एक दिन एक युवक ने अति सादगीपूर्ण ढंग से मुझसे पूछा, “मुझे किस को प्रसन्न रखना चाहिए? यहाँ तो बहुत से लोग हैं – मेरे माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी, बच्चे, बॉस एवं कई अन्य। इनमें से मैं किसका चयन करूँ, अथवा तो क्या मैं प्रयत्न करूँ व सभी को खुश रखूँ?”
“आप सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को तो भूल गए”, मैंने कहा।
“ईश्वर?”
“नहीं, आप स्वयं।”

अंतत:, दैनिक जीवन की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि मैं स्वयं को एवं दूसरों को कितना प्रसन्न रख पाता हूँ, और दोनों में से एक भी सरल नहीं। कृपया “अंतत:” शब्द पर ध्यान दें। प्रारम्भ के कुछ समय तक आप बहुत से समझौते कर सकते हैं व हर किसी को प्रसन्न रख सकते हैं किन्तु जैसे जैसे समय बीतता है, यह सब आपको दुर्बल व अतृप्त कर देगा। और, दूसरों की बात तो दूर, स्वयं को खुश रखना भी वास्तव में जटिल होता है चूंकि आप कितने भी बुद्धिमान, निपुण अथवा सफल क्यों न हों, भले ही स्वयं को व्यस्त रखने के लिए आप ने बहुत से शौक क्यों न अपना रखे हों, तथापि आप स्वयं को स्वयं के द्वारा हर समय प्रसन्न नहीं रख सकते। हाँ, तब स्थिति भिन्न होगी यदि आपने अति सजगतपूर्वक एवं करुणा से भरपूर हो स्वयं को संसार से विलग करते हुए, अंतर्मुख होना आरंभ कर दिया हो। ऐसे में आप अधिकांश लोगों की तुलना में अधिक प्रसन्न रहेंगे। यदि आप एक ऐसे व्यक्ति हैं तो यह लेख आपके लिए नहीं है। आज मेरा केंद्र-बिन्दु इस वास्तविक जगत की वास्तविक चुनौतियों से जूझते लोगों पर हैं जो नित्य-प्रति अनेकानेक भिन्न भिन्न भावनाओं का सामना करते हैं।

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब कभी भी हम कष्ट में होते हैं, सामान्यतः ऐसा किसी दूसरे की हमारे जीवन में उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति के कारण होता है? हम उदास होते हैं चूंकि हमारे जीवन में गलत व्यक्ति है, अथवा तो हम इसलिए उदास हैं कि उपयुक्त व्यक्ति अब हमारे जीवन में नहीं है (अथवा तो उतना नहीं जितना हम उसे अपने साथ चाहते हैं)। (कभी कभी मैं विस्मित होता हूँ कि हमने स्वयं का स्तर किस हद तक नीचे कर लिया है…)

एक नए नए प्रधानमंत्री चुने गए सज्जन मानसिक रोग संस्थान में इस भाव से गए कि वे हर किसी का बराबर ध्यान रखने के आकांशी हैं।

“इस व्यक्ति को क्या हुआ है?” एक व्यक्ति जो कभी हंस रहा था तो कभी रो रहा था, उसे संबोधित करते हुए उन्होंने वार्डेन से पूछा।
“श्रीमान, यह एक स्त्री से प्रेम करता था, किन्तु वह किसी अन्य पुरुष के साथ चली गई। इसी कारण इसका स्नायु-तंत्र क्षतिग्रस्त होने से अब यह विक्षिप्त हो गया है।”
“यह तो बहुत बुरा हुआ,” प्रधानमंत्री ने सहानुभूतिपूर्वक कहा और अगले रोगी की ओर बढ़ गए।
अगले वार्ड में उन्होंने एक और व्यक्ति को देखा जो बहुत अजीब व्यवहार कर रहा था। “और, इसके साथ क्या हुआ था?”
“श्रीमान, यह वह व्यक्ति है जिसके साथ वह स्त्री भागी थी और विवाह कर लिया था।”

