एक प्रसिद्ध जेन सन्यासी बीते वर्ष के विदाई हेतु आयोजित भोज में गए इसका आयोजन एक श्रेष्ठ धनी व्यक्ति ने किया था। यहाँ पर आने वाला शहर का प्रत्येक व्यक्ति जो एक दूसरे से मिल रहा था समारोह को एक अद्भुत रंग प्रदान कर रहा था, जो एक सामान्य अवलोकन करने वाले को आश्चर्य चकित कर देता था। शानदार जापानी नर्तकियाँ, महँगी शराब, सुगंध के झोंके सारे हाल को आपूरित कर रहे थे। और स्वादिष्ट भोजन की सुगंध इंद्रियों को मदमस्त कर रही थी।

एक उच्च कुलीन व्यक्ति जेन सन्यासी के पास जाकर बोला कि “ मैं आपका अपमान नहीं करना चाहता, पर क्या मैं आपसे एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?”
जेन सन्यासी ने अपना हाथ उठाकर स्वीकारोक्ति दी।

उसने फुसफुसाते हुए कहा “ वे कहते हैं कि आपको ज्ञान प्राप्त हो गया है, और आपके चारों ओर शांति प्रदान करने वाला आभामंडल और तेज़ है। लेकिन मैं यही बात उस नर्तकी के बारे में भी कह सकता हूँ। वह मेरे भीतर कामना जगाती है और अपने स्वरूप मात्र से मेरे अहंकार को विलीन कर देती है।” उस उच्च कुलीन व्यक्ति ने एक सुंदर स्त्री की ओर संकेत करते हुए कहा।जो कि फूलों की डिज़ाइन बने हुए रेशमी वस्त्र पहने थी। जिसका हर एक पहलू उसके केश विन्यास से लेकर पैरों के रंगे हुए नाखूनों तक ऐसा लग रहा था कि कलाकृति हो। वास्तव में वह देखने में अति आनंद प्रदान करने वाली थी।

फिर आपके और उसके बीच क्या अंतर है?”
सन्यासी ने उत्तर दिया आप सही कह रहे हैं।मैं सही समय पर आपके प्रश्न का उत्तर दूँगा।

कुछ चाय के प्यालों के पश्चात वही नर्तकी जेन गुरु के पास आयी और उनको प्रणाम किया।”

उन्होंने उसे कहा “ मैं तुमको एक उपहार देना चाहता था।
नर्तकी ने कहा आपसे प्राप्त कोई भी चीज़ मेरे लिए एक आशीर्वाद होगी ।

गुरु ने अपनी चॉप स्टिक से अलाव के भीतर से एक अंगारा उठाया और नर्तकी की ओर बढ़ाया।
एक क्षण के हिचकिचाहट के पश्चात, नर्तकी ने तत्काल अपनी लम्बी पोशाक की बाहें अपने हाथों पर लपेटीं , गुरु से गरम कोयला लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाये ।

उसके बाद वह रसोई घर की ओर भागी और इसे एक जल से भरे बर्तन में डाल दिया। इस सब में उसके हाथ तो सुरक्षित रहे लेकिन उसकी पोशाक अवश्य ख़राब हो गयी । वह प्रसाधन कक्ष में गयी , नवीन वस्त्र पहने, अपना साज श्रिंगार ठीक किया और वापस उस कक्ष में आयी जहाँ आयोजन चल रहा था ।

आने के बाद उसने गुरु से कहा “आपको बहुत बहुत धन्यवाद, मेरे पास भी आपके लिए वापस देने के लिए एक उपहार है।”
गुरु ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। नर्तकी अलाव की ओर मुड़ी और उसने चिमटे से एक अंगारा पकड़ा और गुरु की ओर बढ़ाया।
“अरे मैं इसी चीज़ के बारे में सोच रहा था, और उन्होने फूँक देते हुए उस कोयले से सिगार को सुलगा लिया।
उसने ज़ोर से कहा बोनेंकाई उस वर्ष को ही मत भूलो, भुतकाल को भूलो, अब पुराना सब भूल जाएँ ।
यह सब देख रहे उस रईस व्यक्ति ने कहा गुरु मुझे मेरा उत्तर मिल गया।

कभी कभी जीवन आपको उस समय जलता हुआ कोयला देता है जब आप इसके लिए तैयार नहीं थे।बुरा है जब आप इसके पात्र भी नहीं हैं।उस अनचाहे उपहार से स्वयं को न जलाएँ। इसके स्थान पर अपनी स्थिति को दृढ़ बनाने , आगे बढ़ने के लिए इस उपहार का प्रयोग करें । ऐसा करना न तो बग़ीचे में भ्रमण करने जैसा है , और न ही यह स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर होता है। किंतु यह सीखा जा सकता है और इसमें निपुणता प्राप्त की जा सकती है।मैं कहता हूँ कि यह अत्यंत कठिन है क्योंकि संसार में सारा ज्ञान भुलाने के लिए सजगता में क्षणिक सी चूक पर्याप्त होती है और हम उस अंगारे को लपकने के द्वारा स्वयं को और अन्य प्रत्येक जिस पर हम इसे फेंकते हैं उसे आहत करते हैं।

