किवदंति  है कि ग्रीस का ऐलेग्ज़ैंडर तृतीय भी ऐलेग्ज़ैंडर महान की ही भाँति प्रसिद्ध था।ऐलेग्ज़ैंडर असंख्य लोगों के जीवनों के मूल्य पर विश्व विजय करने के पश्चात अपने साम्राज्य की वृद्धि करता जा रहा था। उसने एक महान योगी दंडिनि की अत्यधिक  प्रशंसा  सुनी थी, इसलिए  उसने अपने एक संदेश वाहक को योगी दंडिनि को प्रवचन और दर्शन पर वाद विवाद हेतु आमंत्रित किया। लेकिन दंडिनि ने उसका आमंत्रण अस्वीकार कर दिया और वन  में स्थित  अपनी कुटिया में ही  रहना पसंद किया। ऐलेग्ज़ैंडर को उनका यह व्यवहार पसंद नहीं आया  लेकिन वह महान ज्ञानी ऐरिस्टॉटल का शिष्य था। इसलिए वह जानता था कि संतों और दार्शनिकों को प्रलोभित करना और दबाना अत्यंत कठिन है।

उसने अपने सेनापति  ओनेसिकृतस को  दंडिनि को पुनः आमंत्रित करने के लिए भेजा। ओनेसिकृतस ने योगी से प्रार्थना की और उनको उपहार भेंट किए। लेकिन जब दंडिनि ने अपना  रवैया नहीं बदला तो ओनेसिकृतस ने उनको धमकी दी कि ऐलेग्ज़ैंडर ने आदेश दिया है कि यदि उनका आदेश नहीं माना गया तो राजा के आदेश की अवहेलना करने के कारण उनका सिर काट दिया जाएगा। दंडिनि ने उसके उपहारों को अस्वीकार कर दिया और ओनेसिकृतस से  कहा कि मुझे  मृत्यु का कोई भय नहीं है । ओनेसिकृतस उनको मारने की हिम्मत नहीं कर सका और  वह उनको प्रणाम करके इस घटना की जानकारी ऐलेग्ज़ैंडर  को देने के लिए वापस चला गया।

एक जंगल में निवास करने वाले व्यक्ति के व्यवहार से  कुंठित होकर ऐलेग्ज़ैंडर बहुत अधिक नाराज़ हो गया। अब उसने दंडिनि से  स्वयं मिलने जाने और उनको सबक़ सिखाने का निर्णय लिया। उसने अपने सेनापति और परिजनों को साथ लिया और जंगल में प्रविष्ट हुआ, किंतु  वहाँ पहुँचते ही  उसके भीतर एक शांति प्रविष्ट हो गयी और जैसे ही उसने दंडिनि की भेदक दृष्टि का सामना किया वैसे ही उसका क्रोध समाप्त हो गया। लेकिन जब दंडिनि उसके स्वागत के लिए नहीं उठे तो उसका  क्रोध पुनः जाग उठा।

ऐलेग्ज़ैंडर ने दंडिनि से पूछा आपने मेरे उपहारों  को अस्वीकार करने का साहस कैसे किया?

“ क्योंकि वे रक्त से सने हुए थे।”

दंडिनि की आवाज़ में एक ऐसा भयंकर सत्य था कि उनकी निर्भय वाणी से  ऐलेग्ज़ैंडर भीतर तक हिल दिया। लेकिन वह अपने भावों को अपने व्यक्तियों के सामने अभिव्यक्त करने हेतु तैयार नहीं था। ऐलेग्ज़ैंडर अपने घोड़े से नीचे उतरा और  संत के सामने  खड़ा हो गया।

ऐलेग्ज़ैंडर दहाड़कर बोला “तुम जानते हो मैं कौन हूँ?

“ मेरे ख़याल से तो तुम स्वयं भी नहीं जानते कि तुम कौन हो  ?”

यह सुनकर  ऐलेग्ज़ैंडर चिढ़ गया। उसे लगा कि  योगी उसका अपमान कर रहे हैं । उसने तत्क्षण अपनी म्यान  में से तलवार बाहर निकाली और उसे बिजली के समान तीव्र गति से दंडिनि की गर्दन के पास लेकर गया।

और चिल्लाकर बोला “ मैं विश्व विजय ऐलेग्ज़ैंडर हूँ। तुम मेरी भूमि पर बैठे हो। या तो समर्पण कर दो अन्यथा मैं तुम्हें मार —“

“ तुम्हारी भूमि?” हे राजा भूमि किसी की नहीं है”

उन्होंने आगे कहा “तुम्हारे पहले अन्य लोग  थे,  जिन्होंने इस पर अधिकार जताया। तुम्हारे बाद अन्य दूसरे होंगे जो कहेंगे कि यह उनकी है। समस्त सृष्टि मात्र सृष्टा की है ऐलेग्ज़ैंडर। और जब उन्होंने इसका सृजन नहीं किया है तो इसे नष्ट करने का उनको अधिकार नहीं है। तुम्हारे हाथ रक्त से सने हुए हैं । तुम अस्थायी रूप से भूमि पर दावा जाता सकते हो, लेकिन ऐसा करने से तुम्हारी आत्मा पर स्थायी निशान हो सकते हैं।” ऐलेग्ज़ैंडर ने अपनी तलवार नीची कर ली और असहजता से अपनी मुद्रा ठीक  की। अपने आदमियों को थोड़ी दूरी पर प्रतीक्षा करने का संकेत कर उसने अपना गला साफ़ किया।”

