां मैं बहुत सावधानी व प्रेम पूर्वक ये फूल उगाता हूँ चूंकि इन्हें प्रभु को समर्पित करना होता है। मैं हर सुबह व शाम उन्हें जल से सींचता हूँ।”

“आप अभी अभी पहाड़ों से आए हैं, किन्तु यहाँ मैदानी भूभाग में अत्यधिक गर्मी पड़ रही है”, उन्होंने बताना जारी रखा। “अत्याधिक गर्मी व लू के कारण लोग जितना अधिक हो, घरों के अंदर ही रह रहे हैं। और तो और, कुत्ते व गाय भी किसी छायादार स्थान की तलाश में रहते हैं क्योंकि सुबह सूर्योदय के बाद से ही धूप बहुत तपाने वाली हो जाती है। सुबह सात बजे भी यदि आप बाहर निकलते हैं तो पसीने आने लगते हैं।”

“वह रविवार का दिन था और मैं बिजली कटौती के चलते रात भर सो नहीं पाया था, अतः उस दिन मैं अन्य दिनों की अपेक्षा देर से उठा। नौ बजे के आस पास मैं अपनी प्रार्थना हेतु फूल तोड़ने बाहर गया। मुझे यह देख बहुत क्रोध आया कि एक कुत्ता बाड़ के नीचे से घुस कर मेरे उस छोटे से बगीचे मैं बैठा हुआ था। फूलों की एक क्यारी आधी नष्ट हो चुकी थी, चूंकि कुत्ते ने बैठने के लिए एक गड्ढा खोद लिया था और वहीं पास में मिट्टी का ढेर पड़ा था।”

“अपनी जीभ मुँह से बाहर निकाले, वह उस ठंडी जगह पर आराम कर रहा था। बगीचे की ऐसी हालत देख मैं उदासी के साथ साथ बहुत गुस्से में भी था। उस पर यह विचार कि अब मैं प्रार्थना में पवित्र, ताजे फूल कैसे अर्पित करूंगा! अगर वो बगीचे के किसी दूसरे कोने में कुछ करता तो मुझे पता भी नहीं चलता। मुझे सच में बहुत अधिक क्रोध आया और मैं पूरी ताकत से चिल्लाया। और, कुत्ता भाग गया।”

“मैंने शीघ्रता से प्रार्थना समाप्त की चूंकि मैं बिलकुल भी तन्मय न हो पाया, और अगला एक घंटा मैंने अपने बगीचे को ठीक करने में लगाया। सारा दिन मैं खराब मूड में रहा। उस दिन दोपहर को मुझे अपने जूते सिलवाने मोची के पास जाना पड़ा। वह मोची एक चौड़ी सड़क के फुटपाथ पर बैठा था। उसके बैठने के स्थान के ऊपर एक टूटा-फूटा पुराना छाता डंडे के सहारे बंधा हुआ थ। वहाँ रखे उस छोटे से धूल खाये, बाबा आदम के जमाने के तख्त, जिस पर रख कर वह जूते की मरम्मत करता था, पर अनेकानेक छोटे-बड़े, गहरे-उथले निशान उभर आए थे जो सालों साल से उसके औजारों की चोट खा खा कर बने होंगे।”

“मोची ने सुए व अन्य औजारों के संग ही एक सान (घिसने का पत्थर) रखा था और उसी के पास एक पानी से भरा पुराना कटोरा था। इसी से वह अपने चमड़ा काटने वाले उस्तरे को बार बार गीला करता व उस पत्थर पर थोड़ा घिस कर धार तेज कर लिया करता। अपनी बाईक पर बैठा मैं गर्मी के कारण परेशानी व बेचैनी महसूस कर रहा था, और वहीं वह मोची बहुत धीरज से, धीरे धीरे अपना काम कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो उस गर्मी व आसपास के शोर का उस पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ रहा हो।”

“वह अपने औज़ार को उस पानी में भिगोने को ही था कि तभी कहीं से एक आवारा कुत्ता मटरगश्ती करते वहाँ आ गया और उस कटोरे से पानी पीने लगा। मोची रुक गया और मुस्कुराने लगा। मैं एक पल उस कुत्ते को देखता और दूसरे पल मोची को, जो उस कुत्ते को शांत चित्त से, एक संतुष्टि का सा भाव लिए निहार रहा था। जल्द ही पानी समाप्त हो गया और कुत्ता कटोरे को चाटने लगा।”

बिना एक भी शब्द बोले, मोची ने अपना थैला खोला, एक पुरानी प्लास्टिक की मुड़ी-तुड़ी बोतल निकाली और थोड़ा पानी और उस कटोरे में डाल दिया। कुत्ता फिर से पानी पीने लगा। उसने भी दो घूंट पानी अपने मुँह में डाला और बोतल वापिस थैले में रख दी। बेतहाशा गर्मी के कारण, अवश्य ही वह पानी गुनगुना हो चुका होगा, यदि पूरी तरह उबलता न भी कहें तो।”

“थोड़ा और पानी पी, कुत्ते ने मोची की ओर देख कर पूँछ हिलाई और वहीं पास में बैठ गया। अपने बूढ़े, मैल से सने चेहरे में छुपी उन छोटी छोटी किन्तु करुणा से भरी आँखों से मोची ने उसे प्रेम से देखा। कुत्ते के लिए वह सीमेंट का फुटपाथ अत्याधिक गरम था, अतः वह उठा, थोड़ा और पानी पीते हुए अपनी पूँछ हिला कर चुपचाप वहाँ से चला गया। मोची ने उसी पानी से अपना उस्तरा गीला किया और अपने काम में लग गया।”

