“मैं ध्यान करना चाहता हूँ ”, किसी ने मुझसे एक दिन कहा। “किंतु यह मार्ग मेरे लिए नहीं है। क्या ध्यान आत्मबोध का एकमात्र मार्ग है?”।
“ऐसा नहीं है।”, मैंने कहा। “किसी अन्य मार्ग से भी आप अवश्य स्वयं के सत्य का खोज कर सकते हैं।”
“किंतु जब आप कहते हैं कि अपने सत्य की खोज स्वयं करो तो इसका क्या अर्थ है? और ऐसा कैसे किया जाए?” उसने मेरे विडियो प्रवचन से संबंधित एक आदर्श-वाक्य के विषय में पूछा।

मुझे यह प्रश्न उचित लगा और मैं ऐसे कई व्यक्तियों से मिल चुका हूँ जिन्होंने इससे पूर्व इसी प्रकार के प्रश्न किए हैं। अंतत: शोरशराबों से भरे हमारे संसार में, जहाँ अनगिनत रास्ते एवं असंख्य विकल्प हैं, आखिर हम कैसे जानें कि इनमें से कौनसा मार्ग हमें अपने लक्ष्य की ओर ले जाएगा? अवश्य, यह उतना दुष्कर भी नहीं है जितना कि यह प्रथमतः प्रतीत होता है। मूलतः यह बोध महत्वपूर्ण है कि जीवन के सरल सत्य का बोध जटिल प्रारूपों से नहीं हो सकता। इस व्यक्ति के प्रश्न से मुझे एक संक्षिप्त जेन लघु कथा का स्मरण हुआ।

एक नौसीखीया दो वरिष्ठ भिक्षुकों से मिला जो झील के किनारे गहन ध्यान में बैठे थे। नये भिक्षुक ने किसी अन्य शिक्षक के प्रशिक्षण में कई वर्षों तक ध्यान का अभ्यास किया था किंतु इस मठ की ख्याति सुनकर उसने यहाँ आने का निश्चय किया।

ध्यान के बीच, वरिष्ठ भिक्षुकों में से एक अपने स्थान से उठा और बोला, “सूर्य की किरणें तेज हो रही हैं, अच्छा होगा यदि मैं अपना छाता ले आऊँ।” बड़ी सरलता से उसने जल पर पैर रखा और झील के ऊपर चलता हुआ एक पहाड़ी मैदान तक पहुँचा जहाँ उनकी झोपड़ी थी।

जैसे ही वह लौटा, दूसरे भिक्षुक ने कहा, “मुझे प्यास लगी है। मैं अपना जलपात्र लेकर आता हूँ।” वह भी उसी प्रकार सहजता से पानी पर चलकर गया और उसी प्रकार वापस भी आ गया।

नया भिक्षुक विस्मयामिभूत था किंतु स्पर्धा में पीछे हटना नहीं चाहता था। उसने कहा, “मैंने भी वर्षों ध्यान किया है। यह सरल है। मुझे देखो।” वह पानी की ओर चल पड़ा किंतु तुरंत झील में गिर पड़ा। वह पैदल कठिनाई से बाहर आया और उसने पुनः प्रयास किया किंतु पुनः उसने स्वयं को कमर तक गहरे पानी में चलते हुए पाया।

“क्या तुम्हें लगता है,” वरिष्ठ भिक्षुक ने दूसरे से कहा, “कि हमें उसे बताना चाहिए कि पैर रखकर जिन पत्थरों पर हम चलते हैं वे कहाँ पर हैं।”

जीवन के गहन सत्य के साथ भी कुछ ऐसा ही है। अधिकतर जिज्ञासुओं की सोचने की यही प्रवृति होती है कि अन्र्तदृष्टि किसी गुप्त, रहस्यपूर्ण जगह पर मिलती है या यह कोई आलौकिक संरचना है। वास्तविकता में यह हमारे नित्य प्रति के जीवन में है। उन छोटे-छोटे कार्यों में जो हम करते हैं (या नहीं करते)। इसके लिए पानी पर चलना सीखने की आवश्यकता नहीं, आवश्यकता है तो मात्र यह जानने की कि पैर रखने वाले पत्थर कहाँ हैं। सत्य तो यह है कि असाधारण के प्रति हमारा सम्मोहन हमें हमारे चारों ओर फैली साधारणता में बसे बाहुल्य सुंदरता की सम्पत्ति से वंचित रखता है।

बेंजामिन हॉफ ने अपनी सुंदर पुस्तक “द टाओ ऑफ पू” में इसे अनतराशा खंड़ कहा है। वह लिखते हैं, “अनतराशे खंड का सार यह है कि वस्तुओ की मौलिक सादगी में ही उनकी प्राकृतिक शक्ति निहित हेाती है, शक्ति जो कि बहुत शीघ्र नष्ट हो जाती है जब उस सादगी को बदल दिया जाता है।”

