मुझसे अक्सर यह पूछा जाता है कि क्या हो यदि आप किसी के प्रति करुणाशील हैं किन्तु वे उसको महत्व न देते हों? यदि वे आपकी उदारता को आपकी निर्बलता के रूप में देखें तो क्या ऐसी स्थिति में भी हमें करुणा ही दिखानी चाहिए? ये सब प्रश्न कारणवश उचित हैं, किन्तु, करुणा ऐसी ही तो नहीं होती – कारणवश। करुणा वस्तुतः तर्करहित, अकारण उपजी भावना है। यह वास्तव में किसी भी तर्क पर आश्रित नहीं। चूंकि तर्क-वितर्क का स्थान मन है, जबकि भावना तो हृदय से उठती है। व्यवहारिक रूप में करुणा किसी तथ्य का सहारा ले सकती है किन्तु एक भावना के रूप में, एक भाव जो महसूस होता है, यह न तो किसी कारण पर आधारित होती है, न ही उससे सक्रिय होती है। व्यवहार भ्रमित हो सकता है, किन्तु भावनाएँ कृत्रिम नहीं हो सकतीं, चूंकि वे आपके अन्तःकरण में रहती हैं। वे तो जो हैं सो हैं।

यह सब कहने के उपरांत, यदि आप करुणायुक्त व्यवहार रखते हैं (भले ही आप दूसरे व्यक्ति के प्रति वैसा महसूस न भी करें), तो वह भी उतनी ही सुंदर बात ही चूंकि हम में से अधिकांश का अपनी भावनाओं पर बहुत कम अथवा बिलकुल भी नियंत्रण नहीं होता, किन्तु हम कम से कम अपने कृत्यों को तो नियंत्रित अवश्य कर सकते हैं। व्यवहार भावनाओं को ईंधन देता है। आप एक विशेष ढंग से व्यवहार कीजिये और अतिशीघ्र आप उसी प्रकार महसूस भी करने लगेंगे। तथापि, यह प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि ऐसा कौन है जो आपकी करुणा का अधिकारी हो सकता है? यदि दूसरा व्यक्ति उसकी परवाह ही नहीं करता, तो क्या तब भी आपको करुणा बरसाते रहना चाहिए? कृपया मुझे एक सरल किन्तु सुंदर कथा साझा करने की अनुमति दें।

एक अप्रतिष्ठित व्यक्ति जिसका नाम समाज में अनादर से लिया जाता था, वह जीसस के पास आ उन्हें अपने निवास पर भोजन का निमंत्रण देता है। सभी जानते थे कि क्राइस्ट कभी भी उनका निमंत्रण स्वीकार नहीं करेंगे, चूंकि यह किसी से भी छुपा नहीं था कि वह व्यक्ति एक पापी है। अथवा तो, यह उनकी सोच थी। अपनी अचल शांत स्थिति बनाए हुए, क्राइस्ट ने वह निमंत्रण स्वीकार कर लिया; जबकि उनके अनुयायी अविश्वास और सदमे से अचंभित लग रहे थे। उनके परम पिता इस कुकर्मी के घर जाने के लिए कैसे स्वीकृति दे सकते हैं? उन्होंने सोचा।

यह समाचार जंगल की आग की भांति फैल गया, और कुछ आपसी परामर्श के उपरांत गाँव के वरिष्ठ व्यक्तियों ने संतश्री के सम्मुख यह बात रखने का निर्णय लिया।

“प्रभु”, उन्होंने कहा, “ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि आप इस व्यक्ति के यहाँ जाएँ। वह हर किसी के द्वारा त्याज्य है; उसने असंख्य पाप किए हैं। यह आपके जैसे व्यक्तित्व को शोभा नहीं देता कि आप और वह एक साथ दिखाई भी दें।”
“मुझे एक बात बताओ”, क्राइस्ट ने कहा, “एक चिकित्सक किसके यहाँ जाता है? एक रोगी व्यक्ति के अथवा स्वस्थ के? चिकित्सक को रोगी का उपचार करना ही चाहिए। मैं यहाँ प्रभु का प्रेम बांटने के लिए उपस्थित हूँ व ऐसे एक भी व्यक्ति को नहीं जानता जो प्रभु-प्रेम का अधिकारी न हो।”

जब भी कोई आपके सम्मुख किसी कारणवश आता है तो उनकी प्रार्थना अस्वीकार करने से पूर्व बस एक क्षण को रुकें। संभवतः आप उनकी भूलों से बड़े हों, शायद आप क्षमा कर सकते हों, करुणा पूर्वक व्यवहार कर सकते हों। संभवतः। यह एक विकल्प है और अपनी रुचिनुसार आप कुछ और चयन भी कर सकते हैं। किन्तु जब बात करुणा की हो तो हर प्राणी इसका पूर्ण अधिकारी होता है, चूंकि करुणा का कोई आधार नहीं होता, यह अकारण होती है। किन्तु, करुणा सदा ही बिना शर्त नहीं होती। कम से कम, हर औसत प्राणी के लिए तो नहीं। और, यह मुझे एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ले जाता है – अपनी करुणा उसी पर प्रकट करें जिसे इसकी इच्छा हो।

