मेरे सन्यास लेने के कुछ वर्ष पूर्व, एक समय उत्तर भारत में अत्यंत ठंड पड़ी। ठंड के कारण कईं बेघर व्यक्तियों की मृत्यु हुई। मेरे पिता से प्रेरित हो कर मैं ने समाज के लिए कुछ करने का निर्णय लिया। मेरी कंपनी के एक वरिष्ठ प्रबंधक, जो मेरे एक अच्छे मित्र थे, उन्होंने और मैं ने निर्धन एवं बेघर व्यक्तियों को कंबल वितरित करने का निर्णय लिया। परंतु हम किसी अपरिचित संगठन को कंबल नहीं देना चाहते थे। जिन व्यक्तियों को वास्तविक रूप से आवश्यकता थी हम उनके हाथों में कंबल देना चाहते थे। हम ने लगभग पन्द्रह दर्जन कंबल खरीदे। हमारे एसयूवी वाहन में हम एक समय में लगभग सत्तर कंबल रख सकते थे। मेरा मित्र, उसकी बहन, हमारे ड्राइवर और मैं आधी रात को वाहन में बैठ गये। हम एक प्रमुख शहर में थे, जो एक औद्योगिक शहर था, और हम उसकी सड़कों पर वाहन चलाने लगे।

वाहन के संकेतक के अनुसार बाहर का तापमान तीन डिग्री सेंटीग्रेड था। कोहरे के कारण स्ट्रीट लाइट भी धुँधले से दिखाई पड़ रहे थे। यहाँ तक कि गलियों में पाए जाने वाले कुत्ते एवं गाय भी छुपे हुए थे। एक दर्दनाक सन्नाटा और ठंड थी। जैसे जैसे हम चारों ओर वाहन में जाने लगे, हमे अत्यंत दुखदायी दृश्य दिखे। विभिन्न स्थानों पर फुटपाथों पर बेघर व्यक्ति पड़े थे। कुछ लोगों ने अपने आप को बोरियों में लपेटा था, कुछ ने चपटे हुए गत्ते के बक्सों का प्रयोग किया, और कुछ ने समाचार पत्रों से अपने आप को लपेटा हुआ था। इन में वृद्ध, युवा, पुरुष, महिला, बच्चे एवं शिशु सभी शामिल थे। उन में से एक व्यक्ति भी अपने पैरों को पूरी तरह से फैला कर नहीं सो रहा था। सब लोग शरीर की गर्मी को बचाने के लिए सिकुड़ कर सो रहे थे। हम चारों वाहन के हीटर की सुविधा का प्रयोग कर रहे थे, परंतु सभी स्तब्ध थे तथा अपने आप को दोषी महसूस कर रहे थे। ऐसे दृश्य हमने पहले भी देखे थे किंतु पहली बार इतने ध्यान से देख रहे थे।

हम वाहन से बाहर उतरे और कुछ व्यक्तियों को जगा कर उन्हें हमने नए कंबल दिए। कुछ व्यक्ति हमे देख कर अत्यंत प्रसन्न हुए, कुछ रोने लगे, कुछ लोगों ने सोचा कि हम पुलीस हैं और उन्हें एक सार्वजनिक जगह पर सोने से मना करने वाले थे और उन्हें वहाँ से हटाने के लिए आए थे। कुछ ने सोचा कि हम उनके साथ परिहास कर रहे थे, कुछ नशे में थे और उठ नहीं सके तथा कुछ व्यक्तियों ने एक से अधिक कंबल की मांग की। किसी ने भी हमसे धन या अन्य वस्तु नहीं मांगे। वे कंबल पाने पर बहुत ही संतुष्ट लग रहे थे।

उनके वस्त्र फटे हुए एवं मैले थे, बाल उलझे हुए, शरीर अस्वच्छ – मानो वर्षों की पीड़ा और पसीना शरीर पर स्थायी रूप से जम गया हो। परंतु उनकी आँखों में शांति एवं स्वीकृति थी। कंबल मिलने पर उन सब के चेहरों पर आभार और संतोष की मुस्कान थी। कुछ ने तुरंत कंबल को खोला और शरीर पर लपेट लिया। उनके यह करने पर हमें इतनी संतुष्टि मिली जिस को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। कुछ व्यक्तियों ने उसका तकिये के रूप में उपयोग किया, संभवत: इसलिए क्योंकि कंबल नया था अथवा वे अगले दिन बाज़ार में उसे बेचना चाहते थे। परंतु वह उसका क्या करते हैं यह मुख्य नहीं था। हमने सोचा कि हमारा जो कर्म था वह हमने पूरा कर दिया।

