चीन के एक विशेष शाओलिन देवगृह में एक अनूठा कक्ष है। उसकी दीवारों व छतों में एक हज़ार दर्पण जड़े हुए हैं। बहुत से भिक्षुक यहाँ प्रशिक्षण लेते हैं और स्वयं को हज़ारों कोनों से दर्पण में निहारकर अपनी गति-विधि में असाधारण परिशुद्धता प्राप्त करते हैं।

एक समय चोरी छिपे वहाँ एक कुत्ता आ गया। स्वयं को एक हज़ार कुत्तों से घिरा देखकर वह असुरक्षित, आतंकित हो गया। उसने अपने दांत दिखाए, गुर्राया और दूसरे कुत्तों को भगाने के लिये भौंका। निस्संदेह एक हज़ार कुत्ते उस पर गुर्राए और भौंके। विरोध से पीछे न हटकर उसने भीषण आक्रमण किया। एक हज़ार कुत्तों ने वापस उस पर आक्रमण किया। इस प्रक्रिया में कुछ काँच टूटकर उसे जा लगे। दूसरे कुत्तों से लड़ते-लड़ते वह कुछ ही देर में ऊर्जाहीन व लहूलुहान होकर मर गया।

कुछ देर पश्चात जब भिक्षु आए तो मृत श्वान और टूटे-बिखरे काँच देखकर वे स्तंभित रह गये। उन्होंने सभाकक्ष की सफाई और मरम्मत की। कुछ दिन बीते और एक छोटा कुत्ता, एक पिल्ला किसी प्रकार कक्ष में आ गया। उसने अपने सामने ठीक उसके जैसे एक हज़ार छोटे कुत्तों को देखा। प्रसन्नता में उसने अपनी पूँछ हिलाई। एक हज़ार कुत्तों ने अपनी पूँछ हिलाई। अपने एक हज़ार मित्रों को देख उस पिल्ले ने कलाबाज़ी मारी और एक हज़ार प्यारे पिल्लों ने ठीक वैसा ही किया।

वह एक कदम उनकी ओर बढ़ता तो वे दो कदम उसकी ओर बढ़ते। छोटे पिल्ले ने अपनी कोमल प्रेमपूर्ण आंखों से उन्हें देखा और उनमें से प्रत्येक ने उतने ही प्रेम से उसे देखा।

हमारा संसार उस हज़ार दर्पणों वाले कक्ष से अधिक भिन्न नहीं। आप गुर्राइये और हज़ारों आप पर गुर्रायेंगे। आप मुस्कुराइये और हज़ारों आप पर मुस्कुरायेंगे। जानते हैं क्यों? क्योंकि प्रतिदान करना आरंभ करने से अधिक आसान होता है।

मुझे फिर से कहने दें – प्रतिदान करना आरंभ करने से अधिक आसान होता है।

नयी दोस्ती शुरू करना, कुछ नया कदम लेने के लिये साहस चाहिये। कुछ व्यक्ति जीवन से इतना ऊब चुके हैं या इतना टूट चुके हैं कि अपने संबंधों को सुधारने, उसे पुनरुज्जीवित करने, पुनर्स्थापित करने का उनमें साहस (एवं इच्छा) नहीं। वे महसूस करते हैं कि अब वे तंग आ चुके हैं। परंतु “अब मैं और परवाह नहीं करता” की भावना के पीछे अस्वीकृत किये जाने या पुनः क्षति पहुँचने की भावना होती है। फलस्वरूप लोग टूटते संबंधो या टूटती दोस्ती में कईं वर्ष व्यतीत कर देते हैं, कभी-कभी अपनी अंतिम सांस तक।

वे, जो कि वास्तव में शक्तिशाली हैं, क्षमा मांगने या करने से भयभीत नहीं होते। सत्य कहूँ तो क्षमा करना उतना दुष्कर नहीं जितना कि क्षमा मांगना। जिस प्रकार एक बहुप्रतीक्षित वर्षा की झड़ी एक शुष्क धरती की प्यास बुझाती है एवं असंख्य बीजों को अंकुरित होने में मदद करती है, उसी प्रकार क्षमा वह हल्की फुहार है जो संबंधों का नवीनीकरण करती है। क्षमा की अनुपस्थिति में प्रेम की कोई भी अनुभूति वास्तव में न तो अंकुरित हो सकती है और न ही खिल सकती है।

हममें से प्रत्येक अपने हज़ारों दर्पणों के कक्ष में अकेला खड़ा है और यह हम पर है कि हम मुस्कुराना चाहते हैं या तेवर दिखाना चाहते हैं। किसी भी प्रकार से हमें १००० प्रतिशत वापस मिलेगा। हमारा कक्ष हमारा संसार है। यह हमारा स्वयं का प्रतिबिम्ब है।