कृपया इसे गहराई से आत्मसात कर लें कि अपनी करुणा उसी पर दर्शाएँ जिसे इसकी इच्छा हो। हमें दूसरे व्यक्ति का आंकलन नहीं करना है, हमें परस्पर भेद नहीं पैदा करना, हमें यह मान कर चलना है कि हर प्राणी हमारी करुणा का अधिकारी है, तथापि इसका यह तात्पर्य नहीं कि आपको उस व्यक्ति के प्रति भी करुणा दर्शानी होगी जो इसकी उपेक्षा करे; जो इसका मूल्य नहीं समझे। ऐसी करुणा बहुधा दोनों के लिए ही पीड़ा का कारण बन जाती है चूंकि ऐसे में देने वाला कुछ छोटा व हतोत्साहित महसूस करता है और लेने वाला इसे आपकी निर्बलता के रूप में देखता है।

हमारी उपरोक्त कथा में भी क्राइस्ट उस व्यक्ति के निवास पर अनामंत्रित नहीं पहुंचे। किन्तु एक बार जब बुलाने वाले ने उनकी प्रस्तुति की प्रार्थना की तो क्राइस्ट ने उसके गुण-दोष के आधार पर उसका आंकलन नहीं किया। एक सच्चे संत की भांति उन्होंने स्वीकृति दे दी। चूंकि करुणापूर्ण व्यवहार गुणों पर आधारित नहीं होता, वह दूसरे की आवश्यकता पर भी उतना निर्भर नहीं होता जितना उनकी तैयारी/इच्छा पर होता है। जब वे आपके सम्मुख आते हैं तो ऐसे में उनके इच्छुक होने की संभावना अधिक है अपितु जब आप बिना कहे वह प्रदान कर रहे हों। करुणा की भावना उसी स्थिति में फलती फूलती है, लाभकारी होती है व बनी रहती है जब उसे पाने वाला इच्छुक हो और इच्छुक होना व अधिकारी होना एक समान नहीं होते।

किसी ऐसे रोगी की कल्पना करें जिसे यह विश्वास हो कि वह रोगी है ही नहीं। आप ऐसे रोगी का वस्तुतः उपचार कर ही नहीं सकते क्योंकि वह दवा नहीं खाएगा। जिस क्षण वह स्वीकार लेता है कि वह बीमार है व उसे चिकित्सीय परामर्श व देखरेख की आवश्यकता है, तब वह उपचार हेतु सज्ज है। इसी प्रकार, यदि दूसरा व्यक्ति आपकी करुणा का इच्छुक ही नहीं तो आप जो चाहें वह कर लें उससे कोई लाभ नहीं पहुंचेगा चूंकि वह इसके लिए तैयार ही नहीं। भले आप किसी भी प्रकार के व्यक्ति हों, आपके पास देने के लिए बहुत कुछ है। आपका स्नेह, आपका समय, उदारता, ज्ञान-बुद्धि – यह सब उसे प्रदान करें जिसे इसकी अपेक्षा हो। लगभग ३ वर्ष पूर्व मैंने एक लघु वीडियो (अंग्रेजी में) तैयार किया था जिसका नाम है – देने के १० स्वर्णिम नियम। आप इसे यहाँ क्लिक कर के देख सकते हैं।

कृपया मुझे मेरा मत दोहराने दें – ऐसा कुछ भी जो अपेक्षित नहीं – भले ही वह आपकी राय हो, प्रेम हो, सहायता अथवा अन्य कुछ हो – उसका मूल्य कम ही पहचाना जाता है। करुणाशील बनें, किन्तु प्राथमिकता उन्हें दें जो इसके लिए तैयार हों, जिन लोगों ने कम से कम उसके लिए बोला तो हो। इस रीति से आप किसी का भी उसकी योग्यता के आधार पर आंकलन नहीं करते, तथापि, साथ-साथ आप करुणाशील होते हैं।

जब आप वास्तव में करुणायुक्त होते हैं तो प्रतिदान में आप कोई भी अपेक्षा नहीं रखते। धन्यवाद का एक शब्द भी नहीं। अपने दैनिक जीवन में करुणा का अभ्यास करते रहें और इसके फलस्वरूप वह आपका समांतर स्वभाव बन जाएगी, वह एक भावना का रूप ले लेगी। आप अपनी रग-रग में उसका संचार, उसका आभास महसूस करने लगेंगे। उस स्थिति में आप इस लेख में समाहित संदेश से बहुत आगे निकल चुके होंगे। और तब आप जानेंगे कि जब मैं यह कहता हूँ कि करुणा अकारण होती है, अतर्कसंगत होती है – तो इससे मेरा क्या अभिप्राय है। ऐसे ही यह सदा धारणाओं से भी परे होती है। हाँ, यह तो दिव्य होती है। और दिव्यता का स्वरूप दूसरे व्यक्ति के कृत्यों एवं प्रयोजन, दोनों को पीछे छोड़ते हुए, अति विस्तृत होता है। यह स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। इस पर चर्चा कभी और।

प्रेम की भांति करुणा भी निराधार है, अतर्कपूर्ण है, किन्तु यह प्रेम की तरह अंधी नहीं होती। तदपि, दोनों ही आत्म-संतुष्टि के भाव से भरपूर करने वाले हैं, वे स्वयं को समझने में आपके परम सहायक हैं, व दूसरों को समझने में भी। इस पर कुछ क्षण विचार करें, दोनों एक दूसरे के प्रतिरूप जैसे हैं। एक का अभ्यास करें तो दूसरा स्वयं ही प्रकट हो जाता है।

शांति।
स्वामी