एक धार्मिक व्यक्ति ने ४० दिनों की एक साधना की।इस साधना के अंत में उसे किसी को भोजन कराना था ।उसने स्थानीय मंदिर के पुजारी को आमंत्रित करना चाहा  लेकिन वह पहले ही  किसी  और से वादा कर चुके थे इस कारण  उन्होंने उसके आमंत्रण को  अस्वीकार कर दिया। वह घर को वापस आ रहा था कि उसे  एक वृद्ध भिखारी दिखाई दिया । उसने सोचा कि मैं इसे भोजन हेतु आमंत्रित कर सकता हूँ आख़िकार सभी में एक ही ईश्वर का वास होता है। एक जीवित आत्मा को भोजन कराने का उद्देश्य  यह  था कि, आप उस व्यक्ति में  ईश्वर को ही भोजन करा रहे हैं और ऐसे उत्तम कर्म करने के द्वारा और अधिक आध्यात्मिक संपत्ति अर्जित कर रहे हैं ।भिखारी ने भी आमंत्रण को तुरंत स्वीकार कर लिया।

वह व्यक्ति उसे घर लेकर गया और बड़े  ही उत्साह  और सम्मान के साथ उसका स्वागत किया।  भिखारी इस असाधारण  प्रेम  और सम्मान को देखकर अवाक्  था। इतना ही नहीं इसके बाद  दही, आचार,आम, शरबत और  चटनी आदि के साथ स्वादिष्ट व्यंजनों की पूरी थाली परोसी गयी। अपनी ७० वर्ष की आयु में किसी ने भी उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया था।

गृह स्वामी ने जैसे ही उसके सामने थाली परोसी भिखारी इस पर टूट पड़ा और खाने लगा।वास्तव में उसने जीवन जो भी भोजन चखा था उसमें यह यह सर्वाधिक स्वादिष्ट भोजन था ।

धार्मिक व्यक्ति को उसे देखकर विश्वास ही  नहीं हुआ और  कुछ  मिनिट तक वह भ्रमित  खड़ा रहा । उसके बाद उसने भिखारी को उसकी कलाई पकड़ कर भोजन करने से रोक दिया और कहा तुम क्या कर रहे हो?

भिखारी ने पूछा क्यों?क्या हुआ?

क्या हुआ! क्या हुआ ये तुम पूछ रहे हो, अकृतज्ञ!  क्या तुमको खाना खाने के पहले ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त नहीं करना चाहिए? भगवान से प्रार्थना करो और इस पवित्र भोजन को गृहण करने के पूर्व उसे धन्यवाद दो।

भिखारी ने कहा लेकिन महानुभाव! मैं किसी भी ईश्वर में विश्वास नहीं करता ।मैं किसी से प्रार्थना नहीं करता।

आदमी इस बात से घबराकर कि  एक नास्तिक को भोजन कराके जो कि न केवल आवारा  है बल्कि एक अविश्वासी भी है उसकी साधना निष्फल रहेगी स्तब्ध रह गया । उसने ऊपर देखा और क्षमा प्रार्थना की हे  प्रभु! मैने भी क्या पाप कर दिया उस व्यक्ति से  भोजन का आग्रह किया  जो आपके अस्तित्व को नकारता है ।

वह भिखारी से थाऽऽली छीनते हुए चिल्लाया मेरे घर से बाहर निकल जाओ यदि मैने कभी तुमको यहाँ पुनः देखा तो मैं तुम्हारे शरीर की एक- एक हड्डी तोड़ डालूँगा।
भिखारी ने कहा तुम ईश्वर  के साथ जाओ भाड़ में।  कोई ईश्वर नहीं है।

मैं तुमको मार डालूँ उससे पहले ही  तुम यहाँ से चले जाओ।

भिखारी बड़बड़ाते हुए वहाँ से चला गया।और उस आदमी ने भोजन  को कचरे के डिब्बे में डाल दिया।उसने निश्चय किया कि वह अगले दिन या किसी अन्य दिन या  जिस दिन भी मंदिर के पुजारी जी चाहेंगे  या उनको  समय होगा भोजन हेतु आमंत्रित करूँगा ।और पूरा दिन शाम पूजा के सामने क्षमा माँगते बितायी।स्वयं पर और भिखारी पर पगलाते हुए वह रात को सोने चला गया।

