जैसे जल से उसकी आद्रता व सूर्य से उसका ताप पृथक नहीं हो सकते, उसी प्रकार कामनाओं को मन से विमुख नहीं किया जा सकता, चूँकि कामनाएँ उन विचारों का ही प्रतिरूप होती हैं जिन विचारों का हम त्याग नहीं कर पाते। विचार तो विचार हैं। वे अच्छे या बुरे, महान या बेतुके, अथवा सही या ग़लत नहीं होते। यह वर्गीकरण आपने अपने पूर्वाग्रह के आधार पर किया है। तात्विक रूप से सभी विचार एक समान होते हैं – समरूप। महत्त्व इस बात का है कि आप एक विचार के साथ करते क्या हैं, न कि उस विचार के होने का। एक विचार उत्पन्न होने के पश्चात वह या तो इच्छा का रूप धारण कर लेता है अथवा भावना का, सकारात्मक या नकारात्मक। सभी क्रियाएँ विचारों से ही उपजती हैं। एक चिरकाल से ठहरा हुआ विचार आपके मन को अस्थिर, व शांत अंत:कारण को सरोवर में फैली तरंगों की भाँति आंदोलित कर देता है। एक शांत मन व पवित्र अंत:करण कामनाओं की पूर्ति अथवा उनके त्याग – दोनों में स्थिर रहता है – चूँकि यह सब मन के द्वारा जाना जाता है। तो, आपको इन्द्रिय्गत सुखों की कामना है या जगत में नाम कमाने की इच्छा; संतोषप्र्द प्रेम की इच्छा है या एक छोटे से लडडू की – इन सब में कोई अंतर नहीं।

हालाँकि कर्म-सिद्धांत को कम करके आँका नहीं जा सकता, तथापि आप, नि:संदेह, अपनी कामनाओं की ही उपज हैं। आपकी इच्छाएँ आपको कार्य करने की ओर अथवा एक विशेष राह पर चलने को तत्त्पर करती हैं। अपनी कामनाओं का स्वभाव समझने से पूर्व, आपको अपने मन का स्वभाव समझ लेना चाहिए।
जब एक इच्छा पूर्ण होती है, तो आपको कुछ समय के लिए प्रसन्नता व सुख की अनुभूति होती है। यह अनुभूति उतनी ही अल्पकालिक व भ्रामक होती है जितनी आपकी इच्छा। यदि इच्छाओं को सदा के लिए संतुष्ट कर पाना संभव होता तो आत्म-साक्षात्कार की चाह के कोई मायने न रहते। अपितु, जब एक कामना पूर्ण हो तो अनगिनत अन्य सामने आ जाती हैं। एक बार यदि आप कामनाओं के स्वरूप को जान जाएँ तो ये आपको व्यथित करना बंद कर देंगी। चूँकि यदि आपका अपने अंत:कारण की शांत स्थिति पर पूर्ण स्थापत्य बन चुका हो तो आपके विचार जैसे ही उत्पन्न होंगे, उसी क्षण वे लुप्त हो जाएँगे। हालाँकि कामनाओं को वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, तथापि आसानी से समझने के लिए, मैं इन्हें निम्नलिखित में वर्गीकृत कर रहा हूँ –

भौतिक इच्छाएँ

सभी प्रकार की इंद्रीयगत इच्छाएँ पूर्णत: भौतिक कामनाएँ हैं। इनकी पूर्ति में आप सुखबोध की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे सुखबोध की तृष्णा आपको अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने की दिशा में तत्पर करती है। परिणामस्वरूप, आपकी क्रियाएँ, भावनाएँ एवं बुद्धिमत्ता – सब मिलकर उस सुख की प्राप्ति के लिए कार्य करने लगते हैं। यह कामनाएँ आपमें बहुत सक्रिय अथवा सुप्तवस्था में, अथवा दोनो रूपों में हो सकती हैं। आप शरीर द्वारा जिस प्रकार का भी सुख अनुभव करते हैं वह सब मूलत: इंद्रीयगत है। अधिकांश मनुष्य अपना संपूर्ण जीवन इन्हीं को संतुष्ट करने में गँवा देते हैं। वे सब कुछ शरीर के माध्यम से ही अनुभव करते हैं; शरीर के लिए ही जीते हैं व इसी के लिए मर जाते हैं। वे सदा अपने शरीर के पूर्ण रूप से आज्ञाकारी सेवक बने रहते हैं। उनका संपूर्ण जीवन केवल शारीरिक देखभाल, भोजन, वस्त्र, भोग, आराम संबंधी आवश्यकताओं के आसपास ही घूमता रहता है। भौतिक कामनाओं का संबंध मौलिक रूप से शरीर के कुशल-क्षेम से है। तथापि, मानव शरीर ह्रास की ओर बढ़ता जाता है, और बहुत से लोग इसे बनाए रखने की दिशा में अनवरत परिश्र्म करते रहते हैं। यह सब व्यर्थ है।

