मैं आरंभ करता हूँ बुद्ध के जीवन से ली गयी एक कहानी से। वही बुद्ध जो कि संसार त्यागने से पूर्व सिद्धार्थ के नाम से जाने जाते थे।

सिद्धार्थ व उसका चचेरा भाई देवदत्त पूरा एक दिन वन में बिताने निकल पड़े। वे छायादार वृक्ष के नीचे आराम करते तो कभी सरोवर में खेलते। सेवक सेविकाएं उनका लालन-पालन कर रहे थे। उनकी सुविधा एवं सुरक्षा हेतु राजा के अनुगामी उपस्थित थे। हालांकि उन्होंने शिकार न करने की आपसी सहमति बनायी थी फिर भी देवदत्त अपना धनुष-बाण साथ ले आया था।

जब वे एक सरोवर के किनारे पड़े हुए थे, पास ही में एक हंस भूमि पर उतरा। सुनहरा अवसर देख, देवदत्त ने अपना धनुष चढ़ाया और हंस पर निशाना साधा। सिद्धार्थ ने उसे रोकने का प्रयास किया पर देवदत्त अटल था। कुछ क्षण बीते और इसी बीच हंगामा सुनकर हंस ने उड़ान भरी। दुर्भाग्यवश देवदत्त एक निपुण धनुर्धर था। उसने बाण छोड़ दिया और बाण अपने निशाने पर लगा। पक्षी को गिरता देख, लम्बे डग भरते हुए सिद्धार्थ ने बहुत तीव्रता से उसकी ओर छलांग लगाई।

चमत्कारिक रूप से वह हंस अभी भी जीवित था। उसका शरीर शिथिल पड़ रहा था जैसे उसके प्राण निकलने ही वाले हों। उसकी आँखें बंद हो रही थीं और घाव से रक्तस्राव हो रहा था। सावधानी से राजकुमार ने बाण खींचकर बाहर निकाला तथा उसके घाव पर कुछ पत्तियों का शीतल रस निचोड़ कर लगाया जिससे रक्तस्राव बंद हो सके। उसने अपने अनुगामी से एक चिकित्सक को बुलाया तथा अपने कोमल हाथों से हंस के घावों पर जड़ी-बूटियों का लेप लगाया।

इससे उस भयभीत पक्षी को राहत मिली। उसने धीरे से अपने पंख फड़फड़ाए। किंतु अत्यधिक दर्द के कारण वह उड़ने योग्य न था। वह सिद्धार्थ के कोमल हाथों में पड़ा आराम करता रहा। देवदत्त को यह रास न आया। उसे लगा जैसे उससे उसका शिकार छीन लिया गया हो।

“इसे मुझे दे दो” उसने सिद्धार्थ से कहा, “इसे मैंने मारा है।”
“कदापि नहीं देवदत्त” राजकुमार ने उत्तर दिया, “मैंने इसे बचाया है।”
“यह बेतुकी बात है” देवदत्त चिल्लाया। “यह मेरा पक्षी है। मैंने अपने बाणों से इसे नीचे गिराया है।”
“यदि तुमने इसे मार दिया होता, तो यह तुम्हारा होता” हंस को अपने और भी समीप लाते हुए सिद्धार्थ ने कहा। “किंतु यह जीवित है, इसलिए यह मेरा है।”

जब बहस का अंत नहीं किया जा सका तो उन्होंने एक मंत्री की सलाह ली जो राजसी अनुरक्षक के एक सदस्य थे। उन्होंने सुझाव दिया कि पास के वन में एक साधु रहते हैं और इस परिस्थिति पर निर्णय लेने के लिये उनसे बेहतर कोई नहीं। जैसी कि परम्परा थी फलों-फूलों की भेंट लेकर वे साधु के पास गये। उन्हें नमन किया और वस्तु-स्थिति से अवगत किया।

“इसमें कोई संदेह नहीं” साधु ने निष्कर्ष निकाला। “जीवन उसी का होता है जो उसे बचाने का प्रयास करता है। उसे हानि पहुँचाने वाले का यह नहीं हो सकता। इसलिए यह हंस सिद्धार्थ का है।”

यह एक सादी कहानी है किंतु विचार किया जाए तो बुद्धिमत्ता सरलता में रहती है। वास्तव में बुद्धिमत्ता केवल सरलता में ही रहती है। बुद्धिमान व्यक्ति सीधे साधे व निष्कपट होते हैं। व्यक्तिगत रूप से मैंने यह पाया कि एक सुंदर उद्देश्यपरक जीवन जीने के लिये जो परम बुद्धिमत्ता चाहिये वह इस कहानी में बड़ी शान से यूँ चमक रही है जैसे कि कोई मुकुट पर जड़ा रत्न चमकता है। एक वाक्य में इसे ऐसे कहा जा सकता है –