हम प्रसन्नता में भी उसी प्रकार उन्मत्त हो जाते हैं जैसे हम उदासी में होते हैं।(साधारणतः प्रतीकात्मक रूप से)। संबंध कठिन होते हैं, और अकेलापन तो उससे भी दुष्कर हो सकता है। प्रमुख रूप से इसलिए चूंकि आप अकेलेपन का हल किसी संबंध में पड़ कर नहीं निकाल सकते; अकेलापन साथ-साथ होने का विपरीत नहीं होता। अपने परम हितैषी जनों से घिरा होने पर भी लोग अविश्वसनीय स्तर तक एकाकी हो सकते हैं। एकाकीपन दुष्कर है चूंकि यह नितांत अकेले रह जाने की भावना है, आप स्वयं से दूर हो चुके हैं; इसमें दूसरों की बहुत कम अथवा कुछ भी भूमिका नहीं होती। इतना सब कह चुकने के उपरांत, लोग इसलिए भी एकाकीपन से बोझिल होते हैं चूंकि उनके सम्बन्धों में वह गुणवत्ता, वह रस नहीं बचा होता। उन्होंने प्रयास किए, शायद बहुत अधिक प्रयत्न किए, किन्तु कुछ न कुछ दोषपूर्ण ही रहा और वह संबंध असफल हो गया। अधिकांशत:, प्रारम्भ में सब कुछ चकाचौंध से भरा होता है। तत्पश्चात, धीरे धीरे उसका आकर्षण कम हो जाता है, काँच के उन नए बर्तनों की भांति जो आरंभ में बहुत चमकदार व सुंदर होते हैं, परंतु, तब, कुछ समय बाद एक दिन आप पाते हैं कि अब यह पुराने हो गए हैं, इनकी चमक समाप्त हो चुकी है। एकाकीपन आपको उस समय सबसे अधिक अखरता है जिस समय आप अकेले नहीं रहना चाह रहे होते। मान लें आपको पदोन्नति का समाचार मिला है और आप किसी से बात कर अपनी खुशी बाँटना चाहते हैं, कुछ जश्न मनाना चाहते हैं; अथवा तो आपको नौकरी से पदच्युत कर दिया गया है, ऐसे में भी आप अपना दुःख साझा करना चाहते हैं। भले ही हम एकाकीपन से बोझिल हो रहे हों अथवा तो साथ साथ रहने से, ऐसा तभी होता है जब हमारे जीवन में एक अच्छे अंतरंग/गुणवत्तापूर्ण संबंध की कमी होती है। गुणवत्ता – यही मूल तत्व है। गुणवत्ता से मेरा क्या अभिप्राय है व एक उत्कृष्ट संबंध किस प्रकार बनाया जाये?

नस्सीम तैलब (Nassim Taleb) द्वारा लिखित द बेड ऑफ प्रोकृस्टेर्स (The Bed of Procrusters) का एक छोटा से लेख मेरे स्मरण में आ रहा है –

एक ग्रीक पौराणिक कथानुसार ऐटिका के कोरिडलस में एक छोटे से प्रदेश का एक क्रूर शासक था प्रोकृस्टस। यह स्थान एथेंस व अल्युसीयस के मध्य स्थित था जहां गुह्य-गुप्त अनुष्ठान किए जाते थे। प्रोकृस्टस का आतिथ्य-प्रदर्शन विलक्षण था (यदि इसे ऐसा कहा भी जा सके तो)। वह यात्रियों का अपहरण करता, उन्हें स्वादिष्ट रात्रि-भोज परोसता और फिर उन्हें विश्राम हेतु एक विशेष बिस्तर पर आमंत्रित करता। वह चाहता था कि उस बिस्तर का नाप यात्री को एकदम पूरा फिट आए। जो यात्री लंबे थे, उनकी टाँगे तेज कुल्हाड़ी से काट डाली गईं; वे जो छोटे थे उन्हें खींच दिया गया।

