बहुधा हम कुछ विशेष करने का संकल्प लेते हैं और योजना बनाते हैं। कुछ विशेष विधि से कार्य करने की योजना। किंतु प्रलोभन की एक लहर, एक छोटी सी बहस, एक छोटा द्वन्द्व और सब कुछ किनारे पर आ जाता है। हम अपनी प्रतिज्ञा भूल जाते हैं और फिर जहाँ के तहाँ आ जाते हैं। फिर हम चिंता में सोचते रहते हैं तथा स्वयं को कोसते रहते हैं। हमें बुरा लगता है और हम स्वयं को दोषी करार दे देते हैं। हम पुनः संकल्प लेते हैं। इस बार कुछ कम आत्मविश्वास के साथ और हम पुनः इसे तोड़ देते हैं।

अंत में स्वयं में थोड़ा परिवर्तन लाना अधिकतर व्यक्तियों को इतना दुष्कर क्यों लगता है? वादा निभाना इतना कठिन क्यों है? हम अपने संकल्प को बनाए रखने में असफल क्यों हो जाते हैं? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक साधारण से कथन में है। किंतु अपना दृष्टिकोण आपसे साझा करने से पूर्व मैं आप को एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ।

एक व्यक्ति बीमार था और अपनी अनियंत्रित वासनाओं से तंग आ चुका था। अपनी दिन भर की कमाई को शराब, जुआ व व्यभिचार पर लुटाने के पश्चात वह प्रतिदिन शाम अपने घर लौटता। अपने भूखे बच्चों व शोकग्रस्त क्रंदन करती पत्नी के पास। हर बार जब भी उसकी पत्नी उससे इस विषय पर चर्चा करती अथवा इस समस्या से उसका सामना कराती, वह उसे पीटता और बाद में पछताता। वह बदलना चाहता था किंतु वह चाहे कुछ भी करता, उसकी पुरानी आदतें उसका पीछा न छोड़तीं।

भटका हुआ, थका मांदा वह पैगंबर मुहम्मद के पास गया।

“मैं एक दुराचारी व्यक्ति हूँ।” उसने मुहम्मद साहब से कहा। “कृपया इन बुरी आदतों से छुटकारा पाने में मेरी सहायता करें।”
“इंशा अल्लाह” पैगंबर ने उत्तर दिया। “मेरी सलाह पर अमल करो और सारे व्यसन तुम्हें छोड़ कर चले जायेंगे।”
“अल रसूल, आप चाहे जो कहें। किंतु मुझे शराब पीने, जुआ खेलने तथा व्यभिचार करने से मना मत कीजियेगा। मेरे सारे प्रयास असफल हो चुके हैं।”
“मैं तुम्हें इनमें से कुछ भी करने से नहीं रोकूँगा ”, मुहम्मद साहब ने कहा “बजाय इसके तुम्हें अगले चालीस दिनों तक केवल एक ही कार्य करना है। केवल सत्य ही बोलना है।”

उसे इस आदेश पर कौतूहल हुआ “झूठ बोलना मेरी समस्या नहीं है। हे पवित्रात्मा, इन व्यसनों ने मुझ पर जो अतिक्रमण कर रखा है, मैं उससे मुक्ति पाना चाहता हूँ।”
“मैंने तुम्हें जो निर्देश दिये हैं उनका पालन करो और अल्लाह की कृपा से तुम अपनी बुरी आदतों को छोड़ दोगे।”
“तो, जब तक मैं सत्य कहूँ, तब तक मैं जो चाहे कर सकता हूँ।”
मुहम्मद साहब ने प्रत्युत्तर में अपना सर हिलाया।

उसने अभिवादन किया और अपने घर चला गया। हालांकि उसे विश्वास नहीं हुआ फिर भी उसने मुहम्मद साहब के शब्दों का मान रखने का मन बना लिया था।

उस रात वह पुनः अपने घर शराब पीकर गया और पुनः उसकी पत्नी ने पूछा कि वह अब तक कहाँ था? वह सम्पूर्ण सत्य बताने का साहस नहीं जुटा पाया, कि शराब पीने के अलावा उसने जुआ भी खेला है और वेश्या-वृत्ति भी की है। वह चुप रहा।

दूसरी शाम उसे उसके दो मित्र मिले, जिन्होंने पूछा कि वह कहाँ जा रहा है ? असत्य न कहने की शपथ से बँधा वह मौन रहा। क्योंकि वह उन्हें सत्य भी नहीं बता सकता था। पुनः पूछे जाने पर उसने कहा कि वह अपने घर जा रहा था। और फिर इसे सच बनाए रखने के लिये वह अपने घर वापस चला गया।

इसी प्रकार कुछ और दिन बीत गये और फिर उसने जाना कि एक ही समय में गलत काम करना और सत्य कहना सरल नहीं है। अपना नाम खराब करने की बजाय उसने स्वयं को किसी प्रकार अपने व्यसनों से कुछ सप्ताह तक दूर रखा। शीघ्र ही वह घर के प्रेमपूर्ण, स्वस्थ वातावरण का आदी हो गया। उसका शरीर और मन उसकी नयी जीवनशैली के अनुकूल होते गये और चालीस दिनों पश्चात वह एक परिवर्तित व्यक्ति था।