इसी पुस्तक में पू के शब्दो में टाओ आध्यात्मिकता पर व्याख्या करते हुए आगे कहते हैं “वह लक्षण जो किसी को वास्तव में भिन्न व विशिष्ट बनाता है, कुछ ऐसा है जिसे चतुराई कभी समझ नहीं सकती।” हमारी मौलिक सादगी की ओर लौटने हेतु यह आवश्यक है कि हम अपने मूल स्वभाव को खोजें। उन्होंने इसे कॉटलस्टन पाई कहा (ए.ए.मिलने की कविता विनी-द-पू से उद्वत) जहाँ पू विशिष्टता के सिद्धांत को इस प्रकार समझाता है –

कॉटलस्टन, कॉटलस्टन, कॉटलस्टन पाई
मक्खी क्या बने पक्षी
पर पक्षी उड़े ज्यूँ मक्खी
तुम पूछो मुझसे पहेली
जवाब मेरा यही
कॉटलस्टन, कॉटलस्टन, कॉटलस्टन पाई

कॉटलस्टन, कॉटलस्टन, कॉटलस्टन पाई
क्या मछली बजाए सीटी
और न ही बजाऊँ मैं
तुम पूछो मुझसे पहेली
जवाब मेरा यही
कॉटलस्टन, कॉटलस्टन, कॉटलस्टन पाई

कॉटलस्टन, कॉटलस्टन, कॉटलस्टन पाई
क्यों मुर्गी करे ऐसा
यह नहीं जानूँ मैं
तुम पूछो मुझसे पहेली
जवाब मेरा यही
कॉटलस्टन, कॉटलस्टन, कॉटलस्टन पाई

“मक्खी क्या बने पक्षी, पर पक्षी उड़े ज्यूँ मक्खी”। बहुत सरल है। क्या यह स्पष्ट नहीं है? फिर भी आप यह जान कर आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि कितने लोग प्रतिदिन अपने जीवन में इस साधारण से नियम का उल्लंघन करते रहते हैं और चौकोर कील को गोल सुराख में समाने का प्रयत्न करते रहते हैं। इस स्पष्ट वास्तविकता को अनदेखा करते हुए कि चीजें वैसी ही हैं जैसी कि वे हैं।

किसी वस्तु को वैसा बनाने का प्रयास करना जैसा कि वह नहीं हैं निरर्थक है। हर वस्तु का अपना स्थान और कार्य है, जिसमें लोग भी शामिल हैं, चाहे वे इसे महसूस न करें। इसलिए वे गलत नौकरी करते हैं या गलत विवाह या संबंध में बने रहते हैं। आपको अपने आंतरिक स्वभाव को जानने एवं उसका सम्मान करने की आवश्यकता है। जब आप ऐसा करते हैं तो आप जानते हैं कि आप कहाँ से संबद्ध है और कहाँ से नहीं।

“एक मछली सीटी नहीं बजा सकती और मैं भी सीटी बजाना नहीं जानता” एक समझदार मन से निकले इस कथन का अर्थ होगा, “मेरी कुछ सीमाएं हैं और मुझे ज्ञात है कि वे क्या हैं।” ऐसा मन इस के अनुसार ही कार्य करेगा। सीटी न बजा सकने में कुछ भी गलत नहीं है, विशेषकर यदि आप एक मछली हैं तो। किंतु बहुत से कार्य गलत हो सकते हैं जब आप उस कार्य को आँख बंदकर करना चाहें जिसके लिए आप बने ही नहीं। मछलियाँ पेड़ पर नहीं रहतीं और चिड़ियाँ अपना अधिकतर समय पानी के अंदर नहीं बितातीं यदि वे ऐसा करना भी चाहें तो भी। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें परिवर्तन या सुधार को रोकने की आवश्यकता है। इसका मात्र यही अर्थ है कि हमें यह देखने की आवश्यकता है कि आखिर स्थिति है क्या। समझदार अपनी सीमाओं को जानते हैं मूर्ख उसे अनदेखा करते हैं।

“मुर्गी ऐसा क्यों करे यह मुझे नहीं पता।” आखिर एक मुर्गी जो भी करती है क्यों करती है? तुम्हें नहीं पता? मुझे भी नहीं पता। किसी को भी नहीं पता। जनन-कोशिका में रहने वाला जीन नामक तत्त्व? डी.एन.ए.? सहज ज्ञान? इसका अर्थ है कि हमें नहीं पता। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हमें जानने की आवश्यकता भी नहीं। हमें काल्पनिक दार्शनिक बनकर, अनावश्यक प्रश्न पूछने की एवं निरर्थक उत्तर प्राप्त करने की आवश्यकता भी नहीं है। आवश्यकता है तो इस बात की कि हम अपना आंतरिक स्वभाव पहचानें एवं स्थिति व वस्तुओं के साथ वैसे ही पेश आएं जैसी कि वे हैं।

कॉटल्स्टन पाई हमारे आंतरिक स्वभाव की ओर संकेत करता है जो कि उत्तर है उन बहुत सी पहेलियों का जिनका सामना हम दैनिक स्तर पर करते हैं। उदाहरणार्थ आप का मित्र फ़ुटबॉल क्यों पसंद करता है जबकि आपको वालीबॉल पसंद है? आपको नाश्ते में नमकीन क्यों पसंद है जबकि आपके मित्र को सुबह-सुबह मीठा खाना पसंद है?