काव्यात्मक न्याय के शुद्धतम रूप में, प्रोकृस्टस को अपने ही बनाए यंत्रणा-यंत्र का शिकार होना पड़ गया। उन यात्रियों में से एक था साहसी थेसियस, जिसने उस रात्रि-भोज के उपरांत प्रोकृस्टस को उसके बिस्तर पर ही लेटने को विवश कर दिया। तब उसे उसी की परंपरा अनुसार बिस्तर पर एकदम पूरा फिट करने के लिए उसने उसका सिर काट डाला…

हमारी मानव जाति, सीमित ज्ञान की परिधि में अटकी, अंजान व अंदेखी वस्तुओं का प्रेक्षण ना करने के कारण अज्ञानी रहती है। ऐसे में हम तनाव का हल निकालने हेतु जीवन व दुनिया को किन्हीं निर्धारित पूर्वनिश्चित विचारों, अतिसरलीकृत श्रेणियों, विशेष शब्द-रचनाओं व पूर्वसिद्ध अर्थादि में विवशतापूर्वक ढालते हैं जिसका समय आने पर विस्फोटक परिणाम होता है। इसके अतिरिक्त, शायद हम ऐसी पलटी हुई सोच से अंजान हैं, बहुत हद तक कपड़ा सीने वाले दर्जियों की तरह जो बढ़िया फिट सूट सी कर देते समय गौरवान्वित सा महसूस करते हैं। किंतु संभवत: वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि ग्राहक अपनी टांगों पर सर्जरी करके ही उन कपड़ों को पहन पाएंगे!

मेरा अनुमान है कि अधिकांश संबंध ऐसे ही होते हैं; एक प्रकार का प्रोकृस्टियन बिस्तर। हम इस दिशा में अत्यधिक परिश्रम करते हैं कि दूसरा व्यक्ति भी वही सब चाहे जो हम चाहते हैं। गलती से हम हमारे सम्बन्धों को हर प्रकार से परिपूर्ण बनाने में लगे रहते हैं। यदि आप इसी प्रकार से किसी भी संबंध को संभालना चाहते हैं तो मुझे खेद है यह कभी नहीं हो पाएगा। मानवीय सम्बन्धों की उत्तमता इस तथ्य पर आधारित नहीं कि दो लोग एक दूसरे के साथ कितना बढ़िया तालमेल रख पाते हैं अथवा तो साथ साथ रह पाते हैं। अपितु, आधार यह होता है कि वे एक दूसरे को कितनी स्वतन्त्रता देते हैं। इसके साथ साथ, अक्सर जब ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों साथ साथ खुश हैं तो उनमें से एक चुपचाप अंदर ही अंदर सुलग रहा होता है। किसी भी संबंध में स्वतन्त्रता प्रदान करना उस संबंध की गुणवत्ता का प्रमुख घटक होता है। स्वतन्त्रता से मेरा तात्पर्य मात्र यह नहीं कि आप जो चाहें वह कर सकते हैं। ऐसी दायित्वहीन, लापरवाह स्वाधीनता तो वास्तव में उस दीमक की भांति है जो अच्छे से अच्छे सम्बन्धों को भी खोखला कर देता है।

मेरे मतानुसार, स्वतन्त्रता का अर्थ है साथ साथ रहने को आदर प्रदान करना; यह सम्बन्धों की खुशियाँ मनाने के साथ ही विविधता का सम्मान करना भी है – एक प्रकार की निडरता। दूसरे शब्दों में इसे परिपक्वता कहते हैं। जब तक दो लोग ऐसे परिपक्व विचार न रखते हों कि वे अपनी अपनी बात, अपनी इच्छाएँ व सत्य एक दूसरे के सम्मुख रख सकें तब तक वे एक मुक्त, अबाध, संबंध नहीं बना पाते। यदि किसी संबंध में ऐसी परिपक्वता विद्यमान नहीं तो ऐसे में वह दोनों को सदा असंतुष्ट व थका मांदा रखेगा।