आप सोच रहे होंगे कि यह कहानी कुछ अधिक ही आशाजनक है। किंतु सत्य तो यह है कि यह पूर्ण रूप से यथा-संभव है। यहाँ तक कि तंत्रिका-विज्ञान की भाषा में कहा जाए तो जब हम कुछ भी, बार-बार, लगातार छः सप्ताहों तक करते हैं तो हमारे मस्तिष्क में तंत्रिकाओं का एक नया पथ बन जाता है जो नई आदतों को मार्ग देता है। किसी पुरानी आदत को तोड़ने के सबसे सरल विधियों में से एक है-उसे एक नई, बेहतर आदत से बदल देना।

यदि आप अपने आसपास सबसे सफल व्यक्तियों का अध्ययन करें तो आप पाएंगे कि ऐसा नहीं है कि उन्होंने कईं संकल्प किये और सभी संकल्पों को निभाया। उन्होंने भी टाल-मटोल किया, वे भी डगमगाए और उन्होंने भी गलतियाँ कीं। फिर भी, उनके कुछ नियम सिद्धांत थे, सामान्यतया एक या दो, जिन पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। उदाहरण के तौर पर फ्रेंकलिन रूज़वेल्ट प्रतिदिन नाश्ते से पूर्व एक नई पुस्तक पढ़ते थे। महात्मा गांधी प्रतिदिन सूती धागा बुनते थे। बुद्ध प्रतिदिन भिक्षाटन के लिये जाते थे। कुछ सेवा हेतु खड़े हुए, कुछ अहिंसा के लिये, तो कुछ स्वतंत्रता के लिये। महान व्यक्ति अपने सिद्धांतों के लिये खड़े हुए। उनकी आदतें उनके सिद्धांतों का परिणाम थीं।

जो भी हो, मेरे आज के लेखन का उद्देश्य आदतों को बनाना या बिगाड़ना नहीं। अपितु यह उन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास है जो मैंने इस लेखन के आरम्भ में उठाये और जो कथा मैंने सुनायी उसमें छिपे वास्तविक संदेश को उजागर करने के लिए है। प्रस्तुत है –

सफल व्यक्तियों के जीवन में कम से कम एक सिद्धांत अवश्य होता है जिससे वे कभी समझौता नहीं करते।

सफलता से मेरा तात्पर्य केवल आर्थिक सफलता नहीं। मैं उनके विषय में भी कह रहा हूँ जो भावनात्मक रूप से सफल हैं तथा जिनके सम्बन्ध सार्थक एवं परिपूर्ण हैं अथवा वे जो आध्यात्मिक रूप से सफल हैं और फलस्वरूप संतुष्ट एवं परमानंद में स्थित हैं।

मुल्ला नसरूद्दीन नव-वर्षोत्सव के कुछ दिनों पश्चात अपने मित्र से मिला और उससे एक सिगरेट मांगी।

“किंतु मैंने सोचा था कि तुमने सिगरेट छोड़ने का संकल्प लिया था।”
“हाँ अवश्य, मैंने लिया था।” मुल्ला ने उत्तर दिया “किंतु इसे छोड़ना एक प्रक्रिया है जिसे मैं निभा रहा हूँ।”
“प्रक्रिया?”
“हाँ, अभी इस समय मैं दूसरे चरण में हूँ।”
“और वह दूसरा चरण क्या है?” उसके मित्र ने पूछा।
“मैंने सिगरेट खरीदना छोड़ दिया है।”

जब संकल्प निभाने की बात हो तो क्रमशः विकास कभी-कभार ही काम करता है। आप या तो उसमें संलग्न रहते हैं, या नहीं। यहाँ मध्य में कुछ भी नहीं। बजाय इसके कि सदैव नये संकल्प बनायें और उन्हें तोड़ते रहें, बेहतर है कि अपने जीवन में एक या दो सिद्धांत रखें, जिनसे समझौता न करें। एक बार आपके पास एक सिद्धांत है जिसके लिये आप प्रतिबद्ध हैं तो विकल्प चुनना बहुत आसान हो जाता है। वह एक सिद्धांत क्या है? जिसके लिये आप अडिग हैं। वह एक आदर्श जिस पर आप कोई समझौता नहीं करेंगे? वह एक तत्व क्या है जिसका आप पूर्ण रूप से समर्थन करते हैं?

यदि आप के पास एक भी सिद्धांत नहीं है तो बनायें। आपके जीवन को एक नया आयाम मिल जायेगा। यह मेरा वचन है। यह सब संलग्न होता जायेगा, जैसे कि वर्षा की बूँदें तालाब में एकत्रित होती जाती हैं। और जिस सिद्धांत के लिये भी आप अडिग हैं आप उन्हीं गुणों का विशाल भंडार बन जायेंगे।

यदि आप किसी सिद्धांत के लिए खड़े नहीं होते तो इस ब्रह्माण्ड में कोई भी पूर्ण रूप से आप का समर्थन नहीं करेगा।

शांति।
स्वामी