भावनात्मक इच्छाएँ

इस श्रेणी में, प्रेम की इच्छा, प्रतिकार, अनुदारता, अपनी मान्यता बनाना, व आदान-प्रदान आदि आते हैं। ये सब मन की अज्ञानतावश् होते हैं, व आपके इस जन्म व पूर्व जन्मों के संकलित कर्मों पर आधारित अनुबंधित मन की उपज हैं। यह कामनाएँ आपको सुख की खोज में बाह्य जगत में धकेलती रहती हैं। आपको सुखभोग व आदान-प्रदान के लिए किसी व्यक्ति की आवश्यकता होती है। चूँकि अब आप अंत:सुख को बाह्य पदार्थों में खोज रहे हैं, तो आपकी यह खोज ऐसी है मानो आप संपूर्ण ब्रह्मांड को एक छोर से दूसरे छोर तक मापने निकल पड़े हों। आप अपने अंतिम श्वास तक इन कामनाओं के हाथ की कठपुतली बन नृत्य करते रहते हैं। भौतिक इच्छाएँ तो शरीर की वृद्धावस्था में कुछ क्षीण हो सकती हैं किंतु भावनात्मक इच्छाएँ सर्वदा सक्रिय रहती हैं व ऊधम मचाती रहती हैं। यह कामनाएँ तभी उपजती हैं जब आप अपना वास्तविक स्वरूप विस्मरित कर देते हैं और जब आप पराश्रित होते हैं। (इस पर अधिक जानकारी के लिए “मेरा सत्य” लेख पढ़ें )। “भावनात्मक आवश्यकताएँ” – यह शब्द स्वयं में मिथ्या है। भावनाएँ एक प्रतिबंधित मन की उपज होती हैं, और, वास्तव में देखा जाए तो मन की कोई आवश्यकताएँ होती ही नहीं। जहाँ एक ओर बूचरखाने का दृश्य आपमें नकारात्मक भाव उत्पन्न करे, वहीं उसके मालिक के लिए वह सकारात्मक हो सकता है, और वहाँ काम करने वाले व्यक्ति के लिए निष्प्रभावी। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार से पूर्वाग्रहित (अनुबंधित) हैं। अपना सत्य जान लेने के उपरांत एवं सदा उस परम स्थिति में ही रहने पर, भावनात्मक इच्छाएँ लुप्त हो जाएँगी।

बौद्धिक इच्छाएँ

एक प्रतिबंधित मन जो पूर्णत: बाह्य जीवन पर केंद्रित होता है, व जब वह भौतिक व भावनात्मक इच्छाओं की पूर्ति का स्वाद कभी कभी चख चुका होता है, तो वह बौद्धिक कामनाओं की ओर चल पड़ता है। यह मनुष्य को कुछ नया करने अथवा नि:स्वार्थ प्रतीत होने वाले सामाजिक कार्यों की ओर प्रेरित करता है। ऐसे कार्यों से जो सुखानुभूति होती है वह भौतिक व भावनात्मक की तुलना में कुछ अधिक समय तक टिकती है। जब जीवन में सब ठीक चल रहा हो, व जब आपको लगने लगे कि केवल इंद्रीयगत सुख व भावनात्मक सुखपूर्ति पर्याप्त नहीं है, तब बौद्धिक कामनाओं का उदयभास होता है। बौद्धिक इच्छाओं का स्वरूप ऐसा होता है जिससे आपको कुछ अंतर दृष्टि की उपलब्धि होती है। तथापि, एक अहंतावादी, अशांत व अनभिज्ञ मन अभी भी आपको बंधन में ही रखेगा। भले ही आप अपने समय व शक्ति का एक बहुत बड़ा भाग बौद्धिक कामनाओं की पूर्ति में लगाते हों, तथापि भौतिक व भावनात्मक इच्छाएँ अभी भी आपको नहीं छोड़ेंगी। इसका प्रमुख कारण यह है की आपने अपने मन को शांत करने के स्थान पर उसे केवल कहीं ओर लगा दिया है। हालाँकि, अक्सर ऐसी भावनाओं की पूर्ति की दिशा में किए गये कार्य समाज को कुछ अच्छा प्रदान कर जाते हैं। एक धर्मार्थ संस्था बनाना, एक भौतिक या आध्यात्मिक खोज की दिशा में कार्यरत होना, किसी सामाजिक अथवा धार्मिक उद्देश्य के प्रति समर्पित होना आदि बौद्धिक कामनाओं के उदाहरण हैं। पहले की दो कामनाओं की अपेक्षा यह आपको अंतर्मुख होने में सहायक होती हैं। अब तक के महान विचारक, आविष्कारक, एवं वैज्ञानिक, बौद्धिक कामनाओं की ही उपज थे।