कोई भी जो आपको यह बताता है कि ध्यान या कोई विशेष साधना ही आपको आपके सत्य तक पहुँचाने की एकमात्र विधि यहाँ तक कि निश्चित विधि है, वह संभवत: एक अज्ञानी कथन दे रहा है जिसका मूल्य आपको चुकाना पड़े। सत्य तो यह है कि गहन चिंतन के पश्वात आपको यह बोध होगा कि आप ही स्वयं को सबसे अच्छी तरह जानते हैं, ना की कोई और। और यह कि इस स्वबोध और समझ से ही आप जान पाएंगे कि आपको अपने जीवन में या जीवन का क्या करना है। जब आपको यह ज्ञात हो जाए तब आप तदानुसार एक परामर्शदाता या गुरू की खोज में निकल सकते हैं। यदि आप नितांत बेतैयार ही बाहर निकल पड़ें तो संभवत: आप किसी ऐसे के संरक्षण में पहुँच जाएं जिसके वादों से आपको कुछ भी प्राप्त न हो।

हममें से प्रत्येक कुछ विशेष अंतर्निहित प्रवृत्तियों के साथ जन्मा है। हमें हमारे पालन-पोषण, संस्कृति और अनुकूलन के द्वारा एक विशेष आकार दिया जाता है। हम अपनी महत्त्वाकांक्षाओं एवं कामनाओं के कारण से विभिन्न वस्तुओं के लिये स्पर्धा करते हैं। इसलिए यदि हम स्वयं के लिये एक पथ का चयन करें जिसमें हमारी सीमाओं का ध्यान रखते हुए हमारे सामर्थ्य का उपयोग किया जाये तो इन सब के लिए कम प्रयास की आवश्यकता होगी। क्योंकि अभिप्राय निरंतर स्वयं से संग्राम का नहीं है वरन स्वयं के साथ मिलकर काम करने का है।

और यही मेरे उस कथन का अर्थ है जब मैं कहता हूँ कि अपने सत्य की खोज स्वयं करें। यदि मैंने या अन्य किसी ने आपसे यह कहा है (आपको स्वयं को जानने में मदद करने से पूर्व) कि ध्यान करें और सब कुछ ठीक हो जाएगा या मंत्र जाप करें और सारे समाधान हो जाएंगे एक दिन आप जान जाएंगे कि यह तो सत्य था ही नहीं। एक गुरू का कार्य प्रवचन देना या आज्ञा देना नहीं है वरन यह आपको स्वयं को देखने में मदद करना है जिससे आप उस पथ पर चल सकें जो आपको आपके ही बेहतर स्वरूप की ओर ले जाए।

“पिताजी, क्या यह सत्य है” एक पुत्र ने अपने पिता से कहा “कि दुनिया के कुछ हिस्सों में, एक व्यक्ति अपनी पत्नी को विवाह होने तक बिल्कुल नहीं जानता?”
“पुत्र” पिता ने आह भरते हुए कहा “यह हर जगह का सत्य है।”

आप कितना कुछ कर सकते हैं यह आप तब तक नहीं जान पाएंगे जब तक आप स्वयं को जान न लें। यह जानना कि आप क्या हैं यह जानने से असीम रूप से प्रबल हैं कि आप क्या हो सकते हैं। स्वबोध की सम्पूर्ण यात्रा का यही सार है – एक ऐसी स्थिति पर पहुँचना जहाँ आप स्वयं को स्पष्ट रूप से देखते और समझते हैं। तब आप जान पाएंगे कि आपका निर्वाण तपते सूरज के नीचे, व्यस्त सड़कों पर गरीबों को भोजन कराने में है या हिमालय के एक वृक्ष तले ध्यान करने में।

कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन पाई
एक बुद्ध आत्मा जो आनंदोत्सव मनाए
वह परमानंद कोई कैसे पाए
एक ही बार, पूछो तो सही
जवाब होगा यही
कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन पाई

कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन पाई
ध्यान लगाऊँ मैं या करूँ मंत्र जप
भक्ति हो पथ तुम्हारा या हो सेवा पथ
मुझसे फिर से पूछो
जवाब होगा यही
कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन, कॉटल्स्टन पाई

स्वयं को जानें और फिर उसके लिए अपना सर्वस्व दे दें। अपने सत्य की खोज स्वयं करें।

शांति।
स्वामी

मूल अंग्रेज़ी लेख - Cottleston Pie