एक महिला मुझसे मिलने आश्रम आईं। उनका व्यवसाय एक मनो-चिकित्सक व उपचारक का था ( इसका जो भी अर्थ होता हो ), और वह विभिन्न चक्रों के बारे में अच्छी जानकारी रखती थीं। उन्हें वास्तु, फेंग शुई व टैरोट में विश्वास था। एक तरह से कहा जाये तो ये सब उनके व्यवसाय के उपकरण थे। उस दिन वह कुछ चिंतित थीं, चूंकि एक प्रसिद्ध ‘चक्र-विशेषज्ञ’ ने उन्हें बताया था कि उनके चक्रों का घुमाव ठीक नहीं, जो उनके व्यवसाय में अवरोध उत्पन्न कर रहा था।

“जरा दोहराएँ,” मैंने कहा, “आपके चक्रों का क्या ठीक नहीं?”
“घूमना,” उन्होने उत्तर दिया। “मेरे चक्रों का घूमना ठीक से नहीं हो रहा।”
“आप क्या हैं?” मैं मंद मंद हँसा, “एक मोटर कार, जिसका संतुलन बिगड़ गया हो?”

उन्हें समझ नहीं आया कि मैं गंभीर हूँ अथवा परिहास कर रहा हूँ, और वह थोड़ा संकोचित हो मुस्कुराई। हालांकि मैं कुछ क्षण चुपचाप हँसता रहा, किन्तु मेरी मंशा परिहास करने की नहीं थी। वस्तुतः, उन महिला के प्रति मुझमें दयभाव उमड़ा, जैसा की उन सभी जिज्ञासुओं के प्रति मुझे महसूस होता है जो ‘चक्र-विशेषज्ञ’ द्वारा भ्रमित कर दिये जाते हैं।

“अच्छा, तो उसने आपको और क्या क्या बताया?” मैंने पूछा।
“उसने मुझे एक विशेष प्रकार का हार गले में पहनने व एक विशेष अगरबत्ती जलाने को कहा।”
“ठीक। तो उससे क्या होगा?”

“उससे मेरे चक्र संतुलित हो जाएँगे,” और, उन महिला ने एक हार बाहर निकाला। वह काफी महंगा लग रहा था। श्वेत स्वर्ण से बने एक सुंदर कमल की चार पंखुड़ियों के मध्य में एक मणि थी व पंखुड़ियाँ पन्ना, माणिक्य, ओपल ( दूधिया पत्थर ) व पुखराज से जड़ित थीं। “इसका मेरे हृदय स्थल को छूना आवश्यक है,” वह बोलीं।
“यह आपके हृदय को तो छू रहा है, किन्तु आपके बाकी शरीर के लिए यह कुछ नहीं कर रह, ठीक है न?”

उसके मुख से सभी अभिव्यक्तियाँ लुप्त हो गईं, बस होंठ कुछ नीचे को मुड़ गए।

“स्वामी, ऐसा कैसे? मैंने इस हार पर कितना धन व्यय किया है।”
“वीना,” ( नाम बदला हुआ है ) मैंने कहा, “यह सब व्यर्थ है।”

वह उदास व क्रोधित लग रही थी, मानो किसी ने उन्हें हीरे का मूल्य ले कर एक साधारण पत्थर पकड़ा दिया हो।

“किन्तु मैंने सोचा था की चक्र एक वास्तविकता हैं।”
“हाँ, वीना, चक्र वास्तविकता ही हैं।”
“तो?”
“मेरा अभिप्राय यह है की चक्रों को संतुलित करने का यह व्यवसाय व विचित्र वस्तुएँ, ये सब लोगों को मूर्ख बनाने के दावपेंच हैं। कुंडलिनी जागृत करने का मात्र एक मार्ग है – एक लंबी अवधि तक ध्यान करना, अन्य कोई मार्ग नहीं।”
“तो क्या यह गले का हार इस प्रक्रिया को गति प्रदान नहीं करेगा?”
“यदि आप नौ स्त्रियों का गर्भाधान करवा के एक मास में बालक का जन्म करवा पाएँ तो,” मैंने कहा, “तब संभवतः आप अपनी कुंडलिनी भी तीव्र गति से जागृत कर पाएँ।”
“क्या यह संभव है स्वामी?” उसने पूर्ण गंभीरता से पूछा।

मैं अपनी हँसी न रोक सका और ज़ोर से हँस दिया। कितना विचित्र है कि हम सब क्या-क्या मानने को उद्यत रहते हैं, मैंने विचार किया।