लोकोत्तर (भावातीत) कामना

अन्य तीनों भावनाओं से विभिन्न, यह भावना सदा ‘एक मात्र’ होती है। जब आपको केवल एक ही प्रबल कामना रह जाती है – अपने वास्तविक स्वरूप के साक्षात्कार की – आधा कार्य तभी संपूर्ण हो जाता है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि संभवत: आपने अन्य सभी, कभी भी समाप्त न होने वाली, कामनाओं की निरर्थकता का अनुभव कर लिया है। इस इन्द्रियतीत कामना की पूर्ति आपको अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त कर देगी व प्रतिबंधता के सभी बंधनों को निकाल फेंकेगी। इस तरह की कामना आपके जीवन का अंतिम अन्वेषण है – अपना सत्य स्वयं खोजने की दिशा में। बिना अधिक बोले, आप कृष्ण, क्राइस्ट, बुद्ध, महावीर अथवा अन्य कोई भी महान प्रचारक, पैगंबर, अथवा विचारक हो सकते हैं, जो अब तक विश्व में हुए हैं।

आपका मिथ्या अहंकार (अहम भाव) भौतिक कामनाओं का भंडार सजाए हुए है, जो इनकी पूर्ति होने पर दिनों-दिन और विस्तृत होता जाता है। आपकी भावनात्मक इच्छाएँ आपके अहम भाव को और अधिक बढ़ने में, आग में घी का कार्य करती हैं, और बौद्धिक इच्छाएँ अहम भाव को संतुष्ट करती हैं। अहंकार, जो एक व्यापक विषय है, इस पर फिर कभी विचार करेंगे। मैं भविष्य में इस पर लिखूंगा। अभी के लिए कृपया यह समझ लें कि आपका मिथ्या अहम आपके चिरकाल् से संकलित कर्मों की छाप मात्र है, वे कर्म जो आपने इस बाह्य जगत को सत्य मान कर, इसका उपभोग करते समय एकत्र किए हैं। यदि आप एक प्याज का छिलका हटाना आरंभ करें तो आप पाएँगे कि अंत में कुछ भी नहीं बचता। इसी प्रकार, जब आप अपने अंत:करण की शुद्धि कर लेते हैं तो अहम का लेश मात्र कण भी आपमें शेष नहीं रह पाएगा, चूँकि यह अशुद्धता व अज्ञानता ही हैं जो इस अतिसूक्ष्म तथापि ठोस अहम भाव को वास्तव में बनाए रखते हैं।

भौतिक इच्छाओं की असंतृप्ति आपके अहम को आहत कर देती है, भावनात्मक अतृप्ति पीड़ा देती है व बौद्धिक स्तर की अतृप्ति अहम को परिवर्तित कर देती है। इन सब के विपरीत, लोकोत्तर (आत्म साक्षात्कार) की कामना की अपूर्ति से वैराग्य भाव जागता है और यह आपको और अधिक प्रयत्नपूर्वक अपने वास्तविक स्वरूप को जानने की दिशा में प्रेरित करती है। वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार आपके अहम् भाव को पूर्णत: गला देगा। भौतिक व भावनात्मक कामनाएँ आपको बाह्य जगत में सुख प्राप्त करने के मार्ग पर ढकेलती हैं। किंतु उस अनंत अथाह परम आनंद की अनुभूति बाह्य जगत में नहीं हो सकती। अतः बाह्य जगत से सुख पाने के लिए आपके घोर प्रयत्न के उपरांत भी आप, अनजाने में, अपनी उन कामनाओं को और अधिक बढ़ाते चले जाते हैं।