“स्वामी, मैं आपको बता नहीं सकता कि मुझे कितना लज्जित महसूस हुआ” वह सज्जन कहते गए। “एक ओर मैं, एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति जो सालों से आपके प्रवचन सुनता आ रहा था और आपके लेख पढ़ रहा था, फिर भी मैं उस कुत्ते में किसी भगवान को नहीं देख पाया जिसने मेरा बगीचा खराब कर दिया था। मैंने एक पागल आदमी की भांति चिल्ला कर उसे भगा दिया था। मैं आवश्यकता से कहीं अधिक परेशान हो गया था। और, यहाँ एक अनपढ़ मोची, जिसने शायद कोई भी ग्रंथ न पढ़ा हो, न ही कभी कहीं पूजा-अर्चना की हो, तब भी वह मुझसे कहीं अधिक आध्यात्मिक था।”

“मैंने अक्सर आपके मुख से सुना है कि हर प्राणी में ईश्वर देखो और उनके साथ वैसा ही व्यवहार करो, किन्तु जब वास्तव में मुझे ऐसा करने का अवसर मिला तो मैं बुरी तरह असफल हो गया। वहीं, दूसरी ओर एक मोची आपके शब्दों को शत-प्रतिशत जी रहा था, वह ग्रन्थों का पालन कर रहा था। स्वामी, मुझे अत्याधिक ग्लानि का अनुभव हो रहा है।”
“आप परेशान न हों”, मैंने कहा, “आपने जीवन भर के लिए एक पाठ सीख लिया।”
“नहीं स्वामी…”, और वे रो पड़े। “कृपया मुझे बताएं कि मैं प्रायश्चित किस प्रकार करूँ?”
“आपका जागरूक हो जाना ही आपका प्रायश्चित है।”
“तब भी स्वामी, मुझे कुछ तो करने की आज्ञा दें”, उन्होंने बल पूर्वक पुनः बोला।
“अच्छा, तो आप अपने घर के बाहर कुत्तों व पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था कर दें और जल के पास ही तीन चपाती अथवा ब्रैड रख दिया कीजिये। प्रतिदिन। जब तक आप कर पाएँ, तब तक।”

उनकी कहानी से मुझे संत रविदास जी का स्मरण हो आया जो व्यवसाय से मोची ही थे। उनका प्रसिद्ध वाक है “मन चंगा ते कठौती विच गंगा” (यदि आपका मन पवित्र है तो आपके पास रखे कटोरे का जल भी गंगा जल की भांति ही पवित्र है)। एक योगिक व भक्तिपूर्व भाव लिए, उनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में इस प्रकार वर्णित है –

तोही मोही, मोही तोही अंतरु कैसा,
कनक कटिका जला तरंग जैसा,
जऊ पै हम न पापा करंता अहे अनंता,
पतित पावन नाम कैसे हुंता (SGGS p.९३)

तुम चन्दन हम इरन्दा, बापुरे संगी तुम्हारे बासा, 
नीच रूखा ते ऊंचा भेय ए है, गंध, सुगंध निवासा। (SGGS p.४८६)

तुम मैं हो और मैं तुम, तुम्हारे और मेरे में अंतर कैसा!
हम दोनों स्वर्ण और माला की भांति हैं, अथवा तो जल और तरंग।  
अगर मैं कोई पाप न करता, ऐ मेरे आदि अनंत प्रभु! 
तो आपको ‘पापियों को तारने वाला’ ये नाम कैसे मिलता? 

तुम हो चन्दन और मैं ठहरा कांटों भरा पौधा, तुम्हारे आस पास ही वास किए हुए।  
एक नीच से भी नीच से अब मैं ऊंचा पेड़ हो गया हूँ और आपकी सुगंध अब मुझ में भी समाये हुए है।

जब आप ईश्वर को पा लेते हैं तो स्वाभाविक रूप से ही आप विनयशील हो जाते हैं। अभिमान और अहम भाव आपको वैसे ही छोड़ कर चले जाते हैं जिस प्रकार उजाला देखते ही चोर भाग लेते हैं। आप अच्छाई की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं, आप अपने शब्द सावधानीपूर्वक चुनते हैं। आप अपने द्वारा होने वाले कार्यों का बहुत सावधानी पूर्वक तोलमोल करते हैं। आप अपने विचारों को सुरुचिपूर्ण ढंग से दिशा देते हैं। आप सजगतापूर्वक कर्म करते हैं। यह सब सहजरूप से ही होता है, चूंकि आप हर प्राणी में उसी एक दिव्य-स्वरूप को देखते हैं।

भले ही हम कितने भी ज्ञानवान अथवा धार्मिक क्यों न हों, जब तक हम दूसरे सचेतन प्राणियों के दर्द को महसूस नहीं करते तब तक हम सब एक जैसे हैं – स्व-केन्द्रित व स्वार्थपरक। और जब सत्य उजागर होता है तब आप को बोध होता है कि अब हम सब एक समान ही हैं – शाश्वत एवं दिव्य। केवलमात्र दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाता है। साक्षात्कार से पूर्व आप देह रूप देखते हैं, बाहरी रूपरंग व भिन्नताएँ देखते हैं। साक्षात्कार के उपरांत, आप आत्म-रूप देखते हैं, समानताएँ व आंतरिक मूल-तत्व देखते हैं।

तब आप कुत्ते में भी भगवान देखते हैं, फूलों में, चींटी में, हर किसी में भगवान का स्वरूप। चूंकि वास्तविक सत्य तो यही है।

शांति।
स्वामी