जीवन उन्हीं का है जो इसे प्रेम करते हैं।

आप जिसे प्रेम करते हैं उसकी रक्षा करते हैं। आप स्वाभाविक रूप से उसे बचाना चाहते हैं जिसकी आप रक्षा करते हैं। यदि आप जीवन को हानि पहुँचाते हैं तो फिर वह जीवन आपका नहीं रह जाता। यदि हंस को चयन करने दिया जाए तो आप को क्या लगता है कि वह किसके पास रहेगा – देवदत्त या सिद्धार्थ? वह पक्षी सिद्धार्थ के पास सदैव प्रसन्न रहेगा। वह उसके पास ही रहना चाहेगा क्योंकि राजकुमार सिद्धार्थ ने उसकी रक्षा करने का प्रयास किया।

उसी प्रकार आपके जीवन का भी अपना एक जीवन है। यदि आप उसे प्यार करते हैं, उसका मूल्य समझते हैं तो वह आपके साथ ही रहना चाहेगा। वह आपका हो जाएगा। पर यदि आप उसे दुख पहुँचाएंगे तो वह आपसे दूर, बहुत दूर चला जाएगा। दयालु बनें, हमारी कहानी के राजकुमार के समान सौम्य बनें और जीवन का हंस आपके हाथों में जीवित हो उठेगा।

जिस प्रकार जब दूसरा व्यक्ति आपके प्रयासों की सराहना नहीं करता तो आप को ठेस पहुँचती है उसी प्रकार जीवन भी पीड़ित होता है जब वह जो भी आपके लिये कर रहा है उसकी सराहना करने के स्थान पर आप उसकी निंदा या विरोध करते रहें।

जीवन भयभीत व आहत हो जाता है जब आप उस पर ईर्ष्या, शिकायतों व स्वार्थ के तीर चलाते हैं। जितनी बार भी यह होता है जीवन आप को स्वयं से दूर कर लेता है। और जब आप का स्वयं का जीवन आपसे दूर हो जाता है तो फिर कोई भी व्यक्ति अथवा संसार की कोई भी वस्तु आप को सुखी नहीं कर सकती। बहुत समय तक तो कदापि नहीं। जीवन से मेरा तात्पर्य आपकी सांसों से नहीं अपितु जीवन के सार से है। शांति व परमानंद से है। अपने जीवन को उपेक्षित या प्रताड़ित करने का कोई अर्थ नहीं। क्योंकि उपेक्षा से अधिक कुछ भी आहत नहीं करता।

एक दूर देश का पर्यटक एक जैन भिक्षु से मिलने आया। भिक्षु ने उसे चाय पीने को दी। चाय के उस छोटे से प्याले का हैंडिल कागज़ की तरह पतला था। जैसे ही उस पर्यटक ने उसे पकड़ा वह टूट गया।

“आप लोग अपने प्याले इतने नाजुक क्यों बनाते हैं?” उसने थोड़ा कुंठित व लज्जित होकर पूछा।
“ऐसा नहीं कि ये प्याले नाजुक हैं” चाय का घूँट लेते हुए भिक्षु ने उत्तर दिया; “आप इसे संभालना नहीं जानते।”

मुख्य तत्व यह है कि आप अपना जीवन कैसे संभालते हैं न कि आप का जीवन कैसा होना चाहिये। जीवन तो अपने आप में वैसे का वैसा है। यदि आप इससे सहानुभूतिपूर्वक, कृतज्ञता व संवेदनशीलता से पेश आते हैं तो आप पाएंगे कि इसका हर तत्व सुंदर है और यह पूर्णरूपेण आपका है।

जीवन जैसा है, उसे उसी रूप में ही प्रेम करना जान लें क्योंकि हर पक्षी भिन्न गाना गाता है। उसको सुनना एवं उसकी सराहना करना सीखें। यह हास्यास्पद किंतु सत्य है कि जब जीवन ने आपके लिये जो भी नियोजित किया है आप स्वयं को उसी के इर्द-गिर्द व्यवस्थित करने लगते हैं, तो जीवन आपके अनुरूप चलने लगता है। यदि आप इसे आहत करते, इससे लड़ते रहते हैं तो जीवन पूर्णतया आपकी अनदेखी कर स्वयं को आपसे दूर ले जाता है। जीवन का पोषण करें, उसे प्यार करें, उसकी रक्षा करें और वह आपका हो जाएगा। तब वह आपके आदेश पर चलेगा।

आपके इस प्रश्न “जीवन तुम मुझे क्यों कष्ट दे रहे हो?” के उत्तर का आरंभ इस प्रश्न से होता है कि “आप जीवन को क्यों कष्ट दे रहे हैं?”

यदि आप वास्तव में किसी भी वस्तु को अपना बनाकर रखना चाहते हैं तो उसे कष्ट न दें।

शांति।
स्वामी