आइए हम इसका सामना करें । हमेशा सजग रहना या अपनी शांति बनाए रखना आसान नहीं होता। वास्तव में इस अस्त व्यस्त संसार में, वह संसार जहाँ हर परिवर्तित हो रही परिस्थिति में हमारे ऊपर एक नया आश्चर्य ऐसे उत्पन्न होता रहता है जैसे कि एक प्रवीण जादूगर हवा में चीज़ें प्रगट करता रहता है, एक उत्कृष्ट अवस्था बनाए रखना लगभग असम्भव ही है। और यही वह चीज़ है कि आप देखते हैं कि आपको यह ज्ञात हो जाता है कि जो भी आपकी व्याकुलता का कारण है वह अस्थायी है, यह हमेशा नहीं रहने वाला। इसलिए इसे सरलता से लें, एक गहरी साँस लें,यह संसार का अंत नहीं है।

जिस प्रकार हमारी आवश्यकताएँ आवर्ती हैं, उसी तरह हमारे जीवन में अच्छा और बुरा समय है।यह बिलकुल भी सम्भव नहीं कि प्रत्येक दिन इस तरह बीते जैसा आप अपेक्षा रखते हैं, या कि हर समय आपको अच्छा समाचार आपके दरवाज़े को खटखटाएगा। कभी कभी स्थितियाँ अनचाही और न अच्छी लगने वाली होती हैं, लेकिन हम उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। हमें उनके साथ व्यवहार करना होता है।

जैसा वे कहते हैं कि किसी को वह मिल गया जिससे रेलें सही समय पर चल सकें । हाँ माना कि दुःख की परिस्थितियों में ख़ुश रह कर व्यवहार करना हमेशा सम्भव नहीं है, किंतु उनके साथ धैर्य से व्यवहार करना सम्भव है।

योगस्थ कुरु कर्माणी संगं त्यक्त्वा धनंजय,
सिद्धय सिद्धयो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ( भग्वदगीता २।४८)
कृष्ण ने अर्जुन से कहा “हे सर्व श्रेष्ठ धनुर्धर । समत्व का योग सफलता और असफलता दोनों का सामना करने के लिए तुम्हारे भीतर दृढ़ता बनाए रखने के लिए है, 
इसका अर्थ वैराग्य के साथ कार्य करना है।’

अक्सर मुझसे पूछा जाता है कि क्या हमें हमारे कार्यों के प्रति भावुक नहीं होना चाहिए? वास्तव में यह सही है। वैराग्य परित्याग का भाव नहीं बल्कि विषय परक निर्णय लेने की समझ है कि, मुझे अब और फिर स्वयं को मेरे लक्ष्य से दूर करना चाहिए जिसे कि मैं एक भिन्न और आदर्श सिद्धांत प्राप्त कर सकूँ। तब आप एक पूर्ण चित्र सिक्के के दाएँ बाएँ और खड़े तीनों पहलू देख सकेंगे

वैराग्य आलस्य या उपेक्षा करना नहीं है। यदि कुछ है तो यह तीक्षण सजगता और चेतना की उच्चतम अवस्था है। जब माता पिता किसी बच्चे या बच्ची को उसके स्वप्नों का अनुकरण से दूर जाने की अनुमति दे देते हैं तो अपने बच्चे के सर्वोत्तम रुचि को अपनी प्राथमिकताओं से आगे रखने के लिए उनको एक स्तर की अनासक्ति की आवश्यकता होती है । यह वैराग्य के बिना सम्भव नहीं है। और अच्छी बात यह है कि वैराग्य सीखा जा सकता है।आप इस संसार की अस्थायी प्रकृति पर और साथ ही साथ इस ब्रहमाँड की विस्तारता पर ध्यान करने के द्वारा इसे सजग अभ्यास में बदल सकते हैं । यह आपको चीज़ों को यथार्थ में रखने में सहायता करेगा।

एक स्त्री ने ध्यान। दिया कि उसका पति जिसका वज़न बहुत अधिक हो गया था बह बाथरूम में। लगे भार मापक यंत्र पर अपना वज़न लेते समय अपने पेट को भीतर की ओर दबा रहा है।
उसने ठिठोली करते। हुए कहा अरे इस से कोई फ़ायदा नहीं होने वाला।
उसने कहा बिलकुल। इससे फ़ायदा होगा , क्योंकि ऐसा करके ही मात्र मैं मापक द्वारा बतायी जा रही संख्या को देख पाउँगा।
जब आपको आवश्यकता हो स्वयं को भीतर खींचें दूसरे नहीं समझ सकेंगे।क्यों और जब तक आप इसे जान लेंगे यह ही मात्र महत्वपूर्ण है।

जैसा कि शेक्सपियर ने कहा था कि “ दुःख का प्रयोग बड़ा ही मधुर है , जो कि घृणित कुरूप और विद्वेष पूर्ण होने के बाद भी सिर पर बहुमूल्य आभूषण की भाँति धारण किया जाता है।” कष्ट के उपहार कुछ इस भाँति हैं कि वे हमें सिखाते हैं, उठाते हैं और सबसे ऊपर हमें उत्तरों और हलों के लिए हमारी चेतना की सर्वोच्च अवस्था के साथ संयुक्त करते हैं।कष्ट प्रद किंतु उपयोगी असहज किंतु अनिवार्य।

इस अनुकूलित संसार में मोह हमें अंधा बना देता है और परास्त कर देता है। वह हमारे लिए कुछ अच्छा नहीं करता । जिस दिन आप इस सत्य को स्वीकार करेंगे और हृदयंगम करेंगे आपका जीवन वही नहीं रहेगा।अंगारे को लें या फेंकें नहीं । इसे उपयोग में लें। बस सजग रहें । यह सहायता करेगा।

क्षणिकता और अस्थायित्व इस संसार के तरीक़े हैं। जब हम यहाँ हैं तो दयालु और गरिमामय बनें। यह बहुमूल्य है।

शांति,
स्वामी