एक बार मैंने कहीं पढ़ा था, “हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि इस दुनिया में हर एक प्राणी का अपना एक उद्देश्य होता है, उसके अपने शौक एवं स्वयं का दृष्टिकोण होता है। और, यह भी कि वह केवल अपने आप के बारे में ही सोचता है। जब आप उसे अपनी पसंद की चीज़ों की ओर आकर्षित करने की इच्छा रखते हैं, तब उसके मन की शांति भंग हो जाती है। यदि आप उस पर अपना दृष्टिकोण लादने का प्रयत्न करते हैं तो भले ही वह आपका कितना भी परम स्नेही व अंतरंग क्यों न हो, वह उस प्रयत्न से कभी खुश नहीं होता।”

हो सकता है हमारे आज के अन्योन्याश्रित खुशी से भरे इस संसार में यह बात सच से बहुत दूर लगे, किन्तु मानव जाति के अस्तित्व का यह असुखद सत्य है कि हम अपने स्वयं के प्रति अत्याधिक चिंतित हैं। हमें यह सब कहा जाता है कि मिल-बाँट कर रहो, अच्छे इंसान बनो इत्यादि, किन्तु साथ ही साथ हमें सर्वप्रथम अपना यान रखने की सीख भी दी जाती है। और तो और, उस युवक को मेरी ओर से भी यही राय दी गई कि उसने खुशियों के संदर्भ में स्वयं की गणना तो की ही नहीं, अपने जीवन का आप स्वयं भी तो एक महत्त्वपूर्ण अंग हो। किन्तु, यदि जीतने पर, अच्छे बने रहने पर बहुत अधिक बल दिया जाता है तो हमारे द्वारा बार बार निराशा महसूस करना अवश्यंभावी सा है, क्योंकि भले ही मैं कितना भी योग्य हूँ, मेरी हानि मुझे मिली जीत से कहीं अधिक मात्रा में होगी। और, यही वह स्थिति है जब एक संवेदनशील संतुलन बनाने की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

मुझे यह भली भांति ज्ञात होना चाहिए कि अपने जीवन से मुझे कम से कम क्या चाहिए और दूसरे व्यक्ति के लिए मैं क्या/कितना योगदान दे सकता हूँ। परिपक्वता तब मानी जाती है जब दो लोग परस्पर बातचीत द्वारा व्यावहारिक हल निकालना जानते हैं। सौहार्द तब कायम होता है जब वे इस बात को मान लेते हैं व इसका सम्मान करते हैं कि हम में से दोनों को ही अपने जीवन के ध्येयादि चुनने का अधिकार है। इससे भी अधिक महत्त्व पूर्ण बात यह है कि अलग अलग मार्ग का यह अभिप्राय कदापि नहीं कि आप दूसरे व्यक्ति से प्रेम नहीं करते। बल्कि वास्तव में परिपक्वता की कसौटी ही यह है कि जब आप हर चीज़ की तुलना स्वयं के दृष्टिकोण अथवा अपनी आवश्यकतानुसार नहीं करते।

एक परिपक्व रिश्ते में एक दूसरे के सामीप्य की खुशी व संतुष्टि के भाव की भरपूर सुगंधि होती ही है। चूंकि आप जानते हैं कि आप बिना किसी डांट-फटकार या आंकलन की तलवार के डर से अपने सुख-दुःख दूसरे के साथ साझा कर सकते हैं। कि, हाँ, मुझे स्वतंत्रता है अपनी बात कहने की, व दूसरा उसे समझेगा। ऐसे में यह प्रश्न ही विलुप्त हो जाता है कि किसे व कैसे प्रसन्न किया जाये? दिल की गहराइयों से आता वह अपनेपन व मिल-बाँटने की खुशी का भाव चहुं ओर हिलोरे मारने लगता है।

एक दिन रविवार की सभा से पादरी जी ने स्वयं को बीमार बता कर अवकाश ले लिया। वे गोल्फ का आनंद लेने चले गए। अकेले। वे भविष्य में होने वाली मित्रवत-प्रतियोगिता में एक अच्छे प्रदर्शन की अभिलाषा से अभ्यास करना चाहते थे। उन्हें यह ज्ञात था कि गोल्फ के खेल में उनका कौशल कोई विशेष स्तर का नहीं था।