उनमें से एक दृश्य ने मुझे असहनीय पीड़ा पहुँचाई। हमे कंबल बांटते हुए देख कुछ व्यक्ति दौड़ते हुए हमारी वाहन की ओर आए। उस समूह में एक लड़की थी जो विकलांग थी। वह अन्य व्यक्तियों के समान तीव्रता से दौड़ने का प्रयास कर रही थी, इस भय से कि हम कहीं वहाँ से चले ना जाएं अथवा कंबल रिक्त ना हो जाएं। भागने के प्रयास में वह ठोकर खा कर नीचे गिर गई। उसकी अवस्था देख कर हमारी आँखों में लगभग आँसू आ गए। जब वह उठी और हमारे समीप आई, हमे ऐसा प्रतीत हुआ कि वह मानसिक रूप से भी विक्षिप्त थी। हमसे वह दृश्य सहा नहीं जा रहा था। हमने शीघ्र कंबल बांटे और वहाँ से चल दिए। मैं कंबल वितरित करने के लिए फिर कभी नहीं गया क्योंकि मुझ में इस प्रकार का दुख देखने की क्षमता नहीं थी। मेरे मित्र और उसकी बहन ने एक और रात को शेष कंबल वितरित किए।

हम घर पहुँचे और जब मैं ने तकिये पर अपना सिर रखा और रजाई ओढ़ी, मैं ने छत की ओर देखा। कमरा सुसज्जित एवं सुविधापूर्ण था। कमरे को गरम करने के लिए हीटर था तथा एक संलग्न शौचालय था। सब कुछ एक सपने की भांति लग रहा था। मैंने सोचा – “वाह! मेरे सिर पर एक छत है। अवश्य मैं ने कोई अच्छे कर्म किए होंगे जिस के कारण मुझे ये सब प्राप्त हुआ।” उन व्यक्तियों का चेहरा बारंबार मेरी आँखों के सामने आता रहा। मैं ने सोचा कि छत नहीं होना तो एक बात है, परंतु अन्य सभी आवश्यकताओं से रहित जीवन कितना कठिन होगा। शौचालय की अनुपलब्धता में वे कैसे जीवन व्यतीत करते होंगे, वे भोजन कहाँ और कैसे पकाते होंगे, उनके पास बर्तन रखने की यहाँ तक कि कंबल रखने की भी वास्तव में कोई जगह नहीं होगी, कपड़े धोने की कोई जगह नहीं होगी। पानी पीने के लिए वे कहाँ जाते होंगे, क्या वे अपने दाँतों को ब्रश करते होंगे या फिर उस के लिए उन के पास पैसे नहीं होंगे। शाम को थक कर आराम करने वे कहाँ जाते होंगे – उनके पास तो कोई घर ही नहीं थे। ऐसे कईं अनगिनत प्रश्नों से मेरा सिर फटने लगा।

मुझे अहसास हुआ कि कृतज्ञ होने के लिए मनुष्य को अधिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है। कृतज्ञता भौतिक वस्तुओं की विशालता अथवा आप को क्या क्या चाहिए उस पर निर्भर नहीं है। यह तो केवल मन की एक अवस्था है, ह्रदय की अभिव्यक्ति, सहिष्णुता के प्रति एक प्रतिबद्धता, प्रसन्न रहने का एक संकल्प, शांति की एक भावना, संतोष का एक मनोभाव, पूर्ति की एक अनुभूति।

यदि आप का यह मानना है कि कृतज्ञ बनने हेतु आप के जीवन में कुछ वस्तुओं का होना आवश्यक है, तो आप को सदैव कृतज्ञ बनने में कठिनाई होगी क्योंकि आप के पास चाहे जितनी अधिक वस्तुएं भी क्यों ना हों फिर भी आप को सदैव ऐसा प्रतीत होगा कि आप के पास जो है वह पर्याप्त नहीं है। आप को जो कुछ सुख देता है उस की प्राप्ति के लिए परिश्रम अवश्य करें किंतु आप के पास जो पहले से है उस के लिए आभारी रहें।

जब आप कृतज्ञ बन कर जीते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप ने शांति की एक अदृश्य कंबल ओढ़ ली हो। उस के कारण आप के चेहरे पर एक अद्भुत तेजस आ जाती है तथा आप प्रसन्न, उज्ज्वल एवं करुणामय बन जाते हैं।

भावनात्मक परिवर्तन की राह पर, सबसे पहली भावना कृतज्ञता है। अन्य सभी आदतों की भांति इस का भी अभ्यास किया जा सकता है और इसे भी सीखा जा सकता है। फिर किसी लेख में मैं कृतज्ञता के वास्तविक अभ्यास के विषय में लिखूँगा।

शांति।
स्वामी