दो ऐसे प्रश्न हैं जो मुझसे अनेकों बार पूछे गये हैं। अभी कुछ दिन पहले एक सज्जन जिन्हें मैं एक अंतराल से जानता हूँ, उनके द्वारा ये प्रश्न पूछे गये। मैंने उत्तर भेज दिया। तत्पश्चात्, मैंने सोचा कि यह उत्तर मुझे अन्य व्यक्तियों के साथ भी साझा करने चाहियें। भविष्य में इस लेख का सन्दर्भ दे कर मैं समय की बचत कर सकता हूँ।

उन प्रश्नों का मैं यहाँ भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ –

१. मैं एक विशेष देव की पूजा करता हूँ। यदि मैं किसी अन्य रूप की भी पूजा करने लगूँ, अथवा अन्य मार्गों का अन्वेषण करना चाहूं, तो क्या इससे मेरे ईष्ट देव नाराज़ हो जाएँगे?
२. क्या गुरु सदा पूर्ण होता है? अथवा, क्या वास्तव में कोई व्यक्ति पूर्ण हो भी सकता है? केवल ईश्वर ही पूर्ण होते हैं।

मेरे विचार यह हैं –

अन्य रूपों की पूजा-अर्चना

ईश्वर हर प्राणी में समान रूप से विराजमान हैं। श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं –

समोऽहं सर्व भूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय |  (भ० गीता ९.२९)

व्याख्या – मैं समदर्शी व निष्पक्ष हूँ, एवं हर प्राणी में समान रूप से विद्यमान हूँ , व मेरी सबके साथ समता है। मेरा कोई व्यक्तिगत कृपापात्र नहीं, और, न ही कोई मेरी घृणा का पात्र है।
यदि आप अन्य मार्गों या मत-मतांतरों के अन्वेषण का निर्णय लेते हैं तो आपका ईश्वर आपसे नाराज़ नहीं होगा। और, यदि वह नाराज़ होता है तो वह ईश्वर कैसे हो सकता है? क्या आप यह मानते हैं कि ईश्वर मान-अपमान, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित आदि द्वंद्व में फँसे हुए हैं? द्वंद्व अनुभव करना एक साधारण मनुष्य का गुण होता हैं। वह भाव जो आपको सत्य व आत्म-अन्वेषण के मार्ग पर बढ़ने में सहायक होता हो, उसे निःसंकोच, निडर भाव से अपनाएँ।

अन्य मार्गों का अन्वेषण आपकी सोच को एक बृहत आयाम प्रदान करता है, किंतु, इसका मूल्य चुकाना होता है। आत्म-साक्षात्कार तक पहुँचने से पूर्व विभिन्न प्रकार के मार्गों की खोजबीन आपकी एकाग्रता, विभिन्न ऊर्जाओं व आस्था को मंद करती है, ऐसा स्वतः होता है। आपके ईश्वर आपके स्वयं के संस्कार, मन की बाधिता व विचारों का ही प्रतिरूप होते हैं। यदि आपके विचारों ने ईश्वर का ऐसा रूप गढ़ लिया है जो प्रसन्न अथवा अप्रसन्न हो सकता है, अथवा, आपके कृत्यों से प्रभावित हो क्रोधित हो जाएगा, तो शायद आपके लिए पुनः विचार करना आपेक्षित है। आप “अपने संसार” में अपना स्वयं का ईश्वर स्थापित करने के अधिकारी हैं। किंतु यह आवश्यक नहीं कि उस रूप का “संपूर्ण संसार” के ईश्वरीय प्रारूप से भी एकीकरण हो।

आदर्श व्यक्ति

हर व्यक्ति उतना ही पूर्ण है जितना कोई अन्य; बिल्कुल ऐसे ही जैसे प्रत्येक व्यक्ति उतना ही अपूर्ण है जितना कोई अन्य। यदि आप मानते हैं कि कोई भी त्रुटि-शून्य अथवा पूर्ण नहीं हो सकता और वह आस्था आपको एक योग्य, सशक्त व प्रसन्नचित व्यक्ति बनने में सहायक है तो आपको उस आस्था के प्रति तब तक दृढ़ रहना चाहिए जब तक आपको एक उन्नत विकल्प न मिल जाए।

इस बिंदु पर मेरा दृष्टिकोण कुछ भिन्न है, किंतु यदि मैं आपको अपना उत्तर बताता हूँ तो वह आपको मेरे विचारों द्वारा प्रतिबंधित करना हो जाएगा, भले ही सूक्ष्म रूप से ही ऐसा हो। वस्तुतः इसका उत्तर आपके स्वयं के द्वारा अपने सत्य की खोज की दिशा में स्वयं ही खोजा व अनुभव किया जाना चाहिए।

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा |  (भ० गीता १७.२)

श्री कृष्ण कहते हैं – श्रद्धा तीन प्रकार की होती है। ऐसी श्रद्धा मनुष्य के वर्तमान जीवन व पिछले जन्म, दोनों के संस्कारों के आधार पर निर्मित होती हैं।

यदि चित्रकला का एक सर्वश्रेष्ठ नमूना हो सकता है; एक सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कथानक हो सकता है; कोई अति स्वादिष्ट व्यंजन हो सकता है तो, मेरे विचार में, उनके रचयिता भी, कम से कम अपने अपने क्षेत्र में तो अवश्य ही सर्वश्रेष्ठ होंगे। यदि किसी के मत में इन वर्णित क्षेत्रों में कोई सर्वश्रेष्ठ नहीं है, तो ऐसे व्यक्ति के लिए कभी भी कोई भी मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हो ही कैसे सकता है!सर्वश्रेष्ठता – संपूर्णत: एक व्यक्तिनिष्ठ व सापेक्ष तथ्य है, चूँकि यह प्रत्येक मनुष्य की अपनी निजी समझ पर आधारित होता है। कुछ जाँचकर्ता किसी को भी पूर्णांक नहीं देते, वहीं कुछ अन्य बहुत आसानी से ऐसा कर लेते हैं।

आत्म-साक्षात्कार सर्वश्रेष्ठ बनने की यात्रा नहीं है; यह तो उसे पुनः परिभाषित करना है।

शांति।
स्वामी