जब आपका शांति व निश्चलता का परिधान बौद्धिक सत्य व परिकाल्पनिक ज्ञान के ताने-बाने से बुना गया हो तो किसी भी कष्टकारी स्थिति के आने पर, अथवा अंत:करण की सुप्त कामनाओं के उदय होने पर, वह ओढ़ा हुआ परिधान कभी भी एक क्षण में उड़ जाएगा, और आप इस बात से अनभिज्ञ ही रहेंगे। आप किसी पशु को तब ही पालतू बना पाएँगे जब आप उसके स्वाभाव से परिचित होंगे। कामनाओं को भी प्रथम स्तर पर समझना होता है, फिर उन्हें साधना होता है, उसके उपरांत उन पर नियंत्रण पाना सीखना होता है और तब उन पर विजय पाई जाती है। अंत में उनका संपूर्ण नाश किया जाता है।

संकेंद्रीय-ध्यान की पद्धति आपके मन को स्थिर कर देगी, फलत:, कामनाएँ भी लुप्त हो जाएँगी। चिंतन-मनन की ध्यान पद्धति अथवा विशुद्ध भक्ति भाव, कामनाओं को पूर्णत: समाप्त कर देगा। उसके पश्चात, जब कभी भी कोई इच्छा उपजे तो आपको अपना मन वहाँ से हटा लेना होगा। अभ्यास द्वारा आप वास्तव में अपनी इच्छाओं को मात्र एक विचार मान पाएँगे, ऐसे विचार जिनका कोई तात्विक मूल्य ही नहीं। विचार कब उत्पन्न हो रहे है, इसका पता लगाने मे लिए आपको हर पल, हर क्षण, मन को सावधान मुद्रा में रखना होगा – बिल्कुल एअरपोर्ट पर स्थापित उस सुरक्षा-प्रणाली की भाँति जहाँ से यदि आप केवल एक सिक्का भी जेब में रख कर निकलो तो तत्काल, वहाँ ध्वनि-संदेश आने लगता है। भौतिक कामनाओं से छुटकारा पाने के लिए चिंतन-मनन व त्याग आवश्यक हैं। भावनात्मक कामनाओं को समाप्त करने में चिंतन के साथ साथ वैराग्य भाव सहायक होते हैं। बौद्धिक इच्छाओं से ऊपर उठने के लिए बुद्धिमत्ता व आंतरिक प्रज्ञा सहयोगी होते हैं। लोकोत्तर कामना की पूर्ति के लिए उपरोक्त सभी रीतियों को दृढ़ता से अपनाना होगा व इसके साथ, भक्ति में संपूर्ण समर्पण, व योगी के लिए ध्यान के अटल व दृढ़ अभ्यास परम आवश्यक हैं।

जब कामनाओं का वेग आए तो सतर्क होना आवश्यक नहीं; इच्छा-तृष्णा तो स्वाभाविक होती हैं। हमारी जीत तभी है यदि हम बिना लड़े ही युद्ध में विजयी हों व बिना समझौता किए इन से पार हो जाएँ। जब आप अपने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार कर लेते हैं, तब आपको अपनी आवश्यकताओं अथवा कामनाओं को लेकर कोई भ्रम नहीं रहेगा।

मन रूपी वृक्ष पर कामना रूपी आकर्षक फल लटक रहे हैं। आख़िर आप कितने फल कतर सकते हैं या तोड़ सकते हैं! आपको मूल तक पहुँचना होगा। कामना-तरुवर के मूल को ही मन कहना सुसंगत है। अपेक्षाएँ इस अज्ञानी मन व अनुबंधित आत्मा (स्व) के अनचाहे शिशु समान हैं, व इच्छा-तृष्णा उसके अनुज। एक बार एक कामना की पूर्ति की ओर कदम बढ़ाया तो जान लीजिए, आने वाले लंबे अंतराल के लिए आप को अन्य कई समझौते भी करने ही होंगे। और, यदि, नवीन प्रकार की कामनाओं व अपेक्षाओं का भी आना-जाना लगा रहेगा, तो आप स्वयं अपनी स्थिति आंक सकते हैं। इसीलिए ज्ञानी जन कहते हैं कि जो भी करो, सोच समझ कर ही करो।

शांति।
स्वामी