वीना का प्रसंग स्वयं में इकलौता नहीं है। मैं नित्यप्रति सैंकड़ों ऐसे भोले भाले जिज्ञासुओं से मिलता हूँ जो तीव्र हल कि अपेक्षा रखते हैं मुझे हँसी आती है जब मैं देखता हूँ कि लोग एक अति मनमोहक ढंग से सुसज्जित स्थान में प्रवेश करते हैं, जहां वह मंद मंद रौशनी फैली होती है, एक छोटी किन्तु कीमती व पुरातन काल का आभास देती बुद्ध अथवा शिव की प्रतिमा एक कोने में सुंदर रूप में सजी होती है जिसके सम्मुख मनोरम दीप ज्योति जगमगा रही होती है, एक तेल का दीपक प्रज्ज्वलित हो वायु में महक बिखेर रहा होता है, पार्श्व में कर्णप्रिय संगीत बज रहा होता है, आरामदायक सोफ़े, महोगनी का साजो सामान आदि, और वे मुझसे पूछते हैं, “ओह! स्वामी, क्या आप इस स्थान की ऊर्जा को अनुभव कर पा रहे हैं?” सामान्यतः, मैं मुस्कुरा देता हूँ और इस ओर ध्यान नहीं देता, किन्तु वे लोग किस ऊर्जा की बात कर रहे होते हैं, मुझे इसका अंशमात्र भी ज्ञान नहीं।

हाँ, आपको वहाँ अच्छा लगता है, खुशी महसूस होती है, किन्तु इसका चक्रों अथवा ऊर्जाओं से कोई संबंध नहीं। यह तो उस स्थान का बाह्य परिवेश मात्र है। मेरा मानना है कि इससे उत्तम यह होगा कि आप किसी अच्छे आयुर्वेदिक स्पा में कुछ समय व्यतीत करें, जहां कम से कम आपको अपने धन का उचित मूल्य तो प्राप्त होगा; जहां वे आपका स्वागत एक ग्राहक के रूप में करेंगे व अपनी सेवाएँ प्रदान करेंगे, न कि आपका दोहन उस बेचारी, भोली भाली, भटकी हुई गाय की तरह करेंगे, जो भूल से किसी अन्य के बाड़े में प्रवेश कर गई हो।

चक्र-कंगन, चक्र-हार, अगरबत्तियाँ, चटाईयाँ, गलीचे, वस्त्र, दीवार तस्वीरें, चक्र-संगीत, चक्र-कार्यक्रम, एवं अन्य लुभावने साजो सामान का वास्तविक चक्र-साधना से लेशमात्र भी संबंध नहीं है। ऐसा कोई भी व्यक्ति जो आपके मस्तक ( अथवा कहीं भी ) स्पर्श कर आपकी कुंडलिनी जागृत करने का दावा करता हो, वह आपसे असत्य कह रहा है, भले ही वह व्यक्ति कितना भी सच्चा और चमत्कारिक क्यों न प्रतीत हो रहा हो।

और, फिर ऐसे भी लोग हैं जो आपके चक्रों को देख पाने अथवा पढ़ पाने का दावा करते हों। वे भी आपका अनुचित लाभ उठा रहे हैं। किसी के चक्रों को देख पाना किसी भी हाल में परोक्ष दर्शन से संबन्धित नहीं है। जहां तक चक्रों का प्रश्न है, उसमें उन्हें देखने अथवा पढ़ने जैसा कुछ भी नहीं। आपके चक्र किसी पाठ्यपुस्तक के अध्याय नहीं जिन्हें कोई भी पढ़ सकता हो। लोग चक्रों के खुलने अथवा बंद होने जैसी बातें भी करते हैं, मानो वे किसी बिस्कुट के डिब्बे का ढक्कन हों, जिसे आप जब चाहें हटा दें अथवा पुनः लगा दें। सांप जैसी सर्सराहट का रीढ़ से ऊपर की ओर जाने का अनुभव कुंडलिनी जागृत होना नहीं है। यदि वह सर्सराहट लगातार महसूस हो तो उत्तम यह होगा कि आप किसी स्नायु-विशेषज्ञ का परामर्श लें।

आपने संभवतः यह सुना होगा कि किस प्रकार हर चक्र की निश्चित संख्या में पंखुड़ियाँ होती हैं, उनके विभिन्न नाम, कई प्रकार के प्रमुख देवी-देवता, बहुत से सहायक देव, भांति भांति की आकृतियाँ इत्यादि होती हैं। मेरा कहना है कि यह सब अवांछित जटिलताएँ हैं। चक्रों से संबन्धित वास्तविक सत्य का अन्वेषण एक पूर्ण रूप से पृथक विषय है।

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ।।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ।।
(भगवद गीता, १५.३,४)

प्राप्ति होने पर यह ज्ञान होता है कि सत्य वह नहीं जो बताया जाता था। जीवन वृक्ष का वास्तविक रूप अनुभूतिशून्य है; इसका न आदि है और न ही अंत है। जो कोई भी सम्पूर्ण अनासक्ति भाव से इसे जड़ से काट पाता है, वह प्राणी परमानंद की अनिवर्त्य ( जहां से पुन: लौटा न जा सके ) स्थिति में पहुँच जाता है। वह उस छोर पर पहुँच जाता है जहां से लौटना संभव नहीं। वह अपने उदगम में समा जाता है।

यही कुंडलिनी का सत्य भी है, चक्रों की वास्तविकता। आज तक आपने इस विषय में जो कुछ भी देखा, सुना अथवा पढ़ा है, वह सत्य नहीं है, कम से कम पूर्ण सत्य तो कदापि नहीं। जिस दिन आपको चक्रों के भेदन अथवा कुंडलिनी के जागृत होने का वास्तविक अनुभव प्राप्त होगा, आप एक अप्रतिरोध्य आनंद की स्थिति में पहुँच जाएँगे, एक ऐसा दिगबिन्दु जहां से पुनः लौटा नहीं जा सकता।

