हम एक ऐसी कहानी से प्रारंभ करते हैं जो मैंने कुछ वर्षों पूर्व पढ़ी थी और मन ही मन एक दिन उसे कहीं उपयोग करने का निश्चय किया था। इसे आपके साथ साझा करने के लिए शनिवार की सुबह से अच्छा अवसर क्या हो सकता है। प्रस्तुत है (यथासंभव कथा वैसी कि वैसी है, इसका स्रोत अज्ञात है) –

मैं जैसे जैसे वृद्ध हो रहा हूँ, उतना ही मैं शनिवार सुबह का आनंद लेने लगा हूँ। संभवतः यह एकांत की वह शांति है जो प्रातः सर्वप्रथम उठने से आती है या कदाचित यह काम पर न जाने की असहज प्रसन्नता है। जैसे भी देखा जाए शनिवार प्रातःकाल के कुछ घंटे अधिक सुखद होते हैं।

कुछ सप्ताह पूर्व, एक सामान्य शनिवार की सुबह के रूप में जो आरंभ हुआ वह उन महत्वपूर्ण पाठों में से एक निकला जो जीवन आपको समय-समय पर सिखाता है।

मैं रेडियो पर शनिवार के अपने मनपसंद कार्यक्रम को सुन रहा था जिसमें श्रोता फोन करके अपनी समस्याएं एवं अन्य बातें साझा करते हैं। और सूत्रधार के अतिरिक्त अन्य श्रोता भी उस विषय पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकते हैं। टॉम नामक एक व्यक्ति ने फोन किया और बताया कि वह जिस प्रकार का काम करता था उस के कारण अपने परिवार से कैसे उसे दूर रहना पड़ा। किंतु नौकरी उसे वास्तव में अच्छा भुगतान देती है और उसे कार्य अच्छा भी लगता है। वह ३२ वर्ष का था और उसका प्रश्न था कि उसकी प्राथमिकता क्या होनी चाहिये- नौकरी या परिवार?

एक अन्य श्रोता ने फोन किया, वह अधिक आयु का लग रहा था और उसका स्वर मनमोहक था। उसका स्वर ऐसा था कि मानो वह स्वयं प्रसारण व्यवसाय में हो। उसने जो परामर्श दिया उसे मैं कभी नहीं भूलूँगा।

“ठीक है, टॉम” उसने कहा “यह निश्चित रूप से लगता है कि आप अपने कार्य में व्यस्त हैं। वे आपको प्रतिकूल वेतन भी प्रदान कर रहे हैं। किंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपको अपने घर-परिवार से अधिक समय तक दूर रहना पड़ रहा है। यह विश्वास करना कठिन है कि एक नव युवक को अपना भविष्य सुरक्षित करने हेतु सप्ताह में साठ से सत्तर घंटे कार्य करना पड़ रहा है।”

“मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ जिससे मेरे जीवन की प्राथमिकताओं के प्रति मेरा दृष्टिकोण स्पष्ट हुआ।” वह वृद्ध व्यक्ति बोला। “एक हज़ार कंचों का मेरा सिद्धांत। एक दिन मैंने बैठकर थोड़ा गणित किया। एक साधारण व्यक्ति लगभग ७५ वर्ष जीवित रहता है। मैं जानता हूँ कि कुछ व्यक्ति अधिक वर्ष जीते हैं और कुछ कम परंतु औसतन व्यक्ति ७५ वर्ष तक जीते हैं।”

“फिर मैंने ७५ को ५२ से गुणा किया और मुझे ३९०० की संख्या मिली। यह उतने शनिवार हैं जो कि एक औसत व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवनकाल में आते हैं। मुझे यह विवरण समझने में ५५ वर्ष लग गये और तब तक मैं २८०० शनिवार जी चुका था। मैं यह सोचने लगा कि यदि मैं ७५ वर्ष तक जी पाया तो मेरे पास जीवन का आनंद लेने के लिए मात्र ११०० शनिवार ही बचे हैं।”

“तब मैं एक खिलौने की दुकान पर गया और वहाँ से जितने भी कंचे मिले, सब ले आया।” वृद्ध व्यक्ति ने कहा। “मुझे १००० कंचे मिले। मैं उन्हें घर ले गया और अपने रेडियो के पास मैं ने उन्हें एक प्लास्टिक के पारदर्शी पात्र में रख दिए। तब से अब तक प्रत्येक शनिवार मैं उनमें से एक कंचा निकालता हूँ और फेंक देता हूँ। मैंने पाया कि कंचों को घटता हुआ देखकर मैंने जीवन मे उन वस्तुओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करना आरंभ किया जो वास्तव में महत्वपूर्ण हैं। अपनी प्राथमिकताओं के निर्धारण हेतु, धरती पर अपने समय को घटते देखने से श्रेष्ठतर कुछ नहीं।”