सुबह  ब्रह्म मुहूर्त के समय भगवान उसके स्वप्न में प्रगट हुए। इस कृपा से आश्चर्यचकित होकर वह उनके पैरों पर गिर पड़ा और उनको ज़ोर से पकड़ लिया।

हे भगवान! मैने सोचा था कि आप मुझसे नाराज़ होंगे।”मुझे दुःख है कि मैने वह पवित्र भोजन ऐसे व्यक्ति को दिया जो कि आपको गाली देता है और  आपमें विश्वास नहीं करता। उसे सबक़ सिखाइए।”

भगवान ने कहा मेरे बेटे तुमने क्या किया? मैं उस व्यक्ति को ७० वर्ष से खिला रहा था बिना उसे जाँचे और तुम उसे एक बार भी न खिला सके।

आपने अक्सर  किसी की सहायता किए बिना स्वयं को किसी और को जांचता हुआ पाया होगा  ? मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि हमारा मस्तिष्क बिना अधिक प्रयत्न के  हमारे चारों ओर की बातों का अर्थ निकालने का प्रयास करने के लिए  रूढ़िवादिता पर बहुत अधिक  निर्भर रहता है । इसलिए यह चीज़ों को आरम्भ से नहीं समझ पाता। और आपको  कोई भी दान  करने के पूर्व उस पर  विचार करने का (शायद जाँचने  का अधिकार प्राप्त है।) लेकिन यही करुणा के बारे में नहीं कहा जा सकता, यह  एक भाव है जो कि आपको  अपने हृदय की गहराई में अनुभव होता है और आपको उसी प्रकार काम करने के लिए प्रेरित करता करता है।

आज हालाँकि मैं करुणा के बारे में बात नहीं कर  रहा हूँ बल्कि कुछ उस बारे में कह रहा हूँ जो कि मूलतः  आतिथ्य सत्कार और दया है। यह अविश्वसनीय ढंग से तेज़ी से भागने वाले  संसार में जहाँ विश्वास आर्कटिक गलेशियर की भाँति  खिसक रहा है,  हममें से प्रत्येक को इस संसार को अधिक धैर्यवान, सहनशील और दयालु स्थान बनाने थोड़ा प्रयास करने हेतु प्रेरित करती है । अपने चारों ओर  देखिए और आप पाएँगे कि अधिकांश लोग न केवल जल्दी में हैं बल्कि वे बेचैन भी हैं। हवाई अड्डे पर, रात्रि भोजन में, रास्ते पर हमारे पास अन्य व्यक्ति के लिए धैर्य या समय नहीं है।हम हमारे गैजेट के ऊपर निरर्थक चीज़ें करते हुए घंटों बिता सकते हैं। लेकिन जिसे हमारी ज़रूरत है उसके लिए हमारे पास एक मिनिट नहीं है।

भारत में एक समय ऐसा था जब लोग अपने घर के प्रवेश द्वार पर लिखा करते थे “अतिथि देवो भव” अर्थात अतिथि भगवान है। क्योंकि संस्कृति  बदलने लगी इस कारण धीरे धीरे चूँकि लोग समाज के हित के स्थान पर अपनी रुचि पर ज़्यादा महत्व देने लगे इस कारण  अब अधिकतर घरों पर अतिथि देवो भव नहीं लिखा रहता इसके स्थान पर उन्होंने इसे नमस्ते से स्थानांतरित कर दिया। जो इस बात का संकेत था, कि “आप और मैं एक ही आत्मा हैं। आप ( एक अतिथि की भाँति ) भगवान नहीं हो सकते। लेकिन आप कम से कम मेरी तरह अच्छे हो सकते हैं। इसलिए आप मेरा सम्मान पाने के अधिकारी हैं।” जैसे जैसे और अधिक समय व्यतीत होता गया पश्चिमी जगत की भौतिक प्रगति की चमक दमक ने जगह ले ली और अब लोग  स्वागत (welcome) का संकेत लगाने लगे। जो यह कहता है आप और मैं अब एक व्यक्ति नहीं रहे और स्वयं को भगवान समझने का साहस न करें। लेकिन फिर भी आपका हमारे घर में स्वागत है, जिसे मैने अपने ख़ून पसीने से बनाया है।देखिए मैं  कितना सफल हूँ।

