कुछ दिनों पहले किसी ने, जो किसी संगठन की सीढ़ी के सबसे निम्न सोपान पर था, मुझे बताया कि कार्यस्थल पर अन्य व्यक्तियों के साथ उसका दिन सर्वदा दुष्कर रहता है। “ऐसा प्रतीत होता है कि मैं सदैव अपने विरोधियों को आकर्षित करता हूँ।” उसने कहा “मुझे कोई पसंद नहीं करता।”

“किंतु एक दिन” वह बोला “मैंने रेडियो पर कुछ सुंदर सुना! उसमें कहा गया था ‘नौकरी है तो नाराज़गी क्यों?’ इस एक बात ने मेरे सम्पूर्ण दृष्टिकोण को परिवर्तित कर दिया और फिर मैंने इस बात की परवाह करनी छोड़ दी कि दूसरे मुझे पसंद करते हैं या नहीं। मुझे मात्र अपना कार्य करना है।”

मुझे उसकी बुद्धिमत्ता पर आश्चर्य हुआ और मैंने अपने मन में बुद्धिमत्ता के इस असाधारण, अमूल्य अंश को अंकित कर लिया। ‘नौकरी है तो नाराज़गी क्यों?’ यही सत्य है। यदि यही मेरा कर्त्तव्य है, तो मेरे पास निराश होने का कोई कारण नहीं है। मुझे वही तो करना है, जिसके लिये मुझे रखा गया है।

“फिर भी, मेरी जिज्ञासा है,” उसने कहा “लोग मुझे पसंद क्यों नहीं करते? मेरी नीयत भली है फिर भी मैं विरोधियों को क्यों आकृष्ट करता हूँ?”

यह केवल उसकी ही व्यथा नहीं बल्कि मैं जिन व्यक्तियों से मिलता हूँ, उनमें से अधिकतर के आशय भले होते हैं किंतु फिर भी वे विरोधी स्थितियों को आकृष्ट करते (या कर लेते) हैं। यह प्रश्न ध्यान देने योग्य है। चलिए पहले मैं एक छोटी सी कहानी कहता हूँ।

एक छोटे से गाँव में एक ज्ञानी ब्राह्मण रहता था। उसका स्वप्न था कि उसके पांडित्य की मान्यता के आधार पर, सभी उसे पंडित जी कहकर बुलाएं। वह पारम्परिक वस्त्र पहनता, विद्वत्ता-पूर्वक बातें करता, संस्कृत भाषा में बात करता, किंतु वह चाहे जितना भी प्रयास करता, कोई भी उसे पंडित जी न कहता। सम्मान का यह अभाव उसे सदैव काटता रहता।

निराश, वह बीरबल के पास पहुँचा जो कि अकबर के दरबार में सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति था। उसने बीरबल से पूछा कि क्या ऐसी कोई संभावना है कि लोग उसे ‘पंडित जी’ कह कर पुकारने लगें।

“यह तो सरल है” बीरबल ने कहा “यदि तुम मेरे कहे अनुसार करो तो कुछ ही दिनों में सभी तुम्हें पंडित जी कहने लगेंगे।” और उसने अपनी योजना बताई।

योजना अनुसार, दूसरे दिन वह ब्राह्मण एक उद्यान में टहल रहा था, जहाँ कुछ बच्चे खेल रहे थे। बीरबल पीछे से आया और उसने ब्राह्मण को पंडित जी कह कर बुलाया। आग बबूला होकर ब्राह्मण ने अपनी छड़ी उठाई और बीरबल को मारने के लिये दौड़ा। यह प्रतिक्रिया देखकर बच्चे आनंदित हुए और उन्होंने यह अनुमान लगाया कि इस व्यक्ति को पंडित कहलाना नापसंद है।

शीघ्र ही सारे बच्चे उसे पंडित जी कहकर चिढ़ाने लगे। हर समय जब वह उसे पंडित जी कहते वह वैसे ही हिंसक प्रतिक्रिया देता। यह बात जंगल में आग जैसे फैल गयी कि पंडितों जैसे वस्त्र पहना एक व्यक्ति, ‘पंडित’ कहे जाने पर चिढ़ता था। इससे पहले कि वह कुछ जान पाता, सभी उसे पंडित जी कहकर पुकार रहे थे।

कुछ माह पश्चात उसने प्रतिक्रिया देनी बंद कर दी, फिर भी लोग उसे पंडित जी ही कहते। पहले तो धृष्टतापूर्वक, फिर सामान्य रूप से, और अंततः बीतते समय के साथ श्रद्धापूर्वक।

मेरा मानना है कि हम जीवन में अधिकतर वस्तुओं को इसी प्रकार आकृष्ट करते हैं। जब भी हम कोई हिंसक, असंगत, आकस्मिक, तीखी प्रतिक्रिया देते हैं, तो हम उस परिस्थिति की ओर स्वभावतः अपना ध्यान आकर्षित कर लेते हैं। हम नकारात्मकता पर जितना ध्यान देते हैं, उतनी ही ऊर्जा अपनी विपत्तियों एवं अशांत भावनाओं को दृढ़ करने में (न कि समाप्त करने में) लगा देते हैं।