“अब इससे पूर्व कि मैं फोन रखूँ और अपनी प्रिय पत्नी को नाश्ते पर बाहर लेकर जाऊँ मैं आपको एक बात और बताना चाहता हूँ। आज सुबह मैंने पात्र से अंतिम कंचा निकाला है। मैं समझता हूँ कि यदि मैं अगले शनिवार तक जीवित रहा तब मुझे अतिरिक्त समय दिया गया है। थोड़ा और समय तो सभी को चाहिये होता है। मेरी आशा है कि आप जिनसे प्रेम करते हैं उनके साथ और भी अधिक समय व्यतीत करें। आपकी प्रातः मंगलमय हो।”

जब उस व्यक्ति ने अपनी बात समाप्त की तब ऐसा सन्नाटा छा गया कि आप सुई गिरने की आवाज़ भी सुन लेते। यहाँ तक कि कार्यक्रम के संचालक को भी कुछ क्षणों के लिए कुछ कहने को न सूझा। मैंने उस सुबह कोई अन्य कार्य करने का सोचा था और तत्पश्चात मैं व्यायामशाला जाने वाला था। इसके बजाय मैं सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया और अपनी पत्नी को एक चुम्बन के साथ उठाया “चलो प्रिये, मैं तुम्हें और बच्चों को नाश्ते पर बाहर ले चलता हूँ।”

“ऐसा क्या है आज?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।
“ओह, कुछ विशेष नहीं, हमें बच्चों के साथ शनिवार व्यतीत करे बहुत समय हो गया है, बस इसी लिए।”
मेरी पत्नी पूरे जोश में बिस्तर से उठ गई।
मैंने उससे कहा, “और, मुझे कुछ कंचे भी खरीदने हैं।”

अधिकतर हम सभी महत्त्वाकांक्षाअों, कार्यों व लक्ष्यों द्वारा उत्तेजित होते हैं। हमें लगता है कि यदि हम सभी कार्यों व परिस्थितियों को वश में न कर लें तब हमारा महत्व फीका पड़ जाएगा। अन्य व्यक्तियों को जो वस्तुएं प्राप्त हो रहीं हैं कहीं हम उनसे वंचित न हो जाएं यह भय हमें अत्यधिक कार्य करने पर विवश कर देता है। ऐसा हम अपनी आध्यात्मिक एवं शारीरिक सेहत का मूल्य चुकाकर करते हैं और उन वस्तुओं का मूल्य चुकाकर जिनका हमारे लिए वास्तव में महत्व है। मैं इस बात को अस्वीकार नहीं कर रहा कि यह संसार अति प्रतिस्पर्धात्मक है परंतु यदि आप अपनी चारों ओर उन लोगों को देखें जो अधिक संतुलित जीवन जी रहे हैं तो आप यह पाएंगे कि वे भी उन्नति कर रहे हैं और संतुष्ट हैं।

अमरीका के एक धर्मशाला में मृत्युकालिक रोगियों का सर्वेक्षण किया गया और उनसे जीवन के सर्वोत्तम पछतावों के विषय में प्रश्न किया गया। एक भी रोगी ने यह नहीं कहा कि उसे अधिक काम न कर पाने का पछतावा है या उनकी इच्छा थी कि वे वह शोध पूरा कर पाते या किसी विशेष उत्पाद का सर्जन कर पाते। प्रत्येक व्यक्ति ने लिखा कि उनकी यही इच्छा थी कि वे समय में वापस जा पाते और अपने परिवार के साथ अधिक समय व्यतीत कर पाते।

बारम्बार धर्मग्रंथ हमें स्मरण दिलाते हैं कि सभी कुछ नश्वर है तथा इनमें से कुछ भी स्थायी नहीं। अभी हमारे पास जो है, वह है हमारा जीवन। एक दिन वह भी नहीं रहेगा। एक शनिवार निश्चित रूप से हमारा अंतिम शनिवार होने वाला है। एक सुबह ऐसी होगी जब हम नहीं उठेंगे। एक क्षण, जिसके पश्चात हम पुनः श्वास नहीं लेंगे। इससे कोई भी बच नहीं सकता। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि यही अटूट सत्य है, इस बोध के साथ कि सभी कुछ नश्वर है, क्या अपने जीवन को पूर्णता के साथ जीने के किसी अन्य प्रयोजन की आवश्यकता नहीं? निश्चित ही सर्वदा कार्य करते रहने का अर्थ यह नहीं कि आप एक संतुष्ट जीवन जी रहे हैं। व्यस्त अवश्य हैं, किंतु संतुष्ट नहीं। विचलित होकर अपनी प्राथमिकताओं से ध्यान हट जाना बहुत सरल है। यहाँ तक कि केन्डी क्रश सागा जैसे वीडियो गेम का साधारण सा लगाव भी आपके जीवन के कितने घंटों को उस ओर खींच ले जाता है जिसका जीवन की वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं। वे सभी घंटे जो आपको व्यायामशाला में, बागीचे में, अपने घरवालों के साथ या मात्र आराम करते हुए व्यतीत करने चाहिए थे, सभी एक व्यर्थ के लक्ष्य में खर्च हो गये। कारण? सावधानी में चूक।