कुछ और समय बीता और लोग इस झूठे  विश्वास के साथ  कि ‘ख़ुशी पूर्णतया व्यक्तिगत  लक्ष्य है या जबकि संसार में मेरे चारों ओर महान असमानता है, उसके  बाद भी मैं ख़ुश रह सकता हूँ’ अपने जीवन का पीछा करने में व्यस्त हो गए। अब दीवारों पर मुख्य रूप से और लोगों को आमंत्रित करता हुआ स्वागत(welcome ) का संकेत नहीं रहा इसके स्थान पर इसने पैरपोश पर स्थान ले लिया। जैसे कि कह रहा हो कि ठीक है अब आप यहाँ आए हैं तो अंदर आइए, मैं देखूँगा कि मैं क्या कर सकता हूँ । और मेरा व्यवहार मैं कैसा अनुभव करता हूँ, उस पर आधारित होगा  यह थोड़े समय तक चलता है।अब दृश्य थोड़ा भिन्न है। अब आप बहुत मुश्किल से कहीं स्वागत (welcome ) का संकेत बाहर दीवार या  पैरपोश पर पाएँगे,  अतिथि देवो भव या नमस्ते को तो भूल जाइए। आज हम गेट पर एक बड़ा बोर्ड रखते हैं जिस पर लिखा रहता  है “कुत्तों से सावधान”।

सार यह है  कि दयालु बनें, यदि यह कठिन है तो समानुभावी  बनें। यदि यह भी कठिन हो तो दूसरों के प्रति संवेदनशील बनें ( यह सजग बन कर किया जा सकता है।) यदि इन सबमें  से कोई भी पहुँच में न हो तो आप विनम्र बन सकते हैं। यदि यह भी असफल हो जाए तो सभ्य बनें । यह भी कठिन है ,तो कम से कम  मृदुभाषी बनें। बहुत कठिन है? तो कम से कम आनेवालों का आदर करने वाले  बनें। ठीक है  अतिथि देवो भव  नहीं  लेकिन कुत्तों से सावधान तो बिलकुल  ठीक नहीं है। मैं ऐसा अनुभव करता हूँ कि, किसी भी हाल में मालिकों से सावधान  यह अधिक उपयुक्त है।

मुल्ला नसीरूद्दीन के लिए एक समृद्धशाली व्यक्ति की लड़की को देखने गया। मिलने का स्थान नियत हो गया और मुल्ला  अपनी पत्नी से मिलने के लिए बहुत उत्सुक था और वह तैयार होकर,दो लैम्प  लेकर घर से बाहर निकला।उसके पिता ने पूछा तुम दो लैम्प लेकर कहाँ जा रहे हो?

क्यों ! मैं अपनी होने वाली दुल्हन को देखने जा रहा हूँ।

पिता ने उसकी दाढ़ी को सहलाते हुए कहा मैं जब तुम्हारी  आयु का था तो इतना बहादुर था और प्रेम में पागल था कि मैं जंगल में अंधकार में तुम्हारी माँ से मिलने के लिए दौड़ता हुआ चला गाय था।

कोई आश्चर्य नहीं अब्बू मुल्ला ने कहा “ देखो आपने क्या प्राप्त किया?

यदि आप अंधेरे में अपने जीवन में चलेंगे तो आप आपके चारों ओर के सौंदर्य को नहीं देख पाएँगे। और कभी कभी जब जीवन आपको  अंधकार भरे रास्तों को पार करने हेतु विवश करेगा ।तो ऊपर ज़रूर देखें जहाँ  असीम सौंदर्य के साथ लाखों सितारे दमक रहे हैं । जब तक कि आप नए ढंग से सोचने के तरीक़ों के प्रति खुले नहीं होंगे, आप अपने हृदय की गहराइयों में नहीं उतर पाएँगे या  अपने अस्तित्व  को खोज नहीं पाएँगे।  चेतना के अनाधिकृत ब्रह्मांड में उड़ान भरें उस उच्च सजगता में आपको संसार को बस एक भिन्न दृष्टिकोण से देखना होगा। और यही अंत में आध्यात्मिक प्राप्ति होगी “एक नवीन दृष्टिकोण प्राप्त करना जिससे कि आप उसी संसार में रहें और फिर भी जीवन का  भिन्न प्रकार से  विवेचन  करें।”

यह स्वयं  और जो आपके आस पास हैं उनका सम्मान करने से , प्रेम सहित करुणा का अभ्यास करने से और विनम्र बनने से आरम्भ होता है।कुत्तों से न सावधान हों , यदि सावधान होना है किसी से तो  विचारों से सावधान हों।भले  बनें।

शांति

स्वामी