नववर्ष में कोई संकल्प लेने के अतिरिक्त क्यों न हम नववर्ष का आरंभ क्षमा मांगने एवं क्षमा करने से करें। हो सकता है कि किसी ने आपके साथ कुछ अनुचित किया हो एवं क्षमा याचना भी की हो, किंतु उस समय आपको इतना कष्ट था कि आप क्षमा नहीं कर सके। क्यों न उन्हें एक चिट्ठी लिख दें, उन्हें यह बताते हुए कि आपने उन्हें क्षमा कर दिया है। इस सुझाव को अस्वीकार करने से पूर्व एक बार पुनः विचार करें। और क्षमा मांगने के विषय में क्या विचार है? आपने अपने जीवन में कभी न कभी किसी के साथ कुछ न कुछ अनुचित किया होगा। क्यों न एक हार्दिक क्षमा याचना लिखें (प्रत्येक शब्द को पूर्ण निष्ठा से लिखते हुए) और किसी प्रत्युत्तर की आशा के बिना उसे प्रेषित करें। और यदि वे प्रत्युत्तर न दें तो ठीक है। क्योंकि क्षमा मांगने का अर्थ है कि आपने अपने कर्मों का उत्तरदायित्व स्वयं ले लिया है। अपनी भूल स्वीकार कर स्वयं को मुक्त कर दिया है, दूसरे की प्रतिक्रिया से पूर्णतः स्वतंत्र।

सत्यता में क्षमा तो वही कर सकता है जिसे हमने कष्ट दिया है। कोई भी पीडित व्यक्ति की जगह नहीं ले सकता। आपने जो दुःख किसी को दिया है, उसके लिये आपको एक यहूदी आचार्य, पादरी, संत या पैगंबर क्षमा नहीं कर सकता। यदि पीडित व्यक्ति अब आपके जीवन में नहीं है या उनसे संपर्क संभव नहीं है तो ऐसी स्थिति में आप अपने अपराध की स्वीकारोक्ति कर सकते हैं। या इससे भी बेहतर है कि अपने हृदय से उसे क्षमा करें जिसने आपको हानि पहुँचाई।

यदि आप क्षमा नहीं पा सकते, तो क्षमा करें।

अपने मित्रों एवं परिवार को साथ लेकर मुल्ला नसरुद्दीन एक स्थानीय मेले में गया। अन्य झूलों को छोड़ मुल्ला एक हिंडोले पर जा बैठा और बारम्बार उस पर झूलता ही रहा। जब भी वह झूला रुकता, मुल्ला चक्कर से आक्रांत होकर उससे उतरता, थोड़ा पानी पीता और फिर चढ़ जाता। यह सब पूरे एक घंटे तक चलता रहा।
“वाह मुल्ला! मुझे नहीं पता था कि तुम्हे यह हिंडोला इतना पसंद है।” उसके मित्र ने कहा।
“पसंद? मुझे इससे घृणा है” मुल्ला ने उत्तर दिया “मुझे अस्वस्थ लग रहा है और मैं किसी भी समय उलटी कर सकता हूँ।”
“फिर तुम इसकी सवारी क्यों कर रहे हो” मित्र ने पूछा।
“इस हिंडोले के मालिक ने मुझसे ५० रूपये उधार लिये हैं, और उसे वसूल करने की एकमात्र विधि यही है।”

जब भी हम कोई हिसाब चुकता करना चाहते है तो अधिकतर समय हम स्वयं को ही दण्ड दे रहे होते हैं जैसा कि मुल्ला ने हिंडोले पर बैठ कर किया। यदि दूसरा व्यक्ति अपना अपराध स्वीकार नहीं करना चाहता तो उसे यह बोध कराने के लिये अधिक कुछ नहीं किया जा सकता। समय बीतते ही हो सकता है वह समझे या फिर न समझे। फिर भी, हमारा हर प्रयास यही होना चाहिये कि हम उनके स्तर तक नीचे न गिरें। यद्यपि आपने उन्हें यह बताया ना हो (उचित व्यवहार क्या है यह दिखाने के लिए अथवा किसी अन्य कारणवश) फिर भी अपने हृदय में उन्हें क्षमा करने का प्रयास करें।

जब आप दूसरों को क्षमा करते हैं तो प्रकृति आपको आपके दुष्कर्मों के लिये क्षमा करती है। विशेषकर उन कर्मों के लिये जहाँ एक व्यक्ति द्वारा क्षमादान संभव नहीं है। एक हल्के हृदय से आप अर्थपूर्ण संबंधों का निर्माण करते हैं।

आपका जीवन उतना ही सुंदर है जितनी आपके संबंधों की गहराई है, आपका स्वयं के साथ एवं दूसरों के साथ संबंध।

यहाँ तक कि जब हम दूसरों पर क्रोधित होते हैं तो पहले हम स्वयं पर क्रोधित होते हैं। यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं तो स्वयं को दर्पण में देखें। जब हम किसी को प्रेम करते हैं तो हम सहज रूप में स्वयं से प्रेम करते हैं। यह क्षमा सहित सभी भावनाओं के लिये सत्य है।

मृदुल मुस्कान धारण करें तथा हृदय में स्नेह धरें ताकि जब आप एक हज़ार दर्पर्णों के कक्ष में प्रवेश करें तो स्वयं को अपनी ही शोभा से चकित कर दें।

शांति।
स्वामी