दूध का एक बार दोहन कर माखन बना लेने के उपरांत उसे पुनः दूध में रूपांतरित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार, यदि एक बार आपने अपने वास्तविक स्वरूप को खोज लिया, तदुपरांत, भले ही कुछ भी हो जाये, आपके पुराने संस्कार, आपकी नकारात्मक भावनाएं सदा सदा के लिए आपको छोड़ देती हैं। आपके अन्तःकरण में सभी प्राणियों के प्रति सद्भाव की निस्स्वार्थ भावना स्वतः उत्पन्न हो जाती है। आप अपने अहम से बहुत ऊपर उठ जाते हैं। इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं कि यदि कोई आपको हानि पहुंचाता है तो आपको पीढ़ा का अनुभव नहीं होगा। पीढ़ा का अनुभव अवश्य होगा, किन्तु अपने पुराने अस्तित्व से कहीं ऊपर, आपका परिष्कृत रूप अब आपको पीढ़ा पहुँचाने वाले के प्रति क्रुद्ध नहीं होने देगा।

कुंडलिनी जागृत होने से अभिप्राय है आपका अपने अन्तःकरण में व्याप्त आनंद व हर्ष की अवस्था तक पहुँचना। यह स्थिति दस आवरणों द्वारा ढकी होती है – इच्छाएँ, क्रोध, लोभ, आसक्ति, अहं, भावातिरेक, ईर्ष्या, घृणा, भय एवं स्व-चिंतन। आप जैसे जैसे आध्यात्म मार्ग में आगे बढ़ते हैं, यह आवरण, एक के बाद एक, हटने लगते हैं। यह आवरण आपके वास्तविक स्वरूप को पर्दे में रखते हैं। आपका वास्तविक स्वरूप हर प्रकार के सुख-दुख, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित आदि द्वंद्वों से परे है। कुंडलिनी साधना के पथ पर जागृति एक संतुलित व मंद प्रक्रिया है। यह एक तत्क्षण उदित हुआ भाव/साक्षात्कार नहीं। यह शनै शनै संचित होता है, आपके व्यक्तित्व पर आच्छादित होता है। जागृति के हर नए स्तर को छूने पर आप अपने स्व को कुछ और जान पाते हैं, और अपने पुराने व्यक्तित्व को कुछ और पीछे छोड़ते चलते हैं।

कुंडलिनी-विज्ञान एक प्राचीन विद्या है, जो सदा एक अनुशासित ढंग से, पीढ़ी दर पीढ़ी, मौखिक रूप में केवल योग्य साधक को दी जाती है। यह विज्ञान वर्तमान में भी उतना ही अखंड व सुरक्षित है योग्यता विकसित करने हेतु साधक को अटल संकल्प शक्ति व दृढ़ निश्चय द्वारा इस मार्ग का अनुसरण करना होता है।

आइये, मैं आपको इसकी तह तक ले चलता हूँ, चूंकि जो प्राप्ति गहराई में उतर कर खोजने से होगी, वह मात्र ऊपरी सतह की जांच पड़ताल से कभी नहीं हो सकती। कृपया मात्र शाखाओं तक पहुँच कर रुक न जाएँ, केवल फलों के आकर्षण में न उलझें। आपको तो बस जड़ों को सींचना है, और सम्पूर्ण वृक्ष आपकी संपत्ति हो जाएगा।

उपरोक्त अंश मेरी आने वाली अंग्रेज़ी पुस्तक, “कुंडलिनी – एक अनकही कहानी” (Kundalini — An Untold Story) का प्राक्कथन है। आप पुस्तक को अमज़ोन इंडिया (यहाँ) द्वारा मँगवा सकते है, अथवा अमज़ोन॰कॉम (यहाँ) द्वारा, यदि आप विदेश में हैं। इसका किंडल प्रारूप अभी भारत में उपलब्ध नहीं, केवल विदेशों में यह उपलब्ध है (यहाँ)।

मैं दिनांक 26 अप्रैल 2016, दिन मंगलवार, को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर,हाल 2,मैक्स मुल्लर मार्ग, लोधी रोड, नई दिल्ली में शाम 6 से 8 बजे, इस पुस्तक के अनावरण हेतु उपस्थित रहूँगा। आप सब सादर आमंत्रित हैं; वहाँ मैं पुस्तक में से एक अध्याय पढ़ूँगा, आपके प्रश्नों के उत्तर दूंगा व पुस्तक पर हस्ताक्षर करूंगा। अन्य जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें।

शांति।
स्वामी
कृ॰देखें – मैं आजीविका हेतु लेखन कार्य में संलग्न हूँ। यदि आप मेरी पुस्तक/कें पढ़ते हैं तो मैं आशा करता हूँ कि आप अमज़ोन पर जाकर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी अवश्य लिखते होंगे। ऐसी टिप्पणी सहायक होती हैं।
कृतज्ञ भाव सहित।