किन्तु उस दिन कुछ ऐसा संयोग बना कि जैसे ही उन्होंने बॉल को मारा तो वह सही जगह, ठीक बिन्दु के गड्ढे में जा घुसी। वह बॉल जा तो रही थी दक्षिण दिशा में, किन्तु अचानक उत्तर की ओर घूमी और गड्ढे में जा पड़ी। पादरी जी तो प्रसन्नता के मारे कूदने लगे। उनकी खुशी का कोई ठिकाना न था। उस 16-होल के गोल्फ कोर्स में खड़े वे गर्व से फूल कर कुप्पा हो गए!

“ऐसा कैसे?” एक देव-पुरुष जो पिछले दो घंटे से सब कुछ देख रहा था ईश्वर से बोला। “प्रभु, आपने इस पादरी की सहायता क्यों की जबकि आप जानते हैं कि यह अपना निर्धारित कार्य छोड़ कर यहाँ गोल्फ खेल रहा है?” क्या इसे सज़ा नहीं मिलनी चाहिए? और देखिये, यह तो आज अपने खेल का सर्वोत्तम प्रदर्शन कर रहा है?”
भगवान ने मुसकुराते हुए कहा, “कोई बात नहीं, परंतु देखो अब यह अपनी खुशी साझा किस के साथ कर पाएगा?”

क्या हमारे जीवन की सबसे अधिक खुशी इस बात में निहित नहीं कि हम अपनी सफलताएँ, अपनी जीत व खुशियाँ, अपनों के साथ साझा कर पाएँ? ऐसे ही, सबसे अधिक सुकून तब मिलता है जब आप अपनी हार भी ऐसे किसी व्यक्ति के साथ साझा कर पाएँ, जिसके लिए आप जानते हैं कि वह आपको बिना किसी आंकलन के, पूरे दिल से सुनेगा। ऐसा तब तक नहीं हो पाता जब तक एक रिश्ते में परिपक्वता न आ जाये। और, परिपक्वता तब तक संभव नहीं जब तक एक दायित्वपूर्ण स्वतन्त्रता को स्थान न मिले। और, स्वतन्त्रता एवं सच्चा प्रेम दोनों एक ही घटक के दो नाम हैं। यदि आप दूसरे व्यक्ति को बांध कर रखना चाहते हैं, उनके जीवन में अपने नियम थोपना चाहते हैं (भले ही वह नियम आपके दृष्टिकोण से कितने भी उपयुक्त अथवा नैतिक क्यों न हों), इस प्रकार का बंधन घुटन पैदा करता है। और जब ऐसा होता है तो इसका विपरीत प्रभाव दिखाई देता है – अब उनकी अनुपस्थिति नहीं, वरन उनकी उपस्थिति आपको अकेलेपन की ओर धकेलने लगती है। कभी कभी ऐसी परिस्थितियों को सही करने के लिए आपको मात्र यह करना होता है कि आप बैठ कर बात करें और एक दूसरे से पूछें, “आपकी खुशी किस बात में है?” तत्पश्चात, किसी व्यावहारिक हल की ओर बढ़ें। यदि आप दोनों में परिपक्वता है तो संभावना इस बात की है कि कोई परस्पर मेल खाता रास्ता निकल आएगा। और, यदि परिपक्वता का अभाव है तब तो वैसे भी इस तरह के संबंध का कोई विशेष अर्थ नहीं। ऐसे में अलग होना मात्र समय की बात है।

प्रेम में परिपक्वता स्वाभाविक रूप से ही आ जाती है, जैसे सूर्य के आने से ऊष्णता। शेष सब तो प्रेम की भ्रांति मात्र है। संभवतः, यह आसक्ति है।

सब कुछ सहजभाव से लें। हल निकालने का प्रयास करें।

शांति।
स्वामी