एक पार्टी में जहाँ हर कोई एक दूसरे से ऊँचे स्वर में बातचीत कर रहा है, पीछे संगति का शोर है, एक ग्लास को फर्श पर गिरा कर तोड़ दें (यह केवल प्रतीकात्मक उदाहरण है, कृपया ऐसा न करें) और आप एक क्षण में सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेंगे। यह मन भी ऐसे ही काम करता है। उसे इतनी शीघ्रता से कुछ भी आकृष्ट नहीं करता, जितना की डर। जिस दिन आप इस ध्यान को अपने चारों ओर अच्छाई देखने की दिशा में मोड़ना जान जाएंगे (अपने अस्तित्व के सकारात्मक पहलुओं की ओर) फिर आप अपने जीवन में बुरे लोगों को आकृष्ट नहीं करेंगे। बुरे लोगों को हम तभी आकृष्ट करते हैं जब हमारी स्व सीमित धारणाएँ (तथा निस्वार्थ समर्पण की कमी) हमें अपनी प्रसन्नता दूसरों में खोजने को उकसाती है।

हमें तुष्टि इस बात से नहीं मिलती कि कितने अधिक व्यक्ति हमें चाहते हैं। यद्यपि इसका प्रभाव पड़ता है, किंतु ऐसा होना असंभव है कि सभी आपको चाहने लगें। यदि आप इस बात की चिंता करें कि सभी आपको चाहें तो आप जीत नहीं सकते। यह कोई सार्वजनिक मार्ग नहीं। अधिकतर व्यक्ति इतने व्यस्त हैं कि दूसरों की परवाह नहीं करते।

अपने जीवन में आप कितने संतुष्ट हैं, यह इस बात पर प्रत्यक्षतः आधारित है कि आप अपनी ऊर्जा का निवेश कहाँ कर रहे हैं। आप अपनी ऊर्जा नकारात्मकता में लगाएं और विध्वंशकारी विचार आपको नष्ट कर देंगे। आप रचनात्मकता में निवेश करें और सकारात्मक विचार आपके कुशलक्षेम को और बढ़ाएंगे। यही संक्षेप में आकर्षण का नियम है।

मैं आपसे अपने स्वप्नों को जानने के महान विचार की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं तो मात्र ध्यान आकर्षित करने की कला की ओर इंगित कर रहा हूँ। वह यह कि, आप जहाँ भी अपना ध्यान केंद्रित करेंगे, वहीं से आप ऊर्जा ग्रहण करेंगे। इसलिये जबकि विज्ञान ईश्वर की धारणा को नकारता है, प्रार्थना से अरबों लोगों को शक्ति मिलती है। उन्हें अपने विश्वास एवं परम्पराओं से शक्ति मिलती है। आप कितनी और किस प्रकार की ऊर्जा ग्रहण करते हैं, यह इस बात पर निर्धारित है कि आपके ध्यान-केन्द्र के विषय (या विश्वास) की गुणवत्ता, तीव्रता एवं कालावधि कितनी और कैसी है।

सारा विश्व भ्रमण करने वाले एक यात्री को किसी प्रकार एक दुर्लभ, असाधारण तोता मिला। वह पक्षी तीस भाषाएं बोल सकता था। यात्री ने तुरंत उसे अपनी माँ के पास यह सोच कर भेजा कि उन्हें यह उपहार पसंद आयेगा। कुछ दिनों पश्चात उसने तोते के विषय में अपनी माँ के विचार जानने के लिये उनसे बात की।

“सचमुच बहुत पसंद आया”, उसकी माँ ने कहा “वह स्वादिष्ट था”।
“क्या?” वह चिल्ला पड़ा “आपने उसे खा लिया? वह कोई ऐसा वैसा तोता नहीं था। वह तीस प्रकार की भाषाएं बोलता था।”
माँ ने कुछ देर चुप रहने के पश्चात कहा “ओह, तो फिर उसने कुछ बताया क्यों नहीं?”

हमारी बुद्धिमत्ता, हमारा ज्ञान किस काम का, यदि हम उसे अभिव्यक्त न कर पाएं? अपने विचारों से जूझते रहने की अपेक्षा कभी-कभी इतना ही पर्याप्त होता है कि विनम्रता से स्वयं को सुस्पष्ट बताएं, नम्रतापूर्वक निवेदन करें। बहुत सौम्यता से, बहुत नम्रता से। अधिकतर बार इससे काम हो जाता है। यह तो स्वभाविक है कि हमें जटिल लोगों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। जब आपको किसी चुनौती का सामना करना है तो भागने से आपका ध्यान हटेगा नहीं। अपने ध्यान की विषय-वस्तु से प्रेरणा लें, उसे प्रबल करें, संपर्क करें और उलझन को सुलझायें। हिंसात्मक प्रतिक्रिया से कुछ भी सार्थक नहीं मिलेगा।

आप जिसे प्रेम करते हैं वह जब तक है, आनंद उठाएं। और जब आपको कुछ ऐसा करना है जो आपको पसंद नहीं, जिसमें कोई आनंद नहीं, तो उसे कर्त्तव्य के समान देख कर चलें। याद रखें – ‘नौकरी है तो नाराज़गी क्यों’।

बस, आगे बढ़ें और कर्म करें।

शांति।
स्वामी