ऐलेग्ज़ैंडर ने कहा “सारा संसार मेरा है ,दंडिनि। इतिहास में मुझे महान शासक के रूप में याद किया जाएगा। मेरे व्यक्ति मेरे लिए अपनी जान तक  दे सकते हैं ।”

दंडिनि ने कहा “ हे राजा! क्या अच्छा है तुम्हारी महत्वाकांक्षा या उनका तुम्हें याद रखना ? तुम प्रत्येक दिन शाम को अपने आपको शराब में डुबो देते हो जिससे कि तुम अपने पापों को भुला सको। जो व्यक्ति तुम्हारे आस-पास हैं वे तुमसे थक चुके हैं। वे तुम्हें अतिशीघ्र किसी दिन छोड़ देंगे।”

दंडिनि ने आगे कहा “ तुम संसार को जीत कर क्या करोगे? जो भी तुम्हें  चाहिए वह है मात्र दो गज ज़मीन ; दो गज लम्बी और दो गज गहरी।आख़िकार बस इतनी ही भूमि तो तुम्हारे साथ रहेगी।”

गहन सोच में डूबे  हुए ऐलेग्ज़ैंडर ने अपनी तलवार म्यान में रख ली और दंडिनि के आगे झुककर वह तत्काल वहाँ से चला गया।

कुछ ही माह व्यतीत हुए होंगे,कि  उसकी सेना ने बग़ावत कर दी, और उसके भारत विजय के  युद्ध को समाप्त कर दिया। तीन वर्ष बाद ऐलेग्ज़ैंडर का बेबिलोन में देहावसान हो गया।

हालाँकि ऐसा प्रतीत हो रहा है किंतु मेरा यहाँ पर उद्देश्य ऐलेग्ज़ैंडर और उसकी क्रूरता का चित्रण करना  नहीं था। इसके स्थान पर यह मेरी और आपकी विजय की ओर ध्यान दिलाना था । मानव जीवन का औसत क्या है? क्या हम भी सदैव एक ऐसे लक्ष्य की ओर कार्यरत नहीं हैं जो कि असम्भव और सतत विस्तारशील  है ? इसी के साथ साथ मेरा यह भी विश्वास है कि हमारे निरंतर उत्पादकता बढ़ाने और विकास करने प्रयास में हम जीवन के सबसे सुंदर दृश्य इसकी सरलता को खो देते हैं।

यह मेरा दृष्टिकोण है कि  सादा जीवन सुंदर जीवन है।  एक अच्छा भोजन, हँसी के दो पल, प्रेम का एक हाव भाव, दयालुता  का एक कार्य इसी के लिए यह जीवन है, यही है वह  सरलता । ये छोटे-छोटे हाव-भाव, ये सरल क्षण ही हैं,जो आपको परिपूर्ण , पूर्ण अनुभव कराते हैं।

और सरलता के लिए बहुत सजगता और दृढ़ निश्चय चाहिए क्योंकि आज़ गेजेट और डिवाइसेज़ के युग में बेकार की चीज़ें  रखना बहुत आसान है। इस  विश्व में जीवन को जटिल बनाना बहुत ही  आसान है। हममें से प्रत्येक अपने साम्राज्य का ऐलेग्ज़ैंडर है जो भौतिक स्वामित्व की अनंत गतिविधि में लगा हुआ है।

मेरा कहने का अर्थ यह नहीं है कि आप अपनी सम्पत्ति से सम्बंध तोड़ लें या कि सम्पत्ति में वृद्धि न करें।

सरलता से मेरा तात्पर्य है कि मेरी सलाह है कि आप अपने सम्पूर्ण  जीवन को सजगता से लें और  जहाँ आप हैं और जहाँ आप होना चाहते हैं, उसमें से आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है उस पर ध्यान दें? इस पर अपना ध्यान केंद्रित करें कि आप सच में जी रहे हैं या बस प्राप्त कर  रहे हैं।

जब आप अपने जीवन को सरल बना लेंगे तो जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण और आपका सफलता का मानदंड एक श्रेष्ठ आदर्श हो जाएगा। वास्तव में जीवन का सरलीकरण एक सज़ा नहीं है, यह अपने आप में विश्व विजय है। उदाहरण के लिए “ एक गिलास में पानी कितना हो इसका कोई निश्चित मानदंड नहीं है यह आपकी प्यास के ऊपर निर्भर है। यदि आप प्यासे नहीं हैं तो अत्यंत थोड़ा ही  पर्याप्त होगा, लेकिन यदि आपकी आत्मा प्यासी है तो एक सम्पूर्ण समुद्र भी कम होगा।”

अब प्रश्न है  कितना पर्याप्त होगा?  एक संतुष्ट हृदय के लिए यह हमेशा पर्याप्त है। क्योंकि यह प्रचुर है, अधिक है, या पर्याप्त है, यह सदैव प्रकृति पर निर्भर है। यही  सरलता  है।

शांति।

स्वामी