मैं सोचता हूँ कि यह अत्युत्तम विचार है कि आपके ७५ (या ७७) वर्ष के होने से पूर्व आपके पास कितने शनिवार शेष हैं उन्हें गिना जाए और फिर उतने ही कंचे एक पारदर्शी जार में रखें। प्रत्येक शनिवार एक कंचा निकाल दें। जैसा कि उस बुद्धिमान व्यक्ति ने रेडियो पर कहा था, “अपनी प्राथमिकताओं के निर्धारण हेतु, धरती पर अपने समय को घटते देखने से श्रेष्ठतर कुछ नहीं”। यह आपके “जीवन का जार” या “सावधानी का जार” हो सकता है। कुछ छूट जाने के भय को छूट जाने के आनंद में परिवर्तित करें। संसार में जो कुछ भी चल रहा है हमें वह सब जानने की आवश्यकता नहीं। हमें सारा साहित्य पढ़ने की आवश्यकता नहीं या हर स्थान पर ऊँचाई प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं। चिंता न करें और बिना भय के जिएं।

मुल्ला नसरूद्दीन का मित्र उसके घर आया। मुल्ला की पत्नी ने अपने मेहमान को गरम रोटियाँ एवं सब्जी खिलाने का निश्चय किया।
मुल्ला एक के बाद एक गरमागरम चपाती लाता गया जब तक कि उसके मित्र ने यह नहीं कहा कि उसका पेट भर चुका है।
“एक और लो” मुल्ला ने आग्रहर्पूवक कहा।
“नहीं मुल्ला” उसने उत्तर दिया “मैं पहले से ही पाँच खा चुका हूँ।”
“ऐसा नहीं कि मैं बहुधा गिनता हूँ परंतु तुम सात रोटियाँ खा चुके हो।”

चाहे कोई गिन रहा हो या नहीं एक लेखा रखा जा रहा है। नहीं मैं यह नहीं कह रहा कि ऊपर कोई एक रजिस्टर लेकर बैठा हुआ है। मात्र इतना ही है कि हममें से प्रत्येक उस अंतिम क्षण की ओर धीरे धीरे बढ़ रहा है। अपने समय को क्षुद्र भावनाओं, रोष, सांसारिक लक्ष्यों पर व्यर्थ करने का कोई अर्थ नहीं है। हो सकता है कि आप सारा जीवन अधिक काम करें ताकि सेवानिवृत्ति के पश्चात आप कुछ वर्ष समुद्र के किनारे जा कर रह सकें। अंततः आप एक शहर में अपने बच्चों के साथ एक कमरे में होंगे या फिर किसी वृद्धाश्रम में, जहाँ अधिक से अधिक एक बगीचे का दृश्य देखने को मिले। बेहतर भविष्य की आशा में अपने वर्तमान को नष्ट कर देना बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं है। बीते कल का भविष्य आपका आज हैं। भविष्य कोई बहुत दूर का समय नहीं या कोई अंतिम पड़ाव भी नहीं। यह यहीं है, अगला कदम है।

हम प्रायः भूल जाते हैं कि हमें अपना समय कहाँ व्यतीत करना चाहिए। हम उन्हें प्रभावित व प्रसन्न करना चाहते हैं जो अर्थहीन हैं, उन वस्तुओं का सहारा लेकर जो हमारी हैं भी नहीं। हम उन वस्तुओं के लिए कार्य करते रहते हैं जो हम चाहते भी नहीं ताकि हम धन अर्जित कर सकें उन वस्तुओं पर खर्च करने के लिए जिनकी हमें आवश्यकता नहीं। क्या बचपन में आपने इस प्रकार का जीवन जीने के सपना देखा था? संभवतः नहीं। किंतु ऐसा होना आवश्यक नहीं। वस्तुओं के बृहद परिप्रेक्ष्य में हम उन वस्तुओं की चिंता करते हैं जो पूर्णतया अर्थहीन है। …जबकि हमें नहीं पता कि कल क्या होगा या हमारा जीवन है क्या? यह उस भाप के समान है जो थोड़ी देर के लिए प्रकट होती है और फिर लुप्त हो जाती है ( जेम्स ४:१४ )।

अपनी तीव्र गति कम करें, ठहरें, रुकें। क्या आप वास्तव में यही करना चाहते हैं? आप किस पथ पर चलना चाहते हैं यह आपका परमाधिकार है। केवल सावधान रहें।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - A Thousand Marbles